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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय ५१५
में लगा हुआ है उसे जो महावीर जीत लेता है उसे ही सच्चा शूरवीर समझना चाहिये। "मैं सदा सदाचरण ही कर
रहा हूँ, निःसन्देह ज्ञानी हूँ, मेरी पवित्र ब्राह्मण देह है" यही जीव का जीवभाव है। देह के माथे पर वर्णाश्रम,
आश्रम के माथे पर कर्म, उस कर्म पर जिसे अत्यन्त अभिमान है, उसे अपार देहभ्रम रहता है। इसलिये
जीवस्वभाव को जीत कर, चिदानंद के राज्य पर बैठकर, अपने आत्मरूप स्वराज्य वैभव का सुख भोगना यही
'शौर्य' का बड़प्पन है। अब जिसे 'सत्य' कहते हैं उसके बारे में भी तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ। उद्धव !
सदासर्वदा सर्वत्र समब्रह्म देखना, यही 'परम सत्य' है। 'परब्रह्म' को सर्वत्र समान रूप से भरा न देख उसे विषम
अर्थात् भिन्न-भिन्न देखना, यही अत्यन्त दुर्गम 'असत्य' है और ब्रह्म सर्वव्यापी तथा सर्वत्र सम है। ऐसा समझना
'सत्य' है। सारांश केवल सत्यभाषण ही निज सत्य नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण और भी निरूपण कर रहे हैं।
ऋतं च सूनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता ।
कर्मस्वसंगमः शौचं त्यागः संन्यास उच्यते ॥ ३८ ॥
कितने ही लोग 'ऋत' को ही सत्य कहते हैं। प्रवृत्ति की दृष्टि से देखने पर वह सच है। किन्तु निवृत्ति की
दृष्टि से सम ब्रह्म को 'सत्य' कहना ही उचित है। श्रोताओं का दुःख सम्बन्ध रहित हित करने वाली सत्यवाणी
को ही वास्तव में 'ऋत' कहना चाहिये। जिस प्रकार चित्त में देखने पर भिन्नता दिखायी देती है लेकिन वह
दीवार जिस पर चित्र बना रहता है, वह सदा सम ही रहती है उसी प्रकार संसार विषम अर्थात् भिन्न-भिन्न दिखाई
पड़ने पर भी ज्ञाताओं को निजबोध के कारण सर्वत्र समब्रह्म ही दिखायी देता है। इसी का नाम 'सत्य' है यह
ध्यान में रखो। उद्धव ने जो प्रश्न किये थे उसमें 'शौच' के सम्बन्ध में प्रश्न नहीं था, लेकिन भगवान स्वयं होकर
उसका निरूपण कर रहे हैं। अंतःकरण की शुद्धि न हो तो त्याग अथवा संन्यास सम्भव नहीं है। इसलिये
अंतःकरण की शुद्धि के लिये पूर्ण शौच अर्थात् निर्मल स्वरूप का जो स्वधर्माचरण है उसका निरूपण श्रीकृष्ण
कर रहे हैं। अंतःकरण में कर्मों का मैल रहता है उसका क्षालन स्वधर्म से करना चाहिये। कर्म से ही कर्म का
निर्दलन कर स्वयं निष्कर्म हो जाना चाहिये। स्वधर्म से फल की आशा छोड़ने से कर्म के बन्धन टूट जाते हैं।
इसलिये फल के प्रति निराश होकर अंतःकरण की शुद्धि कर लेनी चाहिये। नैराश्य वृत्ती से स्वधर्माचरण करने से
अंतःकरण के मलों का क्षालन हो जाता है। इसी का नाम शौच है। अंतःकरण की ऐसी शुद्धता ही संन्यासग्रहण
की भूमिका की नींव है। इसीलिये प्रश्न न करने पर भी श्रीकृष्ण ने उसका निरूपण किया। सारे संकल्पों का
त्याग करना ही उत्तम 'संन्यास' है। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वे इसे उत्कृष्ट त्याग भी कहते हैं। मैं ही देह हूँ ऐसी
कल्पना मन में रहती है इसलिये संकल्प-विकल्प के कारण मन में नित्य नयी छटपटाहट होती रहती है। बाह्य
आडम्बरों में दण्ड, कमण्डल, भगवा वस्त्र यह साज तो मात्र लौकिकता है।
धर्म इष्टं धनं नृणां यज्ञोऽहं भगवत्तमः ।
दक्षिणा ज्ञानसंदेशः प्राणायामः परं बलम् ॥ ३९ ॥
धन धान्य, गायें-भैंसें आदि प्राणी का लाभकारी धन नहीं है, मोक्ष के मार्ग में सबल धर्म ही हितकारी धर्म
है। घर में जो धन गाड़ कर रखा जाता है वह घर में ही रह जाता है लेकिन धर्म साथ में रहने वाला धर्म है। वह
अपने साथ किसी प्रकार का बन्धन नहीं रखता। धार्मिक व्यक्ति जैसा कंजूस मैंने कहीं नहीं देखा। क्योंकि मरने
पर पर भी वह स्त्री-पुत्रों को ठग कर सारा धन साथ ही ले जाता है। उन्होंने अपना धन धर्मार्थ खर्च कर मुझ
नारायण को उसका भण्डारी बना दिया है। इसलिये उन्हें जब भी जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है वह मैं

५१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसे स्वयं ही देता रहता हूँ। इसलिये धर्म ही इष्ट धन है। यही मेरा यथार्थ वचन है। अब 'यज्ञ' का अर्थ सुनो।
उसे भी समझाता हूँ। अग्नि मेरा मुख है और यज्ञ का भोक्ता मैं नारायण हूँ, यह जान लो। अधिक क्या कहूँ, सारा
यज्ञ ही मैं श्रीकृष्ण हूँ। इसका वेद में भी प्रमाण है। उसमें ब्राह्मण मेरा स्वरूप है। यज्ञ दीक्षा लिये हुए जो दीक्षित
ब्राह्मण हैं उन्होंने भक्तिभाव से मेरा यजन कर मेरा पूर्ण सुख प्राप्त कर लिया है। लेकिन जो अधर्म से धन एकत्र
कर, अविधि से केवल ढोंग के लिये यज्ञ करते हैं और वह याग मेरे मुँह में पड़ते हुए भी स्वयं कोरे के कोरे रह
जाते हैं। विधि से वे पशु का वध अवश्य करते हैं लेकिन उस अवदान से मैं सन्तुष्ट नहीं होता। दंभ के कारण वे
अवश्य कुंभीपाक महारौरव नरक में जाते हैं। समस्त प्राणिमात्र के मुख में जो कुछ अर्पण करना चाहिये वह मुझ
यज्ञपुरुष को ही पहुँचता है लेकिन यह दीक्षारहस्य यज्ञकर्ताओं को न मालूम होने के कारण हिंसादोष के कारण
नरक में जाते हैं। जो मेरे भक्ति भाव की दीक्षा लेकर, सारा विश्व ही मेरा मुख है यह सोचकर प्राणिमात्र के मुख
में अवदान करते हैं, उनका यज्ञ मैं अर्थात् मैं नारायण हूँ। अब 'दक्षिणा' का भी अर्थ समझ लो। यज्ञ का कोई
मोल नहीं है। उसमें ज्ञान यही अमूल्य दक्षिणा है। वह प्राप्त होते ही याज्ञिक को 'महासुख' प्राप्त होता है।
ज्ञानस्वरूप दक्षिणा मिलने पर याज्ञिक लोग अत्यन्त सम्पन्न होकर रहते हैं। वह धन कल्पांत में भी खर्च नहीं
होता। इससे जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है। सबमें प्राण अत्यन्त प्रबल है प्राण से ही सबको बल
प्राप्त होता है। प्राण के ही कारण मन चपल बनता है। प्राण के स्पंदन से ही वह अत्यन्त चपल हुआ है। प्राण
इतना बलवान है और मन निरन्तर प्राण के ही अधीन रहता है। ऐसे प्राण को जीतना, इसी का नाम 'बलवंत' है।
प्राण को बिना जीते, केवल हाथी का पैर पकड़ कर उसे फेंक देना अथवा एक घाव में सिंह को चकनाचूर कर
देना यह किसी शूर के बल का प्रमाण नहीं है क्योंकि जीव और मन दोनों प्राण के ही अधीन रहते हैं। उस प्राण
का दमन कर वह स्वयं उसे अपने नियंत्रण में रखता है, इसी का नाम है 'अतिबल' अर्थात् अपार सामर्थ्य ! जब
प्राणायाम अच्छी तरह सध जाता है तो बड़ा देवता भागा-भागा उससे मिलने आता है और जब एक बार आ जाता
