श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
इक्कीसवाँ अध्याय
हे ओंकाररूप सद्गुरु! हे वैकुण्ठनाथ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम सदासर्वदा स्वानंद वैकुण्ठ में ही वास
करते हो! हे अनंत! हे अव्यय! तुम्हारे सच्चे ऐश्वर्य का अंत ही नहीं लगता। तुम्हारा निजबोध का गरुड़ तुम्हारे
सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है। उसके पंख हिलाने भर से प्रचण्ड भववृक्ष भरभराकर गिर पड़ता है। तुम्हारे
हाथ का स्वानुभाव का चक्र प्रखर तेज से लपलपाता रहता है, उसे अभेद भावना की धार लगी हुई है। इसलिये
उसकी मार अत्यन्त प्रचण्ड होती है। तुम्हारा पाञ्चजन्य तो कितना अगाध है। वह निःशब्द में भी भयंकर शब्द
उत्पन्न करता है। वेदवाणी से शुद्ध गर्जना करता रहता है। वही तुम्हारा प्रसिद्ध शंख है। सदासर्वदा आत्मतेज से
चमकने वाली गदा तुम्हारे हाथ में सर्वकाल शोभा देती रहती है। तुम्हारी वह गदा इतनी प्रबल है कि अभिमान
को कुचल देती है। देखने में अत्यन्त मनोहर, जिसे देखते ही आनन्द में उबाल आ जाता है और जिससे
परमानन्दरूपी सुगन्ध निकलती रहती है ऐसा लीला कमल तुम हाथ में उछालते रहते हो। समसमान रहने वाले
जीव और शिव इन दोनों को जय और विजय ये नाम देकर उन्हें द्वार की सुरक्षा के लिए रखा गया है। उसी
प्रकार तुम्हारी अवियोगिनी सुकुमार निजशक्ति अत्यन्त सुन्दर लक्ष्मी रूप में आदर के साथ तुम्हारी चरण सेवा
करती रहती है। तुम्हारे लोक में रहने वाले जितने भी जन हैं वे सब तुम्हारी ही तरह हैं। वहाँ न मानापमान है,
न देहाभिमान है। वहाँ काल का भी प्रवेश नहीं है; कर्म की कुछ नहीं चलती है; वहाँ क्षुधा-तृषा का अंत होता
है; वहाँ तुम्हारे भक्त निजानंद से सदा तृप्त रहते हैं। तुम्हारे कृपाकटाक्ष के कारण अलक्ष्य वस्तु भी बिना ध्यान
किये ध्यान में आ जाती है। तुम्हारे चरण सेवा की अपेक्षा से तुम भक्तों का निरपेक्षता से आचरण कराते हो।
समता के सिंहासन पर एकता की गद्दी बिछी रहती है। उस पर तुम्हारा पूर्णता का स्वाभाविक सहजासन रहता
है। तन्मयता का छत्र, सन्तोष का छत्र, तथा ज्ञान-विज्ञान ये दो चँवर सदा तुम पर झलते रहते हैं। वहाँ चार वेद
तुम्हारे चारण हैं। वे जोर-जोर से तुम्हारी कीर्ति का बखान करते हैं और अठारह पुराण ये बंदी भार के रूप में
तुम्हारी उत्तम वंशावली का वर्णन करते हैं। वहाँ तुम्हारी सभा में छः जन (षट्शास्त्र) वाद-विवाद करते तथा
उपमाओं की रचना करते रहते हैं। युक्तिपूर्वक अपने विचारों का खण्डन-मण्डन कर अपने ज्ञान का प्रदर्शन
करते रहते हैं। कोई भावार्थी बिना कुछ बोले ही तुम्हारी स्तुति करते हैं। ऐसी स्तुति से संतुष्ट होकर तुम उन्हें
अपने पद पर बिठाते हो। तुम ऐसे सद्गुरु महाविष्णु हो, जो चिद्रूप से सम और सहिष्णु है। जो तेज से
देदीप्यमान है, वही जन में एकरूप जनार्दन है। जन में एक जनार्दन ही भरा हुआ है। उसमें एकरूप से
एकनाथ एकरूप हो गया। इसलिये उसने एकपन को भी ग्रस लिया। ऐसा महाबोध उसे प्राप्त हुआ। उस
महाबोध का अंजन हाथ के बिना ही आँखों में डाल देते हैं। इससे पूरे शरीर में ही आँखें फूट निकलती हैं और
दृष्टि सर्वव्यापक हो जाती है। लेकिन सर्वत्र जन को देखने पर वहाँ एक जनार्दन ही दिखायी देता है। ऐसी
परिपूर्ण कृपा कर उसने एकपन भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार भगवान ने प्रसन्न होकर मेरे हाथों से
श्रीमद्भागवत का अर्थ यथार्थ रीति से करवाया और वह भी देशी भाषा में। श्रीमद्भागवत पर संस्कृत में अनेक
टीकायें हैं, फिर भी उन्हें इसमें न जाने क्या बात अच्छी लगी कि उन्होंने प्राकृत और सुगम अर्थ करवाया। मेरा
कर्तृत्त्व और अकर्तृत्त्व उस जनार्दन ने छीन लिया। अब ग्रंथार्थ के निरूपण की बातें भी वही कर रहा है। उसने
इक्कीसवाँ अध्याय ५४३
अपने गौरव के लिये प्रेमादर से वेद के विभाग जिसमें बताये वह एकादश स्कंध का बीसवाँ अध्याय उद्धव को
उत्तम रीति से बताया। इससे भक्त और ज्ञानी इन दोनों को वेदार्थ की पहचान हुई; लेकिन कर्मठ ये गुण दोष
देखने के कारण सन्देह में पड़ गये। उस सन्देह का निवारण करने के लिये इक्कीसवें अध्याय का निरूपण कर
गुणदोषों का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। गुणदोषों का प्रकार बताकर श्रीकृष्ण विषय का त्याग करने के
लिये विस्तृत उपायों का निरूपण कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
य एतान्मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान् ।
क्षुद्रान्कामांश्चलैः प्राणैर्जुषन्तःसंसरन्ति ते॥१॥
भक्ति, ज्ञान और कर्मयोग ये तीन विभाग जो मैंने बताये, वे शुद्ध वेदमार्ग हैं। उन्हें छोड़कर जो भी लोग
विषयसुख की इच्छा करते हैं, देह का सम्बन्ध क्षणभंगुर है यह पूरी तरह भूल कर सांसारिक तथा स्वर्ग के
सुखोपभोग प्राप्त करने के लिये लोभी सकाम कर्म की जल्दीबाजी करते हैं। चंचल प्राण की संगत से काल देह
को ग्रसता ही रहता है। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग इस लोक के अनेक प्रकार के विषयोपभोगों में तथा उसके
प्रयासों में ही सुख मानते हैं। कामभोगों का भोग करते समय काल जीवन को ग्रसता रहता है यह समझ ही नहीं
पाते; जन्म-मरण के फेरे में दुःख के आवेग सहते रहते हैं। काम्यकर्म और नित्यकर्म आचरण करते समय एक
जैसे लगते हैं, फिर उनके फल में उसका विषमत्त्व अर्थात् अच्छे और बुरे परिणाम क्यों होते हैं? तो यह
कर्मवैचित्र्य की बात संकल्प के कारण ही होती है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥२॥
वैसे विचार किया जाय तो सारे कर्म एक जैसे ही हैं। लेकिन उनके अधिकार भिन्न-भिन्न होते हैं। उनके
ही कारण सुख और दुःख भोगना पड़ता है। भोजन करना मुँह का काम है वह यदि नाक से करने लगे तो सुख
के स्थान पर भयंकर दुःख का सामना करना पड़ेगा। पैरों से चलने का काम यदि सिर से करें तो रास्ता तो
कटेगा नहीं लेकिन अनेक कष्ट भोगने पड़ेंगे। उसी प्रकार अधिकार के अनुसार जो कर्म निश्चय ही सुखमय है,
वही कर्म अनधिकार से करने पर दुःसह-दुःख भोगना पड़ेगा। हाथी के हौदे से गधे का गौरव नहीं बढ़ेगा, वह
तो उसके बोझ से मर ही जायेगा। उसी प्रकार अनधिकार किये हुए कर्म की गति है। मेघ निर्मल जल की ही
वृष्टि करता है, लेकिन जिस प्रकार बिजली कड़कती है उसी प्रकार फल मिलता है। किसी प्रदेश में केवल
भाँग तैयार होती है, तो दूसरे प्रदेश में केले उत्पन्न होते हैं। दूध कितना ही उत्तम क्यों न हो वह ज्वर के रोगी
को कड़वा लगेगा लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को मधुर लगेगा और पीने से स्वास्थ्य बनता है। उसी प्रकार इच्छा
रखकर किया हुआ कर्म अत्यन्त बाधक सिद्ध होता है। वही कर्म निष्काम बुद्धि से करने पर मोक्षप्राप्ति का
साधन बनता है। अपने अधिकार के अनुसार कर्माचरण करना यही यहाँ पर प्रमुख गुण है और अनधिकार
किया हुआ कर्म यहाँ अवगुण अर्थात् महादोष है। इस प्रकार कर्माचरण गुण और दोष उत्पन्न करता है और
शास्त्र के ज्ञाता इसी गुणदोष का लक्षण बताते हैं। यही गुणदोष लक्षण शुद्ध-अशुद्ध का कारण है। इसी अर्थ का
निवेदन भगवान करते हैं।
५४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शुद्धयशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थंगुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ ३ ॥
पंचमहाभूत एक समान हैं। उसी प्रकार परब्रह्म भी सर्वत्र समसमान ही है। वहाँ गुणदोष मिथ्या है। लेकिन
वे उपर्युक्त उद्देश्य से ही प्रमाणभूत हुए हैं। श्रुति या स्मृति के बताने से पहले सभी प्राणियों में आविद्यक विषय
प्रवृत्ति स्वाभाविक ही रहती है। ऐसी विषयवासना प्राकृतिक होने के कारण, उसकी निवृत्ति के लिये ही अनेक
प्रकार के गुणदोष बताये गये हैं। विषय की बाधा दूर करने के लिये एक शुद्ध और एक अशुद्ध, उधर का शुभ
और इधर का अशुभ, यह वेदवाणी के रूप में मैंने ही बता दिया है। विषयों की निवृत्ति की स्तुति वेदरूप में मैंने
ही की है। मन में घृणा उत्पन्न करने के लिये विषय वृत्ति की निन्दा भी मैंने ही की है। कर्म प्रवृत्ति चलते समय
विषयों की निवृत्ति होती रहे ऐसा उपाय मैंने वेद के द्वारा कर रखा है वही तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।
दर्शितोऽयं मयाऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम् ॥ ४ ॥
उद्धव ! तुम सचमुच ही निष्पाप हो इसलिये तुम्हारी बुद्धि भी शुद्ध है। इसलिये धर्मादि व्यवहार सिद्धि या
विधि भी तुम्हें बताता हूँ। धर्माचरण करते समय भी प्रवृत्ति धर्म अप्रमाण है। निवृत्ति धर्म ही अत्यन्त शुद्ध है।
यही स्वधर्म के गुणदोष हैं। विषय की आसक्ति से जो भी व्यवहार किया जाता है, वह अशुद्ध ही है और
उपकार की दृष्टि जो व्यवहार करे वह देवताओं को तथा मनुष्यों को भी वंद्य होता है। अदृष्टदाता ईश्वर है,
यह बात बड़े-बड़े पुरुष भी भूल जाते हैं और नीचों के द्वार-द्वार घूमते हैं। वह अमंगल यात्रा है किन्तु स्वयं
आलस त्याग कर कीर्तन आदि का श्रवण करना अथवा तीर्थयात्रा करना साधुओं का दर्शन करना, अथवा पूजा
के लिये मन्दिर जाना अथवा अनाथ का दाहसंस्कार करना आदि से अगणित पुण्य का लाभ होता है। इतना ही
नहीं बल्कि इससे पग-पग पर कोटि-कोटि यज्ञों का फल उत्पन्न होता है। जिसके योग से संसार पार किया जा
