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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

इक्कीसवाँ अध्याय ५६१
वाणी का अपार विस्तार हुआ है। स्वर और वर्ण आदि के उच्चार से वेदों की अधिष्ठान वैखरी वाणी कैसे उत्पन्न
हुई, वह भी बताता हूँ, सुनो।
ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम्॥ ३९ ॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४० ॥
अ-उ-म ये तीन मात्राएँ जब एकत्र होती हैं तो लोग उसे 'ओंकार' कहते हैं। यह ओंकार अलौकिक है
तथा अत्यन्त सूक्ष्म रूप से देह में ही रहता है। उसी ओंकार को प्राण की संगति से जब मूलाधारादि चक्र में
उर्ध्वगति प्रारम्भ होती है तब परा, पश्यंति, मध्यमा वाणी की अभिव्यक्ति होती है। परा वाणी के भीतर 'पश्यंति'
श्रेष्ठ रूप में जन्म लेती है। उसके गर्भ से 'मध्यमा' का जन्म होता है। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरी से उत्पन्न
होती हैं। उसी प्रकार वे क्षणभर के लिये भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं रहतीं। एक-दूसरे को साथ लेकर वे
पहले एक चक्र, फिर दूसरा चक्र और तीसरा चक्र पार करते हुए ऊपर चढ़ती जाती हैं। 'मूलाधार' चक्र में 'परा'
वाचा उत्पन्न होती है। 'स्वाधिष्ठान' चक्र में, पश्यंती का जन्म होता है और 'मणिपुर' चक्र से 'विशुद्धि' चक्र तक
'मध्यमा' का आवागमन चलता रहता है। वहाँ से मुख के द्वारा 'वैखरी' वाणी प्रकट होती है। तब वह स्वर वर्ण
के उच्चार से अनेक मंत्ररूपों में गरजती रहती है। उन्हीं स्वरों में 'स्पर्श' वर्ण, 'असंख्य वर्ण' तथा 'ऊष्म' वर्ण के
विभाग सुनो। केवल अ से अः ये स्वर, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग इस प्रकार पाँच वर्णों के पाँच पंचक अर्थात्
पचीस अक्षरों को स्पर्शवर्ण कहते हैं। जिनकी सहायता से ही वर्णों का ठीक तरह उच्चार हो पाता है वे
अकारादिक सोलह 'स्वर' हैं। य, र, ल, व को 'अंतस्थ' वर्ण कहते हैं और श, ष, स, ह इन चार वर्णों को
शास्त्रकार 'ऊष्म' स्वर कहते हैं। अ-अः ये अनुस्वार तथा विसर्ग विभाग हैं। इसमें क्षकार वह केवल बावनवी
मातृका है। इनमें और अतिरिक्त निरनुनासिक तथा सानुनासिक ये भेद शास्त्रज्ञ जानते ही हैं। इस प्रकार स्वर और
वर्ण इनके यथाशास्त्र उच्चार से तथा वेदशास्त्रों के अर्थ प्रकार से लौकिक और वैदिक भाषा का विस्तार हुआ है।
शब्दों की अनेक प्रकार की उत्पत्ति का प्रयोग कर शब्दों से ही शब्द का खण्डन करते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार
के शब्द कौशल्य से यह वैखरी वाणी विस्तार पायी है। वही चार-चार अक्षरों से बढ़कर उसी के अनेक छंद हो
गये हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे चार अक्षरों के बढ़ने से नये-नये अनेक छंद साध कर वेद ने अपने ज्ञान का बोध
प्रकट किया है। इसीलिये वह वैखरी वाणी अनंत और अपार है। शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से वह अत्यन्त
कठिन है। मेरे शब्द ज्ञान की थाह सुरनरों को भी नहीं लग पाती। वैखरी की शक्ति अनंत है इसीलिये उसे 'बृहती'
कहते हैं। इसके विस्तार की मर्यादा शंकर और ब्रह्मदेव भी नहीं जानते। स्वयं हिरण्यगर्भ के रूप में जीव, शिव
और अंतर्यामी इन्हें मेरी वेदाज्ञा प्रकट करती है। उसी का नामकरण है 'वैखरी'। मैं वेदात्मा श्रीहरि इस प्रकार वेद
का विस्तार करता हूँ। स्वयं ही उसका विस्तार कर उसकी मर्यादा समाप्त होने के समय उसका संहार भी मैं ही
करता हूँ। पहले जो छंद बता दिये थे उनके निजलक्षण, वेद का कारण अर्थात् परमात्मा श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।
त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद्विराट् ॥ ४१ ॥
'गायत्री छंद' सभी छंदों का प्रमुख अधिष्ठान है। उस गायत्री छंद का लक्षण तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण और गिनते समय जिसमें शुद्ध यति (विराम) आराम आता है, उसे गायत्री छंद

५६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। वेदोक्ति का यही मुख्य बीज है। वेद का रहस्य, ब्रह्मज्ञान का दूसरा छोर और परमानंद का शुद्ध
सारतत्त्व, वही गायत्री है। यह चैतन्य का जीवन तथा मेरे गुप्त का गुप्त धन है। जिसमें जीव-शिव का समाधान
होता है, वही यह गायत्री छंद है। इस छंद का एक-एक अक्षर परब्रह्म का सार है और गायत्री सचमुच ही
सच्चिदानन्द का भंडार है। गायत्री का अनुष्ठान कर विश्वामित्र क्षत्रिय से राजा बना। मैं कृष्ण भी उसका वंदन
करता हूँ। रामावतार में वह मेरा भी गुरु था। इसलिये सारे छंदों में मुख्यतः गायत्री छंद ही श्रेष्ठ है। इसके पीछे
लग कर ही अन्य छन्द पावन होते हैं। गायत्री छंद के अक्षरों में चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'उष्णिक'
छंद उत्पन्न होता है। उष्णिक छंद में और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'अनुष्टुप' छंद उत्पन्न होता है।
उसमें और चार अक्षर मिलाने से उससे भी बड़ा 'बृहती' छंद होता है। इसी प्रकार 'पंक्ति-त्रिष्टुप-गजती-
अत्यष्टि-अतिजगती' आदि छंद, चार-चार अक्षर अधिक जोड़ने से वेदवाणी विभाग के छंद बन जाते हैं। ऐसे
चार-चार अक्षर अधिक लगाकर अनेक छंदों की पंक्ति तैयार होती है और वेदराज की राजधानी उस मंत्रध्वनि से
गरजती रहती है। उनके अक्षरों की गिनती नहीं हो पाती, शाखाओं का पता नहीं चल पाता, अर्थज्ञान और
शब्दज्ञान भी समझ में नहीं आता। इस प्रकार वेद का वैभव दुर्गम है।
किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।
इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद वेद कश्चन्॥ ४२ ॥
कर्मकाण्ड के विधिनिषेध बताते समय वेद किस अर्थ से त्याग की निंदा करता है और साधक के हित में
किस अर्थ का प्रतिपादन करता है; मंत्रकाण्ड ने सभी मंत्र मूर्ति का उल्लेख कर आयुधों के प्रकार, उपासना
तथा उपास्य आदि भाग बताकर भक्ति किस लिये करवायी है? ज्ञानकाण्ड में सचमुच किस पदार्थ का निषेध
किया है? और किस अर्थ का प्रतिपादन कर आत्मज्ञान का उपदेश किया है? इस प्रकार वेद का अटल मूल
क्या है? अथवा विधिविधान के साथ मुख्य फल कौन-सा है? यह जानने लायक ज्ञान मनुष्य की बात दूर,
लेकिन देवताओं को भी नहीं है। सचमुच, उस वेदार्थ को ठीक तरह से जानने वाला मैं ही एक सर्वज्ञ हूँ। मेरी
कृपा के बिना यह अर्थ ब्रह्मदेव आदि के हाथ भी नहीं लगेगा। यह सुनकर उद्धव ने सोचा, वेद का सच्चा
अर्थसार केवल भगवान को ही मालूम है और श्रीकृष्ण भक्त के प्रति कृपालु हैं अर्थात् वे शायद मुझ पर भी
दया कर मुझे वह अर्थ बता दें। उद्धव के मन का उद्देश्य जानकर भगवान आगे खिसके और वेदार्थ का सारांश
श्लोक रूप में सुनाने लगे।
मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।
एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।
मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३॥
मेरे स्वरूप की प्राप्ति होने के लिये, मलिनचित्त लोगों की चित्तशुद्धि के लिये वेद ने स्वधर्म का प्रतिपादन
किया है और निषेध बताकर विषयों का त्याग करवाया है। उसमें अग्निहोत्र आदि का विधान और यज्ञ का
कर्माचरण चित्तशुद्धि के लिये अन्यन्त कारणीभूत है। उसके योग से प्रखर वैराग्य उत्पन्न होता है। वैराग्य उत्पन्न
हो जाय और यहाँ की विषय निवृत्ति हो जाय तो साधक को सहजास्थिति से मेरी प्राप्ति होती है। अब जो विषयों
की बाधकता समझते हैं किन्तु उनमें उनका त्याग करने का सामर्थ्य नहीं होता, ऐसे साधकों के लिये वेद ने मेरी
भक्ति प्रकट की है। इसमें मंत्र-मूर्ति की उपासना, मेरे सगुण रूप का अनुष्ठान और एकनिष्ठा से भजन करने से

