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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 869 में से

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पृष्ठ 584

५६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही बताते हैं। एक कहता है विद्वत्ता के बल पर व्यर्थ की मगजमारी क्यों करते हैं? भगवान की लीला किसी की
समझ में नहीं आती। सोलह ही तत्त्व हैं। कोई इस संख्या को तेरह तक ही पहुँचाते हैं। एक कहता है, अपना
पांडित्य दूर रखिये, मूल तत्त्व चार ही हैं। दूसरा कहता है, सच पूछा जाय तो दो ही तत्त्व हैं। तीसरा कहता है, ये
सब वाचाल हैं, इनके मुँह कौन लगे? वास्तव में तत्त्व एक ही है और उसी के अनेक विस्तार हुए हैं। इस प्रकार
बड़े-बड़े ऋषियों ने सोच-विचार कर भिन्न-भिन्न मत प्रतिपादित किये हैं। ऐसी स्थिति में तुमने जो तत्त्वनिर्णय
बताया उसे ही निश्चित रूप में कैसे स्वीकार किया जाय?
गायन्ति पृथगायुष्मन्निदं नो वक्तुमर्हसि ॥ ३॥
तुम निजात्मरूपी परमेश्वर हो। तुम्हें जानने के लिये बड़े-बड़े ऋषियों ने नाना प्रकार के तर्क लड़ा कर
तत्त्व विचार बताये हैं। आपने तो एक ही तत्त्व बताया था और बड़े-बड़े ऋषि बताते हैं कि तत्त्व अनेक हैं। मुझे
इन तत्त्वों की निश्चित संख्या बताने के लिये आप ही योग्य हैं। इस प्रकार उद्धव ने श्रीकृष्ण से विनती की तो
वह प्रसन्न हो गया। बड़े-बड़े ऋषियों ने जिन तत्त्वों के बारे में बताया है वे सब सच ही हैं। सर्वज्ञ ज्ञाता यह बात
जानते हैं। इसी सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
श्री भगवानुवाच
युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४॥
जिसका जैसा ज्ञान होता है उसी के अनुसार वह तत्त्व बताता रहता है। उद्धव! इसी दृष्टि से ब्राह्मण जो
कहते हैं, उसे भी सत्य ही मानना चाहिये। 'अब जब सभी मत सच हैं तो अन्य मतों का खण्डन क्यों किया
जाय?' ऐसा मत कहो, उद्धव! उसका हृद्गत मैं तुम्हें बताता हूँ। मेरी माया अघटित बातें कराती हैं। हरिहर को
भी उसका आकलन नहीं हो पाता क्योंकि वह काल्पनिक सृष्टि का विस्तार कर त्रिभुवन पर अपनी मोहिनी
डालती है। उस माया का हाथ पकड़ महर्षि अपने मत के अनुसार जो भी कुछ बोलते हैं, वह सब वहाँ सच
ही होता है। जहाँ रस्सी सर्पाकार में दिखायी देती है, वहाँ उस साँप को सफेद, काला अथवा लाल कैसे कहा
जाय? तो जिसे जैसा भ्रम होता है, वैसा वह उसे दिखायी देता है। इस प्रकार आत्मतत्त्व एक ही है और वह
निर्गुण तथा निर्विकार है; किन्तु माया के कारण ब्राह्मण अनेक तत्त्वों का प्रतिपादन करते हैं। उनका वह
मायात्मक भाषण मायामय ही रहता है। अपने मत की पुष्टि में वे तरह-तरह के वाद-विवाद करते हैं। वे
विवाद किस प्रकार के होते हैं, वह भी तुम्हें बताता हूँ। इतना कहकर श्रीकृष्ण यथार्थ तत्त्वविचार स्वयं उद्धव
को बताने लगे। अगले पाँच श्लोकों का निरूपण, उद्धव को श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया हुआ तत्त्वों का
यथार्थ व्याख्यान है।
नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।
एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५॥
मेरी माया की शक्ति अत्यन्त प्रबल है; उससे प्रचण्ड अभिमान उत्पन्न होता है। उसके कारण विद्वद्जन
युक्ति-प्रयुक्ति से वाग्जाल की सृष्टि कर व्यर्थ का वितंडा करने लगते हैं। उनका शास्त्र श्रवणाभिमान प्रचण्ड
रहता है। 'तुम्हारी बात असत्य है, जो मैं कहता हूँ वही सच है, मेरे पास ग्रंथाधार है (ऐसा वे कहते हैं)।