सके उसी का नाम है पवित्र यात्रा। यही वेद में बताये अनुसार यात्रा पर जाना और यही गुणदोषों का विचार
है। राजा अपने जूते ब्राह्मण के सिर पर रखे तो उसका दोष ब्राह्मण को नहीं लगता बल्कि राजा स्वयं ही दोषी
होता है। उसी प्रकार आपातकाल आने पर यदि उपवास करने पड़े तो नीच का अनाज लेकर प्राण बचाने में
कोई दोष नहीं है। लेकिन यदि वही नीच का दान आपातकाल न होने की स्थिति में लिया जाय तो महादोष
लगता है। यह भी वेद में हीं बताया गया है। प्रसिद्ध मनु-पराशर आदि शुद्ध कर्मधर्म प्रवर्तकों ने अनेक प्रकार
से गुणदोष और शुद्ध-अशुद्ध की चर्चा की है। वही गुणदोषों के विभाग और शुद्धाशुद्ध विषय सम्बन्धी निरूपण
स्वतः नारायण तीन श्लोकों में कर रहे हैं।
भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातवः।
आब्रह्मस्थावरादीनां शारीराआत्मसंयुताः ॥ ५ ॥
वेदेन नामरूपाणि विषमाणिसमेष्वपि।
धातूषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये ॥ ६ ॥
ब्रह्मदेव से लेकर स्थावरजंगम तक सभी प्राणियों में पृथ्वी, आप, तेज, वायु और आकाश ये पंचमहाभूत
समसमान ही हैं। जिसे नाम और रूप नहीं है, गुण नहीं है और कर्म भी नहीं है, ऐसे सम ब्रह्म के लिये मेरे वेद
इक्कीसवाँ अध्याय ५४५
ने लोकल्याण के लिये नामरूप के भेद बना रखे हैं। नीचे पृथ्वी और ऊपर आकाश ये दोनों एक से दिखाई देते हैं
किन्तु विभिन्न देशों में जाने में सुविधा हो इसलिये दस दिशाओं की कल्पना की गयी है। उसके अनुसार नाम,
रूप और वर्णाश्रम यह मेरे वेद ने सम और विषम जो उत्पन्न कर रखा है, वह स्वधर्म कर्म की सिद्धि के ही लिये
है। इसी द्वार से मैंने पुरुषों के हित के लिये उत्तम लक्षणों से युक्त धर्मार्थकाम मोक्ष साधनों के नियम अथवा
नियंत्रण वेदाज्ञा के रूप में किया है। रूप, नाम, आश्रम, वर्ण इनके सम्बन्ध में यदि नियम नहीं बनाये गये होते तो
व्यवहार चल ही न पाता। फिर मोक्षसाधन कैसे होता ? इस प्रकार वेद ने व्यवहार चला कर उसी में परमार्थ
विचारों का चमत्कार भी दिखा दिया है, लेकिन जो भाग्यवान होगा उसी को वह दिखायी देगा। कर्म पर यदि
अधिक जोर दिया जाय तो पुरुष कर्मठ होकर रह जायेगा, उससे परमार्थ सिद्ध नहीं होगा; उलटे उसे विधिनिषेध
का कष्ट भोगना पड़ेगा और यदि स्वधर्म कर्म को बिलकुल छोड़ दिया जाय तो पाखण्ड अपना प्रभाव दिखाएगा।
इससे मोक्ष हाथ न लगकर अपने हितों की ही हानि होगी। इसलिये स्वधर्म का आचरण करते समय, लगे हाथ
मोक्षलाभ भी प्राप्त हो ऐसी वेदार्थ की योग्यता जिसकी समझ में आयेगी, वही ज्ञाता बुद्धिमान है। लेकिन यह वेद
के अर्थ रहस्य सहसा किसी के हाथ नहीं लगता। इसीलिये परमार्थ मार्ग दिखलाने वाला गुरु चाहिये। उस
सद्गुरु की पूर्ण कृपा होगी तो वेद का रहस्य हाथ लगेगा। गुरुकृपा के बिना आप जो भी साधन करें वे सब
साधकों का अहित ही करते हैं। इसलिये मेरा वेद संसार का गुरु है। उसने वस्तुतः व्यवहार दिखाया है, जन-जन
का उद्धार करने के लिये स्वधर्म कर्म को नियमबद्ध किया है। इस प्रकार मेरा वेद जनहितकारी है। वह नाना
प्रकार के गुण-दोष दिखाकर लोगों को विषयों से बाहर निकालता है। इस प्रकार वेद सारे संसार का उपकारी है।
देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।
गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम् ॥ ७॥
उद्धव भक्तों में अत्युत्तम तथा साधु लक्षणों के अनुसार साधु की ही तरह होने के कारण श्रीकृष्ण उसे
अत्यन्त प्रेम से 'सत्तम' अर्थात् साधुश्रेष्ठ कहकर बुलाने लगे। उद्धव! इस संसार में चाहे जो मनुष्य, मनचाहा
कर्माचरण न करे इसलिये वेदों ने वर्णाश्रम का नियम बना दिया है। जहाँ कर्मतंत्र नहीं करना चाहिये ऐसे
अपवित्र देश, अपवित्र काल और वस्तु की पवित्रता-अपवित्रतता का विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा।
अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत् ।
कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीटासंस्कृतेरिणम् ॥ ८ ॥
पृथ्वी पर किसी स्थान पर मेघवृष्टि नहीं होती लेकिन वहाँ के खेत हरे-भरे दिखायी देते हैं। उस जमीन
को 'तराई' कहते हैं। उसी पृथ्वी पर कहीं पथरीली जमीन रहती है वहाँ मूसलाधार पानी बरसने पर भी उस
जमीन में अंकुर नहीं फूटता। उसी प्रकार देश की शुद्धि-अशुद्धि के सम्बन्ध में भी तुम्हें सविस्तार बताता हूँ। जहाँ
कर्म से कार्यसिद्धि नहीं होती, वहाँ कर्म बिलकुल नहीं करना चाहिये। जहाँ कृष्णमृग नहीं होता उस भूमि को
अपवित्र समझना चाहिये। वहाँ कभी भी कर्म करने का प्रयास नहीं करना चाहिये। उसी प्रकार जहाँ ब्राह्मण न हो
वह देश अपवित्र है अथवा जहाँ निषिद्ध कर्म करने वाले ब्राह्मण हों वह भूमि भी अपवित्र है। उसी प्रकार जहाँ
ब्राह्मणों के प्रति भक्ति नहीं है, बल्कि उनकी निन्दा कर उनकी अवहेलना भी करते हैं वह देश भी कर्म करने के
लिये सचमुच अपवित्र है, यह ध्यान में रखो। किसी देश में कृष्णमृग रहते हैं, किन्तु भगवद्भक्ति नहीं होती, वह
देश भी कर्म के लिये निश्चित रूप से अपवित्र है यह जान लो। कीकट, कलिंग और मागध ये देश भक्तिहीन
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प्रसिद्ध हैं। वे देश अशुद्ध होने के कारण वहाँ भी शुद्ध स्वधर्म नहीं होता। जहाँ उपलेप समार्जन न होता तो हो
ऐसे घर की जमीन को भी अशुद्ध ही समझना चाहिये; अथवा जहाँ वेद बाह्य दुर्जन हों, वह भी स्थान अपवित्र
है। जो जमीन पथरीली होती है, वह भी सदा पथरीली हो होती है। अब काल के तंत्र की पवित्रता-अपवित्रता के
बारे में बताता हूँ।
कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।
यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः ॥ ९॥
जिस काल में देश, काल, द्रव्य और पात्र ये सामग्री सुलभता से मिले वही काल अत्यन्त पवित्र है तथा
शास्त्र सम्मत है। ग्रहण, कपिलाष्टि आदि पर्वों के रूप में जो काल आता है वह परम पवित्र है। उसी प्रकार
जब संतजन घर आयें उस काल को अत्यन्त पवित्र समझना चाहिये अथवा अकस्मात संपत्ति प्राप्त हो जाय या
मन में धर्म करने का विचार आ जाय तो उस काल को वेद 'पुण्यकाल' के रूप में स्वीकार करते हैं। सच्चा पल
काल पुरुष को जन्म में एक ही बार प्राप्त होता है। वह है माता-पिता का अंतराल। धर्म का वह अत्यन्त पवित्र
काल समझना चाहिये। ऐसे समय श्रद्धापूर्वक धर्म करने से अक्षय पवित्रता प्राप्त होती है। अब तुम्हें काल की
स्वाभाविक पवित्रता के बारे में बताता हूँ। वह काल सभी दृष्टियों से उपकारी तथा साधक के निज स्वार्थ को
साधनेवाला है। सचमुच 'ब्राह्म मुहूर्त' अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व पाँच घटिकाएँ, यह काल स्वाभाविक रूप से पवित्र
है; वह काल साधक के हित का होता है और दिन पर दिन उसके हित की वृद्धि ही करता है। अब कर्म के लिये
अयोग्य काल भी बताता हूँ। ऐसे समय स्वाभाविक तौर पर ही कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि वह काल निषिद्ध
होने के कारण कर्म करने में महादोष लगता है। जिस स्थान पर कल न हो, स्थल अथवा विहीत धन उपलब्ध न
हो, वह काल सचमुच कर्म करने के लिये योग्य नहीं है, यह ध्यान में रखो। जिस काल में सूतक लगा हो अथवा
राष्ट्र पर संकट आया हो अथवा जिस समय देह परतंत्र हो गया हो, वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है ऐसा
बताया गया है। जिस काल में सूखा पड़ा हो, ज्वर का जोर चल रहा हो वह काल दूषित हो जाता है, जिस काल
में चोरों का बोलबाला हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं है। जिस समय गुस्सा आया हो, अथवा
तमोगुण उफान पर हो, निद्रा और आलस्य ने कब्जा जमा रखा हो, वह काल भी कर्म करने के लिये योग्य नहीं
है। अकस्मात सुख सम्पदा प्राप्त हुई हो अथवा कभी न सुनी हुई बात सुनने में आयी हो अथवा सज्जनों की
मर्यादा भंग हुई हो, तो वह काल कर्म करने योग्य कभी नहीं है। राह चलते समय यदि कोई संकट आ जाये और
प्राणों पर आ जाय तो वह काल भी कर्म करने योग्य नहीं है। जिस समय धन की लालसा प्रबल हो उठती है,
जिस समय प्राणों की अत्यधिक चिन्ता लगी रहती है, मन जब विकल्प से भर जाता है उस समय भी कर्म करना
उचित नहीं है। इस प्रकार कर्म करने के लिये कौन-सा काल अनुचित है यह तुम्हें अच्छी तरह बता दिया। अब
धन की शुद्धता अशुद्धता का भी विस्तार से वर्णन करता हूँ।
द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येध वचनेन च।
संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा ॥ १०॥
पुरुष गोमूत्र प्राशन करे तो उसमें तत्काल पवित्रता आती है, लेकिन वही ताँबे के बर्तन में लेने से
अपवित्रता आती है। पुरुष जलप्रोक्षण करे तो फूलों को पवित्रता आती है। अग्नि की सेवा करने से ब्राह्मण को
पवित्रता आती है लेकिन वही ब्राह्मण यदि अग्नि से जलता है तो अग्नि अपवित्र हो जाती है। दर्भ पर पिण्ड
रखने से वह पवित्र होता है लेकिन पिण्ड का स्पर्श होने से दर्भ अपवित्र हो जाता है। श्रुति के अनुसार धर्मशास्त्र
वस्तु की शुद्धि-अशुद्धि इस प्रकार बताता है जो वस्तु संदेहास्पद रहती है उसकी शुद्धि के लिये ब्राह्मण वचन
पर्याप्त रहता है क्योंकि ब्राह्मण वचन हरिहर को भी मान्य है। घृत के संस्कार से अन्न शुद्ध होता है; होम के