इक्कीसवाँ अध्याय ५६३

रजोगुण और तमोगुण का नाश होता है। फिर शुद्ध सत्त्ववृत्ति ही शेष रहती है। इससे श्रवण कीर्तन में प्रेम उपजता
है और समस्त प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना उत्पन्न होकर उससे मेरी चौथी भक्ति का लाभ होता है। मेरी चौथी
भक्ति प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुक्ति भी अच्छी नहीं लगती। अद्वैत भजन के आगे वे मोक्ष का भी धिःकार
करते हैं। अद्वैत बोध से मेरा भजन करने पर अनंत, अपार और चिद्घन स्वरूप भक्तों के मैं वश में हो जाता हूँ और
मेरे भक्तों को मद्रूप प्राप्त होता है। उस समय भज्य, भजक और भजन; पूज्य, पूजक और पूजन; साध्य, साधक
और साधन यह सब वह स्वयं ही हो जाता है। मेरा ऐश्वर्य, सामर्थ्य और शक्ति मेरे भक्तों के हाथ में आती है।
अद्वैतभजन के प्रेम से ही मेरे भक्तों को मेरे पद की प्राप्ति होती है। मैं देवता और वह भक्त यह बाह्य अंतर केवल
नाम का ही रह जाता है। आंतरिक दृष्टि से देखा जाय तो दोनों निजात्मज्ञान के कारण सच्चिदानंद स्वरूप ही रहते
हैं। उद्धव ! उपासनाकांड यही है। इस प्रकार साधक मेरी भक्ति करके निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करते हैं।
माया प्रतिबिम्बित चैतन्य जिसका उल्लेख 'त्वं' इस पदार्थ से करते हैं, उसे अविद्या के कारण 'जीव' की संज्ञा
प्राप्त होती है। स्वप्न में हम जिस प्रकार अपने अनेक रूप देखते हैं उसी प्रकार अविद्या के कारण आया हुआ
यह जीवत्व एकदेशी है। जो मायाजन्य चैतन्य, जो योगजन्य होकर जगत की उत्पत्ति का कारण, जो सर्वद्रष्टा,
सर्वज्ञ, सदा सर्वकाल ऐश्वर्य सम्पन्न, जो सभी कर्मों का कर्त्ता, किन्तु कर्ता होते हुए भी अकर्ता; और जिसमें
स्वाभाविक रूप से स्वयंभू नित्यमुक्तता होती है; जिसकी नैसर्गिक अकुंठित सत्ता, तो सदा परमानंद से पूर्ण रहती
है, जो ईश्वर होने के कारण सर्वसमर्थ है; वह (शिव) 'तत्' पदार्थ का वाच्यार्थ है। उस जीव का अज्ञान छोड़
तथा शिव की सर्वज्ञता भी छोड़कर दोनों के बीच का सार (लक्ष्यार्थ तत्त्व) उसी से ऐक्य पाकर अपना हेतु सिद्ध
करते हैं। विवाह के समय उम्र में कम पति अगर परदेश चला जाय और वही कुछ समय बाद अकस्मात परदेश
में यौवन सम्पन्न दिखायी दिया तो उस समय की बाल्यदशा छोड़कर और आज की यौवनावस्था छोड़कर उसकी
पत्नी उसके मूल स्वरूप को लक्ष्य कर जैसा व्यवहार करती है, उसी प्रकार हे उद्धव 'त्वंपद' और 'तत्पद' इन
दोनों का वाक्-अर्थ छोड़ देना चाहिये और ऐक्यभाव से जो दिखायी दे, उसका लक्ष्यार्थ स्वीकार करें यह
ज्ञानकाण्ड का इत्यर्थ है। जीव और शिव का ऐक्य साध कर मेरे चिद्स्वरूप में समाधान प्राप्त करें। यह बात वेद
ने सम्पूर्ण ज्ञानकाण्ड में कही है। वेद के तीनों काण्ड आदि-मध्य-अंत मुझे ही लक्षित हैं। यही अर्थ ग्रन्थ के अंत
में उपसंहार करते हुए श्रीकृष्ण बता रहे हैं। उद्धव ! वेद का भाषण अर्थ की गम्भीरता के कारण अत्यन्त गहन है।
उसके सम्बन्ध में अनेक ऋषियों ने काफी परिश्रम किया फिर सच्चा अर्थ उनकी समझ में नहीं आया। वही
वेदार्थ का सार मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बताया। भगवान का भाषण सुनकर उद्धव को आश्चर्य लगा और उसने
मन ही मन कहा कि वेद का यह सार भगवान और क्यों नहीं बताते ? बछड़े के मुँह लगाने से गाय के थन से
दूध आते ही, दूध निकालने वाला बछड़े को दूध पीने से रोक देता है, उसी प्रकार यह अत्यन्त प्रिय विषय
भगवान ने बीच ही में क्यों बन्द कर दिया ? उद्धव मन ही मन छटपटाने लगा। चिड़िया के बच्चे चारा लेने के
लिये जिस प्रकार चोंच फैलाकर माँ के सामने बैठ जाते हैं, उसी प्रकार उद्धव श्रीकृष्ण के सामने मुँह खोलकर
बैठ गया। उद्धव का उद्देश्य ध्यान में आकर भगवान श्रीकृष्ण वेद का अर्थ संक्षेप में ग्रन्थ के अन्त में सारांश रूप
में बता रहे हैं। अनेक शाखाओं में प्रसिद्ध त्रिकांडात्मक बढ़ा हुआ वेद, उसका बोध यही है कि मुझ अभेद
परमात्मा का हाथ पकड़ कर श्रुति तीन कांडों में चल रही है। कर्म का आदि, मध्य और अन्त मैं ही हूँ; कर्मकर्त्ता
और क्रियाशक्ति मैं ही हूँ; कर्म का फल देने वाला श्रीपति मैं ही हूँ, यही कर्मकाण्ड का इत्यर्थ है। मंत्रमूर्ति और मंत्रार्थ
भी सचमुच मैं हूँ, पूज्य, पूज्यक और पूज्य यह सब मैं ही हूँ मेरे सिवा अन्य कुछ भी नहीं। देवता ही देवता की पूजा

५६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करें; देवता बनकर ही देवता को भजें, यही वेद का मेरा रहस्य और यही आगमों ने भी बताया है। मैं ही देवता हूँ
और भक्त भी मैं हूँ, पूजा का सारा साहित्य भी मैं ही हूँ, मेरी पूजा मैं ही करता हूँ। यही सम्पूर्ण उपासना है। वेद
के उपासना काण्ड का मुख्य सार यही है। आगमशास्त्र का गुप्त भण्डार यही है, मेरे भक्तों का निवासस्थान यही
वह उपासना है। 'ज्ञानकांड' तो अत्यन्त विचित्र है। उसमें वेद स्वयं ही अपना द्योतक बन जाता है। सारा संसार
ही यदि काल्पनिक है तो वेद को 'नियामक' किस अर्थ में मानें? उजाड़ घर में यदि कोई, निर्जीव मेहमान आ
जाय तो उसका आदरातिथ्य कौन करेगा? यही बात वेदाज्ञा की है। कठपुतली वाली गुड़िया के केश यदि मूँड़
दिये जायें तो उसके सिर पर पुन: केश नहीं आयेंगे। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में भी वेद को कोई स्थान नहीं है।
मूल संसार ही जब मायिक है तो उसका वेद भी मद्रूप होगा। मृगजल में उदक तो रहता ही नहीं है, लेकिन उसमें
गीलापन भी नहीं होता। जहाँ सारा कुछ अद्वैत ही है, वहाँ श्रोता और वक्ता कैसा? वहाँ वेदवार्त्ता कैसी? जहाँ
दृश्य, द्रष्टा और दर्शन नहीं है, जहाँ ध्येय, ध्याता और ध्यान नहीं है; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान नहीं है वहाँ वेदवचन
भी किसका होगा? जहाँ भ्रम का साम्राज्य और भेदभाव की बात रहती है, वहीं वेद की बुद्धि और उपनिषदों का
सुमधुर संगीत चलता है। भेद जब तक प्रबल है, तभी तक वेद का महात्म्य है; भेद जब अद्वैत में प्रवेश करता है
तो वेद भी 'नेति नेति' कहता हुआ विलीन हो जाता है। पानी की धारा जिस प्रकार पानी में ही विलीन हो जाती
है, उसी प्रकार वेद भी अद्वैत में विलीन हो जाता है। यही वास्तविक 'ज्ञानकांड' है। वह मैंने तुम्हें प्रेम से
बताया। जिस अरणीकाष्ठ से अग्नि उत्पन्न होता है उसी अरणी को जलाकर वह शांत होता है। उसी प्रकार
ज्ञानकांड निरूपण में वेद ने स्वयं को ही समाप्त कर दिया है। 'अद्वैतरूप ब्रह्म एक है' इस श्रुतिवाक्य से ही द्वैत
मिथ्या हो जाता है। इतना कहकर वेद अदृश्य हो जाता है और ब्रह्म अपनी सम्पूर्णता में सदा जैसा है वैसा ही
रहता है। निर्विकार शुद्ध ब्रह्म में 'मैं ब्रह्म' यह जो स्फूर्ति उत्पन्न होती है, वही ओंकार की उत्पत्ति होती है। उसे
'एकाक्षर ब्रह्म' कहते हैं। उसी ओंकार से स्वरवर्ण की उत्पत्ति हुई और श्रुति की बड़ी-बड़ी शाखाएँ उत्पन्न हो
गयीं। वह सारा ब्रह्मरूप ही है। इस प्रकार सारे वेद परब्रह्मरूप हैं। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार वास्तविक रूप
में सुवर्ण ही रहते हैं, उसी प्रकार श्रुति शाखाओं से होने वाला वेद का विस्तार भी ओंकार स्वरूप में मद्रूप ही है।
वेदों द्वारा प्रतिपादित पुरुषोत्तम, जो भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाला कल्पतरु ही है ऐसा मेघश्याम,
आत्माराम, श्रीकृष्ण ने कहा। तीनों कांडों का संबंध कहीं भी विरोध न होने वाला ही है। यही अत्यन्त शुद्ध वेद
का अर्थ है। उसे मैंने विस्तारपूर्वक बताया। हे उद्धव ! इससे अलग, वेद का कोई अर्थ नहीं है। वेद के इस अर्थ
की पहचान हृदय में अंकित करने से जीव-शिव का समाधान होता है। श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर उद्धव वेद
के अर्थ में निमग्न हो गया। उसकी दोनों आँखें भर आयीं और मन आत्मानंद में डूब गया। चित्त चैतन्य में
विलीन हो गया, हृदय द्रवित होने के कारण गला भर आया, स्वानंद का स्वाद मिलते ही देह रोमांचित हो उठा।
शरीर से पसीना छूटने लगा और देह काँपने लगा। आँखों में आनंदाश्रु भर आये और वाचा मौन हो गयी। मूर्छा
आने लगी लेकिन उसने अपने को सँभाल लिया। उसे स्मरण हो गया कि मन की यह लापरवाही ठीक नहीं है।
कहीं ऐसा न हो कि भगवान निजधाम चले जाएँ। इस भय से उसने आँखें खोलीं। उसने देखा, सामने मेघ की
तरह श्यामसुन्दर, मुकुट, कुण्डल और मेखला धारण किये हुए, पीताम्बर परिधान किये तथा गले में वनमाला
धारण किये श्रीकृष्ण खड़े हैं। वह हृदय में चैतन्यघन का अनुभव कर रहा था। आँखें खोलते ही आनंदघन की
मूर्ति उसी प्रकार सामने दिखायी देने लगी। वह कहने लगा कि श्रीकृष्ण चैतन्यघन है तथा चैतन्य की साकार मूर्ति
है। सगुण और निर्गुण रूप में श्रीकृष्ण परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप है। उद्धव कितना भाग्यशाली है। क्योंकि सगुण और

इक्कीसवाँ अध्याय ५६५
निर्गुण इन दोनों स्वरूपों के वास्तविक सुख का वह अकेला अनुभव कर रहा था। यह केवल श्रीकृष्ण कृपा का
माहात्म्य है। जब सद्गुरु की पूर्ण कृपा होती है, तब शिष्य की पसन्द ही उसका माप रहता है। वह यदि सगुण
मूर्ति चाहता है तो गुरु वैसी ही मूर्ति देते हैं। मन में निर्गुण मूर्ति की इच्छा हो तो गुरु की कृपा उसे निर्गुण स्वरूप
की स्थिति में साक्षात्कार कराती है अथवा जिसे सगुण और निर्गुण इन दोनों स्वरूपों का उपभोग करने की इच्छा
हो तो उसकी दोनों इच्छायें पूरी करने का सामर्थ्य कृपालु गुरु में रहता है। सद्गुरु की महिमा अगाध है। वेद भी
उसका बखान नहीं कर सकते। उनकी परिपूर्ण कृपा होने के बाद कौन-सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है ? श्रीकृष्ण
की कृपा से उद्धव की वह दुर्लभता समाप्त हो गयी और सगुण और निर्गुण दोनों श्रीकृष्ण ही हैं, यह बात हृदय
में अंकित हो गयी। श्रीकृष्ण की इस परिपूर्णता को जानकर, उसके चरण कमलों को लक्ष्य कर उद्धव ने उन्हें
साष्टांग दण्डवत किया। तब साँवले कृष्ण ने अपनी चारों बाहें फैला कर उसे आलिंगन में आबद्ध कर लिया।
उस आलिंगन का सुख अनुभवी ही जान सकता है। उस समय उद्धव को जो आनन्द हुआ उसका द्रष्टा एक
श्रीकृष्ण ही था। कृष्ण ने कहा, उद्धव ! मैंने वेदरहस्य का गुप्त खजाना, यह इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया।
इससे लिंगदेह का भाव टूटता है, जीव को जीवत्व का स्मरण नहीं होता वही इक्कीसवाँ अध्याय तुम्हें बताया
जिससे देहभावना मिथ्या होकर नामरूप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। वेदार्थ सार का यह निरूपण मेरे
विश्वात्मा का गुप्त निधान है। उद्धव ! मैंने अपना समझ कर ही तुम्हें मेरे जीव की पहचान करायी। उद्धव !
सहस्रों साधन करने पर भी, गुरुकृपा के बिना यह किसी के हाथ नहीं लगेगा। उस गुरुकृपा को साध्य करने के
लिये ही हमें पूर्ण स्वधर्म के अनुसार आचरण करना चाहिये, शास्त्र श्रवण तथा वेदपठन भी उसी के लिये करना
चाहिये और संतों का चरण स्पर्श करना चाहिये ताकि स्वामी जनार्दन प्रसन्न हो जाएँ। श्रीगुरु प्रसन्न होकर स्वयं
ही भागवत का निरूपण करा रहे हैं इसलिये एकनाथ जनार्दन से विनती कर रहा है कि उनकी नित्य नूतन कृपा
बनी रहे। अगले अध्याय में उद्धव प्रकृति-पुरुष का लक्षण तथा तत्त्वों की संख्या के सम्बन्ध में मधुर प्रश्न
पूछेगा। उसका उत्तर देते समय जन्म-मरण के प्रकार के सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बतायेंगे। उस कथा में गहन
परमार्थ दिखायी देगा। उस कथा का श्रवण करते समय वैराग्य प्रखर हो उठेगा, ऐसे विस्तार से श्रीकृष्ण स्वयं
निरूपण करेंगे। घटाकाश महाकाश में मिल जाता है, उसी प्रकार एकनाथ जनार्दन की शरण में आया है। उसके
चरणों का वंदन करते समय अपने आप ही रसाल निरूपण की स्फूर्ति होती है। ॐ तत्सत्।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे भगवदुद्धव संवादे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
वेदत्रय विभाग निरूपण नाम का एकविंशतितमोध्यायः ॥२१॥

बाईसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप, कठपुतली का खेल करने वाले सद्गुरु ! तुम्हें नमस्कार है। चौरासी लाख पुतलियों को
तुम पूर्वसंचित के अनुसार अपनी इच्छानुसार नचाते हो। हाथ की डोर तो नहीं देखने देते हो लेकिन पुतलियों को
तो स्वयं ही नचाते हो। फिर भी तुम सर्वदा उनसे अलिप्त रहते हो। तुम्हारा यह कौशल कितना अपूर्व है।
जिसका जैसा पूर्वकर्म रहता है उसके अनुसार वह नाचता रहता है। उसे नचाने की चेतनाशक्ति तुम्हारा हाथ न
रहते हुए भी तुम्हारे हाथ में रहती है। भारी लौहखण्ड को जिस प्रकार चुम्बक अपनी शक्ति से वश में करता है,
उसी प्रकार अपने सामर्थ्य से तुम भी समस्त प्राणिमात्र को नचाते हो। इस प्रकार ये जीव परतंत्र के अनुसार
नाचते रहते हैं, लेकिन उनका अहंकार कितना प्रबल होता है। देह का आकार सत्य है यह मानकर वे स्वयं को
स्वतंत्र ही कहते हैं। हम अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न तथा कर्म करने में अत्यन्त कुशल हैं और बाकी सब मूर्ख हैं इस
अभिमान को बढ़ाते हैं। इस प्रकार देहाभिमान के कारण अपना अकर्त्तापन भूलकर स्वप्नावस्था में हुई विषबाधां
की तरह कर्मबन्धन में पड़ जाते हैं। स्वप्न में विष का प्रभाव हुआ था, वह अब बिलकुल उतर गया है, इस
प्रकार बंध और मोक्ष को ये मूर्ख लोग सच मान लेते हैं। तुम्हारा यह कठपुतली का खेल मिथ्या होते हुए भी
तुम उसे सत्य का आभास देते हो। तुम्हारी यह महिमा अपूर्व है। तुम्हारी अतर्क्य लीला का कोई तर्क सम्भव
नहीं है। अचेतन में तुम चैतन्य का धर्म स्वयं दिखला देते हो, यह मर्म किसी को समझ में नहीं आता। तुम कर्म
करके भी अकर्ता हो। तुम अकर्ता होते हुए कर्ता बनते हो और कर्ता होते हुए अकर्ता बनते हो। यह तुम्हारी
कठपुतली की कला किसी की समझ में नहीं आती। तुम्हारी माया देखने जाओ तो वही माया देखने वाले को
ग्रस लेती है। उसे भी छोड़ दें तो; तुम्हें ही देखने जाओ तो वह सत्तावस्था भी मायिक थी। तुम्हारा चरित्र अगम्य
है इसलिये समझ में आना सम्भव नहीं है। अपने सूत्र को दृष्टि से ओझल रखकर तुम प्राणिमात्र को विचित्र ढंग
से नचाते हो। तुम्हारे ही कारण संसार चल रहा है लेकिन मैंने कुछ किया है ऐसा तुम्हें नहीं लगता है। ऐसा
तुम्हारा खेल है, वह कोई कैसे देखे ? इस प्रकार खेल बढ़ाते हो और झट विकल्प से तोड़ भी देते हो। महतत्व
में विकार भर देते हो। लेकिन इसके लिये भी तुम्हारे कर्तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इसका मुख्य लक्षण
तुम्हारी कृपा के बिना मालूम नहीं होता। तुम्हारी पूर्ण कृपा हो जाय तभी जन में जनार्दन प्रकट होता है और जब
जन में जनार्दन प्रकट होता है तभी हम भी तद्रूप होते हैं। यही उसका मूलबीज है। वहाँ 'मं' का 'तू' का भाव
नहीं रहता। 'मैं' 'तू' के बिना जन में नित्यानंद रूपी जनार्दन प्रसिद्ध है; उसकी कृपा से ही श्रीमद्भागवत का
ठीक तरह वर्णन हो रहा है। उसके इक्कीसवें अध्याय के अन्त में त्रिकांडात्मक वेद का लक्ष्यार्थ अर्थात् सर्वत्र
एक ही ब्रह्म है और वह अद्वय एवं अविनाशी है यह बतलाया गया है। वेदवाणी के अनुसार भी ब्रह्म एक ही है
और स्वानुभव से देखने पर भी वह वैसा ही दिखाई देता है। फिर भी बड़े-बड़े ऋषि और ज्ञाता तत्त्व अनेक हैं
ऐसा क्यों कहते हैं ? यही शंका मन में लाकर उद्धव ने प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया। लेकिन मन में एक ही भाव
था कि श्रीकृष्ण शान्त न बैठें। यदि मैं कहूँ कि 'मैं ब्रह्मस्वरूप हो गया' तो श्रीकृष्ण यह सुनकर निजधाम को
चले जायेंगे। इस उलझन में, उसने सन्देह न होते हुए भी प्रश्न किया। वह सुनकर श्रीकृष्ण को सुख और
समाधान का अनुभव हुआ। इतने में श्रीकृष्ण के मन में एक निराली ही बात आयी कि उद्धव और मैं तो एक ही

हैं, वियोग का दुःख तो मिथ्या है, यह बात उद्धव की समझ में आने तक क्यों न उसके प्रश्नों का उत्तर दें ? इस
बाईसवें अध्याय में वे कुल तत्त्वों की संख्या बतायेंगे, उसी के साथ-साथ प्रकृति पुरुष का विचार और
जन्ममरण का प्रकार भी बतायेंगे। आत्मा एक ही है या अनेक है यह मालूम हो, साथ ही तत्व संख्या भी ठीक
से ज्ञात हो इसलिये उद्धव प्रश्न पूछ रहा है।

उद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश संख्यातान्यूषिभिः प्रभो ।
नवैकादश पञ्च त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम ॥ १ ॥

हे विश्वात्मका, विश्वेश्वरा, हे विश्वधारका, हे विश्वसाक्षी, हे विश्वाकारा, हे विश्वैकसुंदरा श्रीकृष्ण ! तुम्हें
'विश्वात्मक' कहें तो जड़, मलिन एकदेशीयता और अज्ञानता का बोध होता है ऐसा तुम कहोगे, इसलिये तुम्हारा
प्रभुत्व बताता हूँ। जड़-मलिन-अज्ञानता यह सब माया के ही कारण होता है, जिसके नियंता तुम ही हो। यही
तुम्हारा अगाध प्रभुत्व है। इस प्रकार स्वामी श्रीकृष्ण का उत्तम ढंग से गौरव कर उद्धव ने अत्यन्त विनयपूर्वक
तत्वसंख्या के विचार पूछे। उसने कहा, तपसामर्थ्य में महासमर्थ, भूत-भविष्य जानने वाले जो बड़े-बड़े ऋषिवर्य
हैं उन्होंने निकाली हुई तत्त्वों की संख्या विचित्र-सी लगती है। वे उसके विविध प्रकार बताते हैं। उन्नीसवें
अध्याय में आपने ही तत्वों के सम्बन्ध में विचार विस्तार से बताये हैं। उसमें आपने तत्वों की जो संख्या बतायी
है वही मैं बताता हूँ। चौदहवें श्लोक के निरूपण में, हे श्रीकृष्ण ! तत्वों की गणना कर आपने निश्चयपूर्वक वह
संख्या अट्ठाईस बतायी। इस तत्त्वसंख्या के विचार में प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व और अहंकार और श्रेष्ठ पंच
महाभूत मिलाकर यह संख्या नौ हो गयी। इसके बाद दस इन्द्रिय, ग्यारहवाँ मन, पाँच विषय और तीनों गुण
मिलाकर यह संख्या अट्ठाईस होती है ऐसा आप ही ने निरूपण किया था। हे लक्ष्मीपते ! यही तुम्हारा मुख्य
निरूपण था। अब बड़े-बड़े ऋषियों का युक्तिवाद भी तुम्हें बताता हूँ। उसका अर्थ भी आपको बताता हूँ। उसे
आप ठीक तरह से सुन लें। ऐसा कह कर उद्धव स्वयं उनकी बातें बताने लगा। उसने कहा, आप ठीक तरह से
श्रवण करें। मैं एक चमत्कार बताता हूँ। प्रकृतिपुरुष में ही एक विचित्र प्रकार है।

केचित् षड्विंशति प्राहुरपरे पञ्चविंशतिम् ।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे ॥ २ ॥
केचित् सप्तदश प्राहुः षोडशैके त्रयोदश ।
एतावत्त्वं हि संख्यानामृषययो यद्विवक्षया ॥ ३ ॥

इन तत्वों की संख्या में बहुत बड़ा मतभेद है तथा बड़े-बड़े ऋषियों के इस संबंध में विवाद चल रहे हैं।
उन विवादों का सारांश भी मैं आपको स्पष्ट रूप से बताता हूँ। एक मत है कि ये तत्व छब्बीस हैं, दूसरा कहता
है, चुप रहो। कुल मिलाकर सारे तत्त्व पच्चीस ही हैं। तीसरा कहता है, आप लोग यहाँ अपना हठ लेकर क्यों बैठे
हैं ? सारे तत्त्व सात ही निश्चित हुए हैं। एक कहता है, कैसा आश्चर्य ! लोगों को बोलते हुए लाज नहीं लगती।
यह बकवास व्यर्थ है। वास्तव में नौ तत्त्व ही निश्चित हुए हैं। उनमें से एक जन हँस कर कहता है, आजकल
लोग बहुत बुद्धिमान हो गये हैं। व्यर्थ की बकवास करते हैं। तत्त्व कुल मिलाकर छः ही हैं। कुछ लोग कहते हैं,
दूर हटिये, तत्त्वसंख्या का विचार आपकी समझ में नहीं आता। बड़े लोगों से पूछने पर वे तत्त्वों की संख्या सत्रह

