श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 588, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें५७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदि अलग तत्त्व हुआ होता तो ये दोनों तत्त्व व्यर्थ हो जाते; लेकिन उनकी गिनती गुणों में होने के कारण वे दोनों
मत निर्दोष हैं। उद्धव ! अब मैं तुम्हें उन तीन गुणों की व्यवस्था बताता हूँ। गुण पूरी तरह अविद्यात्मक ही हैं।
प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।
सत्वं रजस्तम ईति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२॥
उत्पत्ति, स्थिति और नाश यह कार्य त्रिगुणों का है। उन तीन गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है। आत्मा
निर्गुण अर्थात् गुणातीत है। अब तुम पूछोगे कि यदि परमात्मा गुणातीत है तो जीवात्मा गुणों से ग्रस्त है या नहीं ?
लेकिन यह बात भी गलत है। कैसे ? बताता हूँ। चन्द्रमा मूलतः निश्चल रहता है। लेकिन वह बादलों के साथ
द्रुतगति से भागता दिखायी देता है। उसी प्रकार गुणस्वभाव के कारण जीवात्मा भी वैसा ही कुछ दिखाई देता है।
घट में पानी भरने से घटाकाश गीला नहीं होता, उसी प्रकार जीवात्मा भी गुणों में विचरण करते समय, गुणकर्मों
से अलिप्त रहता है। लेकिन जीव 'मैं कर्त्ता हूँ' इस अहंकार के लिये प्रसिद्ध है। उसे 'कर्मातीत' कैसे कहा
जाय ? इसी का स्पष्टीकरण श्रीकृष्ण करते हैं।
सत्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३॥
सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से कर्म होता है और तम में आलस्ययुक्त मोह और अज्ञान का
वास रहता है। सत्त्वाधिक जो तीनों गुण हैं वे केवल प्रकृति के हैं, इसीलिये वे स्वतंत्र नहीं हैं। काल गुणों का
क्षोभक है। वह पुरुष का अवलोक अर्थात् ईक्षण या देखना है। पुरुष और काल इन दोनों में नाम का ही भेद है,
स्वभावतः दोनों एक ही हैं और माया का स्वभावसिद्ध स्फुरण होकर जो पहला निर्माण कार्य होता है उसे
'महत्तत्त्व' कहते हैं और उसी का नाम 'प्रधान-सूत्र' भी है। इसीलिये उसे भी प्रकृति से भिन्नत्व नहीं आता ऐसा
तत्त्व के विचारकों का मानना है। पहले बताये गये अट्ठाईस तत्व यह भगवान का भी मत है। इसी विषय का
अगले ढाई श्लोकों में प्रतिपादन करते हैं।
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहंकारो नभोऽनिलः ।
ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४॥
उन अट्ठाईस में प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, पंचमहाभूत और अहंकार ये नौ तत्त्व हैं। शेष का भी माहात्म्य
सुनो।
श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणा जिह्वेति ज्ञानशक्तयः ।
वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रिकर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५॥
मुख्य ज्ञानेन्द्रिय पाँच, दूसरे पाँच कर्मेन्द्रिय है। कर्मेन्द्रिय ज्ञानेन्द्रियों के वश में होते हैं। उनका अपना चलन
नहीं है। अन्धा आदमी अपने पैरों से चल सकता है, अन्धा आदमी लंगड़े आदमी को कन्धे पर बिठा ले तो उसे
देखने वाले के अनुसार चलना पड़ता है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय का समन्वय बना हुआ है। इसलिये
श्रीकृष्ण ने ज्ञानेन्द्रिय को ही प्रमुखता दी है। लेकिन दोनों इन्द्रियों का चालक एक मन ही है। इसलिये श्रीकृष्ण ने
इन्द्रिय ग्यारह बताये। उन इन्द्रियों के विषयों का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं ही कर रहे हैं। मुख्य विषय पाँच हैं तथा
उनका साधन और क्रिया आदि भगवान बताते हैं।