संस्कार से नवधान्य शुद्ध होता है; और अग्नि के संस्कार से नमक शुद्ध होता है ऐसा शास्त्र कहते हैं। 'रा' अक्षर
के आगे 'म' जोड़कर उच्चार करने से पातकों का भार कम होकर वह पुरुष शुद्धात्म हो जाता है। उसी 'म'कार
के आगे 'ध्य' अक्षर लगाने से और उसका उच्चार करने से घोर पाप सिर पर लगता है और उससे वह पुरुष
बन्धन में पड़ जाता है। रजस्वला चौथे दिन शुद्ध होती है, मेघोदक चौथे दिन शुद्ध होता है। वृद्धि अथवा सूतक
दस दिन के बाद निवृत्त होता है। इसी रीति से काल की शुद्धता है। पिछले दिन का अन्न अगले दिन दूषित होता
है और जिसमें बासीपन आ गया, वह अन्न भी अशुद्ध रहता है। लेकिन घी में तली हुई चीज की बात वैसी नहीं
है। वह बहुत दिन तक शुद्ध रहता है। जिसमें खटास आ जाती है, वह तत्काल ही अपवित्र होता है। एकत्र किये
हुए पानी को यदि चांडाल स्पर्श करे तो वह बिलकुल अपवित्र हो जाता है। उसे बिलकुल स्पर्श नहीं करना
चाहिये। लेकिन वही पानी यदि सोते के जलाशय का हो, तो चांडाल के स्पर्श से वह अपवित्र नहीं होता। वह
नित्य निर्मल और पवित्र ही रहता है। थोड़ा खाना बना हो और उसे कुत्ता और कौआ छू ले तो पूरा खाना ही
फेंक देना चाहिये, क्योंकि वह अन्न अपवित्र होता है। यदि वही खाना सहस्र भोजन का हो तो जितने भाग में
कुत्ता या कौआ स्पर्श किया हो और जिस-जिस स्थानपर उसका मुँह लगा हो उतना भाग निकाल कर फेंक दिया
जाना चाहिये। शेष अन्न को ग्रहण करने में दोष नहीं है।
शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।
अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः ॥ ११॥
चन्द्रग्रहण अथवा सूर्यग्रहण लगने पर स्वस्थ आदमी स्नान न करे तो उसे दोष लगता है; किन्तु बालक,
वृद्ध और रोगी यदि स्नान न करे तो उसे कोई दोष नहीं है। पुत्र जन्म पर, जितने भाई उन सबको दस दिन का
अशौच अवश्य है। किन्तु दूसरे देश में रहने पर यदि अशौच बाधा समाप्त होने के बाद पुत्र जन्म का समाचार
मिले तो अशौच पालने की आवश्यकता नहीं है। बीते दिन यदि किसी के भाई की मृत्यु होती है तो उसके
गोत्रजों को सूतक लगता है। लेकिन अगले दिन अगर कोई और मरता है तो पहले सूतक में ही दूसरा सूतक मिट
जाता है। जिसने विष लिया हो वह यदि साँप से कटवा ले तो उसके विष से पहला विष समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार सूतक से ही सूतक नष्ट होता है। हम जानकर जो पाप या पुण्य करते हैं, उसका फल भोगना ही
पड़ता है। लेकिन बुद्धि को जिसका पता नहीं होता, वह अनजाने में होने के कारण वह बाधक नहीं होता। हमारे
अंतःकरण को आत्मज्ञान पवित्र करता है, यही विवेकयुक्त वैराग्य की 'बुद्धि की शुद्धि' है। जो धनी है उसके
लिये पुराना वस्त्र परिधान करना अपवित्र है। सीया हुआ कपड़ा भी उसके लिये अपवित्र है। किन्तु गरीब के
लिये वही अत्यन्त पवित्र है। वेद का रहस्य अत्यन्त गहन है। स्मृतिकारों ने उसे विशद कर दिया है। भोजन में
किसी को साथ न लेना धनी आदमी के लिये अशुद्ध अन्न है लेकिन गरीब के लिये अकेले बैठ कर भोजन करना
अत्यन्त पवित्र है ऐसा वेद ने ही कहा है। पंचमहायज्ञ किये बिना अन्न ग्रहण करना पाप भक्षण करने जैसा है।
अतिथि को विन्मुख भेज दिया जाय तो सारे पुण्य पर पानी फिर जाता है। अपने गाँव में रहने पर सारे आचार
करें, दूसरे देश में जाने पर केवल आधे का ही निर्वाह करें। किसी शहर में या नगर में जाने पर केवल एक
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चौथाई आचारों का ही पालन करें और मार्ग में साथियों के अनुसार कर्म करें। देशकाल और परिस्थिति का
विचार करके ही यह मर्यादा धर्मशास्त्र ने लगा रखी है। इससे भिन्न आचरण करने पर कर्ता को सर्वथा दोष ही
लगेगा। शरीर में कर्म करने का सामर्थ्य होते हुए जो कर्म नहीं करता उसे बहुत बड़ा दोष लगता है, उसी प्रकार
शरीर रोग से ग्रस्त है तिस पर भी कर्म करने वाला दोषी होता है। अब तक वस्तुओं की शुद्धि और अशुद्धि की
विधियों के बारे में बतलाया। उसी का प्रतिपादन पुनः वेदोक्त धर्मशास्त्र के अनुसार करते हैं।
धान्यदार्वस्थिततन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।
कालवाय्वग्निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥१२॥
शूद्र ने दान किया हुआ अन्न एक रात्रि में शुद्ध होता है। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि जो लकड़ी के पात्र हैं, वे
पानी से धोने पर शुद्ध हो जाते हैं। बाघ के नख और हस्तिदंत जब तक गीले हैं, तब तक अशुद्ध रहते हैं। वही
सूख जाने पर अत्यन्त पवित्र हो जाते हैं। रेशम का धागा मूलतया शुद्ध ही होता है। उनके तंतु वायु से शुद्ध होते
हैं और कपास के वस्त्र के तंतु धोने से शुद्ध होते हैं। गाय का दूध कांसे के बर्तन में अथवा मटकी में रखने से
पवित्र होता है, वही ताँबे के बर्तन में रखने से अपवित्र होता है। इमली आदि खट्टे पदार्थ से ताँबा शुद्ध होता है
और नमक से खट्टे पदार्थ शुद्ध होते हैं। घृत अग्नि संस्कार से शुद्ध होता है, अग्नि ब्राह्मण के मंत्रों से पवित्र
होता है; ब्राह्मण स्वधर्म के आचरण से पवित्र होता है, और धर्माचरण वेद विधि से पवित्र होता है। वह गुरुमुख
से पवित्र होता है, गुरु आत्मानंद से पवित्र होता है, आत्मा (जीव) गुरु चरणोदक से पवित्र होता है, और उदक
ब्राह्मणों के चरण से पवित्र होता है। लीपने से धरती पवित्र होती है, मिट्टी से जल पवित्र होता है, तेल से
चमड़ा पवित्र होता है और चमड़े के पात्र में रखने से तेल पवित्र होता है। व्याघ्रचर्म, कृष्णाजिन आदि चर्म
मूलतया पवित्र होते हैं। अग्निसंस्कार से सुवर्ण सहज ही पवित्र होता है। इस प्रकार परस्पर पदार्थों से परस्पर
पवित्रता के आने की बात स्मृति शास्त्रों में बतायी गयी है। अब मल से लिप्त होने पर, किस प्रकार उसमें
पवित्रता आती है, सुनो।
अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।
भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते ॥१३॥
बर्तन, चौकी अथवा किसी भी प्रकार का आसन अमंगल पदार्थ से लिप्त होने पर, जब तक उसकी
दुर्गंध न जाय तब तक धोने से उसे पवित्रता आती है। शरीर में नाभि के नीचे अमंगल लेप लगा हो तो उसे
स्थान की दुर्गन्ध पूरी तरह समाप्त होने तक धोने से उस पुरुष में पवित्रता आती है। नाभि के ऊपर अकस्मात
अमंगल पदार्थ का लेप लग जाय, तो मृत्तिकास्नान करने से वह पुरुष पवित्र होता है। मल धोने से तत्काल
चला जाता है; लेकिन उसकी महक जाने तक शरीर पहले जैसा नहीं हो जाता। इसी का नाम है 'मलनिष्कृति'
बाह्य पदार्थों की मल निवृत्ति के लिये ही वेद ने इतना बताने का श्रम लिया। अब कर्त्ता की पवित्रता के संबंध
में उपाय बताता हूँ, सुनो।
स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।
मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः ॥ १४॥
गर्भाधान से अन्नप्राशन संस्कार होते हैं वह बाल्यावस्था है। चौल संस्कार कुमारावस्था है और उपनयन
संस्कार से ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है। कर्माधिकार प्राप्त करने के लिये स्नान करें; द्रव्यशुद्धि के लिये दान करें,
इक्कीसवाँ अध्याय ५४९
वैराग्य के लिये तप करें और आलस्य जाने के लिये कर्म करें। मेरे भजन के प्रति दृढ़ बुद्धि रखना इसी का नाम
है 'वीर्यशुद्धि' और मेरे अविरत स्मरण से 'चित्त शुद्धि' निश्चय रूप से प्राप्त होती है। जो बुद्धिमान ब्राह्मण हों,
उन्हें इस प्रकार अंतर्बाह्य शुद्ध होना चाहिये। इसके लिये वेद ने अपने-अपने कर्म बताये हैं।
मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धेर्मदर्पणम्।
धर्म सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५॥
मंत्रार्थ ज्ञान से मंत्र शुद्धि होती है, ब्रह्मार्पण से कर्म शुद्धि होती है; कर्ता की शुद्धि के लिये वेद ने छः
लक्षण बताये हैं। देश, काल, द्रव्यसंग्रह, मंत्र, कर्म और निरोगी कर्त्ता ये छह अवस्थाएँ शुद्ध हों तो स्वधर्म
फलदायी होता है। अनाथ, दीन लोगों के पास संकट के समय जो द्रव्य पहुँचता है, अथवा मेरे भक्त के पास
जाता है, वही वास्तव में 'द्रव्य की पवित्रता' है। स्वयं कष्ट से अर्जित किया हुआ धन धर्मशास्त्र के अनुसार शुद्ध
है, लेकिन धन के लालच में प्राण अटका हुआ हो तो वह सारा धन अशुद्ध है। इसी को धन की शुद्धता कहते हैं।
अब मंत्र की पवित्रता सुनो। जिस मंत्र से मंत्र की सिद्धता होती है, वही मंत्र सर्वथा शुद्ध है। जिस मंत्र के लेने से
देह में अभिमान बढ़ता है, अथवा जिसमें जारण-मारण उच्चाटन आदि रहता है वह मंत्र अपवित्र हैं। इस प्रकार
'मंत्रशुद्धि' बतायी। अब कर्म का लक्षण सुनो। तो जिस कर्म के योग से कर्म का बन्धन टूटता है वह कर्माचरण
अत्यन्त शुद्ध है। कर्माचरण करते समय जिसमें देहाभिमान खौलता है और कर्ता का बन्धन अधिक दृढ़ होता है,
वह कर्म अपवित्र है। जिस कर्म से कर्म का निवारण होता है, वही कर्म वास्तव में शुद्ध है और उद्धव! जहाँ
सर्वदा अविनाश समबुद्धि रहती है; वह देश पुण्यवान है। यदि सुक्षेत्र में वास करे किन्तु वहाँ दूसरों के गुणदोष
दिखायी देने लगे तो वह देश भी तामस है। उसके योग से कर्त्ता का अचूक नाश होता है। अन्य क्षेत्रों में दोष