५६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही बताते हैं। एक कहता है विद्वत्ता के बल पर व्यर्थ की मगजमारी क्यों करते हैं? भगवान की लीला किसी की
समझ में नहीं आती। सोलह ही तत्त्व हैं। कोई इस संख्या को तेरह तक ही पहुँचाते हैं। एक कहता है, अपना
पांडित्य दूर रखिये, मूल तत्त्व चार ही हैं। दूसरा कहता है, सच पूछा जाय तो दो ही तत्त्व हैं। तीसरा कहता है, ये
सब वाचाल हैं, इनके मुँह कौन लगे? वास्तव में तत्त्व एक ही है और उसी के अनेक विस्तार हुए हैं। इस प्रकार
बड़े-बड़े ऋषियों ने सोच-विचार कर भिन्न-भिन्न मत प्रतिपादित किये हैं। ऐसी स्थिति में तुमने जो तत्त्वनिर्णय
बताया उसे ही निश्चित रूप में कैसे स्वीकार किया जाय?
गायन्ति पृथगायुष्मन्निदं नो वक्तुमर्हसि ॥ ३॥
तुम निजात्मरूपी परमेश्वर हो। तुम्हें जानने के लिये बड़े-बड़े ऋषियों ने नाना प्रकार के तर्क लड़ा कर
तत्त्व विचार बताये हैं। आपने तो एक ही तत्त्व बताया था और बड़े-बड़े ऋषि बताते हैं कि तत्त्व अनेक हैं। मुझे
इन तत्त्वों की निश्चित संख्या बताने के लिये आप ही योग्य हैं। इस प्रकार उद्धव ने श्रीकृष्ण से विनती की तो
वह प्रसन्न हो गया। बड़े-बड़े ऋषियों ने जिन तत्त्वों के बारे में बताया है वे सब सच ही हैं। सर्वज्ञ ज्ञाता यह बात
जानते हैं। इसी सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्री भगवानुवाच
युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४॥
जिसका जैसा ज्ञान होता है उसी के अनुसार वह तत्त्व बताता रहता है। उद्धव! इसी दृष्टि से ब्राह्मण जो
कहते हैं, उसे भी सत्य ही मानना चाहिये। 'अब जब सभी मत सच हैं तो अन्य मतों का खण्डन क्यों किया
जाय?' ऐसा मत कहो, उद्धव! उसका हृद्गत मैं तुम्हें बताता हूँ। मेरी माया अघटित बातें कराती हैं। हरिहर को
भी उसका आकलन नहीं हो पाता क्योंकि वह काल्पनिक सृष्टि का विस्तार कर त्रिभुवन पर अपनी मोहिनी
डालती है। उस माया का हाथ पकड़ महर्षि अपने मत के अनुसार जो भी कुछ बोलते हैं, वह सब वहाँ सच
ही होता है। जहाँ रस्सी सर्पाकार में दिखायी देती है, वहाँ उस साँप को सफेद, काला अथवा लाल कैसे कहा
जाय? तो जिसे जैसा भ्रम होता है, वैसा वह उसे दिखायी देता है। इस प्रकार आत्मतत्त्व एक ही है और वह
निर्गुण तथा निर्विकार है; किन्तु माया के कारण ब्राह्मण अनेक तत्त्वों का प्रतिपादन करते हैं। उनका वह
मायात्मक भाषण मायामय ही रहता है। अपने मत की पुष्टि में वे तरह-तरह के वाद-विवाद करते हैं। वे
विवाद किस प्रकार के होते हैं, वह भी तुम्हें बताता हूँ। इतना कहकर श्रीकृष्ण यथार्थ तत्त्वविचार स्वयं उद्धव
को बताने लगे। अगले पाँच श्लोकों का निरूपण, उद्धव को श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया हुआ तत्त्वों का
यथार्थ व्याख्यान है।
नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।
एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५॥
मेरी माया की शक्ति अत्यन्त प्रबल है; उससे प्रचण्ड अभिमान उत्पन्न होता है। उसके कारण विद्वद्जन
युक्ति-प्रयुक्ति से वाग्जाल की सृष्टि कर व्यर्थ का वितंडा करने लगते हैं। उनका शास्त्र श्रवणाभिमान प्रचण्ड
रहता है। 'तुम्हारी बात असत्य है, जो मैं कहता हूँ वही सच है, मेरे पास ग्रंथाधार है (ऐसा वे कहते हैं)।

बाईसवाँ अध्याय ५६९
सत्त्वरजादि गुणोत्पत्ति के कारण मेरी माया की अनेक शक्तियाँ हैं इसलिये गुण क्षुब्ध हो जाते हैं तो हमारा ही मत
सच है' ऐसे अभिमान से वे झगड़ा करने लगते हैं।
यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो गदतां पदम्।
प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनु शाम्यति ॥६॥
गुणक्षोभ से होने वाला अभिमान भयानक विकल्प उत्पन्न करता है और अतिवाद कर उस विकल्प की
युक्ति का खण्डन करता है। किन्तु इस गुणक्षोभ की बात छोड़ दी जाय तो रज का और तम का ह्रास होकर
सत्त्ववृत्ति प्रकाशित होती है। उस समय शम और दम का उत्कर्ष होता है। उस शमदम का प्रभाव ही कुछ ऐसा
होता है कि जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार विकल्प के साथ संकल्प और
वाद-विवाद अपने आप ही बन्द हो जाते हैं। लेकिन जो सर्वज्ञ ज्ञाता होते हैं, वे नाना प्रकार के तत्त्वों के सम्बन्ध
में नाना प्रकार के मतों का विचार कर उनका हृद्गत जान लेते हैं। वह भी तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।
पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥७॥
हे प्रियोत्तम पुरुषश्रेष्ठ उद्धव ! यथोचित ढंग से गुरु के पास शास्त्रपाठ लेकर आत्मनिष्ठा की साधना करते
रहते हैं। तत्त्वों की गणना के सम्बन्ध में जो लेख हैं, उनमें से किसी के अधिक तथा किसी के कम हैं। तत्त्व एक
से एक उत्पन्न होते हैं, इसे परस्पर का 'अनुप्रवेश' कहते हैं। उद्धव ! एक तत्त्व से अनेक तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
कारणरूप से ही कार्य की स्थिति होती है। अन्त में जो जहाँ के होते हैं, वहीं वे प्रवेश करते हैं। तत्त्वों की
उपपत्ति ऐसी है। तत्त्वों की जो पूर्वस्थिति होती है, वह कारण और जिससे वह उत्पन्न होता है वह कार्य होता है।
तत्त्व का विचार करने वाले पुरुष कार्यकारण का लक्षण इसी प्रकार बताते हैं। इसमें जैसी वक्ता की इच्छा रहती
है, उसी प्रकार उन तत्त्वों की संख्या होती है। कार्य और कारण को जो लोग एक ही मानते हैं, उनकी तत्त्वसंख्या
कम रहती है। उद्धव ! कार्य और कारण एक ही होने पर, गिनते समय उन्हें भिन्न-भिन्न मानते हैं इसलिये तत्त्वों
की संख्या सहज ही अधिक हो जाती है। इस प्रकार कार्य और कारण को अलग-अलग गिनने से तत्त्वों की
संख्या कम या अधिक होती है। इसी विषय का अधिक विश्लेषण और कार्यकारण के सम्बन्ध में अपना मत
श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च।
पूर्वस्मिन् वा परस्मिन् वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥
वायु आकाश से उत्पन्न हुआ है लेकिन वह आकाश छोड़कर कहीं नहीं गया है। वायु से अग्नि हुआ,
उसमें आकाश और वायु दोनों का ही समावेश हो गया। अग्नि से पानी उत्पन्न हुआ, उसमें तीनों का ही समावेश
हो गया। जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई, उसमें चारों का समावेश हो गया। इस प्रकार कार्य और कारण ये परस्पर
अभिन्न अर्थात् एकरूप रहते हैं। उसी तरह जैसे अलंकार और सुवर्ण अलग दिखायी देने पर भी एक ही रहते हैं।
तंतु और वस्त्र जिस प्रकार एकरूप दिखायी देते हैं, उसी प्रकार कार्यकारण भी परस्पर एकरूप दिखाई देते हैं।
शक्कर का नारियल या केला बनाने से वे अपने शक्कर के मूल स्वरूप को नहीं छोड़ते। उसी प्रकार कारण का
कार्य होने पर भी वे कारण रूप में एक ही रहते हैं। मिट्टी के लोंदे से विविध आकार के मटके बनाने पर भी उन

५७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सब में मिट्टी ही अखण्ड रहती है। उसी प्रकार कारण में कार्य रहता है, कारण से ही कार्य प्रकट होता है। यह
परस्परों का अनुप्रवेश है और उनमें एकरूपता हमेशा से ही है। एक कार्य और एक कारण ऐसा भिन्न-भिन्न मानने
पर तत्त्वसंख्या भी कम या अधिक होती है।
पौर्वापर्यमतोऽमीषां प्रसंख्यानमभीप्सताम्।
यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात्॥ ९॥
तत्त्वों की संख्या कम या अधिक होने में कहने वाले की इच्छा ही कारणीभूत होती है। जिसका जैसा ज्ञान
रहता है, जिसे जिस इष्ट मत का अभिमान रहता है, उसके अनुसार वे महर्षि बातें करते रहते हैं। इसके लिये वह
जिस मत के अनुसार बोलता है, वह उसके मत के अनुसार ठीक ही रहता है। यह बात मैं सर्वज्ञ श्रीहरि जानता
हूँ। इसलिये उनकी बात भी मैं जानता हूँ। अब हे उद्धव! ऋषियों ने जो छब्बीस तत्त्व चुने हैं, उनके बारे में मैं
तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०॥
उसमें प्रकृति, पुरुष महत्तत्त्व तथा अहंकार और पंच महाभूत, पाँच विषयों के साथ ग्यारह इन्द्रिय; इस
प्रकार कुल मिलाकर पच्चीस तत्त्व होते हैं। उसमें यदि जीव को ईश्वर से भिन्न मानें तो ये तत्त्व छब्बीस हो जाते
हैं। अनादिकाल से जो अविद्या चलती आ रही है, वही जीव के भिन्नत्त्व का कारण है। इसीलिये उसे देहाभिमान
होता है और कर्म का बन्धन दृढ़ हो जाता है। कर्त्तापन के अहंकार से हरकतें करता रहता है, इसलिये पाप-पुण्य
का भागी बनता है। विषय का लोभ बढ़ाते-बढ़ाते आत्मस्वरूप को ही भूल जाता है। बद्धता का बन्धन लग जाने
से कर्मपाश नहीं तोड़ पाता। इसलिये उसके उद्धार के लिये ज्ञानदाता सर्वज्ञ ईश्वर की आवश्यकता पड़ती है।
किन्तु "गुरु से यदि ज्ञानप्राप्ति होती है तो इसमें ईश्वर का आभार मानने की क्या आवश्यकता है ?" यदि ऐसा
कहोगे तो तुम्हें बता दूँ कि ईश्वर के बिना सद्गुरु से भी भेंट नहीं होती। उसी प्रकार सद्गुरु की प्राप्ति होने पर
भी, ईश्वर कृपा के बिना उसकी भक्ति सम्भव नहीं होती। सद्गुरु ही ईश्वरमूर्ति है यह बात वेदशास्त्रों को भी
मान्य है। गुरु और ईश्वर में जो भिन्नता करता है वह समझो डूब ही गया। सारांश, ईश्वर के अनुग्रह से ही जीव
ज्ञानसम्पन्न होता है और हे उद्धव ! गुरु ज्ञान का जो स्वरूप बताता है वह ईश्वर की कृपा के बिना मन में अंकित
नहीं होता, इसे ध्यान में रखो। जीव नियम्य और ईश्वर नियामक है। जीव अज्ञानी और ईश्वर ज्ञानदाता है। जीव
एकदेशीय होने के कारण मर्यादित है और ईश्वर सर्वदा सर्वव्यापक है। जीव हीन, दीन और अज्ञान है, ईश्वर
सर्वसमर्थ और सर्वज्ञ है। जीव को कर्म का दृढ़ बन्धन है और ईश्वर कर्म से परे है। इसी कारण से ईश्वर कृपा
से जीव को ज्ञान प्राप्त होता है और इसीलिये जीव ईश्वर से भिन्न है। अब शायद तुम यह कहोगे कि कर्माचरण
करने से जीव को ज्ञान प्राप्त होगा, लेकिन वैसा कभी नहीं होगा क्योंकि कर्म में जड़ता है। इसीलिये उसमें बन्धन
और अज्ञान है। उस कर्म में अत्यन्त बद्धता होती है, यह बात सज्ञान लोग जानते हैं। कर्म स्वभाव से ही जड़
अर्थात् अचेतन रहता है। उसे चेतना प्रदान करने वाला ईश्वर होता है। इसलिये यदि उसे ईश्वर को अर्पण नहीं
किया तो उस कर्म को ज्ञान कौन प्रदान करेगा ? कर्म जड़ होने के कारण उसे सत्ता नहीं होती; कर्मक्रिया को
जानने वाला ईश्वर होता है इसलिये उसका फल देने वाला और चेतना देने वाला भी ईश्वर ही होता है। ज्ञान ही
ईश्वर है और उसी ने इस सृष्टि का विस्तार किया है। उसका संहार करने वाला भी ईश्वर है। जीव को मोक्ष

