श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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सब में मिट्टी ही अखण्ड रहती है। उसी प्रकार कारण में कार्य रहता है, कारण से ही कार्य प्रकट होता है। यह
परस्परों का अनुप्रवेश है और उनमें एकरूपता हमेशा से ही है। एक कार्य और एक कारण ऐसा भिन्न-भिन्न मानने
पर तत्त्वसंख्या भी कम या अधिक होती है।
पौर्वापर्यमतोऽमीषां प्रसंख्यानमभीप्सताम्।
यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात्॥ ९॥
तत्त्वों की संख्या कम या अधिक होने में कहने वाले की इच्छा ही कारणीभूत होती है। जिसका जैसा ज्ञान
रहता है, जिसे जिस इष्ट मत का अभिमान रहता है, उसके अनुसार वे महर्षि बातें करते रहते हैं। इसके लिये वह
जिस मत के अनुसार बोलता है, वह उसके मत के अनुसार ठीक ही रहता है। यह बात मैं सर्वज्ञ श्रीहरि जानता
हूँ। इसलिये उनकी बात भी मैं जानता हूँ। अब हे उद्धव! ऋषियों ने जो छब्बीस तत्त्व चुने हैं, उनके बारे में मैं
तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०॥
उसमें प्रकृति, पुरुष महत्तत्त्व तथा अहंकार और पंच महाभूत, पाँच विषयों के साथ ग्यारह इन्द्रिय; इस
प्रकार कुल मिलाकर पच्चीस तत्त्व होते हैं। उसमें यदि जीव को ईश्वर से भिन्न मानें तो ये तत्त्व छब्बीस हो जाते
हैं। अनादिकाल से जो अविद्या चलती आ रही है, वही जीव के भिन्नत्त्व का कारण है। इसीलिये उसे देहाभिमान
होता है और कर्म का बन्धन दृढ़ हो जाता है। कर्त्तापन के अहंकार से हरकतें करता रहता है, इसलिये पाप-पुण्य
का भागी बनता है। विषय का लोभ बढ़ाते-बढ़ाते आत्मस्वरूप को ही भूल जाता है। बद्धता का बन्धन लग जाने
से कर्मपाश नहीं तोड़ पाता। इसलिये उसके उद्धार के लिये ज्ञानदाता सर्वज्ञ ईश्वर की आवश्यकता पड़ती है।
किन्तु "गुरु से यदि ज्ञानप्राप्ति होती है तो इसमें ईश्वर का आभार मानने की क्या आवश्यकता है ?" यदि ऐसा
कहोगे तो तुम्हें बता दूँ कि ईश्वर के बिना सद्गुरु से भी भेंट नहीं होती। उसी प्रकार सद्गुरु की प्राप्ति होने पर
भी, ईश्वर कृपा के बिना उसकी भक्ति सम्भव नहीं होती। सद्गुरु ही ईश्वरमूर्ति है यह बात वेदशास्त्रों को भी
मान्य है। गुरु और ईश्वर में जो भिन्नता करता है वह समझो डूब ही गया। सारांश, ईश्वर के अनुग्रह से ही जीव
ज्ञानसम्पन्न होता है और हे उद्धव ! गुरु ज्ञान का जो स्वरूप बताता है वह ईश्वर की कृपा के बिना मन में अंकित
नहीं होता, इसे ध्यान में रखो। जीव नियम्य और ईश्वर नियामक है। जीव अज्ञानी और ईश्वर ज्ञानदाता है। जीव
एकदेशीय होने के कारण मर्यादित है और ईश्वर सर्वदा सर्वव्यापक है। जीव हीन, दीन और अज्ञान है, ईश्वर
सर्वसमर्थ और सर्वज्ञ है। जीव को कर्म का दृढ़ बन्धन है और ईश्वर कर्म से परे है। इसी कारण से ईश्वर कृपा
से जीव को ज्ञान प्राप्त होता है और इसीलिये जीव ईश्वर से भिन्न है। अब शायद तुम यह कहोगे कि कर्माचरण
करने से जीव को ज्ञान प्राप्त होगा, लेकिन वैसा कभी नहीं होगा क्योंकि कर्म में जड़ता है। इसीलिये उसमें बन्धन
और अज्ञान है। उस कर्म में अत्यन्त बद्धता होती है, यह बात सज्ञान लोग जानते हैं। कर्म स्वभाव से ही जड़
अर्थात् अचेतन रहता है। उसे चेतना प्रदान करने वाला ईश्वर होता है। इसलिये यदि उसे ईश्वर को अर्पण नहीं
किया तो उस कर्म को ज्ञान कौन प्रदान करेगा ? कर्म जड़ होने के कारण उसे सत्ता नहीं होती; कर्मक्रिया को
जानने वाला ईश्वर होता है इसलिये उसका फल देने वाला और चेतना देने वाला भी ईश्वर ही होता है। ज्ञान ही
ईश्वर है और उसी ने इस सृष्टि का विस्तार किया है। उसका संहार करने वाला भी ईश्वर है। जीव को मोक्ष