देखने से उनका उत्तम क्षेत्र में विनाश होता है; किन्तु उत्तम क्षेत्र में ही दोष देखने पर वे कल्पांत में भी जीव को
नहीं छोड़ते। जहाँ ऐक्य भाव का निर्माण होता है उस देश को निर्मल समझना चाहिये और चित्त को सुप्रसन्न
करने की जो बेला है वही साधक का पुण्यकाल समझना चाहिये। 'ब्राह्ममुहूर्त' का अर्थ है, भोर की बेला। यह
समय स्वाभाविक रूप से पवित्र है। उसमें भी यदि चित्तक्षोभ हो तो वह काल भी अपवित्र समझना चाहिये। अब
जो कर्म कर्ता है उसकी कर्म की अहंता यदि नष्ट हो जाय, तभी वह कर्म स्वाभाविक रहता है। यही कर्ता की
पवित्रता है। उसमें यदि कोई 'मैं कर्ता' कहे तो वह बद्ध हो जाता है। देहाभिमान के कारण कर्ता अपवित्र होता
है। इस प्रकार धर्माधर्म के छह प्रकार हैं। यही वेदार्थ तत्त्व का सार है। इसी धर्म से पुरुष मुक्त होता है और
अधर्म से अपवित्र होकर बन्धन में फँसता है। इस प्रकार गुणदोषों का लक्षण बहुत गहन है। उसमें बड़े-बड़े
ज्ञानी, चतुर पण्डित भी भ्रम में पड़ जाते हैं।
कश्चिद्गुणोऽपिदोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।
[L
५५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
में लेने से मद्यपान का दोष लगता है। कटहल खाने में मीठा लगता है, लेकिन अधिक खाने पर पेट में दर्द उठ
ब्रह्माण्ड फटने जैसा कष्ट होता है। सूर्य की पूजा करने से पुण्य लगता है लेकिन यदि कहीं बेल का पत्ता चढ़ा
दिया तो पुण्य की बात दूर उलटे पाप ही लगता है। ऐसे कर्म में ही कर्म का विधि निषेध प्रकार रहता है। कभी-
कभी गुण ही दोष बन जाता है, तो कभी-कभी दोनों ही से ढेरसारा पुण्य प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ, जिस रास्ते
पर चोर हों वहाँ प्रातःकाल स्नानकरने वाले ब्राह्मण को वह कर्म न करने दे और उसे कहीं दूर ले जाएँ तो वह
दोष ही है किन्तु गुण सिद्ध होता है। अग्निहोत्र करना गृहस्थ का गुण है, लेकिन यदि वह कोई संन्यासी करे तो
वह दोष होता है। वेदमंत्र का पठन ब्राह्मण का विहीत गुण है लेकिन वह शूद्र के लिये दोषकारक होता है।
विषय से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये गुणदोषों के सुगम नियम बनाये गये हैं। वेद का मर्म न समझने के कारण
इसमें भ्रमिष्ट लोगों को विषय का भ्रम होता है। जब तक भ्रान्ति रहती है तब तक कर्मप्रवृत्ति रहती है। अँधेरी
रात में ही जुगनू चमकते हैं, उसी प्रकार अज्ञान स्थिति में ही गुणदोषों का महत्त्व होता है। गुणदोषों में पतन यह
अवश्य ही किसी दिन माथे पर गिरता है। इसी अर्थ का निरूपण भगवान कर रहे हैं।
समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।
औत्पत्तिकोगुणः सङ्गो न शयानः पतत्यधः ॥ १७ ॥
महार, भील, मछुआरे अपने कर्म से ही पतित हुए हैं। ऐसे पतितों को मद्यपान आदि दोषों से अधिक
पतन नहीं है। नील में डुबाये हुए काले कपड़े को काजल और अधिक क्या काला करेगा? अथवा अन्धकार
को स्याही लगाने से वह और क्या अधिक मैला होगा? उसी प्रकार जो स्वयं ही चांडाल कुल में पैदा हुआ है
उस पर किसकी छूत का असर पड़ सकता है? काजल को और अधिक काला करने की शक्ति कीट में नहीं
होती। निर्जीव को विष देने से उसे क्या दुःख होगा? उसी प्रकार पतित के लिये पातक कभी बाधक नहीं
होता। जो नीचे ही सोया है उसे गिरने का क्या भय ? उसी प्रकार जिस पर देहाभिमान का असर होता है, वह
नीच से भी अधिक नीच बन जाता है। रजंतमादि गुणों की संगत से जो विषयलंपट हो जाता है, उसे कामभोग
बुद्धि नयी नहीं लगती। जो धतूरे का बीज खाकर बकने-झकने लगता है और नाचने-गाने लगता है, उसकी
गाँठ से धन चोरी हो जाय तो उसकी उसे परवाह ही नहीं होती। उसी प्रकार जो देहाभिमान के कारण उन्मत्त
हो जाता है, अत्यन्त काम लोलुपता के कारण जो कामासक्त हो जाता है, उसे अपने स्वार्थ की होने वाली हानि
समझ में नहीं आती। जिस पर विष का असर होता है उसे सुअर की विष्टा खिलाते हैं, उसी प्रकार
विषयालोलुप पापी लोगों के लिये मैंने स्वपत्नीनिष्ठा की मर्यादा बना दी है। क्योंकि जिस पर विष का प्रभाव
रहता है, उसे उस समय सुअर की विष्ठा औषधि के रूप में देनी चाहिये ऐसा ज्ञानी लोगों का कहना है। उसी
प्रकार जब तक स्त्री और पुरुष हैं, तब तक विषयलंपट का स्वेच्छाचार वेद ने सपत्नी निष्ठा की सीमा बाँध दी
है। फिर भी वेद की आज्ञा के अनुसार, कहीं लोग अपनी स्त्री के साथ दिन-रात गमन न करें इसलिये उन्होंने
प्रतिबन्ध लगाया कि केवल ऋतुकाल में ही गमन करना चाहिये। उसमें भी यदि पुत्र का जन्म हो जाय तो
'आत्मा वै पुत्रनामासि' इस वाक्य से वेद ने स्त्रीकाम से परावृत्त किया है। विष का प्रभाव पूरी तरह समाप्त
होने पर वह सुअर की विष्ठा हाथ में भी नहीं लेता, उसी प्रकार अंतःकरण में विरक्ति उत्पन्न होने पर वे स्वस्त्री
का भी त्याग करते हैं। इस प्रकार विषय की निवृत्ति ही वेद में बतायी गयी है। वह वेदोक्ति गुणदोष दिखाकर
विषय पर से आसक्ति हटा देती है।
इक्कीसवाँ अध्याय ५५१
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।
एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥१८॥
विषय से निवृत्ति हो, यही मेरे वेद का उद्देश्य है, इसलिये विषय छोड़ने के लिये ही गुणदोष दिखाने का
उपाय बताया है। प्राणी अकस्मात् ही सारे विषयों का त्याग नहीं कर पाते इसलिये निषेध रूप में उसकी निंदा कर
धीरे-धीरे विषय छूट सकें ऐसी योजना की गयी है। जैसे-जैसे विषय से निवृत्ति होती है वैसे-वैसे आत्मसुख की
प्राप्ति होती जाती है। पूर्ण विरक्ति होने पर साधक मत्स्वरूप हो जाता है। मत्स्वरूप की प्राप्ति में विषयासक्ति ही
बाधक होती है। उसकी निवृत्ति होने पर, साधक मत्स्वरूप हो जाता है और जब मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है
तब अहंकार पूरी तरह नष्ट हो जाता है। फिर शोक मोह शान्त होकर, अविद्या भी सचमुच नष्ट होती है। अविद्या
का नाश होते ही भयंकर जन्मभाव नष्ट हो जाता है। तब मृत्यु की ही मृत्यु हो जाती है और जीव का जीवत्व
समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही अँधेरे के साथ रात्रि के लिये भी कोई स्थान नहीं रह जाता,
उसी प्रकार अविद्या जीव के साथ समाप्त होते ही, संसार भय को स्थान ही नहीं रह जाता। दृष्टि स्थिर होने पर
जिस प्रकार मृगजल की बाढ़ नहीं रह जाती, उसी प्रकार भवभय के साथ सारा संसार ही मिथ्या हो जाता है।
वेदोक्त स्वधर्माचरण प्राणियों के कल्याण के ही लिये है और विषय त्याग के लिये गुणदोषों का निरूपण किया
गया है। जिन्हें वेद का अर्थ समझ में नहीं आता वे उसे प्रवृत्तिपरक कहते हैं लेकिन वास्तव में वेद ने विषयों के
प्रति आसक्ति नष्ट करने वाली विरक्ति ही बताई है। वेदों के अनुसार स्वधर्म स्थिति से रहने पर विषयों के प्रति
विरक्ति उत्पन्न होती है और प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं, यही मेरी वेदोक्ति है। वेद की आज्ञा का पालन न कर
केवल विषयों के प्रति आसक्ति रखने से प्राणी अत्यन्त दुःख के भागी होते हैं। प्रवृत्ति जितनी भी है, वह
अनर्थकारी ही है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीभगवान चार श्लोकों में उद्धव को बताये हैं।
विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः सङ्गस्ततो भवेत्।
सङ्गात्तत्र भवेत् कामः, कामादेव कलिर्नृणाम् ॥ १९ ॥
कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।
तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम् ॥२०॥
जिसका मन सदा विषय के माधुर्य का ही स्मरण करता रहता है, उसमें अत्यन्त प्रबल विषयासक्ति उत्पन्न
होती है। विषयासक्ति बढ़ते ही निर्लज्ज काम खौल उठता है और उसके लिये वह अत्यन्त संकट के दुर्गम प्रसंग
सहन करता है। किन्तु विषयप्राप्ति के जो भी उपाय सोचते हैं वे पग-पग पर हानिकारक ही सिद्ध होते हैं। जब
तक विषयवासना की पूर्णता नहीं होती तब तक बहुत प्रबल कलह मचा रहता है। जहाँ वितंडा की अति हो
जाती है वहाँ उस कलह में सहायता करने वाला विरुद्ध और दुर्धर क्रोध तैश में आ जाता है। इससे बुद्धि का ज्ञान
तत्काल नष्ट हो जाता है। तब महामोह विवेक को ग्रस लेता है। विवेक का भान लुप्त होते ही चेतना भी
आश्चर्यचकित हो उठती है और फिर कार्य और अकार्य का भेद भी विस्मृत हो जाता है।
तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।
ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१ ॥
विवेकशून्य हो कर मूढ़ हो जाने पर फिर न विषय ही रह जाता है और न परमार्थ ही। सन्मार्ग का मार्ग
५५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं दिखायी देता, इसलिये पग-पग पर आत्मघात होता रहता है। जड़-मूढ़ होकर वह बेसुध की तरह स्तब्ध हो
जाता है और अज्ञान के कारण मन मसोसता रहता है। इस प्रकार न ठीक तरह से सजीव और न ठीक तरह से
निर्जीव, इस प्रकार मूढ़ होकर रहता है, और प्राप्त लाभ से वंचित होकर व्यर्थ का अनर्थ भोगता है।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।
वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्वसन्॥ २२॥
इस प्रकार विषय की आसक्ति के कारण जब तमोगुण वृत्ति को ग्रस लेता है तब किसी भी बात का
स्मरण नहीं रहता। मैं कौन हूँ, इसका भी स्मरण नहीं रहता। दारू पीने पर जिस प्रकार मनुष्य बदहवास हो