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बाईसवाँ अध्याय ५७१
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अथवा स्वर्ग का फल देने वाला अथवा इहलोक में चलाने वाला सचमुच ईश्वर ही है। इसलिये जीव और ईश्वर
को भिन्न-भिन्न मानना अभीष्ट है इस उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने तत्त्वों की संख्या छब्बीस मानी है। अब उनके
मतानुसार पच्चीस तत्त्वों का विवरण अर्थात् जीवेश्वर की ऐक्यता को मानना भी तुम्हें बताता हूँ।
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि।
तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥
सच पूछो तो जीवेश्वर की एकता सहज और स्वाभाविक है। इसमें अणुमात्र का भी भेद नहीं है, यह
बिलकुल निश्चित है। सहज ही दर्पण में देखने पर एक व्यक्ति के दो रूप दिखायी देने लगते हैं लेकिन देखने
वाला स्वयं द्विधा नहीं हो जाता। उसी प्रकार तुम जीव और शिव को समझो। अविद्या में प्रतिबिम्बित होने वाला
जीव और उसका द्रष्टा सदाशिव है। लेकिन परस्पर एकता का जो उनका मूल स्वभाव है वह नहीं टूटता। दर्पण
में जिस प्रकार हम रहते हैं, उसी प्रकार तुम जीव और शिव को समझो। अविद्या में प्रतिबिम्बित होने वाला जीव
है और उसका द्रष्टा सदाशिव है। लेकिन परस्पर एकता का जो उनका मूल स्वभाव है वह नहीं टूटता। दर्पण में
जिस प्रकार हम रहते हैं, उसी प्रकार जीव रूप में शिव ही रहता है। चैतन्य धर्म से वे दोनों एक जैसे होते हैं।
उसका भी लक्षण सुनो। हम जैसी हलचल करते हैं, वैसी ही हलचल प्रतिबिम्ब में भी दिखायी पड़ती है। उसी
प्रकार ईश्वर की सत्ता जीव के विचरण के लिये कारणीभूत होती है। जैसा हमारा स्वरूप रहता है, वैसा ही
उसका प्रतिबिम्ब रहता है। उसी प्रकार जीव में भी परिपूर्ण ईश्वरत्व भरा हुआ है। जिस प्रकार राख से ढँकने पर
भी वह अग्नि के रूप में ही रहता है, उसी प्रकार शिव में जीवत्म आने पर भी वह आत्मस्वरूप से अलग नहीं
होता। (आशंका) जीव और शिव ये दोनों यदि एक हैं तो एक मलिन और दूसरा शुद्ध; एक सदोष, एक निर्दोष
इस प्रकार भिन्न-भिन्न क्यों दिखायी देते हैं ? (समाधान) किसी जलाशय में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है तो
उसमें प्रतिबिम्ब को जलाशय की गन्दगी भी लगी हुई दिखायी देती है। लेकिन ठीक तरह से देखने पर उस
बिम्ब को कहीं भी गन्दगी लगी नहीं दिखायी देती, वह दोनों निर्मल ही रहते हैं। यदि गन्दगी जलाशय में है या
दर्पण में है तो उसे अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर साफ करना चाहिये। उसी प्रकार सदोष अथवा निर्दोष अविद्या ही
है; जीव और शिव सदासर्वदा आत्मस्वरूप से निर्दोष ही रहते हैं। स्फटिक स्वच्छ ही रहता है लेकिन उसे जिस
रंग पर रखो, उसी रंग का वह दिखायी देने लगता है। फिर भी वह रंग से अलिप्त ही रहता है। उसी प्रकार जीव
स्वाभाविक रूप से अलिप्त ही है। जीव स्वभावतः चिद्रूप है, लेकिन वह जिस गुण से संलग्न रहता है उसी
गुण का दिखायी देने लगता है। गुणदोष अथवा पाप-पुण्य जीव से नहीं जुड़ते। मूलबिम्ब के सामर्थ्य से ही
प्रतिबिम्ब में गुणों का मिथ्याभास होता है, उसी प्रकार जीव में और शिव में अभिन्नता अवश्य है। इस प्रकार
जीव-शिव को एक मान लेने पर एक तत्त्व कम होकर पचीस तत्त्व शेष रहते हैं। (आशंका) अब जीव और
शिव में एकता है यह जानना भी एक प्रकार का ज्ञान ही है। यह एक नया तत्त्व उत्पन्न हो गया। इस ज्ञानतत्त्व को
स्वीकार कर लेने से पच्चीस और छब्बीस ये दोनों ही संख्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं। लेकिन ऐसा नहीं कहना चाहिये
क्योंकि मूल श्लोक के अन्तिम चरण में (ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः) ज्ञान प्रकृति का गुण है, वह अलग नहीं है, ऐसा
निरूपण है। गुण कर्मों के प्रयासों से ही यह प्रपंच अज्ञान से भर गया है और ज्ञान अज्ञान का सत्त्वांश है। जैसे
काँटे से काँटा निकाला जाता है, उसी प्रकार ज्ञान से अज्ञान दूर करना चाहिये। शुद्ध होकर जो सत्त्वगुण निकलता
है, उसे ही मुख्य ज्ञान कहते हैं। उसकी गिनती भी गुणों में ही होती है। उसे अलग तत्त्व नहीं कह सकते। ज्ञान

५७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदि अलग तत्त्व हुआ होता तो ये दोनों तत्त्व व्यर्थ हो जाते; लेकिन उनकी गिनती गुणों में होने के कारण वे दोनों
मत निर्दोष हैं। उद्धव ! अब मैं तुम्हें उन तीन गुणों की व्यवस्था बताता हूँ। गुण पूरी तरह अविद्यात्मक ही हैं।
प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।
सत्वं रजस्तम ईति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२॥
उत्पत्ति, स्थिति और नाश यह कार्य त्रिगुणों का है। उन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। आत्मा
निर्गुण अर्थात् गुणातीत है। अब तुम पूछोगे कि यदि परमात्मा गुणातीत है तो जीवात्मा गुणों से ग्रस्त है या नहीं ?
लेकिन यह बात भी गलत है। कैसे ? बताता हूँ। चन्द्रमा मूलतः निश्चल रहता है। लेकिन वह बादलों के साथ
द्रुतगति से भागता दिखायी देता है। उसी प्रकार गुणस्वभाव के कारण जीवात्मा भी वैसा ही कुछ दिखाई देता है।
घट में पानी भरने से घटाकाश गीला नहीं होता, उसी प्रकार जीवात्मा भी गुणों में विचरण करते समय, गुणकर्मों
से अलिप्त रहता है। लेकिन जीव 'मैं कर्त्ता हूँ' इस अहंकार के लिये प्रसिद्ध है। उसे 'कर्मातीत' कैसे कहा
जाय ? इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
सत्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३॥
सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से कर्म होता है और तम में आलस्ययुक्त मोह और अज्ञान का
वास रहता है। सत्त्वाधिक जो तीनों गुण हैं वे केवल प्रकृति के हैं, इसीलिये वे स्वतंत्र नहीं हैं। काल गुणों का
क्षोभक है। वह पुरुष का अवलोक अर्थात् ईक्षण या देखना है। पुरुष और काल इन दोनों में नाम का ही भेद है,
स्वभावतः दोनों एक ही हैं और माया का स्वभावसिद्ध स्फुरण होकर जो पहला निर्माण कार्य होता है उसे
'महत्तत्त्व' कहते हैं और उसी का नाम 'प्रधान-सूत्र' भी है। इसीलिये उसे भी प्रकृति से भिन्नत्व नहीं आता ऐसा
तत्त्व के विचारकों का मानना है। पहले बताये गये अट्ठाईस तत्व यह भगवान का भी मत है। इसी विषय का
अगले ढाई श्लोकों में प्रतिपादन करते हैं।
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहंकारो नभोऽनिलः ।
ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४॥
उन अट्ठाईस में प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, पंचमहाभूत और अहंकार ये नौ तत्त्व हैं। शेष का भी माहात्म्य
सुनो।
श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणा जिह्वेति ज्ञानशक्तयः ।
वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रिकर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५॥
मुख्य ज्ञानेन्द्रिय पाँच, दूसरे पाँच कर्मेन्द्रिय है। कर्मेन्द्रिय ज्ञानेन्द्रियों के वश में होते हैं। उनका अपना चलन
नहीं है। अन्धा आदमी अपने पैरों से चल सकता है, अन्धा आदमी लंगड़े आदमी को कन्धे पर बिठा ले तो उसे
देखने वाले के अनुसार चलना पड़ता है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय का समन्वय बना हुआ है। इसलिये
श्रीकृष्ण ने ज्ञानेन्द्रिय को ही प्रमुखता दी है। लेकिन दोनों इन्द्रियों का चालक एक मन ही है। इसलिये श्रीकृष्ण ने
इन्द्रिय ग्यारह बताये। उन इन्द्रियों के विषयों का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं ही कर रहे हैं। मुख्य विषय पाँच हैं तथा
उनका साधन और क्रिया आदि भगवान बताते हैं।

बाईसवाँ अध्याय ५७३
शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपंचेत्यर्थजातयः ।
गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥
शब्द-स्पर्श-रूप-गंध ये पाँच विषय हैं (ये ज्ञानेन्द्रिय गम्य हैं)। गमन-भाषण आदि क्रियाचरण उस
विषयों के साधन हैं। दृष्टि रूपविषय दिखलाती है; और पैर उसकी ओर दौड़ते हुए आते हैं। रस विषय और
स्पर्शसुख लेने के लिये हाथ आगे बढ़ते हैं। कुल मिलाकर दोनों इन्द्रियों में विषय मुख्य रूप से पाँच ही हैं।
उनकी संख्या अधिक नहीं ही होती ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। नौ और ग्यारह तत्त्वों का लक्षण पूर्व में दो श्लोकों में
बता ही दिया है। इन श्लोकों के अनुसार विषय पाँच ही हैं। केवल ज्ञानेन्द्रिय विषयों का उपभोग नहीं ले पाते
अथवा केवल कर्मेन्द्रियों को भी वह नहीं मिल पाता। दोनों का संयोग होता है, तभी भोग सम्भव होता है।
लेकिन विषय केवल पाँच हैं। इन्हीं पाँच विषयों ने चतुर्दश भुवनों को व्याप लिया है। इनका स्वाद चटक और
प्राणघातक होते हुए भी उन्होंने सुरनरों का मन मोह लिया है। ठग लोग जिस प्रकार साथ रहकर मौका मिलते ही
प्राण ले लेते हैं, उसी प्रकार विषयसंग जीव को बाँध कर नरक में डालता है। नरक में दुःख भोगते हैं लेकिन
वहाँ भी विषयासक्ति पीछा नहीं छोड़ती। विषय जैसा विश्वासघाती त्रिभुवन में भी नहीं मिलेगा। वैसे ये विषय
पाँच ही हैं, लेकिन वे महाभयंकर हैं। उनके कारण ब्रह्मदेव भी संकट में पड़ जाते हैं, फिर औरों की क्या बिसात
है ? विषयों का माधुर्य विष से भी भयंकर है। विष से एक ही बार मृत्यु आती है लेकिन विषय से बार-बार मृत्यु
का आभास होता है। पुनः जन्म और पुनः मृत्यु, यह सब विषयों के कारण ही होता है। जन्म-मरणरूपी संसार
का जोर विषय के अधीन ही है। जब विषयों का, अर्थात् विषयासक्ति का त्याग होता है तभी संसाररूपी रोग
उखड़ कर गिर पड़ता है। जिसे विषयों के भोग अच्छे नहीं लगते, उसका मैं श्रीकृष्ण दास बनकर रहता हूँ। इस
प्रकार ये पाँच विषय तुम्हें बतलाये। अब तीन गुणों के भी लक्षण बताता हूँ। उसे भी अच्छी तरह ध्यान देकर
सुनो। उत्पत्ति, स्थिति और लय त्रिगुणों के कारण ही होते हैं। इसलिये श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों को स्वीकार करते
हैं। ये तीनों गुण मिलाकर अट्ठाईस तत्त्व उन्होंने पूरे किये। उद्धव ! यही श्रीकृष्ण के मत का सच्चा लक्षण है।
त्रिगुणों के सिवा प्रकृति को भी सृष्टि करने की शक्ति नहीं है। गुणों के द्वार से ही उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में
संहार वह कार्य करती है। इसी अर्थ से कार्यकारण का लक्षण और यथार्थ विभाग श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी ।
सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते ॥ १७ ॥
प्रकृति से ही समस्त विकार, त्रिगुणों की सारी लीलायें, सात कारण और सोलह कार्य उत्पन्न होते हैं। उनके
विभागों के बारे में भी सुनो। महत्, अहंकार पंचमहाभूत ये सात 'कारण' हैं और पंचविषय युक्त ग्यारह इन्द्रियों
को मिलाकर सोलह 'कार्य' समझने चाहिये। इस प्रकार की यह प्रवृत्ति रजोगुण को साथ लेकर कार्यकारण की
युक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति करती है। उत्पन्न की हुई सृष्टि का सत्त्वगुण से पालन करती है लेकिन यदि पुरुष
उसकी ओर न देखे तो प्रकृति से भी उत्पत्ति, स्थिति और संहार नहीं होता। उसके कारण भी सुनो। हाथ पैर
हिलाये-डुलाये बिना जिस प्रकार कछुवी केवल अपनी दृष्टि से ही अपने बच्चों का पालन करती है, उसी प्रकार
पुरुष की दृष्टि रहती है अथवा जिस प्रकार सूर्य की किरणों से सूर्यकांत मणि में से अग्नि निकलता है और
उसके योग से ही ब्राह्मण अपने स्वधर्म कर्म से यज्ञ यागादिक बड़े-बड़े होम करते हैं। उद्धव ! उसी प्रकार यह
भी लक्षण है। इसी रीति से कार्य और कारण उत्पन्न होकर स्वधर्माचरण चलता है। प्रकृति के अनुसार चलते हुए