है तो आलिंगन नहीं छोड़ता। प्राणायाम करने वाला संसार में इतना बलिष्ट हो जाता है।
भगो मे ऐश्वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तमः ।
विद्याऽऽत्मनि भिदावाधो जुगुप्साहीरकंर्मसु ॥ ४० ॥
उद्धव ने 'दया' किसे कहते हैं, यह प्रश्न पूछा था उसका उत्तर न देकर श्रीकृष्ण 'महद्भाग्य' का ही
निरूपण करने लगे। इसका कारण यही है कि भाग्य के बिना दया व्यर्थ है। इसलिये श्रीकृष्ण भाग्य का ही लक्षण
बताते हैं। तुम कहोगे कि एकआध कंजूस भी भाग्यवान रहता है, लेकिन वह भाग्यवान होते हुए भी अभागा है।
इसलिये जो दया का ही पोषण करता है, उसका ही भाग्य उत्तम है। उस उत्तम भाग्य का सम्पूर्ण लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। उस भाग्य की उत्कृष्टता रहस्यपूर्वक बताता हूँ, सुनो। 'ज्ञान' और 'पूर्ण वैराग्य', 'लक्ष्मी' और
'औदार्य', 'ऐश्वर्य' और 'यश' ये छह गुण ही 'महाभाग्य' है। ये षड्गुण ही मेरा भाग्य है। ऐसा भाग्य जिसे
सौभाग्य से प्राप्त होता है, वही दया का विधिपूर्वक पोषण कर सकता है। इन छह गुणों से जो परिपूर्ण रहता है,
वही 'दीनदयालु' है। वही दानसम्मान करना जानता है और दारिद्रय भी दूर कर सकता है। ऐसे भाग्यवान से भेंट
होने के लिये भी वैसा ही भाग्य चाहिये। सारांश मेरे जैसा भाग्य संसार में किसी को नहीं मिलेगा इस ऐश्वर्य से
जो सम्पन्न रहता है, वही 'दया' का मायका है। वही उसका लाड़-प्यार करता है और उसके ही कारण दया
समर्थ हो उठती है। इसीलिये भाग्य की बात बतायी। जिसके अंतःकरण में भूतदया है वह संसार में कभी अभागा

उन्नीसवाँ अध्याय ५१७
नहीं रहेगा। अब 'लाभ' क्या होता है ? यह प्रश्न भी तुमने पूछा है। उसका भी लक्षण सुनो। मेरी जो उत्तम भक्ति
है, वही सम्पूर्ण 'लाभ' है। मेरी उत्तम भक्ति करने से चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। बड़े-बड़े देवतागण
भी दण्डवत करते हैं। भक्ति से मुख्य रूप से मुझ लक्ष्मीपति का लाभ होता है। यह लाभ प्राप्त न कर धन आदि
का होने वाला लाभ नरक गति देनेवाला तथा हानि प्रदान करने वाला है। इसलिये सबसे श्रेष्ठ लाभ मेरी भक्ति ही
है। क्योंकि उसके द्वारा मुझ श्रीपति का लाभ होता है। अब 'विद्या' के बारे में स्पष्टीकरण सुनो। उसे मैं यथार्थ
रूप से बताता हूँ। वासना से दृढ़ सम्बन्ध जोड़कर जो आत्मा को जीवरूप प्रदान करती है तथा अभेद में भेद
उत्पन्न करती है उसे 'अविद्या बाधा' कहते हैं। देह के माथे वर्णाश्रम और आश्रम के माथे कर्म और उस कर्म के
प्रबल अभिमान के कारण 'मैं ही देह हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है। यही 'जीवधर्म' है। जो जीव की बाधा नष्ट
कर उसे चिदानंद स्वरूप प्राप्त कराती है, उसी का नाम शुद्ध 'आत्मविद्या' है। बाकी सब एकझार 'अविद्या' ही
हैं। जो अविद्या को नष्ट करती है, वही 'शुद्धविद्या' कहलाती है। अन्य शास्त्र आदि जो चौदह विद्या हैं वे पल्लव
निकली हुई अविद्या ही हैं। जीव की बाधा जिसके योग से नष्ट होती है, उसी को शुद्ध 'आत्मविद्या' कहते हैं;
अब 'ह्री' अर्थात् 'लज्जा' का स्वरूप सुनो। निंद्य कर्म के प्रति लज्जा का अनुभव होना यही वास्तव में लज्जा है।
केवल इन्द्रियों को ढँकने को ही 'लज्जा' कौन कहेगा ? तो जीवप्राण भी चला जाय तो भी अकर्म नहीं करना,
यही वास्तव में 'लज्जा' है।
श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः।
दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्॥ ४१॥
चौदह भुवनों के साम्राज्य वैभव के साथ यदि लक्ष्मी प्राप्त हो जाय तो भी जो उसकी ओर नहीं देखता,
उसकी जो यह निरपेक्षता है, वही उत्कृष्ट 'श्री' है। श्रीमंत को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ, फिर इतरों की
क्या बात की जाय ? जिसे लक्ष्मी की भी आकांक्षा नहीं है वह निरन्तर मेरे मस्तक पर ही रहता है। उसकी अपेक्षा
लाडला मुझे कोई नहीं है। उद्धव ! सुख और महादुःख इन दोनों को समाप्त कर जो 'स्वाभाविक' आनन्द प्रकट
होता है उसी का नाम है 'सुख'। जहाँ दूसरे की आवश्यकता नहीं पड़ती, इन्द्रियों की कमी नहीं पड़ती और
विषयों की भी आवश्यकता नहीं होती; ऐसी स्थिति में हृदय में जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसका नाम है,
'निजात्मसुख'। इस आत्मसुख को भूलकर विषय की इच्छा करना इसी का नाम है 'महादुःख' जिसका सेवन
शुद्ध मूर्ख ही करते हैं। रोज-रोज भी यदि विषय प्राप्त हो जायँ तो भी इच्छा की तृप्ति नहीं होती। विषय की
इच्छा ही मनुष्य को दुःख के भँवर में डालती है। जो बंध और मोक्ष को जानता है, 'अनुमान' नहीं करता वही
'पण्डित' है। ऐसी अवस्था न प्राप्त कर केवल वेदशास्त्रों का अध्ययन कर 'सज्ञान' होना ऐसा विद्वत्ता का
अभिमान यहाँ काम नहीं करता। तो जिसे सच्ची 'शान्ति' और वास्तविक समाधान प्राप्त हुआ है, 'बंध' और मोक्ष
का यथार्थ ज्ञान है, वही 'महापण्डित' है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं।
मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्निगमः स्मृतः।
उत्पथश्चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः॥ ४२॥
वेदशास्त्र न जानने वाले को लोग मूर्ख कहते हैं लेकिन यहाँ मूर्ख का वह अर्थ नहीं है। तो जो केवल
देहाभिमानी होता है उसे ही 'मूर्ख' समझा जाता है। जो नष्ट होने वाले देह को ही 'मैं' समझ लेता है और हर्षित
होता है तथा देह के अभिमान से नरक भोगता है उससे अधिक मूर्ख कौन है ? अशौच से ही देह की उत्पत्ति

५१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होती है; अशौच से ही देह की वृद्धि होती है और अशौच में ही देह का निधन होता है। इस प्रकार देह के पास
ही अशौच की बस्ती होती है। ऐसे इस देह का स्वरूप देखें तो अस्थि, चर्म, विष्ठा और मूत्र। ऐसे ही देह को जो
'मैं' कहकर अभिमान करता है वह वास्तव में 'मूर्ख' है। देह के इसी अभिमान का नाम 'मूर्खता' है। मेरे
वेदमार्ग पर चलना ही 'सन्मार्ग' है। जिसका चित्तभ्रंश हुआ है वही गुरु और परमात्मा की निन्दा करता है। जो
वेदशास्त्र नहीं मानता वही गलत रास्ते पर गिर पड़ता है। जो ईर्ष्यावश गुरु में दोष देखता है, जो सुहृद और
सम्बन्धियों से अशिष्ट व्यवहार करता है जो माता-पिता का धिःकार करता है उसका नाम है 'चित्तविक्षेप'। जो
दूसरों का दोष गिनता है, जो दूसरों की निन्दा करता है, जो स्त्री की बात पर विश्वास करता है उसे चित्तभ्रंश का
विकार हुआ है यह मान लो। जो सन्मार्ग से भटक कर अधर्म अथवा अकर्म में पड़ता है उसे भी हे उद्धव!