जाता है और उसके स्मरण का विस्मरण होकर मन में भ्रम उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मनुष्य भ्रम के जाल में
फँसा हुआ है। अथवा विषमज्वर में मनुष्य चाहे जैसी बातें करने लगता है, उसे अपना और पराया भी याद
नहीं रहता, व्यर्थ की बकवास करता रहता है। चित्त भ्रमित होने के कारण उसे किसी भी बात का ठीक से
स्मरण नहीं होता। इस प्रकार प्राणी संकट भोगता रहता है अथवा शरीर में भूतसंचार होने पर वह हुँः हुंः करता
रहता है और भ्रम के कारण स्वयं को श्वान समझ कर भूँकने लगता है। इसी प्रकार सोया हुआ व्यक्ति अपना
अस्तित्व भूलकर जैसे स्वप्न में घबरा रहा हो और कह रहा हो, मैं रण में फँस गया हूँ, वैसे ही ये सारे प्राणी
मोह में फँसे हुए हैं। ऐसी झूठी भूलभुलैया में फँस कर प्राणी काम के मोह में व्याप्त हो गये हैं। जड़मूढ़ होकर
अन्तःकरण में पागल हो गये हैं। बकरी के नाक में कीड़ा घुस जाये तो वह घबरा कर खें-खें करके अपनी
व्यथा प्रकट करती है। उसी प्रकार दुःख के आवेश में प्राणी विह्वल हो जाते हैं और सन्मार्ग न मालूम होने के
कारण मोहमद में भूलकर मूक होकर विह्वल होते रहते हैं। अहंकार के बल से शरीर में वायु भर जाती है और
वही बाधक होकर वे पिछले रास्ते से चलकर गहरे कुएँ में गिर पड़ते हैं। तेली का बैल जिस प्रकार आँख पर
बँधी पट्टी के साथ चलता जाता है, उसका रास्ता कभी खत्म नहीं होता। जल्दी-जल्दी अपने चारों ओर घूमता
जाता है लेकिन उस घूमने का कोई अंत नहीं होता। घान का चक्कर लगाते-लगाते उसे चक्कर आने लगता है।
उसी प्रकार विषय निरन्तर चलने वाला संसारचक्र है। किन्तु विधि की माया समझ में नहीं आती। सर्प पगलाता
है तो जिस प्रकार भागता फिरता है, उसी प्रकार सारे विषय भागते रहते हैं। अमावस्या के अन्धकार की तरह
वह जड़ मूढ़ और स्तब्ध हो जाता है। उसे अपने और पराये का भान नहीं रहता। सारे संसार में अन्धकार फैल
जाता है। लोहार के भाते की तरह साँसे अवश्य चलती रहती हैं। जिस प्रकार वृक्ष तटस्थ खड़े रहते हैं, उसी
प्रकार वे भी न ठीक से जीवित, न ठीक तरह से मरी हुई स्थिति में खड़े रहते हैं। अब तुम कहोगे कि सकाम
कर्म करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है ऐसा वेद में बताया गया है, लेकिन यह भी लालची लोगों का ही
कहना है। तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
फलश्रुतिरियं नृणां न श्रेयो रोचनं परम्।
श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३॥
मूर्ख लोग निष्काम कर्म कभी नहीं करते, इसलिये उन्हें फलश्रुति दिखला कर स्वकर्म के लिये प्रवृत्त किया
है। सकाम कर्म करने की और निष्काम कर्म करने की प्रक्रिया एक जैसी ही होती है लेकिन दोनों के फल का
उद्देश्य अलग-अलग होता है। स्वाती का जल सीप में गिरता है तो मोती बन जाता है लेकिन वही जल यदि सर्प
प्राशन करे तो वह विष बन जाता है। उसी प्रकार निष्काम कर्म मुक्ति दिलाता है तो सकाम कर्म दृढ़बन्धन में
इक्कीसवाँ अध्याय ५५३
फँसाता है। वेद ने स्वर्ग का जो फल बताया है वह मुख्य नहीं है। जिस प्रकार वैद्य बच्चे को दवा खाने के लिये
गुड़ का लालच दिखाता है, उसी प्रकार यह स्वर्ग भी एक लालच ही है। औषधि खाने से क्षयरोग दूर हो जाता
है, लेकिन बच्चा गुड़ चाटता रहता है। उसी प्रकार वेद का हृद्गत यह है कि स्वर्गफल की आशा दिला कर मूर्खों
को मुक्त करने के लिये स्वधर्माचरण कराना। तुम कहोगे, कर्मवादी लोग वेद को प्रवृत्तिपरक कहते हैं, उसी वेद
को निवृत्तिपरक कैसे माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि श्रुति का अर्थ यदि प्रवृत्तिपरक होता तो वेद अनर्थकारी
सिद्ध होता है। इसलिये उस प्रवृत्ति को ही दोष देकर श्रीकृष्ण वेद का अर्थ निवृत्तिपरक है इसका स्पष्टीकरण
करते हैं।
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु ॥ २४॥
न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।
कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः ॥ २५॥
जन्म लेते ही प्राणिमात्र को अपना देह अच्छा लगने लगता है। 'मैं ही देह हूँ' यह मानकर वह जीवभाव से
विषय पर लुब्ध रहता है। विषय की आसक्ति के कारण मन में स्त्री पुत्रों के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। स्वजनों पर
और धन पर अत्यन्त प्रेम जागृत होता है। वह स्वाभाविक स्थिति अनिवार्य रहती है। जिसके कारण अधोगति को
जाना पड़ता है, वह कामासक्ति प्राणियों को नैसर्गिक ही रहती है। वही विषय की प्रवृत्ति यदि वेद विधिपूर्वक
बताये तो वह वेदवाणी सबको डुबोने वाली अर्थात् महाअनर्थकारी होगी। मरने वाले को चाबुक की मार दी
जाय, डूबने वाले के मस्तक पर पत्थर मारा जाय अथवा अन्धे को कुएँ में ढकेला जाय, उसी प्रकार वेद भी
अनर्थकारक होगा। वेद ही यदि विषयों में लिप्त करने लगे तो प्राणियों को और कौन छुड़ाएगा ? राजा ही अगर
सर्वस्व लूट ले तो गरीबों को कौन मुक्त करेगा ? वेद का अर्थ समझे बिना जो स्वयं ही विषयासक्त हो जाता है,
वह श्रुति के अर्थ को प्रवृत्तिपरक ही मानता है और इसीलिये वह मूर्खों के लिये अनर्थकारी होता है। ग्रहण के
समय पुत्र ने पिता से कहा, सुबह बनी हुई खीर खा लें। तिस पर बाप ने कहा, ग्रहण छूटने पर हम हमारे घर में
बना ताजा खाना ही खाएंगे। वैसा ही मेरा वेद कहता है। निषेध मुख से प्रवृत्ति दिखा दी है। सारांश, विषय की
निवृत्ति यही वेद का मनोगत है। विषयों में डूबने वालों के लिये ही मेरी वेदवाणी है, जो उनका उद्धार करती है।
वह सकाम नहीं है। किन्तु जो मंदबुद्धि के लोग हैं, वे पूर्णतयः विषयांध होते हैं। वही लोग वेद के सकाम होने
की रट लगाते हैं। उनकी दुर्बुद्धि के बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।
फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि ॥ २६॥
सकाम लोग फल की इच्छा छोड़कर स्वधर्माचरण कभी नहीं करते, इसलिये स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने
के लिये वेद ने फलश्रुति बतायी है। नमक जब समुद्र से मिलने जाता है तो उसका खारापन समाप्त हो जाता है,
उसी प्रकार स्वधर्म की ओर प्रवृत्ति होने पर उसकी सकामता रहती ही नहीं। दो बातियों को मिलाकर यदि एक
बाती कर दी जाय तो जिस प्रकार उनमें कोई भेद नहीं दिखायी देता, कपूर अग्नि में मिल जाने पर वह भी अग्नि
ही हो जाता है, उसी प्रकार स्वधर्म कर्म का आचरण करने पर अपने आप ही निष्कर्मता प्रकट होती है। कर्माकर्म
५५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाँस का जंगल है, उसमें स्वधर्म का घर्षण होनेपर चित्तशुद्धि की चिनगारी निकलती है जो उस कर्माकर्म को
जलाकर भस्म कर देती है। कामना के साथ कर्म करने से भी, स्वधर्म जब फलेच्छा को नष्ट करता है, तब
सकाम और निष्काम दोनों ही कर्मों को स्वधर्म भस्म कर देता है। दो लकड़ियाँ जब एक-दूसरे पर रगड़ती हैं तो
उससे अग्नि उत्पन्न होता है और वह दोनों लकड़ियों को जलाकर अपनी ही दीप्ति से प्रकट होता है। उसी प्रकार
मेरी वेदवाणी है जो स्वकर्म से ही कर्म का बन्धन तोड़ देती है। यह मर्म न जानने से विषयांध पुरुष फल की
आशा से जकड़ा रहता है। वेद ने स्वकर्म प्रवृत्ति में रुचि उत्पन्न करने के लिये स्वर्गादिक अनेक फल बताये हैं
लेकिन जो उनके ही फेर में पड़ता है वह अपने लाभ से वंचित हो जाता है। खेत को बड़ी मेहनत से तैयार कर
उसमें चना बोया, लेकिन वह हरा था तभी उसे उखाड़ कर उसकी सब्जी बना ली। अब इसे लाभ समझें या
हानि ? उसी प्रकार सकाम के फल की स्थिति है। जोनरी के हरे बाल खाने में बहुत मीठे लगते हैं; लेकिन उसके
लिये यदि पूरा खेत ही उखाड़ दिया जाय तो लाभ होगा या हानि होगी ? उसी प्रकार जो लोग सकाम बुद्धि से
उन्मत्त होते हैं, जो फल की आशा से लुब्ध होते हैं, वे किस प्रकार स्वधर्म के लाभ से वंचित रह जाते हैं, यही
तुम्हें बताता हूँ। खेत में बोने के लिये लाये गये चने को यदि कोई भट्टी में भून कर खा जाय उसे बुद्धिमान कहा
जाय या मूर्ख ? उसी प्रकार वह सकाम का फल भोगता है। घोड़ा बेचकर कोई जीन खरीद ले, मक्खन देकर
छाछ माँगे, भात फेंक कर माँड़ पिये उसी प्रकार सकाम का फल भोगता है। जो ऐसे सकाम और मूर्ख होते हैं वे
स्वधर्म की सिद्धि से वंचित रह जाते हैं। इसीलिये भगवान उन्हें कुबुद्धि कहते हैं। उस कुबुद्धि के भी लक्षण
भगवान बताते हैं।
कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः ।
अग्निमुग्धा धूमतान्ता स्वंलोकं न विदन्ति ते ॥ २७॥
सकाम की तृष्णा कभी पूरी नहीं होती। काम की इच्छा से उसकी स्थिति सदा दयनीय रहती है, इसलिये
उसे 'कृपण' कहते हैं। बगुला जिस प्रकार पानी में मछली के लिये ध्यान करके बैठता है, उसी प्रकार सकाम
मनुष्य फल की इच्छा से लुब्ध होकर अनुष्ठान करता रहता है। पर-पुरुष के पास जाना सुलभ हो, इसलिये
जिस प्रकार व्यभिचारिणी अपने पति के आगे-पीछे करती रहती है, उसी प्रकार वह भी मन में फल की इच्छा
कर स्वधर्म का आचरण करता रहता है। अज्ञान बालक जिस प्रकार फूल को ही फल समझता है, उसी प्रकार
वह भी मूर्खता के कारण स्वर्ग के सुख को अक्षय समझ बैठता है। उस स्वर्गसुख की प्राप्ति के लिये कर्म
यथाविधि होंगे या नहीं इसका भी उसे सन्देह होता है, जिससे उसकी स्थिति अत्यन्त दयनीय हो जाती है।