५७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मण अपना आचरण करते रहते हैं और इसी से उच्च और नीच कर्म की वृद्धि होती है। इस प्रकार पुरुष का
ईक्षण प्राप्त कर प्रकृति ही उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने का सामर्थ्य प्राप्त करती है। परदे पर दीपक के
प्रकाश की सहायता से दिखाये जाने वाले छायाचित्रण में विचित्र सैन्य दिखायी देने में जिस प्रकार दीपक ही
कारणीभूत होता है, उसी प्रकार प्रकृति के कार्य में पुरुष का ईक्षण ही कारणीभूत होता है। संसार का आदिकारण
प्रकृति है और प्रकृति पुरुष से प्रकाशित होती है इसलिये पुरुष महाकारण है। प्रकृति दृश्य और पुरुष अदृश्य है;
यह विकारी है, वह अविकारी है; यह गुणयुक्त है और वह स्वयं स्वतःसिद्ध गुणातीत है। प्रकृति स्वभाव से
चंचल और पुरुष अव्यय होने के कारण अचल है। प्रकृति औपाधिक होने के कारण बद्ध है; और पुरुष बन्धन से
मुक्त है। प्रकृति स्वभावतः शून्य अर्थात् जड़ है और पुरुष केवल चैतन्यघन है। प्रकृति का अंत है और पुरुष
अनंत है। प्रकृति आनन्दरहित होने के कारण, उसमें विषयों का छंद है; पुरुष पूर्णरूप से परमानन्द स्वरूप होने
के कारण विषय का मूल ही छेदने में समर्थ है। इस प्रकार प्रकृति का और पुरुष का भिन्न-भिन्न रूप मैंने तुम्हें
बताया। परमार्थ की मुख्य पहचान यही है कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। यही स्पष्ट करने के लिये नाना मतों के
वाद-प्रतिवाद हुए हैं। उन मतों का शुद्ध प्रबोध तुम्हें बताता हूँ। सुनो।
व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया।
लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥
पुरुष का ईक्षण प्राप्त होने पर प्रकृति के सामर्थ्य ने महत्तत्त्व-अहंकारादि पदार्थ एकत्र होकर ब्रह्माण्ड की
उत्पत्ति की। पुरुष के अवलोकन से ही प्रकृति को वीर्य प्राप्ति होकर वह ब्रह्माण्ड को धारण करती है; इसीलिये
उद्धव! इसे 'धातु' कहते हैं। यह मैंने तुम्हें साधारण लक्षण बताया; लेकिन अनेक प्रकार के मतवादी हैं, यह
उसका विशेष लक्षण भी बतलाते हैं।
सप्तैव धातव इति तत्रार्थाः पञ्च खाद‌यः।
ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥
पचीस और छब्बीस तत्त्वों की संख्या का निरूपण मैंने तुम्हें पहले बतलाया है; अब सात तत्त्वों का लक्षण
भी तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ। पंचमहाभूत, जीव और शिव यह सात तत्त्वों का स्वरूप है। प्राणों का और
इन्द्रियों का समुदाय भी इनसे ही उत्पन्न होता है। महाभूत अचेतन हैं। उन्हें चेतना देने वाला जीव है। उसका भी
परिपूर्ण द्रष्टा ईश्वर यह सातवाँ है। माया, महत्तत्त्व और अहंकार यहाँ हैं। इनसे ही सूक्ष्म कारण उत्पन्न होते हैं;
और उनसे ही स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं। कार्यों में कारण सबाह्य व्याप लेता है। मन इन्द्रियों का भी इसमें समावेश
होता है। इस प्रकार इस मत ने पंचमहाभूत निश्चित किये हैं। उन सबको चेतना देने वाला जीव है और उन
सबका नियंता सदाशिव है। उद्धव ! इस प्रकार यह सात तत्त्वों का समुदाय स्पष्ट हो चुका है। अब छह तत्त्वों का
जो पक्ष है उसका निरूपण करता हूँ। उस सम्बन्ध में ऋषियों का क्या कहना है वह भी बताता हूँ।
षडित्यत्रापि भूतानि पञ्च षष्ठः परः पुमान्।
तैर्युक्त आत्मसम्भूतैः सृष्ट्वेदं समुपाविशत् ॥ २० ॥
पंचमहाभूत का निर्माण कर पुरुष उसी में प्रवेश करता है, इसलिये उसे छठाँ तत्त्व कहते हैं। अब जिनके
मतानुसार चार ही तत्त्व हैं, उनका भी चमत्कार सुनो। वह जिस प्रत्यक्ष साकार पदार्थ को देखता है, उसी को वह
तत्त्व समझता है।

बाईसवाँ अध्याय ५७५
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः।
जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु॥२१॥
अग्नि, जल और पृथ्वी आँखों को प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं वही सच्चे तत्त्व हैं; ऐसा वे मतवादी मानते हैं
और इन स्थूलों को चेतना देने वाले आत्मा को वे चौथा मानते हैं। उन तीनों के बिना सृष्टि को कभी साकारता
प्राप्त नहीं होगी। सृष्टि को मुख्य रूप से इनके ही कारण नाम, रूप, क्रिया और कारण प्राप्त होते हैं। इसलिये
तीन ही भूत प्रामाणिक हैं, ऐसा उनका मानना है। इस प्रकार तीन भूत और आत्मा चौथा इस प्रकार चार तत्त्वों की
व्यवस्था हो गयी। अब सत्रह तत्त्वों के प्रकार यथार्थ रीति से बताता हूँ, सुनो।
संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।
पञ्च पञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः॥२२॥
पाँच विषय, पाँच महाभूत, पाँच इन्द्रिय और मन और आत्मा मिलाकर सत्रह तत्त्व निश्चित हुए हैं। उसी
प्रकार आगे बताये जाने वाले सोलह तत्त्वों को भी ध्यान में रखो। वहीं तेरह तत्त्वों का लक्षण भी भगवान स्वयं
बतायेंगे।
तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।
भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश॥२३॥
सत्रह तत्त्वों का पूरा निरूपण तुम्हें बताया। उनमें मन और आत्मा एक ही हैं। उनका लक्षण सुनो। कथा
सुनाते समय जिस प्रकार हाथ अपने आप हिलते हैं, उसी प्रकार मन की हलचल भी अपने आप होती रहती
है। राजा सिंहासन पर बैठता है, तो राजा कहलाता है और जब वसंत ऋतु में क्रीडा के लिये उद्यत होता है तो
क्या वह राजा नहीं रह जाता? समुद्र में जब ज्वार आता है तो उस समय भी वह समुद्र ही रहता है और उसका
पानी जब शान्त रहता है, उस समय भी वह समुद्र ही रहता है। उसी प्रकार मन के रूप में वह चंचल हो
अथवा आत्मस्वरूप से निश्चल हो तो भी दोनों में जो परमात्मा है उसका स्वरूप नहीं बदलता। इसलिये मन
का जो स्वरूप है वह आत्मसाक्षात्कार के बिना किसी की समझ में नहीं आता। यही मन का प्रमुख लक्षण है।
मन और आत्मा एक हो जाने के कारण, सत्रह में से एक कम हो जाने के कारण जो सोलह तत्त्व बचते हैं वही
सच्चे तत्त्व हैं। उसी प्रकार पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और मन को मिलाकर ग्यारह और उसमें जीव और शिव
को मिलाकर सारे तत्त्व तेरह निश्चित किये गये हैं। उद्धव! तत्त्वों के सम्बन्ध में और भी कई मत हैं। उनका
निर्णय भी तुम्हें बताता हूँ।
एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।
अष्टौ प्रकृतयश्चैव पुरुषश्च नवेत्यथ॥२४॥
जहाँ ग्यारह ही तत्त्व बताये गये हैं वहाँ पाँच इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव तथा मन को एक ही
रूप मान कर ग्यारह तत्त्व माने गये हैं। सुगन्ध, मृदुता और पीतवर्ण ये तीनों गुण चम्पा के फूल में एकत्र मिलते
हैं या सुवास, मिठास और उत्तम रंग ये तीन गुण जिस प्रकार आम में एकत्र रहते हैं, अथवा जिस प्रकार सुवर्ण
के मणि सुवर्ण की ही तार में गुँथे रहते हैं, उसी प्रकार जीव, शिव और मन ये तीनों एक रूप ही हैं। पाँच
इन्द्रिय, पाँच महाभूत और जीव, शिव और मन मिलाकर एक, इस प्रकार ग्यारह तत्त्व इसी उद्देश्य से निश्चित

