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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 869 में से

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पृष्ठ 585

बाईसवाँ अध्याय ५६९
सत्त्वरजादि गुणोत्पत्ति के कारण मेरी माया की अनेक शक्तियाँ हैं इसलिये गुण क्षुब्ध हो जाते हैं तो हमारा ही मत
सच है' ऐसे अभिमान से वे झगड़ा करने लगते हैं।
यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो गदतां पदम्।
प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनु शाम्यति ॥६॥
गुणक्षोभ से होने वाला अभिमान भयानक विकल्प उत्पन्न करता है और अतिवाद कर उस विकल्प की
युक्ति का खण्डन करता है। किन्तु इस गुणक्षोभ की बात छोड़ दी जाय तो रज का और तम का ह्रास होकर
सत्त्ववृत्ति प्रकाशित होती है। उस समय शम और दम का उत्कर्ष होता है। उस शमदम का प्रभाव ही कुछ ऐसा
होता है कि जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार विकल्प के साथ संकल्प और
वाद-विवाद अपने आप ही बन्द हो जाते हैं। लेकिन जो सर्वज्ञ ज्ञाता होते हैं, वे नाना प्रकार के तत्त्वों के सम्बन्ध
में नाना प्रकार के मतों का विचार कर उनका हृद्गत जान लेते हैं। वह भी तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ।
पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥७॥
हे प्रियोत्तम पुरुषश्रेष्ठ उद्धव ! यथोचित ढंग से गुरु के पास शास्त्रपाठ लेकर आत्मनिष्ठा की साधना करते
रहते हैं। तत्त्वों की गणना के सम्बन्ध में जो लेख हैं, उनमें से किसी के अधिक तथा किसी के कम हैं। तत्त्व एक
से एक उत्पन्न होते हैं, इसे परस्पर का 'अनुप्रवेश' कहते हैं। उद्धव ! एक तत्त्व से अनेक तत्त्व उत्पन्न होते हैं।
कारणरूप से ही कार्य की स्थिति होती है। अन्त में जो जहाँ के होते हैं, वहीं वे प्रवेश करते हैं। तत्त्वों की
उपपत्ति ऐसी है। तत्त्वों की जो पूर्वस्थिति होती है, वह कारण और जिससे वह उत्पन्न होता है वह कार्य होता है।
तत्त्व का विचार करने वाले पुरुष कार्यकारण का लक्षण इसी प्रकार बताते हैं। इसमें जैसी वक्ता की इच्छा रहती
है, उसी प्रकार उन तत्त्वों की संख्या होती है। कार्य और कारण को जो लोग एक ही मानते हैं, उनकी तत्त्वसंख्या
कम रहती है। उद्धव ! कार्य और कारण एक ही होने पर, गिनते समय उन्हें भिन्न-भिन्न मानते हैं इसलिये तत्त्वों
की संख्या सहज ही अधिक हो जाती है। इस प्रकार कार्य और कारण को अलग-अलग गिनने से तत्त्वों की
संख्या कम या अधिक होती है। इसी विषय का अधिक विश्लेषण और कार्यकारण के सम्बन्ध में अपना मत
श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च।
पूर्वस्मिन् वा परस्मिन् वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥
वायु आकाश से उत्पन्न हुआ है लेकिन वह आकाश छोड़कर कहीं नहीं गया है। वायु से अग्नि हुआ,
उसमें आकाश और वायु दोनों का ही समावेश हो गया। अग्नि से पानी उत्पन्न हुआ, उसमें तीनों का ही समावेश
हो गया। जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई, उसमें चारों का समावेश हो गया। इस प्रकार कार्य और कारण ये परस्पर
अभिन्न अर्थात् एकरूप रहते हैं। उसी तरह जैसे अलंकार और सुवर्ण अलग दिखायी देने पर भी एक ही रहते हैं।
तंतु और वस्त्र जिस प्रकार एकरूप दिखायी देते हैं, उसी प्रकार कार्यकारण भी परस्पर एकरूप दिखाई देते हैं।
शक्कर का नारियल या केला बनाने से वे अपने शक्कर के मूल स्वरूप को नहीं छोड़ते। उसी प्रकार कारण का
कार्य होने पर भी वे कारण रूप में एक ही रहते हैं। मिट्टी के लोंदे से विविध आकार के मटके बनाने पर भी उन