सकाम सदा दीन ही रहता है; उस दीनता के कारण वह अत्यन्त कृपण और लालची हो जाता है। लोभ के
कारण उसके ज्ञान को महामोह ग्रस लेता है। मोह जब क्षुब्ध होता है तो वह विवेक के साथ-साथ ज्ञान को भी
निगल लेता है। उस समय बुद्धि में अंतर्बाह्य तमोगुण ही उफनने लगता है। तमोगुण से जब बुद्धि भर जाती है
तो धुँधलके की सी स्थिति हो जाती है। अन्धे की संगत से कोई अँधेरी रात में जंगल में खो जाये उसी प्रकार
सकाम पुरुष की स्थिति हो जाती है। विवेक की संगति टूटने पर अन्धी वृत्ति अत्यन्त प्रसन्न हो उठती है।
अज्ञान बालक की तरह वह पूरी तरह मुग्ध हो उठता है, फिर कर्म क्या है और उसका फल क्या है यह उसकी
समझ में नहीं आता। संसार में मेरी क्या स्थिति है ? आगे मेरी गति क्या होगी ? देह में धूम्रवृत्ति होने के कारण
उसे कुछ स्मरण नहीं होता।
इक्कीसवाँ अध्याय ५५५
न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८॥
तुमने वेद के रहस्य का मर्म पूछा था, इसलिये उसकी गुह्य बातें मैंने तुम्हें बतायीं। वेद के ये विभाग सुनकर
उद्धव को अत्यन्त आनन्द हुआ। इससे सन्तुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव को, 'हे अंग' कहकर सम्बोधित किया।
जो सकाम होते हैं उनकी काम पर आसक्ति होने के कारण, वे सबके हृदय में रहने वाले मुझ परमात्मा को नहीं
पहचानते। मैं हृदय में अवश्य रहता हूँ लेकिन इतने से मैं एकदेशी नहीं हो जाता। जिस प्रकार समुद्र लहरों के रूप
में प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार मैं जगदाकार के रूप में प्रतीत होता हूँ। अलंकार का रूप लेने पर भी जैसे वह
शुद्ध सुवर्ण ही होता है, उसी प्रकार मैं श्रीकृष्ण संसार के आकार की परिपूर्णता से पूर्ण ही हूँ। नाम, रूप अथवा
अनेक वर्ण अथवा यह संसार इस प्रकार का जो बोध है वह मेरे ही ज्ञानप्रकाश के कारण होता है। फिर भी
नामरूप अथवा जातिभेद आदि का मुझसे कोई सम्बन्ध नहीं है। आकाश भले ही जल में डूबा हुआ दिखायी दे
लेकिन वह जल से गीला नहीं होता। उसी प्रकार मैं भी संसार के आकार का होते हुए भी उसके दोषों से अलिप्त
रहता हूँ। मेरे जैसा विश्वात्मा और विश्वंभर, विश्वमूर्ति और विश्वेश्वर होते हुए भी शिश्नोदर परायण अज्ञानी
लोग मुझे नहीं पहचानते। जिसकी आँखों के आगे अँधेरा छाया रहता है अथवा जो भयानक गुफा में फँस जाता
उसे अगला या पिछला कुछ नहीं दिखायी देता और वह अकस्मात गड्ढे में गिर पड़ता है। उसी प्रकार मोह ममता
की भ्रान्ति से, अज्ञानरूपी निद्रा में अंतर्बाह्य व्याप्त होकर मैं निकट होते हुए भी वे मुझे नहीं देखते और अज्ञान की
विशाल गर्त में जा गिरते हैं। मेरे वेद का अर्थ न समझने के कारण जो पूरी तरह कामासक्त हो जाते हैं वे मैं निकट
में रहते हुए भी मुझे नहीं पहचानते और अपना अधःपतन करा लेते हैं। तो मैं निकट किस प्रकार हूँ यह पूछोगे तो
ज्ञान का प्रकाश देने वाला मैं सबके हृदय में रात दिन वास करता हूँ। मेरे वेद का वास्तविक अर्थ कामासक्तों की
समझ में नहीं आता। उसी सम्बन्ध में स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण दे रहे हैं।
ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।
हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९॥
मेरे वेद का भाव अगम्य है। उसका गूढ़ार्थ न समझने के कारण सकाम पुरुष बड़े उत्साह से स्वर्ग को ही
सत्य मान लेते हैं। वेद ने स्वर्ग का उल्लेख केवल रुचि उत्पन्न करने के लिये किया है; लेकिन वही उसका
वास्तविक अर्थ समझ कर कामालुब्ध लोग अनेक प्रकार के स्वर्गादिक साधनों का प्रयोग बड़े उत्साह से करने
लगते हैं। उसमें स्वयं मांस भक्षण करने के लिये यज्ञ का बहाना करते हैं। उनकी दृढ़ प्रवृत्ति अपनी इच्छा पूरी
होने के प्रति ही होने के कारण अविधि से ही पशु की हत्या करते हैं। ऐसे लोगों की हत्या तो उन्होंने मारे हुए
पशु ही करते हैं। हाथ में लपलपाती तलवारें लेकर, बदला लेने के लिये वे यम के द्वार पर खड़े रहते हैं। उन्हें
स्वर्गसुख कैसा ? पेटभर मांस खाने के लिये स्वेच्छा से पशु मारने पर नियंत्रण लगाने के लिये वेद ने केवल यज्ञ
के लिये पशु का हनन करने की अनुमति दी है। उसमें भी देश, काल, वर्तमान, मंत्र, विधि, विधान और सारे
द्रव्य शुद्ध हों ऐसा भी प्रतिबन्ध लगा दिया है और कर्ता भी सशक्त हो, ज्ञानसम्पन्न और श्रीमान हो क्योंकि मुट्ठी
के प्रहार से पशु को मारते समय यदि 'में' 'में' ऐसा शब्द पशु ने निकाला तो उसका प्रायश्चित्त करना पड़ता है।
वेद में अनेक कठिन प्रायश्चित्त बताये गये हैं। फिर भी महामूर्ख सकाम लोग पशु मारने के लिये तत्पर रहते हैं।
इस प्रकार पशु को मारने के बाद अपने हिस्से में जितना आये उतना ही मांस भक्षण करना चाहिये। वह भी इस
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तरह खाना चाहिये कि दाँत न लगे। इस प्रकार अपना हिस्सा खाते समय यदि कोई स्वाद लेता है तो उसे भी
प्रायश्चित्त लेना पड़ेगा ऐसा निर्देश भी वेद ने दिया है। सारांश, मांसभक्षण करने की वेद की आज्ञा नहीं है,
बल्कि मांसभक्षण की निवृत्ति करने के लिये ही यज्ञ का विधान लगा दिया है। अपनी इच्छा से पशु न मारें
इसलिये यज्ञ में पशु मारने का नियम बना दिया गया है और मांसभक्षण न करें इसलिये यज्ञ के भाग को निश्चित
कर दिया है। लेकिन वेद का यह नियम भी मूर्खों की लालच पर नियंत्रण करने के लिये है। वास्तव में, पशु
हिंसा करना और मांस भक्षण भी न करना यही वेद का सच्चा गुह्य है।
हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।
यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः ॥ ३०॥
वेदोक्त विधि की परवाह न कर जो लोग पशु हत्या का खेल खेलते हैं, वे अविधि से पशु वध कर याज्ञिक
होने की शेखी बघारते हैं। अविधि से प्राण लेकर उस पशु से यज्ञ करते हैं; और फिर निश्चिंत होकर पितृ-देव-
भूतगण इन सबको हविर्भाग देते हैं। खोखला बीज यदि खेत में डालें तो फसल से हाथ धोना पड़ेगा। बीज तो
नष्ट होगा ही सरकार का लगान अलग से देना पड़ेगा। अविधि से यज्ञ करने वालों की यही गति होती है। स्वर्ग
तो स्वप्न में भी नहीं दिखायी देता, लेकिन यह नरदेह छूट जाता है और अन्त में यमयातना के दुःख भोगने पड़ते
हैं। पशुओं को व्यर्थ ही दुःख देते हैं और स्वयं भी दुःखी होते हैं। इस प्रकार याज्ञिकों की गति विलक्षण हो जाती
है। उसी के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।
आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक् ॥ ३१॥
स्वप्न दिखायी देता है और तत्काल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसार कल्पना में ही दिखायी देता है।
कामना से पगलाये सकाम पुरुष स्वर्ग को सत्य समझ बैठते हैं। मृगजल बिलकुल मिथ्या है, उसके शीतल जल
के लिये बालक हठ करे उसी प्रकार सकाम पुरुष स्वर्ग का हठ कर बैठते हैं। 'पीपल पर से मार्ग है' यह सुनकर
जो उस वृक्ष पर चढ़ने लगता है और भ्रमजल में फँस जाता है, उसी प्रकार स्वर्ग का वैभव सुनकर सकाम की
गति होती है। मनुष्य स्वधर्म के मार्ग पर चले इसलिये वेद स्वर्ग का एक गौण फल दिखलाता है; लेकिन सकाम
पुरुष भ्रम में उसी स्वर्ग के पीछे दौड़ते हैं। 'पीपल पर से रास्ता है' सुनकर बुद्धिमान पुरुष उस मार्ग की ओर
ध्यान देकर चलता है और पीपल की परिक्रमा कर आनन्दपूर्वक अपने गंतव्य स्थान तक पहुँचता है। इस प्रकार
जो स्वधर्म के अनुष्ठान में स्वर्ग के फलों की उपेक्षा करता है, उसका चित्त शुद्ध होकर वह स्वयं ब्रह्मसमाधान
प्राप्त करता है। उस स्वधर्म मार्ग को छोड़कर सकाम पुरुष सुनने में मधुर लगने वाले स्वर्गसुख के पीछे दौड़
पड़ते हैं। मृग घंटानाद के भुलावे में आ जाते हैं। उसी प्रकार कर्मभूमि में जन्म लेकर धन, धान्य आदि खर्च कर
स्वर्ग सुख के मोह में अनायास प्राप्त हुए नरदेह को व्यर्थ ही खो देते हैं। जिस प्रकार कोई वणिक, दूसरे द्वीप में
जाने से अधिक लाभ होगा यह सुनकर पुराना जहाज लेकर समुद्र में प्रवेश करता है और उन्मत्त खलासी के
कहने पर टूटी-फूटी नौका के साथ समुद्र में डूब जाता है, वैसी ही गति सकामों की होती है। बेचारे स्वर्ग की
इच्छा मन में दबाकर संसार सागर में डूब जाते हैं। स्वर्गसुख की इच्छा करने से स्वधर्मरूपी सारा धन डूब जाता
है, चित्तशुद्धि का मूल ही नष्ट होकर नरदेहरूपी मूलधन भी नष्ट हो जाता है। इतनी हानि का कारण भगवान यह
बताते हैं कि सकाम्यता के मूल त्रिगुण हैं जिनके विशेष लक्षण वे बताते हैं।
इक्कीसवाँ अध्याय ५५७
रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजस्तक्तमोजुषः ।
उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम् ॥ ३२ ॥
रज और तम जब बहुत अधिक बढ़ जाते हैं तो उसमें जब सत्त्व भी मिल जाता है तो रज की संगति से
काम चित्त को क्षुब्ध कर देता है। चित्त में जब काम अत्यधिक उफनता है तो गुण के अनुसार विषय पर प्रेम
होता है। तब वह निश्चित रूप से सकामी की ही संगत पकड़ता है। सकाम की संगति के कारण काम्यकर्म में
ही आदर बढ़ने लगता है और वह स्वर्गभोग में तत्पर होकर देव, पितर, भूत, प्रथमगण आदि का यजन करता है।
इस प्रकार वासनालुब्ध लोग मुझ सर्वात्मा, सर्वेश्वर के पास होते हुए भी मेरा अनादर कर अन्य देवताओं की ही
उपासना करते हैं। अब शायद तुम यह कहोगे कि अन्य देवताओं के होने पर भी तुम तो हो ही, तो उनके साथ