चित्तभ्रंश हुआ समझ लो। मैं सचमुच परब्रह्म हूँ यह मानना ही उत्तम 'वेदमार्ग' है। यह न जानकर लालच से
व्यवहार करना ही बड़ा 'असन्मार्ग' है। अब स्वर्ग का अर्थ जिससे आत्मसुख की प्राप्ति होती है ऐसे सत्त्वगुण से
इन्द्रलोक पहुँचने का नाम स्वर्ग नहीं है क्योंकि इस प्रकार इन्द्रलोक पहुँचने वाले वापस लौट आते हैं लेकिन जो
शुद्धसत्त्व में मिल जाते हैं और निजसुख तक पहुँच जाते हैं ऐसे उस सत्त्वगुण को 'स्वर्ग' समझना चाहिये। अब
तुम्हें नरक का लक्षण बताता हूँ।
नरकस्तमउन्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे।
गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याढ्य उच्यते ॥ ४३॥
काम, क्रोध और लोभ का जो उद्रेक होता है, उससे महामोह खौल उठता है, वह ज्ञान के साथ-साथ
विवेक को भी डुबो देता है; उस समय अकेला तमोगुण ही बढ़ता रहता है। अरुणोदय के समय चारों ओर
धुँधलका ही छाया रहता है, गहरा अँधेरा रहता है और सूर्य चन्द्रमा दोनों ही दिखाई न देने के कारण दिन है या
रात है यह भी मालूम नहीं होता। इस प्रकार मन में अंधतम वृत्ति बढ़ती जाती है और क्या कर्तव्य है और क्या
अकर्तव्य है इसका भान नहीं रहता। इस प्रकार तमोगुण का जो उद्रेक होता है, उसी का नाम 'महानरक' है।
यमयातना के दुःख को नरक नहीं कहना चाहिये क्योंकि यमयातना से पाप झड़ जात' है। यमलोक के नरक
उसके सामने तुच्छ हैं। महामोह के नरक को ही महानरक समझना चाहिये। काम, क्रोध और लोभ ये तीनों ही
नरक देने वाले हैं, उसमें महामोह भी मिल जाय तो 'अंधतम' बनता है। इतना समुदाय जब एकसाथ मिलता है
तो उसे 'तमउन्नाह' कहते हैं। ऐसी स्थिति जिस पुरुष की हो जाय उसे 'नरकरूप' ही समझना चाहिये जो घोर
नरक में जाता है उसका वहाँ से उद्धार हो जाता है; लेकिन जिसे 'तमउन्नाह' प्राप्त होता है उसका महाकल्पांत में
भी उद्धार नहीं होता। ऐसे 'तमउन्नाह' की ख्याति सुनकर उद्धव का मन ऊब गया और वह मन ही मन विचार
करने लगा कि ऐसी तमोवृत्ति में डूबने वाले जीवों का कौन उद्धार करेगा? उद्धव के मन की बात जानकर
देवाधिदेव बोले, ऐसे डूबने वाले लोगों का सखा जो गुरु है, वह उद्धार करता है। अब, ऐसा गुरु कौन है? तो
नित्य जिसका पैर छूते हैं, जो चिन्मात्र ब्रह्मरूप प्राप्त कराता है, उसी को 'गुरु' कहते हैं। सचमुच, उस गुरु की
योग्यता ब्रह्मा से भी अधिक है क्योंकि ब्रह्मा केवल 'यह ब्रह्म है' इतने का ही प्रतिपादन करता है अन्यथा ब्रह्म
की बात कौन पूछता है? जो अज है, अव्यय है; उसी प्रकार अनंत, अच्छेद्य और अपरिमित है, ऐसे ब्रह्मा की
महिमा संसार में सद्गुरुओं ने ही प्रस्तुत की है। इसे सद्गुरु की कीर्ति श्रवण करने से जड़जीवों का उद्धार होता
है। 'गुरु' नाम की बहुत ख्याति है। उसे सुनकर यम और काल भी काँप उठते हैं। उस सद्गुरु की महिमा ही

उन्नीसवाँ अध्याय ५१९
डूबते का उद्धार करती है और जन्म-मरण का बन्धन समाप्त कर शिष्य को समाधान देता है। शिष्य का आप्त,
सखा, बन्धु सभी सद्गुरु होते हैं यह प्रसिद्ध है। वही नरक से बचा कर परमानंद सुख प्रदान करने वाला है। अब
तुम्हें 'गृह' का लक्षण बताता हूँ। मंजिलें, अट्टालिकायें, बंगले ये सब घर नहीं हैं। बल्कि मनुष्य देह यही गृहाश्रम
है, उसमें ही मैं पुरुषोत्तम विशेष रूप से रहता हूँ। उस गृह के स्वधर्म कर्म करने से आत्माराम सन्तुष्ट होता है।
जिस नरदेह की प्राप्ति की इच्छा इन्द्रादि देवता भी करते हैं और वेद भी जिस देह की कीर्ति का वर्णन करते हैं,
उस नरदेह में ही मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिये जिसे अपना 'घर' कहते हैं उसे नरशरीर समझना चाहिये। अब
आढ्यता (घमण्ड) का भी विचार सुनो। जो ज्ञानगुण से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, जो धन कल्पांत में भी समाप्त
नहीं होता, उसी को 'आढ्य' अर्थात् श्रीमान कहना चाहिये क्योंकि और सभी धन नश्वर है। नश्वर धन की
घमण्ड निश्चित रूप से अधःपात का कारण बनती है, किन्तु ज्ञानधन की सम्पन्नता से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः।
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४४ ॥
अब दरिद्र का लक्षण सुनो। करोड़ों की सम्पत्ति पास में होने पर भी जिसका मन तृप्त नहीं होता उसी का
नाम है 'दरिद्र'। किन्तु जिसकी गाँठ में एक कौड़ी भी नहीं है किन्तु मन में संतोष है, वही संसार में 'सम्पन्न' है,
यह जान लो। पास में धन होते हुए भी जो पेट भर नहीं खाता, सदा सर्वदा मन में लालच भरी रहती है, इसी का
नाम है 'दरिद्रलक्षण'। अब इसके बाद कृपण (कंजूस) किसे कहते हैं, यह भी सुनो। जिस प्रकार राजा को
उसके सेवक बाँध कर रखें, उसी प्रकार वह इन्द्रियों के वश में रहता है। अपने स्वरूप का विचार करें तो सबके
राजा हम स्वयं हैं। यह भूलकर वह दीन होकर इन्द्रियों के अधीन हो जाता है। वास्तव में मन आत्मा का चाकर
होता है और इन्द्रियाँ मन की चाकरी करती हैं किन्तु यह उनका भी दासानुदास बनता है। इस प्रकार इन्द्रियों के
अधीन होने के कारण 'कृपणत्व' दीनता आती है। अपने चाकरों के चाकर जो इन्द्रिय हैं, उनकी यह पूजा करता
रहता है। इस प्रकार इन्द्रियों को महत्त्व देने से शरीर में 'कृपणता' आती है। अब हे उद्धव! ईश्वरत्व का
वास्तविक लक्षण बताता हूँ। उद्धव! जिसे कनक और कामिनी अच्छी नहीं लगती, वही सचमुच त्रिभुवन का
