श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 589, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाईसवाँ अध्याय ५७३
शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपंचेत्यर्थजातयः ।
गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥
शब्द-स्पर्श-रूप-गंध ये पाँच विषय हैं (ये ज्ञानेन्द्रिय गम्य हैं)। गमन-भाषण आदि क्रियाचरण उस
विषयों के साधन हैं। दृष्टि रूपविषय दिखलाती है; और पैर उसकी ओर दौड़ते हुए आते हैं। रस विषय और
स्पर्शसुख लेने के लिये हाथ आगे बढ़ते हैं। कुल मिलाकर दोनों इन्द्रियों में विषय मुख्य रूप से पाँच ही हैं।
उनकी संख्या अधिक नहीं ही होती ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। नौ और ग्यारह तत्त्वों का लक्षण पूर्व में दो श्लोकों में
बता ही दिया है। इन श्लोकों के अनुसार विषय पाँच ही हैं। केवल ज्ञानेन्द्रिय विषयों का उपभोग नहीं ले पाते
अथवा केवल कर्मेन्द्रियों को भी वह नहीं मिल पाता। दोनों का संयोग होता है, तभी भोग सम्भव होता है।
लेकिन विषय केवल पाँच हैं। इन्हीं पाँच विषयों ने चतुर्दश भुवनों को व्याप लिया है। इनका स्वाद चटक और
प्राणघातक होते हुए भी उन्होंने सुरनरों का मन मोह लिया है। ठग लोग जिस प्रकार साथ रहकर मौका मिलते ही
प्राण ले लेते हैं, उसी प्रकार विषयसंग जीव को बाँध कर नरक में डालता है। नरक में दुःख भोगते हैं लेकिन
वहाँ भी विषयासक्ति पीछा नहीं छोड़ती। विषय जैसा विश्वासघाती त्रिभुवन में भी नहीं मिलेगा। वैसे ये विषय
पाँच ही हैं, लेकिन वे महाभयंकर हैं। उनके कारण ब्रह्मदेव भी संकट में पड़ जाते हैं, फिर औरों की क्या बिसात
है ? विषयों का माधुर्य विष से भी भयंकर है। विष से एक ही बार मृत्यु आती है लेकिन विषय से बार-बार मृत्यु
का आभास होता है। पुनः जन्म और पुनः मृत्यु, यह सब विषयों के कारण ही होता है। जन्म-मरणरूपी संसार
का जोर विषय के अधीन ही है। जब विषयों का, अर्थात् विषयासक्ति का त्याग होता है तभी संसाररूपी रोग
उखड़ कर गिर पड़ता है। जिसे विषयों के भोग अच्छे नहीं लगते, उसका मैं श्रीकृष्ण दास बनकर रहता हूँ। इस
प्रकार ये पाँच विषय तुम्हें बतलाये। अब तीन गुणों के भी लक्षण बताता हूँ। उसे भी अच्छी तरह ध्यान देकर
सुनो। उत्पत्ति, स्थिति और लय त्रिगुणों के कारण ही होते हैं। इसलिये श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों को स्वीकार करते
हैं। ये तीनों गुण मिलाकर अट्ठाईस तत्त्व उन्होंने पूरे किये। उद्धव ! यही श्रीकृष्ण के मत का सच्चा लक्षण है।
त्रिगुणों के सिवा प्रकृति को भी सृष्टि करने की शक्ति नहीं है। गुणों के द्वार से ही उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में
संहार वह कार्य करती है। इसी अर्थ से कार्यकारण का लक्षण और यथार्थ विभाग श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी ।
सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते ॥ १७ ॥
प्रकृति से ही समस्त विकार, त्रिगुणों की सारी लीलायें, सात कारण और सोलह कार्य उत्पन्न होते हैं। उनके
विभागों के बारे में भी सुनो। महत्, अहंकार पंचमहाभूत ये सात 'कारण' हैं और पंचविषय युक्त ग्यारह इन्द्रियों
को मिलाकर सोलह 'कार्य' समझने चाहिये। इस प्रकार की यह प्रवृत्ति रजोगुण को साथ लेकर कार्यकारण की
युक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति करती है। उत्पन्न की हुई सृष्टि का सत्त्वगुण से पालन करती है लेकिन यदि पुरुष
उसकी ओर न देखे तो प्रकृति से भी उत्पत्ति, स्थिति और संहार नहीं होता। उसके कारण भी सुनो। हाथ पैर
हिलाये-डुलाये बिना जिस प्रकार कछुवी केवल अपनी दृष्टि से ही अपने बच्चों का पालन करती है, उसी प्रकार
पुरुष की दृष्टि रहती है अथवा जिस प्रकार सूर्य की किरणों से सूर्यकांत मणि में से अग्नि निकलता है और
उसके योग से ही ब्राह्मण अपने स्वधर्म कर्म से यज्ञ यागादिक बड़े-बड़े होम करते हैं। उद्धव ! उसी प्रकार यह
भी लक्षण है। इसी रीति से कार्य और कारण उत्पन्न होकर स्वधर्माचरण चलता है। प्रकृति के अनुसार चलते हुए