५७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किये गये हैं। इसके अतिरिक्त प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार और अविकृति ये पंच महाभूत, इन नौ में सभी
विकार समुदायों का अंतर्भाव होता है। उसी प्रकार, उद्धव! ऋषिवर्यों के तत्त्वसम्बन्धी विचारों के अनुसार यह
संख्या नौ है। उसी प्रकार कुछ आत्मज्ञानी प्रकृति और पुरुष को दो ही तत्त्व मानते हैं क्योंकि इनके अतिरिक्त
कोई तीसरा तत्त्व जन में या वन में कहीं दिखायी नहीं देता। इससे भी अधिक जिनका निश्चय दृढ़ है वे कहते हैं
कि तत्त्व एक ही है। वही एक तत्त्व अनेक रूपों में भासित होता है। वास्तव में देखा जाय तो सब में एक ही
तत्त्व भरा हुआ है। जिस प्रकार सुवर्ण के अलंकार में मूल सुवर्ण तो होता ही है, उसी प्रकार अनेक में ऐक्य रूप
से सचमुच एक ही तत्त्व होता है। जिस प्रकार गन्ने की मिठास गुड़ और चीनी में बढ़ती मात्रा में रहती है, उसी
प्रकार आत्म तत्त्व के सारे तत्त्व प्रकार हैं। उस आत्मतत्त्व को जानने के लिये श्रेष्ठ ऋषियों के अनेक मत हैं।
उनमें से बहुत ही कम मैंने यहाँ बतलाये हैं अन्यथा ग्रन्थों में उनकी संख्या असंख्य है।
इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानाम्ऋषिभिः कृतम्।
सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५ ॥
लेकिन उनमें जो सर्वज्ञ और ज्ञानी होते हैं, वे मन में अनेक मतों का विचार कर तथा तत्त्वों का वास्तविक
स्वरूप ध्यान में रखकर उनके विभाग करना जानते हैं। आत्मतत्त्व जानने के लिये तत्त्वों का विचार करते समय
तत्त्वों की संख्या कम या अधिक है यह कहने में दोष नहीं लगता है। वास्तव में देखा जाय तो विकारों के
सम्बन्ध में ज्ञाता को बोलने लायक कुछ भी नहीं रहता क्योंकि विकार प्रकृति में रहते हैं। आत्मा शुद्ध अविकारी
ही है। प्रकृति से आत्मा भिन्न है। इसलिये वह अविकारी ही है, यह ध्यान में रखो। सारे विकार प्रकृति में ही हैं,
यही तत्त्वों का प्रमुख लक्षण है। इसलिये हे उद्धव! प्रकृति से पुरुष की भिन्नता जानने के लिये हमें तत्त्वों का
विचार करना चाहिये। कृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को चमत्कार लगा और उसने विचार किया क्यों न
प्रकृति और पुरुष की भिन्नता के बारे में भगवान से ही पूछा जाय?
उद्धव उवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।
अन्योन्यापाश्रयात्कृष्ण दृश्यते नभिदा तयोः॥ २६॥
प्रकृति और पुरुष भिन्न-भिन्न क्यों हैं? यह गहन प्रश्न उद्धव ने भगवान से साढ़े तीन श्लोकों में पूछा।
उद्धव मन में सोचने लगा कि यदि प्रकृति से पुरुष भिन्न है तो फिर इन दोनों से अलग श्रीकृष्ण दोनों का ही
साक्षी है। इसलिये उसने कहा, हे श्रेष्ठ श्रीकृष्ण देवाधिदेव! लक्ष्मीपति! इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और पुरुष
के व्यापार अलग ढंग से देखने वाले तुम एक निराले ही साक्षी हो क्योंकि प्रकृति और पुरुष ये दोनों भिन्न ही हैं।
एक जड़ है और एक चेतन है, यह मैं भी समझता हूँ। लेकिन वे अलग क्यों हैं, यह समझ में नहीं आता। जिस
प्रकार लौह का तप्त गोला बिलकुल अग्नि का सा दिखायी देता है, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष का समन्वय
ऐक्य रूप में बिलकुल दृढ़ हुआ रहता है। जिस प्रकार बीज को पेट में रखकर कणरहित अनाज का छिलका
बढ़ता रहता है, उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुष के साथ समरस हो जाती है। अथवा पेट में उत्तम गरी रख कर नीरस
और कनेर करोंटी बड़ी होती है। उसी प्रकार पुरुष के बल पर प्रकृति भी बड़ी होकर विशाल सृष्टि उत्पन्न करती
है। दाने के बिना जिस प्रकार छिलका बड़ा नहीं होता, उसी प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति भी दृष्टिगोचर नहीं
होती। अतः प्रकृति-पुरुष की यह पहेली तुम्हारे सिवा कोई हल नहीं कर सकता। सीप के शरीर पर जिस प्रकार

बाईसवाँ अध्याय ५७७
चाँदी की कांति है उसी प्रकार संसार में पुरुष के संग से प्रकृति का भी भास होता है। प्रखर सूर्य किरणों के योग
से जिस प्रकार मृगजल की बड़ी नदी का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष के योग से सचमुच प्रकृति का भास
होता है। जिस प्रकार आकाश की नीलिमा आकाश से भिन्न नहीं दिखायी देती, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुषोत्तम
में हमें भिन्नता नहीं दिखायी देती। देह का जो देहपन है वही प्रकृति की बाध्यता है। लेकिन इस देह से अलग
पुरुष का भान दिखायी ही नहीं देता। 'मैं' के अनुभव को आत्मा कहते हैं, लेकिन वह स्फूर्ति भी देह के आकार
के कारण होती है। हे गोविन्द ! देह से अलग आत्मा की प्रतीति वास्तव में नहीं होती। हे गोविन्द ! यदि आँखों के
बिना दृष्टि सम्भव हो, बाती के बिना लौ जले तभी देह के बिना आत्मा का स्फुरण होगा। गोविन्द ! जिह्वा के
बिना यदि स्वाद मालूम हो सके, कान के बिना शब्द सुनायी दे, तभी देह के बिना आत्मा का बोध स्पष्ट हो
सकेगा। हे गोविन्द ! यदि कांटे के बिना कटहल मिले अथवा छिलके के बिना गन्ना बढ़े तभी देह के बिना आत्मा
मिलेगा। ब्रह्मप्राप्ति का कारण नरदेह है, यह आत्मज्ञान का मर्म आपही ने बताया और अन्त में देह के बिना
आत्मदर्शन होता है यह भी आपही प्रतिपादित करते हैं। आत्मा के बिना प्रकृति किसी भी प्रकार से व्यक्त स्वरूप
में नहीं आती। स्वरूप के बिना छाया अलग किस प्रकार दिखायी देगी? मिठास से यदि शक्कर अलग की जा
सके, सुगन्ध से कपूर अलग हो जाये तभी आत्मा के बिना प्रकृति दिखायी देगी। माधुर्य के बिना यदि ईख बढ़े,
दाने के बिना छिलका बढ़े तभी आत्मा के बिना मूर्तिमंत माया भी व्यवस्थित ढंग से आकार प्राप्त करेगी। आत्मा
का स्वरूप प्रकृति के लक्षणों से ही मालूम होता है और आत्मा ही प्रकृति को प्रकाशित करता है। इनका संयोग
अनादि काल से चलता चला आ रहा है। फिर उनका बोध अलग-अलग कैसे होगा? प्रकृति से भिन्न आत्मा हमें
कहीं नहीं दिखायी देता। इसी अर्थ की विनती उद्धव स्वयं कर रहा है।
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ।
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणैः ॥ २७॥
हे कमलनाभ ! हे कमलवदन ! हे कमलधाम ! हे कमलधरा ! हे कमलिनीनिवासा ! हे कमलनयन श्रीकृष्ण !
प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध अत्यन्त कठिन है। उनका स्पष्ट निर्णय योगियों की समझ में भी नहीं आता। इसी
सन्देश का विराट वृक्ष हृदय में बढ़ रहा है। हृदय में संशय की जड़ें जमीं, जो प्रकृतिरूपी भूमि पर पड़ीं, उस पर
विकल्प का पानी गिरा। उसके बल पर संशयरूपी वृक्ष बढ़ा और उसे अहंकाररूपी फल सर्वकाल लगने लगे।
उस वृक्ष के फल खाये बिना इस जीव को कभी चैन नहीं पड़ता। इससे सन्देह अधिक बलवान होता है और
चित्त को कभी विश्राम नहीं मिलता। अतः ऐसे वृक्ष को आप कृपया तोड़ डालें। ज्ञान के तीन प्रखर बाण छोड़कर
तुम स्वयं उसकी जड़ें और पत्ते उखाड़ दो। हे गोविन्द ! कितने ही योग साधन और याग किये, कितने ही शास्त्र
पढ़े, अथवा धर्म कर्म के कितने ही प्रयास किये लेकिन इस वृक्ष का एक पत्ता भी नहीं टूटा यह बहुत बड़ा
संकट है। उस वृक्ष को तोड़ते-तोड़ते ब्रह्मदेव भी सन्देह में पड़ गया, इसीलिये तुमने हंसगीत कहकर अपने
सत्पुत्रों का उद्धार किया। जब साक्षात ब्रह्मदेव की यह दशा हुई तो औरों की क्या बिसात ? इसलिये इस वृक्ष को
तोड़ने वाला, तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है। इसे यदि ऊपर से ही तोड़ा जाय तो वासना की जड़ें शेष रहती हैं
और फिर वह पहले से भी अधिक जोश से बढ़कर उसका विस्तार बहुत ही बड़ा होता है। इसलिये इसका मूल
गड़्ढा ही उखाड़ कर फेंकने वाले एक तुम ही हो। तुम्हारे सिवा कोई ज्ञाता इस सन्देह का नाश करने वाला नहीं

५७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। अब तुम कहोगे कि सन्देह का उद्भव तो हृदय में होता है और वहाँ तक शस्त्र भी नहीं पहुँचता तो मैं उसे
कैसे छेद पाऊँगा ? उसके बारे में भी बताता हूँ। तुम्हारे ही शब्दरूपी तेज से दीप्त तुम्हारा ज्ञानस्वरूप चक्र बड़ा
अलौकिक है। हे श्रीकृष्ण ! सन्देह का समूल छेदन करने वाला तुम्हारा एक वचन ही है। तुम्हारा भाषण
ज्ञानस्वरूप होने के कारण तुम्हारे कृपावलोकन मात्र से ही सारे संदेह का निर्दलन हो जाता है। तो हे मुकुंद ! तुम
मुझे सन्देह की इस पीड़ा से मुक्त करो। उद्धव के इस भाषण पर गोपियों के आराध्य श्रीकृष्ण ने 'मैं ही हूँ।' ऐसा
कहने का क्या कारण है ? तो उसका उद्देश्य भी सुनो।
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्रशक्तितः।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः ॥ २८ ॥
तुम्हारी माया शक्ति अतर्क्य है। इसलिये वह आनन्द की जितनी भी ऊर्मियाँ आती हैं, उन्हें रोककर विषय
की दृढ़तर आसक्ति लगा देती है। इससे जीव अज्ञानी हो जाते हैं। विषय का चिन्तन करते हुए जीव मन के
अधीन होकर रह जाता है और वह मन उसे दुर्बल, दीन-हीन, कंजूस, जड़ और मूढ़ बना देता है। ऐसे सम्पूर्ण
अज्ञानी जीव, केवल तुम्हारी कृपा से ही ज्ञानसम्पन्न हुए हैं। यह तुम्हारी ही परिपूर्ण कृपा है। हे श्रीकृष्ण ! जब
तुम्हारी पूर्ण कृपा होती है तो जीव तुम्हारे ही सामर्थ्य से माया का निर्दलन कर पूर्ण ब्रह्मत्व को प्राप्त करते हैं।
अब शायद तुम यह कहोगे कि मेरी गाँठ में न ज्ञान है और न अज्ञान ही है। फिर भी तुम स्वयं ही पूर्ण ज्ञानदाता
बन गये हो। उसके सम्बन्ध में सविस्तार सुनो। ब्रह्मदेव, सूर्य, सनत्कुमार, नारद, प्रह्लाद, अम्बरीष आदि तथा
प्रसंगानुसार अर्जुन को भी तुमने उपदेश किया है। तुम ऐसे ज्ञानदाता हो। तुम कहोगे कि संसार में ज्ञानसम्पन्न
लोग अनेक हैं, उनसे पूछ कर ज्ञान प्राप्त किया जाय ! लेकिन तुम्हारे सिवा माया पर नियंत्रण किसी और से नहीं
होगा। माया की उत्पत्ति, स्थिति और माया के निर्द्दलन के बारे में जानने वाले त्रिभुवन में एक तुम ही हो।
इसलिये हे श्रीपति ! मुझ पर कृपा करो। इस प्रकार उद्धव ने विनती के रूप में श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। अब
श्रीकृष्ण उद्धव को प्रकृतिपुरुष के विभाग विशद करके बतायेंगे। सूर्य से जिस प्रकार मृगजल उत्पन्न होता है,
अथवा आकाश से बादल उत्पन्न होता है, अथवा काँच की फर्श पर जल का भास होता है, उसी प्रकार पुरुष से
यह महाबली प्रकृति उत्पन्न होती है। इस प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं प्रकृति-पुरुष का निरूपण समूल बता रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।
एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २९ ॥
देखो ! प्रकृति और पुरुष ये दोनों निरन्तर भिन्न ही हैं। जिस प्रकार दिन और रात में एक का लोप होने पर
ही दूसरे का उदय होता है, दिन अस्त होते ही परिपूर्ण अन्धकार से युक्त रात्रि नक्षत्र और समस्त ग्रहों के साथ
बड़े उत्साह से प्रकट होती है। उसी प्रकार पुरुष का भान लुप्त होते ही प्रकृति कार्यों के साथ सत्त्वादि गुण लेकर
और ज्ञान-अज्ञान से परिपूर्ण होकर प्रबल होती है। इसमें प्रमुख रूप से देह का आकार ही प्रकृति का बड़ा किला
है। उसमें देहरूप अहंकाररूपी योद्धा ही किलेदार है। वही प्रकृति का सखा और मित्र है। प्रकृति उसी पर
सर्वाधिक विश्वास करती है। किले के ओर से लड़ने वाला वही एक है। वहाँ की सारी जिम्मेदारी वह अपने
माथे पर लेता है। इसीलिए उस अभिमान ने ही स्वयं होकर प्रकृति को अभय देकर और विकारों की सारी
सामग्री एकत्र कर महाभयानक किले पर अधिकार कर लिया है। हे नरपुंगव उद्धव ! सुनो। अपनी प्रकृति की