'ईश्वर' है। मेरी यह बात त्रिवार सत्य है। तुमने जितने प्रश्न पूछे थे उतने ही गुण जिसके पास होते हैं, लेकिन
जो उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार 'ईश्वर' यह नाम शोभा देता है। लेकिन उद्धव! कनक और कामिनी से
जिसे मन से आसक्ति रहती है, वह संसार का 'अनीश्वर' है इसे निश्चयपूर्वक जान लो। इस प्रकार शमादि प्रश्नों
का उत्तर मैंने बतलाया। उनके विपरीत जो लक्षण हैं, अर्थात् अशमादिक गुणों का होना, यही 'अनीश्वरत्व' है,
यह जान लो।
एत उद्धव ते प्रश्नाः सर्वे साधु निरूपिताः।
किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः ॥ ४५ ॥
उद्धव! मैंने तुम्हारे सारे प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। जिससे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त हो सके, ऐसा ही
व्याख्यान दिया। संसार में गुणदोषों की संख्या असंख्य है। कहने से कम नहीं होगी। गुणदोषों का विवेचन करना
अत्यन्त कठिन है। इसलिये मौन रहना ही अच्छा है क्योंकि गुणदोषों को न कानों से सुनना चाहिये, न आँखों से
देखना चाहिये और न मुँह से कहना चाहिये। गुणदोषों के बारे में मन में भी नहीं सोचना चाहिये। अब ब्रह्मज्ञान
के लक्षण का निरूपण बहुत अधिक नहीं है। उसे श्रीकृष्ण आधे ही श्लोक में बता रहे हैं।

५२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ॥ ४६ ॥
सर्वत्र एक परिपूर्ण ब्रह्म ही है। इसमें दोष कौन से और गुण कौन हैं? अविद्या क्षुब्ध होती है, तभी गुणदोष
बढ़ते हैं। इसलिये जो गुणदोषों को देखने लगता है, समझ लो उसकी अविद्या क्षुब्ध हो गयी और जो गुणदोष
नहीं देखते, वह समझ लो ब्रह्मसम्पन्न हो गया। दूसरों के गुणदोष देखना यही सबसे बड़ा दोष है और गुणदोष न
देखना यही सबसे अच्छा गुण है। ब्रह्म में कोई गुणदोष नहीं है यह सर्वथैव सत्य है। अर्थात् जो गुणदोष देखता
है उसमें ब्रह्मत्व नहीं है। यह सहज सिद्ध है। जो गुणदोष देखने लगते हैं, उनका ब्रह्मत्व किस तरह लुप्त होता
है ? क्या वह उनसे रूठ कर चला जाता है ? जिस समय राहु रविबिंब को ग्रसता है, उस समय दिन में भी नक्षत्र
दिखायी पड़ते हैं। उसी प्रकार अविद्या जब ब्रह्मत्व को ग्रस लेती है, तो गुणदोष दिखायी पड़ने लगते हैं। श्रीकृष्ण
आदरपूर्वक कहते हैं कि जीव को किसी का भी गुणदोष नहीं देखना चाहिये। संसार में चौरासी लाख योनी हैं
उनमें से यदि मनुष्य योनि के ही गुणदोष न देखो तो उतने से ही तुम नित्यमुक्त हो जाओगे। अब शायद तुम यह
कहोगे कि स्वधर्माचरण करते समय गुणदोष तो देखने ही चाहिये। लेकिन उद्धव ! यह बात बिलकुल गलत है
क्योंकि स्वधर्माचरण की प्रकृति बिलकुल भिन्न है। अपने दोषों को नष्ट करने के लिये ही स्वधर्माचरण किया
जाता है और वही अगर गुणदोष देखने लगे तो वह नंगी दौड़ जैसा होगा। धान पैदा करने के लिये खेत में पत्ते
आदि जलाकर जमीन को तैयार करते हैं, यदि उसके बदले फसल को ही जला दें तो किसान को मिट्टी ही खानी
पड़ेगी। दोषों का क्षालन करने के लिये ही वेदों ने धर्म की प्रवृत्ति बतायी है; यदि उस स्वधर्म से दोष ही देखने
लगे तो वह अपने हितों से ही वंचित हो जायेगा। स्त्री पुरुष स्वांग बनाकर अनेक प्रकार के हावभाव दिखलाते
हैं, अनेक प्रकार की शृंगारिक बातें करते हैं, लेकिन वह भाव वे अपने मन से नहीं करते। उसी वृष्टि से स्वधर्म
का आचरण करना चाहिये। बिना गुण-दोष देखे, बिना स्वधर्म की मर्यादा छोड़े स्वधर्म का आचरण करना
चाहिये, यही स्वधर्म कर्म का प्रमुख लक्षण है। ऐसे स्वधर्माचरण से कर्म के मैल धुल जाते हैं। ऐसे स्वधर्माचरण
से कर्म के मैल धुल जाते हैं। गुणदोष की बात छोड़ने पर ही साधकों को निजात्मपद की प्राप्ति होती है। गुणदोष
देह में होते हैं लेकिन आत्मा तो नित्य विदेही ही रहती है। सिद्ध को तो वे दिखायी ही नहीं देते। तिस पर भी
यदि उसे गुणदोष दिखायी देने लगे तो दोनों की खैर नहीं। इससे साधक की हानि होती है और उसकी सिद्धि
तत्काल नष्ट हो जाती है। इस प्रकार उद्धव ! गुणदोषों का यह संकट दोनों ओर एक जैसा है। सारा संसार
गुणदोषों से भरा हुआ है लेकिन हमें उधर ध्यान ही नहीं देना चाहिये। यही बात श्रीकृष्ण ने अत्यन्त भावुक
होकर उद्धव को बतलायी। यदि गुणदोषों को देखना इतना निषिद्ध है तो फिर श्रीकृष्ण ने वेदमुख से इतना स्पष्ट
क्यों बताया है ? ऐसा प्रश्न उद्धव आगे कहने वाला है। उस पर व्यास का निरूपण सुनकर जीव और शिव दोनों
को ही शान्ति मिलेगी। इसमें श्रीकृष्ण सकाम-भक्ति और निष्काम भक्ति के अधिकार विशद करेंगे। वह कथा
अत्यंत अद्भुत है। अतः संत उधर ध्यान दें और श्रोता सावधान हो जाएँ। ऐसी विनती एकाजनार्दन कर रहा है।
अगला निरूपण रस से सराबोर है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकार टीकायां
भगवदुद्धव संवादे एकोनविंश अध्यायः ॥ १९ ॥

बीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूप चित्समुद्र, सद्गुरुराया ! तुम्हें मेरा प्रणाम ! मुक्तरूपी मोतियों को तुझमें ही आश्रय प्राप्त
होता है और ज्ञानवैराग्यरूपी सीप के रूप में तुम उसे भाग्यवान पुरुषों को देते हो । तुम्हारा आवास तो असीम है।
उसमें नाना प्रकार के चिद्रत्न भरे हुए हैं। निजबोधरूपी चन्द्रमा को देखते ही तुम में ज्वार आता है जिसमें
स्वानंद में उफान आने पर भी तुम गुरुमर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हो। स्वानंद की लहरें निरन्तर तुम्हारी सतह
