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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 869 में से

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पृष्ठ 71

द्वितीय अध्याय ५५
मिलता है वह सब अग्नि ही बन जाता है, उसी प्रकार अभेदरूप हुआ भक्त जो कुछ भी देखता है वह सब
स्वाभाविक रूप से आत्मस्वरूप ही हो जाता है। अपना धन दूसरे को देते समय उसके मन में शंका नहीं आती।
दूजेपन की वार्ता भी उसे सुनाई नहीं देती और कोई विकल्प की बात करता है तो वह उसके गले नहीं उतरती।
बायें हाथ की वस्तु दाहिने हाथ में दी जाये तो देनेवाला कौन और लेने वाला कौन ? उसी प्रकार समस्त प्राणिमात्र
के प्रति उसकी एकात्मता ही हो जाती है। भक्तों को स्वयं अपने शरीर में भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं
दिखाई देता इसलिए उनके मन में शान्ति बनी रहती है। अपनी उस समदृष्टिरूप शान्ति में भगवद्भक्त क्रीड़ा
करते रहते हैं इसीलिए उन्हें सचमुच ही उत्तमत्त्व की प्राप्ति होती है। हे राजा ! अब हरिभक्तों की 'निरपेक्षता'
बताता हूँ, सुनो। उत्तम भक्तों की कथा सुनाते समय हरि के मन को अत्यन्त उल्लास हो रहा था। (उसने कहा)
जो निरपेक्ष है वही 'मुख्य भक्त' है। निरपेक्ष ही वास्तव में 'विरक्त' और निरपेक्ष ही 'नित्यमुक्त' है। क्योंकि
भगवान सचमुच ही निरपेक्ष है।
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठस्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविन्दाल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रयः ॥ ५३ ॥
अपना सच्चा स्वार्थ साधने की अवस्था में सप्रेम भक्ति करते समय भक्त अपनी सारी वृत्ति हरि के चरणों
पर केन्द्रित करता है। उस समय त्रैलोक्य की सारी सम्पत्ति हाथ जोड़कर यदि उसका वरण करने आये तो भी वह
अपनी चित्तवृत्ति एक क्षण के लिए भी हरिचरणों से दूर करने के लिये तैयार नहीं रहता। परमार्थ के प्रति वह
इतना अधिक आसक्त रहता है। यदि क्षणभर के लिए भी वह अपनी चित्तवृत्ति वहाँ से हटा ले तो त्रैलोक्य की
सम्पत्ति उसके हाथ लगे। तो फिर इतना स्वार्थ त्याग करने में हरिभक्त का क्या लाभ है ? तो उसका कारण यह है
कि हरिचरणों में लीन होने में जो साक्षात्कार होता है, उस क्षणार्ध में लाभ के सामने भक्तों को त्रैलोक्य का वैभव
अथवा सम्पत्ति तुच्छ मालूम होती है। सारे संसार को उत्पन्न करने वाला ब्रह्मदेव पितामह जिसके आँगन में
त्रैलोक्य की सम्पत्ति ऐसी ही पड़ी रहती है, उस सम्पत्ति के सामने उसका ब्रह्मपद भी काफी श्रेष्ठ है लेकिन वह
ब्रह्मदेव भी अपने सुखस्वार्थ के लिए-हरिचरणों को खोजता रहता है।
ब्रह्मलोक की सम्पत्ति और वैभव को ठुकराकर ब्रह्मदेव एकान्त में बैठकर दिन-रात हरिचरणों का ध्यान
करते रहते हैं। फिर भी उन्हें एकाएक उसकी प्राप्ति नहीं होती। यह बात ध्यान में रखो कि ब्रह्मदेव को हरिचरण
प्राप्त न होने के कारण ही वह घमण्डी हो गया था और गोकुल के गोपाल तथा बछड़ों को चुराकर ले गया था।
उस समय स्वयं बिना कोई कष्ट किये और अपना कृष्णपना भी न तोड़ते हुए वह पूर्णत्व से गोपाल और उनके
बछड़े स्वयं बन कर रहा। हरि की यह अद्भुत लीला देखकर ब्रह्मदेव बौरा गया और अपने ब्रह्मपद का अभिमान
त्याग कर अनन्यभाव से हरि की शरण में आया। ब्रह्मदेव भी जिसके चरण पकड़ता है वह कैलाशपति शंकर भी
अपने कैलाश का राज्य त्याग कर महाश्मशान में बैठकर हरिचरणों का ध्यान करता रहता है। कमर में कौपीन
बाँधकर, पूरे शरीर में भभूत रचाकर, मस्तक पर जटा धारण कर तथा मस्तक पर हरिचरणों का तीर्थ (गंगा)
रखकर अपने हृदय में निरन्तर हरिचरणों का चिन्तन करता रहता है। इस प्रकार जहाँ ब्रह्मदेव और शंकर इन दोनों
को ही हरिचरणों का पता नहीं रहता वहाँ त्रैलोक्य के वैभव को जो श्रेष्ठ मानता है, वह पापी नितान्त भाग्यहीन
होना चाहिए। हरिचरणों की एक क्षण की प्राप्ति के आगे भक्त लोग त्रैलोक्य के वैभव को न्योछावर कर देते हैं,
इसे ध्यान में रखो। हरिचरणसारामृत की मधुरता का स्वाद यदि क्षणभर के लिए भी मिल जाए तो उस पर