बाईसवाँ अध्याय ५७९
भक्ति से यही अभिमान देहरूप किले में प्रबल होकर सरजोर बन जाता है। देहरूप किले में तीन गुण और
अहंकारादि विकार की सामग्री भरी रहती है। यह वास्तविक प्रकृति है जो देहाकार दिखाई देने लगती है।
आकाश में आभासित गंधर्व नगर में अट्टालिकाएँ, शिखर, जंगल, बाग आदि दिखायी देते हैं, उसी प्रकार प्रकृति
स्वयं नाना रूपों में भासमान होती है। मृगजल की नदी दूर से बड़े प्रवाह के रूप में बहती दिखायी देती है, उसी
प्रकार प्रकृति के नाना प्रकारों का आभास होता है। इस प्रकार प्रकृति का यह किला अत्यन्त भयंकर है और
उसमें अहंकार कैसे-कैसे विकारों की सामग्री भर देता है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ।
ममाङ्ग माया गुणमप्यनेकधा विकल्पबुद्धींश्च गुणैर्विधत्ते ।
वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥ ३० ॥
मेरी माया ही स्वयं स्वरूप से त्रिगुणात्मक हो गयी है। लेकिन वे तीनों गुण, अभिमान ने अपने अधिकार
में रखे हैं। उसी देहरूपी किले के सामने उन तीन गुणों की खाई खन कर तथा त्रिपुटी की सुव्यवस्थित रचना कर
अभिमान भयानक मारकाट करता रहता है। उस किले की सुरक्षा त्रिपुटी करती है। उस त्रिपुटी का मूल स्वरूप
भी अब मैं तुम्हें बताता हूँ। हे बुद्धिमान उद्धव ! उस देहरूपी किले के तीन मार्ग हैं उसमें दो चोर रास्ते हैं और
एक सरल रास्ता है। उन सभी रास्तों के बारे में मैं तुम्हें बताता हूँ। उस मार्ग में दस स्थानों पर सेना खड़ी रहती है
और अन्त में युद्ध करने वाला सैनिक खड़ा निरीक्षण करता रहता है। वे मार्ग चारों ओर से अवरुद्ध रहते हैं और
तीन मार्गों पर रक्षक रहते हैं। फिर ऐसी जगह अत्यन्त कष्ट से जाने की ज्ञानी को क्या आवश्यकता है ? देहरूपी
किले पर कठोर सामग्री की व्यवस्था है। कार्य, कारण और कर्तव्यता; कर्म, क्रिया और अहं यह कर्त्ता; ध्येय
ध्यान और विषयों का ध्यान करने वाला; इस त्रिपुटी से यह किला बिल्कुल सुदृढ़ है और उसमें भोग्य, भोग
और भोक्ता; कर्म, कार्य और कर्त्ता; यह अभिमान प्रवृत्ति की सहमति से वहाँ अधिकार जमा कर बैठा हुआ है।
वह चोरद्वार से देखता रहता है और काम क्रोध की खिड़की खोल कर एकाएक हमला बोल देता है। तब सारे
लोग थरथर काँपने लगते हैं। उनकी दहशत से तपस्वी लोग इधर-उधर भागने लगते हैं। लंगोटी छोड़ कर
दिगम्बर घूमने वालों को भी क्रोध थर-थर कँपा देता है। लोभरूपी तोपखाना शुरू होकर गोलों की आवाज होने
लगती है, जिससे चारों ओर अज्ञान का धुआँ फैलने लगता है। महामोह के धुंध से दिशाएँ भर जाती हैं और कहीं
कुछ दिखायी नहीं देता। इस किले के चारों ओर नौ बारादरी रहती हैं, उन्हें दाग कर विषय गोलाबारी करते रहते
हैं। देहाभिमान का मुख्य चालक है, मन। उसकी मार महाभयंकर है। वह किसी भी तरह पीछे नहीं हटता और
किले के बंदोबस्त अपने हाथ में रखता है। इसलिये जब शत्रु भी सीढ़ी चढ़कर शीघ्रता से आगे बढ़ते हैं तो उस
दसवें द्वार का मार्ग भी किवाड़ लगाकर बन्द किया रहता है। इस प्रकार मन स्वयं ही इस देहरूपी किले की
सुरक्षा करता है और उसका अंतर्बाह्य संरक्षण करने के लिये स्वयं ही नीड़ बनाता है। काम का हाथ पकड़ कर
वही मन शत्रु से मुकाबला करता है और उसकी अगली पंक्ति के वीरों को धराशायी कर देता है। इस प्रकार मन
की मार अत्यन्त कठिन है। उसने अपने त्रिविध ताप से लोगों को जर्जर कर हाय-हाय करने के लिये बाध्य कर
दिया है। देवताओं से जो ताप होता है उसे आधिदैविक, मन से जो ताप होता है उसे आध्यात्मिक और
पंचमहाभूतों से जो ताप होता है, वह भौतिक, इस प्रकार ताप तीन प्रकार के होते हैं। महाभूत सत्त्वगुण से
अंतःकरण, रजोगुण से इन्द्रिय तथा तमोगुण से विषयभाव की उत्पत्ति करते हैं, यह ध्यान में रखो। इसके
अतिरिक्त इन तीन गुणों से नाना विकार उत्पन्न होते हैं, उसका कारण यह प्रकृति ही है। इस प्रकार इस किले पर

५८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूरी तैयारी है और इसी कारण यह प्रपंच इतना फला फूला है। संकल्परूप महापर्जन्य के जल से तथा
वासनारूपी उदक से यहाँ की टंकियाँ भरी हुई हैं इसलिये किले में रहने वाले लोग यही पानी पीकर संसार के
सुख-दुःख में विहार करते हैं। अब इस किले के नौ द्वारों में से किसमें आधिदैव, आधिभूत और अध्यात्म है वह
भी बताता हूँ। किस द्वार में कौन-सा यंत्र रहता है, उसका चालक कौन रहता है, उसकी रचना कैसी है और
उससे विषयों का प्रहार कैसे होता है, यह भी सुनो।
दृग्रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।
आत्मा यदेषामपरो य आद्यः स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ॥ ३१॥
नेत्रेन्द्रिय एक बहुत बड़ी तोप है। वह स्त्रीस्वरूप की मार करती है और उस प्रहार से मर्मस्थान का भेद हो
जाने के कारण कोटि-कोटि सुरनर घायल हो जाते हैं। नेत्र गोल इन्द्रिय शरीर में और इस इन्द्रिय की अधिष्ठात्री
देवता सूर्य है इसलिये वह देखे हुए स्वरूप को अपने में अंकित करती है। वही सच्चा अध्यात्म है। नीला, पीला
आदि जो स्वरूप का आभास दृष्टि को होता है, वह दृष्टि को दृश्य का भान होना ही वास्तविक अधिभूत है।
अधिदैव सूर्य सिद्ध है, दृष्टि के सामने अधिभूत रखा हुआ है और शरीर में नेत्रगोल भी हैं, लेकिन यदि दृष्टि में
अध्यात्म तेज न हो तो अंधत्व ही रहता है। अधिदैव और अधिभूत होते हुए भी जब तक दृष्टि में अध्यात्म तेज
नहीं है, तब तक कुछ भी देखना सम्भव नहीं होता। वहाँ अंधत्व कायम ही रहता है। अथवा अध्यात्म और
अधिभूत दोनों हों और अधिदैव रूपी सूर्य अस्त हो गया हो तो भी आँखों का देखना अंधकार में लुप्त हो जाता
है। उस समय यदि बत्ती जलाकर प्रकाश भी किया जाय तो उसका प्रकाश सूर्य की तरह नहीं होता। चन्द्रोदय भी
सूर्यपकाश की बराबरी नहीं कर सकता। सूर्य रात्रि को समाप्त कर दृष्टि की सहायता करता है इसीलिये सूर्य को
अधिदैव कहते हैं। अध्यात्म और अधिभूत ये दोनों हों और अधिदैव सूर्य ही न हो, तो दृष्टि का कुछ बस नहीं
चलता। अध्यात्म और अधिदैव ये दोनों हों और गुरु की पूर्ण कृपा हो और अधिभूत का दृश्य दर्शन बन्द होता है,
तभी सचमुच ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। यहाँ जो अपने दृश्य का दर्शन होता है, उससे देह ही सब कुछ है, यह
देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। उस दृश्य का ही भान नष्ट करने से, देह के साथ संसार ही शून्य लगने लगता है। इस
प्रकार अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत यह त्रिपुटी किसे कहते हैं यह तुम्हें उसके विभागों के साथ विस्तारपूर्वक
बताया। इसमें त्रिपुटी का अर्थ स्वरूप अर्थात् दृश्य, द्रष्टा और दर्शन, कर्म, कर्त्ता और क्रिया का आचरण ध्येय,
ध्यान और ध्यातृत्त्व से है। इन्हें त्रिपुटी कहने का अर्थ यही है कि ये एक-दूसरे से सापेक्ष हैं। इसलिये अब
उनकी परस्पर अपेक्षाओं के लक्षण भी बताता हूँ। नाना प्रकार के सुखोपभोग होते हैं और उन्हें देखने के लिये
दृष्टि भी सक्षम रहती है। लेकिन वह सूर्य के बिना व्यर्थ ही रहती है। ऐसा यह परस्पर सम्बन्ध है। सूर्य हो किन्तु
आँख न हो तो भी दिखायी नहीं देता या आँख हो और सूर्य न हो तो भी कुछ भी नहीं दिखायी देता या सूर्य और
दृष्टि दोनों हो किन्तु देखने के लिये कुछ न हो तो भी दोनों का सामर्थ्य व्यर्थ हो जाता है। सूर्य स्वरूप को व्यक्त
करता है और अपने किरणों से दृष्टि में प्रवेश कर नाना प्रकार के आभास दिखलाता है। इसलिये यह देखने का
कार्य एक-दूसरे पर निर्भर है। लेकिन इतना होते हुए भी सूर्य अलिप्त होकर आकाश मण्डल में रहता है। उसी
प्रकार इस विश्वस्वरूप को व्यक्त करने वाला चिदात्मा सचमुच अलिप्त ही रहता है। वह इस जगत में भरा हुआ
है तथा जगत के हृदय में रहता है। यह सारा संसार उत्पन्न हो या उसका लय हो जाय लेकिन वह वैसा ही रहता
है। जिस प्रकार आकाश में हजारों घटाकाश निर्माण होने पर भी उन घटों में आकाश प्रत्यक्ष रूप से दिखायी ही