पर उछलती रहती हैं। ब्रह्मविद्या एक बहुत बड़ा बन्दरगाह है जिसमें निजभक्ति नाम का बहुत बड़ा जहाज है।
उसे चलाने वाले नाविक तुम हो। तुम्हीं उस पर प्रेम की पाल लगाते हो और भक्त, संत और ज्ञानसम्पन्न लोगों को
उस पार लगाते हो। उनका वार-बार आना-जाना सचमुच हीं रुक जाता है। किसी किनारे पर लाकर भवसागर में
विचरण कराते हो। उसे महाकल्पांत में भी डूबने की बाधा नहीं आती। जो भक्तिरस में डूबता है उसे शेषशायी के
पास पहुँचा देते हो, किसी को अटल स्थान पर पहुँचा देते हो जहाँ से ब्रह्मादिक देवता भी नहीं हिला सकते।
तुम्हारे सागरपन का गुण ऐसा है कि किसी को तिलमात्र के लिये भी विजातीय नहीं रहने देते हो। तुम्हारी यह
शक्ति बड़ी अद्भुत है। यह जब प्रलय काल में भी ऊपर चढ़ता जाता है, उस समय संसार नाम का गाँव भी डूब
जाता है। यह वैकुण्ठ, कैलास के भी ऊपर चढ़ता जाता है। आगे, पीछे सर्वत्र यही दिखायी देता है। ऐसे इस
सद्गुरुरूपी समुद्रोदक में एकनाथ एकता से खो गया। उसमें गिरते ही जनार्दन ने उसका अंगीकार किया। उस
जनार्दन ने ही स्वयं एकादश स्कन्ध पर यह भाष्य तैयार किया। उसने अभंग में एकनाथ का नाम देकर लोगों को
उसके कवित्व से परिचय कराया। जनार्दन को एकत्व प्रिय है। मैं एका उनसे मिलने के कारण, निजात्मभाव से
दोनों में एकत्व स्थापित हुआ और उन्होंने अपने निजसुख का मुझे उपभोग कराया। निजसुख की कथा वह स्वयं
कहता है और श्रोता भी वह स्वयं ही बनता है। फिर उसके अर्थ का समाधान भी वह स्वयं ही करता है। इस
प्रकार उस जनार्दन ने यह एकादश स्कन्ध सुलभ करा दिया। उन्नीसवें अध्याय के अन्त में गुण-दोषों की कुछ
बातें उद्धव को बतायी थीं। वह यह कि गुणदोष देखने को सबसे बड़ा 'दोष' मानना चाहिये और गुणदोष न
देखना सबसे बड़ा गुण मानना चाहिये। यह बात मुझ श्रीकृष्ण को स्वीकार है। भगवान का यह भाषण सुनकर
उद्धव को बड़ा चमत्कार लगा। उसने कहा, घर-घर में गुणदोषों का विचार क्या लोगों ने किया है ? आपने स्वयं
ही वेदमुख से गुणदोषों का लक्षण बताया है। आपकी वेद की बातें कैसे अस्वीकार कर दी जाएँ ? विधिनिषेध
लक्षण का विचार करने पर वह वेद का ही वचन मालूम होता है ? ऐसा होते हुए श्रीकृष्ण उसका निषेध क्यों
करते हैं ? यही प्रश्न उद्धव स्वयं पूछ रहे हैं। बीसवें अध्याय में गुणदोष लक्षण बताने के लिये भक्ति, ज्ञान और
कर्म इन तीन भिन्न-भिन्न अधिकारों के बारे में भगवान बतायेंगे। उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! तुमने स्वयं ही वेद
के रूप में गुणदोषों का विवेचन किया है। उसी को हम प्रमाण मान कर चल रहे हैं। यह विधि और निषेध, तुम्हें
वेद स्वयं ही स्पष्ट कर रहे हैं। वह वेदानुवाद में तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। सुनो।
उद्धव उवाच
विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते।
अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम् ॥ १ ॥

५२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव ने कहा, हे कमलनयन श्रीकृष्ण! वेद की आज्ञा तुम्हारी आज्ञा है यह प्रसिद्ध है। उसमें ही विधि
निषेध लक्षण यह गुण और दोष है ऐसा बताया गया है। तुम्हारे ही वेद के जो विधि हैं, इसीलिये बुद्धि गुणदोषों
में दृढ़ हो गयी। हे कृपानिधि! वही मैं स्पष्ट कर दिखाता हूँ, श्रवण करो।
वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्।
द्रव्यदेशवयःकालान् स्वर्गं नरकमेव च॥२॥
आप की ही जो वेदवाणी है, वही गुणदोषों की खान है। उसी ने उत्तम, मध्यम और अधम ऐसे विभाग
बनाकर वर्णाश्रम का भेद दिखाया है। धन भी कौन सयोग्य है और कौन-सा अयोग्य है, यह भेद भी वेदों ने ही
बताया है। उसी प्रकार पवित्र स्थल कौन-सा है और अपवित्र कौन सा, उचित काल कौन-सा है और अनुचित
काल कौन-सा यह भी उसी ने बताया है। पूर्ववय में मन स्थिर रहता है, यौवन में वह कामलोलुप होता है और
वार्धक्य में वही अत्यन्त कुश्चित। इस प्रकार तुम्हारे वेद ने ही गुणदोष उत्पन्न किये हैं। भगवन्! देखिये। तुम्हारा
ही वेद स्वर्ग और नरक की बात करता है और उसके लिये कर्म की आवश्यकता बता कर साधक-बाधक कर्मों
का भी वर्णन करता है। वर्णाश्रम में भी 'प्रतिलोमज', 'अनुलोमज' आदि नाना प्रकार के भेदों को नचाता है।
उच्चवर्ण की स्त्री यदि हीनवर्ण से गर्भ धारण करे तो उसकी संतति को 'प्रतिलोमज' कहा जाता है। ऐसी संततियाँ
सूत, वैदेह तथा मागध इस नाम से प्रसिद्ध हुई हैं और हीन जाति की स्त्री को उच्चवर्ण का गर्भ रहने पर जो
संतति उत्पन्न होती है, उसे शास्त्रों के विद्वान 'अनुलोमज' इस नाम से पुकारते हैं। अंबष्ट, मूर्धावसिक्त, पारशव
तथा सात्वत आदि नाम से जो प्रसिद्ध हैं उन्हें 'अनुलोमज' समझना चाहिये। इस प्रकार जो नाना प्रकार के भेद
हैं, उनमें 'विधि-अविधि' का प्रकार भी वेदों का ही बताया हुआ है। इसलिये तुम्हारा वेद ही गुण-दोषों का
मायका है।
गुणदोषभिदा दृष्टिमन्तरेण वचस्तव।
निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥३॥
ये गुण हैं और ये दोष हैं, यह कहने पर दोनों में बैर हो जाता है और वे गुण दोष स्पष्ट करने वाला तुम्हारा
वेद ही है। वेदवाणी ने ही यह बैर लगाकर गुणदोषों का झगड़ा खड़ा किया है तब वेदवचन से प्राणी को मोक्ष
कैसे मिलेगा? भगवन् आपने स्वयं गुणदोषों की ओर न देखने के लिये कहा है और तुम ही वेद को प्रमाण बताते
हो उन्हें सच माना जाय तो गुण-दोषों को देखना पड़ेगा। अर्थात् तुम्हारा भाषण सुनने से दोनों ओर से अड़चन