इस प्रकार का ऐक्यभाव नहीं रहता। सारा विनियोग भेद बुद्धि में ही होता है। अरे! इन्द्रादि देवों के द्वारा मैं ही
प्रसन्न होता हूँ, लेकिन उनका सकाम मन स्वर्ग की ही इच्छा करने के कारण वे मेरा भजन नहीं करते। मन में
वासना दृढ़ रहती है इसलिये स्वर्ग की पुनरावृत्ति के और भी फेरे हैं यह सुनकर उन्हें वह हित का ही लगता है।
उसके बारे में भी सुनो।
इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रस्यामहे दिवि।
तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः ॥ ३३ ॥
कर्मभूमि में जो मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं, वे सहज ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं। ऐसा होते हुए भी वे
कामना में फँस जाते हैं और स्वर्ग में दूसरे देवताओं का ही भजन करते हैं। स्वर्गभोग पर दृष्टि रख कर अनेक
यज्ञायाग करते हैं और उतने से स्वर्ग के सुखोपभोग की आशा करते हैं। कालान्तर में पुण्य का क्षय होते ही उनका
पतन होता है। वह भी उन्हें हितकर ही लगता है। पुण्यवान स्वर्गस्थ जीव होने के कारण हमने सुशील ब्राह्मण के
कुल में जन्म लिया, ऐसा वे कहते हैं। वेदवेदांग का अध्ययन कर धनधान्य से समृद्ध होकर हम विख्यात गृहस्थ
बन कर रहेंगे ऐसा उनका विश्वास रहता है। वेदार्थ का सच्चा अर्थ न जानने के कारण ये लोग काम्यकर्म को ही
इति कर्तव्यता समझते हैं और गन्ना छोड़ कर उसका बाल (भुट्टा) माँगते फिरते हैं।
एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनां चातिस्तब्धानां मद्मार्ताऽपि न रोचते ॥ ३४ ॥
फल छोड़कर फूल खाना यही याज्ञिकों की स्थिति रहती है। वे स्वर्ग की इच्छा से जो उपाय करते हैं
वही उनका अहित करते हैं। सारा संसार ही जहाँ काल्पनिक है वहाँ स्वर्ग का सुख ही सत्य कैसे होगा ? किन्तु
केवल सुनी हुई बातों को ही सच मानकर मूर्ख लोग स्वर्ग के सुख से मोहित हो जाते हैं। नपुंसक स्त्री सुख की
कितनी ही इच्छा क्यों न करे लेकिन वह उसके साथ संग कैसे कर सकता है ? जब बीजोत्पत्ति ही नहीं है तो
काम का प्रयास किसलिये ? व्यर्थ ही उठता है, फिर सोता है लेकिन उसे सच्चा स्त्रीसुख नहीं मिल पाता। उसी
प्रकार स्वर्ग के सम्बन्ध में उनकी स्थिति होती है। गेहूँ की कोमल बाली स्वाद में भली लगती है लेकिन जिसे
फसल की कल्पना रहती है वह बाली को नहीं उखाड़ता। पत्तों का स्वाद लेने से उसे गेहूँ की मिठास नहीं
मिलती, ऐसा होते हुए यदि पत्ते ही उखाड़ लिये तो गेहूँ के नाम पर रोने की नौबत आयेगी। इस प्रकार वेद ने
स्वर्ग का फल बताया है, वही स्वधर्म का कोमल मूल है। उसे तुरन्त तोड़कर खाने से मनुष्य मोक्षफल से
वंचित हो जाता है। जो ज्ञानी इस बात को जानते हैं वे स्वर्ग का स्पर्श भी नहीं करते, लेकिन मूर्ख की
५५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विषयतृष्णा रुकती नहीं है। वे लोग काम की आसक्ति से सकाम कर्म ही करते रहते हैं इसलिये वे जन्म-मरण
के चक्र में फँसकर कल्पांत तक बाहर नहीं निकल पाते। साधु लोग उन्हें हित की बात बताते हैं लेकिन उसे वे
स्वीकार नहीं करते। हम ज्ञाता हैं, वेद का अर्थ हम ही जानते हैं, ऐसा ज्ञानाभिमान होने के कारण वे अभिमान
में फूले रहते हैं। मैं भगवान सृष्टि का नियंता हूँ ऐसा वेद ने स्पष्ट कहा है फिर भी यह बात वे नहीं मानते।
निष्काम कर्म की बात करने से उनका मस्तिष्क खराब हो जाता है क्योंकि उनकी सकाम बुद्धि अत्यन्त दृढ़ हो
जाती है। इस प्रकार वेद को प्रवृत्तिपरक मान कर सभी सकाम लोग भ्रम में फँस जाते हैं। इसलिये उस वेद का
ब्रह्मपरक अर्थ स्वयं श्रीकृष्ण समझा रहे हैं।
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।
परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम चा प्रियम्॥ ३५॥
वेद स्वयं ही कर्मकाण्ड, उपासनाकांड और ज्ञानकांड के द्वारा चित्तशुद्धि के द्वार से जीव को ब्रह्मस्वरूप
करता है। मछुआरा जिस प्रकार बंसी में मांस का टुकड़ा लगाकर मछली को जल के बाहर निकालता है उसी
प्रकार वेद भी स्वर्गसुख का लालच देकर जीव को परमार्थ की ओर खींचता है। वेद ने परोक्ष में अर्थात् अस्पष्ट
कहकर त्यागमुख से अन्योक्ति गाकर विषय के प्रति आसक्ति छुड़ायी है। वेदार्थ का यह गुह्य ज्ञान समझ कर जब
जीव ब्रह्मस्वरूप होता है, तब कर्म और कर्त्ता मिथ्या हो जाते हैं। फिर आश्रम और वर्ण किसके? ध्येय, ध्याता
और ध्यान किसका? वह परिपूर्णता से परब्रह्मस्वरूप ही हो जाने के कारण भज्य, भजक और भजन ये तीनों भी
शेष नहीं रह जाते। फिर कर्मकर्माचरण किसका किया जाय? वेद किसका, वेदाध्ययन किसलिये और साधन
किसका? क्योंकि जब वह पूर्णता से परिपूर्ण ब्रह्म हो जाता है तो दोष और गुण, पाप और पुण्य, जन्म और मृत्यु
कैसे होगा? परिपूर्णत्त्व से सारा पूर्ण ब्रह्म ही भरा रहता है। वहाँ भेद किसका और ऐक्यभाव भी किसका? बंध
किसका और मोक्ष किसका? उद्धव! सदा सर्वकाल परमानन्द ही भरा रहता है। यही वेद का सच्चा अर्थ है।
किन्तु इस वेदार्थ का निरूपण मैं स्वयं ही प्रकट करूँ तो लोगों के हित पर पानी फिर जायेगा इसलिये मैंने उसे
गुप्त रखा है। यह वेदार्थ का सार है और मेरे गुप्त ज्ञान का भण्डार है। तुम अधिकारी हो यह ध्यान में आने से ही
मैंने तुम्हें यह बताया है। अगर यह गुह्यार्थ प्रकट कर दिया तो नष्ट और अनधिकारी लोग कर्ममार्ग का मार्ग
छोड़कर कर्म और ब्रह्म दोनों से ही वंचित हो जायेंगे। ज्ञानसम्पन्न ऋषियों ने इसी बात को ध्यान में रखकर वेदार्थ
बताने की शैली में मुख्य अर्थ को गुप्त रखकर परोक्षवाद अर्थात् प्रवृत्तिमार्ग का ही प्रतिपादन किया है। उद्धव!
सब लोगों के हित के लिये और उन्हें रास्ता दिखलाने के लिये यही उचित है ऐसा मुझे भी लगता है क्योंकि
सबको प्रवृत्ति मार्ग ही अच्छा लगता है। लोगों को सही मार्ग दिखलाने के लिये, मैं अकर्त्ता होते हुए भी कर्म
करता हूँ और लोक कल्याण के लिये वेद का जो प्रवृत्तिपरक विचार है उसका भी स्वयं पालन करता हूँ। उस
वेद का स्वरूप अत्यन्त गहन, अतर्क्य, अलक्ष्य और अगम्य है, यह तुम जान लो। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण
अगले श्लोक में कर रहे हैं।
शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६॥
मेरा वेदरूपी भाषण शब्दशः और अर्थशः अत्यन्त गहन है। इस सम्बन्ध में ब्रह्मदेवादिक देवता भी भ्रम में
पड़ जाते हैं। समुद्र जिस प्रकार स्वयं तैर कर पार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार अपनी ही बुद्धि से वेद का
इक्कीसवाँ अध्याय [५५९]
अर्थ समझ में नहीं आता। इसीलिये अनेक ऋषियों ने अनेक युक्तियाँ लड़ायी हैं। लेकिन उससे वेद का
वास्तविक अर्थ किसी के हाथ नहीं लगता क्योंकि वह शब्दशः और अर्थशः भी दुर्बोध है। उसके शब्दों का
उच्चारण ही स्वरवर्ण की दृष्टि से किसी की समझ में ठीक से नहीं आ पाता, उसके अर्थ की बात क्या करें ? वह
मनुष्यों को ही नहीं, देवताओं के लिये भी अगम्य है। पहले जब इस वेद को किसी ने नहीं देखा था तब इसे
पहले ब्रह्मदेव से कंठस्थ करवाया। लेकिन उनकी समझ में भी ठीक से न आने के कारण वह कर्म से कर्मठ ही
बन गया। वह अत्यन्त सुन्दर कर्मक्रिया शंखासुर ने तत्काल चुरा ली, जिससे ब्रह्मदेव वेद की बात ही भूल गया
और सृष्टि की उत्पत्ति का कार्य रुक गया। उस वेद का उद्धार करने के लिये मैंने शंखासुर का वध किया और
वेद का पूरा भण्डार ब्रह्मदेव को सौंप दिया। लेकिन ब्रह्मदेव को उनका स्मरण नहीं हो पा रहा था। वह बेचारा
पागल-सा हो गया। उस वेद विभाग के लिये ऋषियों ने अपने ज्ञान का उपयोग किया, उसकी शाखा उपशाखाओं
का पदच्छेद करने के लिये रावण आगे आया। फिर भी उद्धव ! मेरे वेद की सम्पूर्ण वार्ता तत्त्वतः किसी के भी
हाथ नहीं लगी। वही वेदसंस्थापक श्रीहरि, मैंने लोगों को मर्यादा में रखने के लिये स्वयं श्रीव्यास का अवतार
लेकर सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। वेद विभाग करने में वह राजहंस था इसीलिये उसे वेदव्यास कहते हैं।
उसने वेदार्थ प्रकट कर उसके चार भाग किये। वेद अर्थ की दृष्टि से गूढ़ है किन्तु शब्द की दृष्टि से सरल है। वे
शब्द अर्थात् वाणी के चार प्रकार हैं। उन्हें मैं स्पष्ट करके बताता हूँ। नाद का प्रथम स्फुरण जिसका सूक्ष्म प्राण
घोष करवाता है, उसका नाम है 'परावाणी', वही ओंकार का प्रथम लक्षण है। वही नादयुक्त प्राण जब
अंतःकारण में स्फुरण पाता है तो उसे 'पश्यंती वाणी' कहते हैं। उसमें विवेक लक्षण होता है और नाभि से
नाभिस्वर से कंठ तक घूमने वाली वाणी को 'मध्यमा' कहते हैं। इसके उपरान्त अकार, उकार और मकार का
स्वर वर्णयुक्त उच्चार जिससे 'ओंकार' प्रकट होता है, उसे 'वैखरी वाणी' कहते हैं। उस वैखरी वाणी में
शाखोपशाखाओं में जो अनंत रूप से वेद भरा हुआ है, उसकी भी मर्यादा नहीं है। इस प्रकार वेद असीम है।
उसके चार विभाग करने पर भी वह लोगों के लिये दुरूह ही रहा इसलिये 'उपवेद' के रूप में उसके और
विभाग किये। फिर भी उनकी समझ में वेद नहीं आया। इसलिये श्री व्यास ने वेद के पदों को विशद किया और
उनका अर्थ स्पष्ट किया। फिर भी वेद का वास्तविक अर्थ समझ में नहीं ही आता। उसका अर्थ लगाने के लिये
सुमंत, जैमिनी, भाष्य भारत, वैलसूत्र आदि महान ऋषि भी थक गये, फिर भी वेद का अर्थ उनकी समझ में नहीं
