श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 587, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page-Header]
बाईसवाँ अध्याय ५७१
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अथवा स्वर्ग का फल देने वाला अथवा इहलोक में चलाने वाला सचमुच ईश्वर ही है। इसलिये जीव और ईश्वर
को भिन्न-भिन्न मानना अभीष्ट है इस उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने तत्त्वों की संख्या छब्बीस मानी है। अब उनके
मतानुसार पच्चीस तत्त्वों का विवरण अर्थात् जीवेश्वर की ऐक्यता को मानना भी तुम्हें बताता हूँ।
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि।
तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥
सच पूछो तो जीवेश्वर की एकता सहज और स्वाभाविक है। इसमें अणुमात्र का भी भेद नहीं है, यह
बिलकुल निश्चित है। सहज ही दर्पण में देखने पर एक व्यक्ति के दो रूप दिखायी देने लगते हैं लेकिन देखने
वाला स्वयं द्विधा नहीं हो जाता। उसी प्रकार तुम जीव और शिव को समझो। अविद्या में प्रतिबिम्बित होने वाला
जीव और उसका द्रष्टा सदाशिव है। लेकिन परस्पर एकता का जो उनका मूल स्वभाव है वह नहीं टूटता। दर्पण
में जिस प्रकार हम रहते हैं, उसी प्रकार तुम जीव और शिव को समझो। अविद्या में प्रतिबिम्बित होने वाला जीव
है और उसका द्रष्टा सदाशिव है। लेकिन परस्पर एकता का जो उनका मूल स्वभाव है वह नहीं टूटता। दर्पण में
जिस प्रकार हम रहते हैं, उसी प्रकार जीव रूप में शिव ही रहता है। चैतन्य धर्म से वे दोनों एक जैसे होते हैं।
उसका भी लक्षण सुनो। हम जैसी हलचल करते हैं, वैसी ही हलचल प्रतिबिम्ब में भी दिखायी पड़ती है। उसी
प्रकार ईश्वर की सत्ता जीव के विचरण के लिये कारणीभूत होती है। जैसा हमारा स्वरूप रहता है, वैसा ही
उसका प्रतिबिम्ब रहता है। उसी प्रकार जीव में भी परिपूर्ण ईश्वरत्व भरा हुआ है। जिस प्रकार राख से ढँकने पर
भी वह अग्नि के रूप में ही रहता है, उसी प्रकार शिव में जीवत्म आने पर भी वह आत्मस्वरूप से अलग नहीं
होता। (आशंका) जीव और शिव ये दोनों यदि एक हैं तो एक मलिन और दूसरा शुद्ध; एक सदोष, एक निर्दोष
इस प्रकार भिन्न-भिन्न क्यों दिखायी देते हैं ? (समाधान) किसी जलाशय में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है तो
उसमें प्रतिबिम्ब को जलाशय की गन्दगी भी लगी हुई दिखायी देती है। लेकिन ठीक तरह से देखने पर उस
बिम्ब को कहीं भी गन्दगी लगी नहीं दिखायी देती, वह दोनों निर्मल ही रहते हैं। यदि गन्दगी जलाशय में है या
दर्पण में है तो उसे अच्छी तरह झाड़-पोंछ कर साफ करना चाहिये। उसी प्रकार सदोष अथवा निर्दोष अविद्या ही
है; जीव और शिव सदासर्वदा आत्मस्वरूप से निर्दोष ही रहते हैं। स्फटिक स्वच्छ ही रहता है लेकिन उसे जिस
रंग पर रखो, उसी रंग का वह दिखायी देने लगता है। फिर भी वह रंग से अलिप्त ही रहता है। उसी प्रकार जीव
स्वाभाविक रूप से अलिप्त ही है। जीव स्वभावतः चिद्रूप है, लेकिन वह जिस गुण से संलग्न रहता है उसी
गुण का दिखायी देने लगता है। गुणदोष अथवा पाप-पुण्य जीव से नहीं जुड़ते। मूलबिम्ब के सामर्थ्य से ही
प्रतिबिम्ब में गुणों का मिथ्याभास होता है, उसी प्रकार जीव में और शिव में अभिन्नता अवश्य है। इस प्रकार
जीव-शिव को एक मान लेने पर एक तत्त्व कम होकर पचीस तत्त्व शेष रहते हैं। (आशंका) अब जीव और
शिव में एकता है यह जानना भी एक प्रकार का ज्ञान ही है। यह एक नया तत्त्व उत्पन्न हो गया। इस ज्ञानतत्त्व को
स्वीकार कर लेने से पच्चीस और छब्बीस ये दोनों ही संख्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं। लेकिन ऐसा नहीं कहना चाहिये
क्योंकि मूल श्लोक के अन्तिम चरण में (ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः) ज्ञान प्रकृति का गुण है, वह अलग नहीं है, ऐसा
निरूपण है। गुण कर्मों के प्रयासों से ही यह प्रपंच अज्ञान से भर गया है और ज्ञान अज्ञान का सत्त्वांश है। जैसे
काँटे से काँटा निकाला जाता है, उसी प्रकार ज्ञान से अज्ञान दूर करना चाहिये। शुद्ध होकर जो सत्त्वगुण निकलता
है, उसे ही मुख्य ज्ञान कहते हैं। उसकी गिनती भी गुणों में ही होती है। उसे अलग तत्त्व नहीं कह सकते। ज्ञान