उत्पन्न होती है। तुम्हारे ऐसे भाषण से बड़े-बड़े ज्ञानी भी संभ्रम में पड़ जाते हैं, फिर औरों की क्या बात की
जाय ? मेरे भाषण और वेदवचन दोनों को ही प्रामाणिक कहते हो तो फिर गुणदोष दर्शन में दोनों में मतभेद क्यों
है? यदि हाथ से वेद का विधान न हो पाये और वेदार्थ का ज्ञान भी न हो सके तो मोक्ष प्राप्ति नहीं होती,
इसीलिये तुम वेद को प्रमाण मानते हो। लेकिन उस मोक्ष को प्राप्त करने में क्या कठिनाई है? यदि सारे कर्म ही
छोड़ दिये जाएँ तो मोक्ष बिना माँगे, स्वयं घर तक चल कर आयेगा। अब शायद तुम यह कहोगे कि यदि वेद का
अर्थ समझ में न आये तो कर्म करने पर या कर्म का त्याग करने पर भी मोक्ष की कभी प्राप्ति नहीं होगी। रस्सी
को ही यदि सर्प समझ लिया जाय तो हजारों मंत्रों का जप करने अथवा बाजों का शोर करने से वह केशमात्र भी
वहाँ से नहीं हिलेगा। लेकिन यदि ठीक से देखा जाय तो वह सर्प अदृश्य हो जाता है। उसी प्रकार वेदवचनों का
योग्य विचार करने से संसार का भय नष्ट हो जाता है। भवभय के निर्मूलन का ही अर्थ है 'मोक्ष'! वह वेदार्थ

बीसवाँ अध्याय ५२३
ज्ञान के बिना हाथ नहीं लगेगा। वेद में बताये गये कर्म त्याग का विधि किये बिना यदि उन्मत्त होकर कर्म का
त्याग कर दिया जाय तो मोक्ष तो मिलने से रहा, उलटे पाखण्ड ही हाथ लगेगा। इसलिये वेदों में बतायी गयी
विधि के ही अनुसार कर्मत्याग करने से वेद का बन्धन नहीं पड़ेगा ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह भी ठीक नहीं है
क्योंकि गुरुवाक्य श्रवण करने के लिये संन्यास लेना पड़ता है उस श्रवण का भी विधि विधान है। गुरुमुख से
महावाक्य श्रवण करना यह भी वेदार्थ है। (आशंका) अब देव तथा पितरों के लिये यदि यज्ञ करें तो शायद वे
भी प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करें; लेकिन वह भी वेद के बिना सम्भव नहीं है। स्वाहाकार से देवता तृप्त होते हैं
और स्वधाकार से पितर तृप्त होते हैं। सारांश, वेदविधि के बिना देवता अथवा पितर कोई भी प्रसन्न नहीं होगा।
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुस्तवेश्वर।
श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि॥ ४॥
मिथ्यारूप यह स्थावर और जंगम संसार, तथा देवता मनुष्य और पितर इन सबका दर्शन वेद ही कराता है,
और वे पूज्य तथा महान हैं यह भी प्रतिपादित करता है। लेकिन उनमें भी परस्पर अत्यन्त विरुद्ध, उत्तम, मध्यम
और कनिष्ठ इस प्रकार के तीन भेद करने का प्रयास भी वेदों का ही है। इस प्रकार गुण-दोषों के लक्षणों का
विस्तार भी तुमने ही किया है। तुम्हारे ऐसे उल्टे-सीधे भाषण से तुम्हारी बातों में ही विरोध उत्पन्न होता है और
इसी कारण गुण-दोषों का प्रकार बढ़कर उसकी बाधा का तत्काल अनुभव होता है। उसमें एक स्वर्ग, एक नरक,
यह मोक्ष, यह मोक्ष, यह बन्धन जैसे वेदवचन सुनाकर तुमने ही लोगों को भ्रमित करके रखा है। पहले लोगों के
मन में गुण दोषों की बात ही नहीं थी लेकिन तुम्हारे वेदवचन के कारण गुणदोषों में दृष्टि दृढ़ हो गयी। सारांश,
तुम्हारे इस भाषण से लोगों का नुकसान ही हुआ है। दारुण नरक भोगने के लिये तुम्हारी यह भ्रमित करने वाली
वेदोक्ति ही कारण है।
गुणदोषभिदा दृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः।
निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रमः ॥ ५॥
सारांश अनेक गुणदोषों की दृष्टि की सृष्टि तुम्हारे वेदों ने ही की है। अन्यथा लोगों के मन में गुणदोषों की
बात बिलकुल नहीं थी। तुम्हारी वेदाज्ञा के अनुसार ही ये गुणदोष उत्पन्न होने के कारण वे अब जोरजबरदस्ती से
भी उनके चित्त से निकल नहीं पायेंगे। वेद अनादि हैं तथा प्रामाणिक हैं यह तुम्हारा ही वेदवचन है। इसलिये
अब गुणदोष न देखने का तुम्हारा भाषण स्वीकार्य नहीं है। इसलिये हे कृपामूर्ति, यह भ्रम समाप्त कर दो। उद्धव
का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण ने क्या कहा ? उद्धव की यह विनती सुनकर, तीन योगों की उपपत्ति अर्थात्
अधिकार भेद के अनुसार वेदार्थ की प्राप्ति कैसे होती है, यह स्वयं श्रीकृष्ण बताने लगे।
श्रीभगवानुवाच
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६॥
मेघगर्जना हो रही हो ऐसी गम्भीर वाणी में भगवान बोले, मेरी पूर्ण कृपा के बिना मेरी वेदवाणी समझ में
नहीं आती। वेदशास्त्र में कितने ही निष्णात क्यों न हो जाए लेकिन बिना मेरे प्रसाद के वेद का अर्थ समझ में
नहीं आयेगा। ब्रह्मदेव चार मुख से वेद पढ़ता है लेकिन जब उसे भी वेदार्थ का सच्चा रहस्य समझ में नहीं आता,

५२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तो फिर औरों की क्या बात की जाय? यदि ब्रह्मदेव को वेद का अर्थ मालूम हुआ होता तो शंखासुर वेद क्यों ले
गये होते? ब्रह्मदेव को यदि वेदार्थ का मर्म समझ में आया होता तो वह सरस्वती की अभिलाषा न करता। अब
तुम्हें मेरे वेद का निर्धार भी बता देता हूँ। उद्धव! अच्छी तरह ध्यान देकर श्रवण करो। वेद का विचार इस प्रकार
है। मेरा वेद व्यर्थ की बकबक करना नहीं जानता। ज्ञान, भक्ति और कर्म यही तीन काण्ड वेदों ने बताये हैं। मेरे
वेदों की जो वाणी है वह इन्हीं तीन योगों का प्रतिपादन करती है। इसलिये उद्धव! मोक्ष प्राप्त करने के लिये
अन्य कोई उपाय नहीं हैं यह ध्यान में रखो। तो ये तीन योग कौन से हैं? उनके अधिकार के कौन-कौन से
