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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 869 में से

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पृष्ठ 590

५७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्राह्मण अपना आचरण करते रहते हैं और इसी से उच्च और नीच कर्म की वृद्धि होती है। इस प्रकार पुरुष का
ईक्षण प्राप्त कर प्रकृति ही उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने का सामर्थ्य प्राप्त करती है। परदे पर दीपक के
प्रकाश की सहायता से दिखाये जाने वाले छायाचित्रण में विचित्र सैन्य दिखायी देने में जिस प्रकार दीपक ही
कारणीभूत होता है, उसी प्रकार प्रकृति के कार्य में पुरुष का ईक्षण ही कारणीभूत होता है। संसार का आदिकारण
प्रकृति है और प्रकृति पुरुष से प्रकाशित होती है इसलिये पुरुष महाकारण है। प्रकृति दृश्य और पुरुष अदृश्य है;
यह विकारी है, वह अविकारी है; यह गुणयुक्त है और वह स्वयं स्वतःसिद्ध गुणातीत है। प्रकृति स्वभाव से
चंचल और पुरुष अव्यय होने के कारण अचल है। प्रकृति औपाधिक होने के कारण बद्ध है; और पुरुष बन्धन से
मुक्त है। प्रकृति स्वभावतः शून्य अर्थात् जड़ है और पुरुष केवल चैतन्यघन है। प्रकृति का अंत है और पुरुष
अनंत है। प्रकृति आनन्दरहित होने के कारण, उसमें विषयों का छंद है; पुरुष पूर्णरूप से परमानन्द स्वरूप होने
के कारण विषय का मूल ही छेदने में समर्थ है। इस प्रकार प्रकृति का और पुरुष का भिन्न-भिन्न रूप मैंने तुम्हें
बताया। परमार्थ की मुख्य पहचान यही है कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। यही स्पष्ट करने के लिये नाना मतों के
वाद-प्रतिवाद हुए हैं। उन मतों का शुद्ध प्रबोध तुम्हें बताता हूँ। सुनो।
व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया।
लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥
पुरुष का ईक्षण प्राप्त होने पर प्रकृति के सामर्थ्य ने महत्तत्त्व-अहंकारादि पदार्थ एकत्र होकर ब्रह्माण्ड की
उत्पत्ति की। पुरुष के अवलोकन से ही प्रकृति को वीर्य प्राप्ति होकर वह ब्रह्माण्ड को धारण करती है; इसीलिये
उद्धव! इसे 'धातु' कहते हैं। यह मैंने तुम्हें साधारण लक्षण बताया; लेकिन अनेक प्रकार के मतवादी हैं, यह
उसका विशेष लक्षण भी बतलाते हैं।
सप्तैव धातव इति तत्रार्थाः पञ्च खाद‌यः।
ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥
पचीस और छब्बीस तत्त्वों की संख्या का निरूपण मैंने तुम्हें पहले बतलाया है; अब सात तत्त्वों का लक्षण
भी तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ। पंचमहाभूत, जीव और शिव यह सात तत्त्वों का स्वरूप है। प्राणों का और
इन्द्रियों का समुदाय भी इनसे ही उत्पन्न होता है। महाभूत अचेतन हैं। उन्हें चेतना देने वाला जीव है। उसका भी
परिपूर्ण द्रष्टा ईश्वर यह सातवाँ है। माया, महत्तत्त्व और अहंकार यहाँ हैं। इनसे ही सूक्ष्म कारण उत्पन्न होते हैं;
और उनसे ही स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं। कार्यों में कारण सबाह्य व्याप लेता है। मन इन्द्रियों का भी इसमें समावेश
होता है। इस प्रकार इस मत ने पंचमहाभूत निश्चित किये हैं। उन सबको चेतना देने वाला जीव है और उन
सबका नियंता सदाशिव है। उद्धव ! इस प्रकार यह सात तत्त्वों का समुदाय स्पष्ट हो चुका है। अब छह तत्त्वों का
जो पक्ष है उसका निरूपण करता हूँ। उस सम्बन्ध में ऋषियों का क्या कहना है वह भी बताता हूँ।
षडित्यत्रापि भूतानि पञ्च षष्ठः परः पुमान्।
तैर्युक्त आत्मसम्भूतैः सृष्ट्वेदं समुपाविशत् ॥ २० ॥
पंचमहाभूत का निर्माण कर पुरुष उसी में प्रवेश करता है, इसलिये उसे छठाँ तत्त्व कहते हैं। अब जिनके
मतानुसार चार ही तत्त्व हैं, उनका भी चमत्कार सुनो। वह जिस प्रत्यक्ष साकार पदार्थ को देखता है, उसी को वह
तत्त्व समझता है।