आया। सारांश, वेद का स्थूल और सूक्ष्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ जानने वाला मेरे सिवा और कोई नहीं है।
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।
भूतेषु घोषरूपेण विसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७॥
मैं जो स्वयं सबके अंतःकरण में 'भूमा' अर्थात् अपरिच्छिन्न रूप से अंतर्बाह्य व्याप्त, परिपूर्ण परब्रह्म मुझसे
ही वेद अधिष्ठित है, इसी को 'उपबृंहित' कहते हैं। किन्तु अधिष्ठाता बादल में छिपे चन्द्रमा की तरह विकृत
हुआ सा दिखाई देता है अथवा अग्नि जब काष्ठ में अधिष्ठित होता है तो उसे तत्काल आकार प्राप्त होता है,
तब उस अग्नि को भी प्रबलता और शांतता ये दो विकारावस्थाएँ प्राप्त होती हैं। उसी प्रकार मैं अंतर्यामी नारायण
विकारी नहीं होता। मैं ब्रह्मस्वरूप से परिपूर्ण तथा स्वयं विकारों का निर्दलन करने वाला हूँ। विकारों का कर्त्ता
भी मैं और कर के अकर्त्ता भी मैं, मैं स्वयंभू ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मुझे विकार होता ही नहीं है। ब्रह्म तो
निर्धर्म है। वह विकार का कर्म कैसे करेगा ? यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार की कोई शंका है तो उसका उत्तर भी
५६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्पष्ट कर देता हूँ। मेरी अनंत शक्ति रूप जो योगमाया है, वह शंकर और ब्रह्मदेव को भी समझ में नहीं आती।
उसी योग से मैं चिन्मूर्ति होते हुए भी उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्ता बनता हूँ। ऐसा योगमाया का स्वभाव है।
सब कुछ करने पर भी मैं अकर्ता हूँ। इसलिये मुझे देश और काल का विकार स्पर्श नहीं करता। भेदभाव की
बात सच होती तो मुझे विकारबाधा हुई होती; परन्तु मेरा निजस्वरूप देखने पर उसमें भेद की बात ही नहीं
दिखायी देती। भ्रम से जिस प्रकार रस्सी के सर्प का भास होता है, उसी प्रकार मैं परमात्मा श्रीहरि सब कुछ
करके भी निजरूप से अधिकारी ही रहता हूँ। घोषरूप में रहने वाला वह अत्यंत सूक्ष्म नाद, मैं स्वयं प्रणवरूप
वेद प्राणिमात्र में स्वतः सिद्ध हूँ, लेकिन लोग सकामबुद्धि से वह नहीं जानते। सुअर जिस प्रकार कस्तूरी या
कपूर छोड़कर विष्ठा ही खाता है, उसी प्रकार सूक्ष्मवेद के अंतरंग की सकाम पुरुष उपेक्षा करते हैं। मैं निजानंद
स्वरूप प्रत्येक प्राणी के हृदय में उपस्थित होते हुए भी, भ्रांतिमान लोग कामासक्ति के कारण नीचों की ड्योढ़ी
के चक्कर लगाते हैं। लेकिन योगी लोग उस हृदयस्थ देवता का ध्यान लगाकर बैठते हैं उसका उन्हें ध्यास लगा
रहता है, प्राणापान को सम कर वे निरन्तर नाद का अनुसंधान रखते हैं। मेरा वेदरहस्य जो गुप्त है वह प्रणवरूप
से हृदय के अन्दर ही है, योगी सर्वकाल उसका अनुभव लेते हैं। उसका निश्चित स्वरूप बताता हूँ, सुनो। कमल
के डंठल के नाजुक तंतु की तरह यह अत्यन्त सूक्ष्म नाद नाभि से ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है और ओंकारस्वरूप में
लक्षित होता है। इस प्रकार का, नाभि से ब्रह्मरंध्र तक ओंकार रूप से चलने वाले सूक्ष्म नादरूपी स्वर को
महायोगी योगधारणा से अनुसंधान में रखते हैं। यही नाद दोनों हाथ कान पर रखने पर घूमता हुआ सा मालूम
होता है। योगी लोग उसे 'अनाहतशब्द' कहते हैं। वेदांती लोग इसी को 'सूक्ष्मनाद' कहते हैं और हम इसे
'शुद्धवेद' कहते हैं। लेकिन यह नाम के अनुवाद की बात रहने दीजिये। ऐसे स्वयंसिद्ध वेद पर मनुष्य की श्रद्धा
नहीं जमती इसलिये उस सूक्ष्मवेद को ही मैं लोककल्याण के लिये स्थूलरूप में लाया। स्थूलरूप में प्रकट हुआ
यह वेद ही वेद का प्रसिद्ध मार्ग बन गया। इसे दृष्टांत से स्पष्ट करके बताता हूँ। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा जिससे
उद्धव की आत्मा को अत्यन्त संतोष हुआ। वह कहने लगा, श्रीकृष्ण मेरे लिये अत्यन्त सरस निरूपण कर रहे
हैं। मुझसे प्रेम होने के कारण ही, केवल मेरा उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण निरूपण की बरसात कर उसमें
अमृत से भी मधुर रस भर रहे हैं। उद्धव का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण क्या बोले ? उन्होंने कहा, उद्धव ! उसी
वेद को मैं अब निरूपण में सुना देता हूँ।
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।
आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा ॥ ३८ ॥
छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।
ऊर्णनाभि अर्थात् मकड़ी जिस तरह अपने मुँह से अत्यंत महीन तंतु निकालती है, उसी प्रकार निर्गुण में से
ओंकार का धागा निकलता है। वह ओंकार अपने स्वभाव के अनुसार 'सप्राण' अर्थात् सचेतन होते ही
'हिरण्यगर्भ' संज्ञक होता है ऐसा वेद में बताया गया है। उद्धव! वही 'प्रभु' ऐश्वर्ययुक्त स्वामी है। उसकी शक्ति
अचिंत्य, अनंत है और वही छंदोमय वेदमूर्ति है, यह जान लो। वास्तव में वह अविनाशी है तथा नित्य सुखमय
एवं सुखमूर्ति है। उससे सप्राण नादाभिव्यक्ति है जो मनःशक्ति को जागृत करती है। यही जागृत मनःशक्ति स्पर्श-
स्वर-वर्ण का निर्माण करती है। इसी को वेदवेत्ता पुरुष 'बृहती' कहते हैं क्योंकि इसका विस्तार असीम है। स्वर
और वर्णों से युक्त वे मंत्र, हृदयाकाश में विचित्र ढंग से, हजारों शाखाओं में विस्तार पाते हैं। इस प्रकार वैखरी
इक्कीसवाँ अध्याय ५६१
वाणी का अपार विस्तार हुआ है। स्वर और वर्ण आदि के उच्चार से वेदों की अधिष्ठान वैखरी वाणी कैसे उत्पन्न
हुई, वह भी बताता हूँ, सुनो।
ओङ्काराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तस्थभूषिताम्॥ ३९ ॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरैः।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४० ॥
अ-उ-म ये तीन मात्राएँ जब एकत्र होती हैं तो लोग उसे 'ओंकार' कहते हैं। यह ओंकार अलौकिक है
तथा अत्यन्त सूक्ष्म रूप से देह में ही रहता है। उसी ओंकार को प्राण की संगति से जब मूलाधारादि चक्र में
उर्ध्वगति प्रारम्भ होती है तब परा, पश्यंति, मध्यमा वाणी की अभिव्यक्ति होती है। परा वाणी के भीतर 'पश्यंति'
श्रेष्ठ रूप में जन्म लेती है। उसके गर्भ से 'मध्यमा' का जन्म होता है। इस प्रकार ये दोनों एक दूसरी से उत्पन्न
होती हैं। उसी प्रकार वे क्षणभर के लिये भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं रहतीं। एक-दूसरे को साथ लेकर वे
पहले एक चक्र, फिर दूसरा चक्र और तीसरा चक्र पार करते हुए ऊपर चढ़ती जाती हैं। 'मूलाधार' चक्र में 'परा'
वाचा उत्पन्न होती है। 'स्वाधिष्ठान' चक्र में, पश्यंती का जन्म होता है और 'मणिपुर' चक्र से 'विशुद्धि' चक्र तक
'मध्यमा' का आवागमन चलता रहता है। वहाँ से मुख के द्वारा 'वैखरी' वाणी प्रकट होती है। तब वह स्वर वर्ण
के उच्चार से अनेक मंत्ररूपों में गरजती रहती है। उन्हीं स्वरों में 'स्पर्श' वर्ण, 'असंख्य वर्ण' तथा 'ऊष्म' वर्ण के
विभाग सुनो। केवल अ से अः ये स्वर, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग इस प्रकार पाँच वर्णों के पाँच पंचक अर्थात्
पचीस अक्षरों को स्पर्शवर्ण कहते हैं। जिनकी सहायता से ही वर्णों का ठीक तरह उच्चार हो पाता है वे
अकारादिक सोलह 'स्वर' हैं। य, र, ल, व को 'अंतस्थ' वर्ण कहते हैं और श, ष, स, ह इन चार वर्णों को
शास्त्रकार 'ऊष्म' स्वर कहते हैं। अ-अः ये अनुस्वार तथा विसर्ग विभाग हैं। इसमें क्षकार वह केवल बावनवी
मातृका है। इनमें और अतिरिक्त निरनुनासिक तथा सानुनासिक ये भेद शास्त्रज्ञ जानते ही हैं। इस प्रकार स्वर और
वर्ण इनके यथाशास्त्र उच्चार से तथा वेदशास्त्रों के अर्थ प्रकार से लौकिक और वैदिक भाषा का विस्तार हुआ है।
शब्दों की अनेक प्रकार की उत्पत्ति का प्रयोग कर शब्दों से ही शब्द का खण्डन करते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार
के शब्द कौशल्य से यह वैखरी वाणी विस्तार पायी है। वही चार-चार अक्षरों से बढ़कर उसी के अनेक छंद हो
गये हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे चार अक्षरों के बढ़ने से नये-नये अनेक छंद साध कर वेद ने अपने ज्ञान का बोध
प्रकट किया है। इसीलिये वह वैखरी वाणी अनंत और अपार है। शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से वह अत्यन्त
कठिन है। मेरे शब्द ज्ञान की थाह सुरनरों को भी नहीं लग पाती। वैखरी की शक्ति अनंत है इसीलिये उसे 'बृहती'
कहते हैं। इसके विस्तार की मर्यादा शंकर और ब्रह्मदेव भी नहीं जानते। स्वयं हिरण्यगर्भ के रूप में जीव, शिव
और अंतर्यामी इन्हें मेरी वेदाज्ञा प्रकट करती है। उसी का नामकरण है 'वैखरी'। मैं वेदात्मा श्रीहरि इस प्रकार वेद
का विस्तार करता हूँ। स्वयं ही उसका विस्तार कर उसकी मर्यादा समाप्त होने के समय उसका संहार भी मैं ही
करता हूँ। पहले जो छंद बता दिये थे उनके निजलक्षण, वेद का कारण अर्थात् परमात्मा श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।
त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद्विराट् ॥ ४१ ॥
'गायत्री छंद' सभी छंदों का प्रमुख अधिष्ठान है। उस गायत्री छंद का लक्षण तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण और गिनते समय जिसमें शुद्ध यति (विराम) आराम आता है, उसे गायत्री छंद