विभाग हैं? यदि तुम ठीक प्रकार से पूछ रहे हो तो तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।
तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥७॥
जो अंतःकरण से ब्रह्मलोक के भोगों से विरक्त रहते हैं, जो विधिपूर्वक तथा संकल्पयुक्त संन्यास लेकर
कर्म का त्याग करते हैं, ऐसे अधिकारियों के लिये मैंने 'ज्ञानयोग' प्रकट किया है। उस आत्मज्ञान के साधन से
मेरी मद्रूपता प्रकट होती है। अब इस लोक में जो केवल अविरक्त है, विषय के लिये कामासक्त हुए रहते हैं,
उनके लिये मैंने कर्मयोग प्रकट किया है। इस प्रकार मैंने श्रेष्ठ और कनिष्ठ इन दोनों के बारे में स्पष्ट रूप से
बताया। अब उत्कृष्ट और अलौकिक तीसरा अधिकारी है, उसके बारे में सुनो।
यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्।
न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥८॥
हरि की कथा सभी सुनते हैं, लेकिन मेरे प्रति उनके मन में श्रद्धा कभी नहीं उत्पन्न होती; लेकिन किसी को
कथा श्रवण से ही विलक्षण श्रद्धा उत्पन्न होती है। उस श्रद्धा का लक्षण सुनो। वह जो भी श्रवण करता रहता है
उसका अनुसंधान उसके हृदय में चलता रहता है। इससे उसका मनन भी उत्साहयुक्त प्रेम से होने लगता है। कथा
प्रेम इतना विचित्र है कि उससे मन में हर्ष उफनने लगता है और हृदय में स्वानंद की पताका फहराने लगती है।
श्रवण करने में उसकी इतनी अधिक रुचि रहती है। उसके कारण विषय दोषयुक्त दिखायी देने लगते हैं। इसमें
मुख्य रूप से स्त्री और धन यही अधिक बाधक हैं। इसलिये जिह्वा और जननेन्द्रिय पर नियन्त्रण रखना है, इसका
स्मरण रात-दिन मन में रहना चाहिये। घाव में यदि बाण का फल घुसा हो तो उसे खींच कर निकाले बिना घाव
अच्छा नहीं होता, उसी प्रकार विषयों के दोष भोग कर ही विषय कभी नष्ट नहीं होंगे। मृत्यु को सामने देखकर
मनुष्य जिस प्रकार थर-थर काँपने लगता है, उसी प्रकार विषयभोग देखकर वह (सच्चा साधक) थर-थर काँपने
लगता है। इस प्रकार वह विषयों के दोष निरन्तर देखता रहता है, लेकिन उनका त्याग करने का सामर्थ्य भी
उसमें नहीं होता। सेवक राजा को बन्दीगृह में डाल दें और भले ही वे उसे स्त्री, चन्दन आदि विलास दें लेकिन
वे उसे विषसमान लगते हैं। उन भोगों में वह उद्विग्न ही रहता है। सारांश, भोग भोगते समय वह अपने छुटकारे
की बाट जोहता रहता है। इसी प्रकार यह भी दिन-रात विषयों का भोग करते हुए ऊब जाता है। इस प्रकार जो
विषयासक्त भी नहीं है और सचमुच विरक्त भी नहीं है, ऐसी मध्यम स्थिति के व्यक्ति के ही लिये मैंने वेदमुख से
भक्तिमार्ग दिखाया है। ऐसे लोग जब मेरी भक्ति करते हैं तो उन्हें मेरे स्वरूप पर प्रेम उपजता है और अपने आप
विरक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मेरी भक्ति सिद्धि देने वाली है। मैंने स्वयं वेद में जो कहा है वे ये तीन योग ही हैं।
इन तीन योगों के योग से ही वेदवाणी का ज्ञान, कर्म तथा उपासना ये तीन विभाग बन गये हैं। इसमें किसी को

बीसवाँ अध्याय ५२५
गुणदोष दिखायी देते हैं, किसी को दोनों ही नहीं दिखायी देता, इसमें मध्यम रीति में कौन रहता है, उसके भी
लक्षण सुनो। जो विषय के प्रति आसक्त रहता है वही कर्म मार्ग का अधिकारी है। उसका गुणदोषों से छुटकारा
नहीं होता। यही बात श्रीकृष्ण अगले अध्याय में बताने वाले हैं। लेकिन जो सचमुच ही विरक्त होकर ज्ञान का
अधिकारी है, वह गुणदोषों से बिलकुल विरत रहता है और उसे सारे संसार में तिलमात्र के लिये भी गुणदोष नहीं
दिखायी देता। संसार पूर्ण ब्रह्मरूप है। उसमें गुण किसके कहें और दोष किसके ? जो ऐसे सम्पन्न हैं उन्हें दोष
दिखाई ही नहीं देते। जो अत्यन्त आसक्त नहीं हैं और अत्यन्त विरक्त भी नहीं हैं ऐसे मेरे भक्त पहले गुणदोष
देखते हैं; किन्तु बाद में विवेक से उन्हें छोड़ देते हैं। मैं परमात्मा प्रत्येक प्राणी में आत्मस्वरूप में विद्यमान हूँ।
उनमें गुणदोष नहीं देखने चाहिये। ऐसे जो भजननिष्ठ राजहंस होते हैं वे गुणदोष देखना छोड़ देते हैं। मैंने वेदार्थ
में जिन गुणदोषों को बताया है, वे केवल दोषों का त्याग करने के लिये। दूसरों के दोष देखने की बात वेद में
नहीं है। वेदार्थ का श्रवण इस प्रकार करना चाहिये कि दोषों का त्याग कर केवल गुण ग्रहण किये जाएँ। जो
दूसरों के दोष देखता है वह उसके पाप का भागी होता है। जो दूसरों के दोषों का वर्णन करता है, वह उसी दोष
से नरक जाता है। अब श्रीकृष्ण कर्म का अधिकार बता रहे हैं। उस पर विचार कर कर्म का आदर करें।
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ ९ ॥
जब तक सच्ची विरक्ति उत्पन्न न हो जाय तब तक कर्म करें। एक बार विरक्ति प्राप्त होने पर स्वर्ग और
संसार दोनों ही त्याज्य हो जाते हैं। वमन किये हुए मिष्टान्न पर जिस प्रकार जिह्वा की पुनः वासना नहीं होती; उसी
प्रकार जब सचमुच ही विषयवासना के प्रति मन में घृणा उत्पन्न होती है, तब उस सम्बन्ध के विचार समूल बन्द
हो जाते हैं अथवा संयोग से मेरी कथा सुनने के प्रति आदर उत्पन्न होता है। मेरी कथा श्रवण करते समय प्रेम से
अंतःकरण भर उठता है, घरबार का विस्मरण होता है, तब कर्मत्याग की बाधा नहीं होती। मेरी कथा का श्रवण
चलता है, तभी हृदय में मेरा स्मरण भी चलता है। ऐसी अवस्था में बाधा दोष नहीं रहता। मेरी कथा श्रवण करते
समय करते समय करोड़ों कर्मों का लोप भले ही हो जाय लेकिन कर्मलोप के दोष की बाधा नहीं होती। मेरी
