श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कारण लेना-देना अथवा आना-जाना आदि इन्द्रियों का चलन आत्माराम ही करता रहता है, ऐसा उन्हें अनुभव
होता है। इस प्रकार जब इन्द्रियाँ कष्ट करने लगती हैं तो उस कष्ट में भी आत्मसुख ही प्रकट होता है। इससे
इन्द्रियों को उत्तम प्रकार का विश्राम मिलता है। इस प्रकार हरिभक्तों के हिस्से में स्वानन्द की पेठ (बाजार) ही
आ जाती है। जिससे इन्द्रियों को कष्ट होता है, उससे ही उसे सुख भी प्राप्त होता है यह भगवद्भजन की युक्ति
है। इस प्रकार हरिभक्त हरि के स्मरण से नित्यमुक्ति भोगते रहते हैं। जन्म और मरण तो देह के साथ लिखा हुआ
है किन्तु भक्त देह में होते हुए भी विदेही होते हैं। हरि चरणों का ध्यान करते-करते वे हरिरूप हो जाते हैं।
इसलिए भगवद् भक्तों को देह का अहंकार कभी उत्पन्न नहीं होता। हे राजाधिराज! उस भक्त की पूर्णता का वर्णन
करता हूँ, सुनो। देह को यदि बाघ पकड़ ले तो भी भक्त का मन विचलित नहीं होता। क्योंकि वह जानता है कि
देह का मरण बाँझ स्त्री के बच्चे को सूली पर चढ़ाने की तरह है। जिस प्रकार कोई यह नहीं चाहता कि उसकी
छाया पालकी में बैठे उसी प्रकार देह को कोई बड़ी मान्यता या सम्मान मिले यह इच्छा भक्त के मन में
स्वाभाविक रूप से ही नहीं आती। अथवा शरीर पर कितनी ही आपदाएँ क्यों न आएँ लेकिन भक्तों के मन में
कभी भी उसके प्रति खेद नहीं उत्पन्न होता। यदि आकाश पर तलवार से घाव किया जाए तो वह करुणा का
प्रदर्शन नहीं करता, वैसी ही बात है। देह माँ के गर्भ से उत्पन्न होता है लेकिन 'मैंने जन्म लिया' यह बात भक्त
नहीं करता। जलकुण्ड में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है तो सूर्य यह नहीं कहता कि मैं जलकुण्ड बन गया हूँ।
सुबह से शाम तक सूर्य प्रकाश देता है, उस प्रकाश से बादलों में गन्धर्वनगर का आभास होता है (सूर्य यह नहीं
कहता कि गन्धर्व नगर मैंने उत्पन्न किया है) उसी प्रकार जो अदृष्ट है वही शरीर की सुरक्षा करता है। वहाँ मैं
कर रहा हूँ यह बात उसके मन में नहीं आती। भक्त की देह को मरण आता है, लेकिन उसे हेतुरहित हरि का
स्मरण रहता है। इसलिए देह भले ही मर जाए लेकिन वह बिना मरे पूर्णत्व के कारण पूर्णत्व में ही शेष रहता है।
जलाशय का पानी सूख जाने पर सूर्य यह नहीं कहता कि मैं अदृश्य हो गया हूँ। उसी प्रकार देह नष्ट होने पर भी
भक्त हरिस्मरण के कारण अपने सद्रूप से विश्व में छाया रहता है। रस्सी पर भासित होने वाले सर्प को क्या पहले
मार कर फिर रस्सी को रस्सी बनाया जाता है ? अपने मूल स्वरूप को बदले बिना डोरी डोर के ही रूप में
अखण्ड रहती है। उसी प्रकार हरिभक्त को देह का अभाव रहता है। फिर काल प्रहार किस पर करेगा ? अब हम
तो खुद ही ब्रह्मरूप हैं और उस ब्रह्मत्व के कारण हमारा अहंभाव (मैं देह ही हूँ यह अभिमान) व्यर्थ हो गया।
इस प्रकार संसार के देहधर्म और कर्माकर्म जिसे स्पर्श भी नहीं करते, जिसे मोह के कारण संसारभ्रम नहीं होता,
वही भक्तों में उत्तम है। राजा तुम्हें एक और भी लक्षण बताता हूँ। जिसका काम भी नारायण हो जाता है, ऐसा
भक्तलक्षण बताता हूँ।
न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः ।
वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५०॥
अंतःकरण में आत्माराम का चिन्तन करते-करते हृदय का काम आत्मरूप हो जाता है। देवाधिदेव पुरुषोत्तम
उससे सन्तुष्ट होकर सारे कर्मों में प्रकट होता है। इसलिए हृदय में जो भी वासनाएँ रहती हैं वे सब हरिसुख के
वश हो जाती है। इस प्रकार जब सारी वासनाएँ हरि के ही वश हो जाती हैं तो उन्हें हरि ही दृढ़ आश्रय हो जाता
है। उस समय भक्त का जो भी विषयाभिलाष होता है वह आत्माराम ही हो जाता है। उसकी वासना का
निजसंभ्रम स्वयं पुरुषोत्तम हो जाता है। संसार में हरि की भक्ति सर्वोत्तम है। वह भक्त को काम से ही निष्काम