कथा का ऐसा प्रभाव है।
(संमति श्लोक) मत्कर्म कुर्वतां पुंसां कर्मलोपो भवेद्यदि।
तत्कर्म तेषां कुर्वन्ति तिस्रः कोट्यो महर्षयः ॥ १॥
मेरी प्रेमपूर्वक भक्ति करते समय जब मेरे भक्तों के नित्यकर्म रह जाते हैं, तब उनके वे कर्म तैंतीस करोड़
ऋषि महंत पूर्ण करते रहते हैं। मेरी कथा की ऐसी महिमा है। मेरा पूजन और कीर्तन चल रहा हो, उस समय
विघ्नों की वहाँ आने की क्या हिम्मत है ? उन्हें मुँह दिखाने का भी साहस नहीं होता अथवा जब कोई पुरुष पूर्ण
विरक्त हो जाता है अथवा मेरी सेवा में तत्पर हो जाता है, उस समय उसके स्थान पर बेचारा कर्म दास बन कर
रहता है, ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं। उद्धव ! स्वधर्म के अनुसार कर्म करने से मेरी प्राप्ति होती है। उसके
सम्बन्ध में भी तुम्हें यथार्थ रूप से बताता हूँ, सुनो।
स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव।
न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत् ॥ १०॥
उद्धव ! गृहस्थाश्रम में स्वधर्मानुरूप ही रहें, अन्य मार्ग पर नहीं चलें तो यहीं निश्चित रूप से विरक्ति प्राप्त

५२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होती है। अब अन्य मार्ग का क्या अर्थ है ? उसका भी लक्षण बताता हूँ। पराया धन और परायी स्त्री की आसक्ति
तथा परनिंदा में रुचि, इसी को उद्धव ! 'नरक का मार्ग' कहते हैं। स्वर्ग सुख की बात सुनकर जो उसके लिये मन
बना लेता है और उसके अनुकूल कर्म करता है उसे अचूक स्वर्गभाग प्राप्त होता है। ये दोनों 'अन्यगति' अर्थात्
विपरीत स्थितियाँ हैं। इनसे वृत्ति हटाकर यज्ञादिक कर्मों से मेरा यजन करने से, नित्यनैमित्तिक कर्मों से ही
वैराग्यस्थिति अर्थात् नैराश्य प्राप्त होता है। तब स्वर्ग में भी नहीं रहना पड़ता अथवा नरक में भी नहीं जाना होता।
इहलोक में ही विरक्तता प्राप्त होती है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अस्मिंल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः।
ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥११॥
इस लोक में विचरण करते समय, इस प्रकार स्वधर्माचरण करते रहने से पुण्य और पाप इन दोनों का ही
क्षालन हो जाता है तथा वह निर्मलत्व से अत्यन्त पवित्र हो जाता है। तब संसार का भान नष्ट होकर उसे मेरा
'शुद्ध ज्ञान' अथवा मेरा सप्रेम भजन अर्थात् 'पराभक्ति' प्राप्त होती है। ऐसी भक्ति में मैं सदा भक्त के अधीन
होकर रहता हूँ। तब ज्ञान मोक्ष के साथ ही स्वयं भक्त के चरणों पर आकर गिरता है। अब इस ज्ञान का परिणाम
सुनो। वह संसार को 'महादुःख' तथा मोक्ष को 'परमसुख' कहता है। परन्तु मेरा भक्त इन दोनों को नहीं मानता।
प्रेम से मेरा भजन करते समय संसार भय का स्मरण ही नहीं होता। उधर मोक्ष को कौन पूछता है ? मेरे भक्तों को
भक्ति का ही पूर्ण उल्हास रहता है। जिसे 'महादुःख' कहते हैं वह भक्तों के लिये भगवद्रूप ही होता है; उसी
प्रकार जिसे महासुख कहते हैं वह भी उनके लिये भगवद्रूप ही रहता है। इस प्रकार मेरा भक्त मेरे भजन में सुख
और दुःख दोनों को भूलता है। मुझ भगवन्त के सिवा उसे दुनिया में दूसरा कुछ दिखायी ही नहीं देता। लेकिन
मेरी यह पूर्ण भक्ति कहीं से लाकर नहीं आती। मैं जब प्रसन्न रहता हूँ, तभी संयोग से वह प्राप्त होती है। अब
तुम सोचोगे कि मैं किससे प्रसन्न होता हूँ तो मैं बताता हूँ कि मेरे प्रसन्न होने के लिये नरदेह ही एक कारण है।
स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा।
साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्॥१२॥
जिन्हें स्वर्गभोग से अत्यन्त प्रेम है, उन्होंने अमरत्व की पताका फहरायी है और स्वर्ग के बन्दीखाने में पड़े
हुए हैं, वे भी बड़ी चाह से नरदेह की इच्छा करते हैं। उसी प्रकार जिन्होंने भयंकर नरक यातनाएँ भोगी हैं, वे
प्राणी भी बड़ी चाह से नरदेह की इच्छा करते हैं। नरदेह अत्यन्त पवित्र वस्तु है तथा भक्ति और ज्ञान का वह
आश्रय स्थान है। जिसके योग से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, वह नरदेह धन्य है। इस नरदेह के कारण ही जन्म-मरण
का बन्धन समाप्त हो जाता है, जीव को समाधान प्राप्त होता है और स्वयं स्वानंदघन हो जाता है। जिस नरदेह
की संगति से अविद्या की निवृत्ति होती है और भगवत्पद की प्राप्ति होती है, उस नरदेह की यह कीर्ति प्रसिद्ध ही
है। सभी प्राणी नरदेह की इच्छा करते हैं। साक्षात् ब्रह्मदेव भी नरदेह की इच्छा करते हैं। नरदेह इतना श्रेष्ठ है
क्योंकि इसमें भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है; लेकिन भक्तिज्ञान से मनुष्य देह नहीं प्राप्त होता।
न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्नारकीं वा विचक्षणः।
नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥१३॥
नरदेह की प्राप्ति होने पर भी, अधर्म का आचरण करने पर नरक में ही जाना पड़ता है तथा पुण्य संग्रह
करने पर निश्चित रूप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वर्ग मिलने पर पुनर्जन्म के चक्कर में फँसना होता है

बीसवाँ अध्याय ५२७
और नरक में तो असह्य दुःख भोगना होता है। इसीलिये इन दोनों की प्रीति छोड़कर नरदेह से प्रीति करना
चाहते हैं। मनुष्य देह की चाह भी देहबुद्धि ही है। इसके कारण काम-क्रोध की युति बनती है। क्षण-क्षण पर
असंख्य प्रमाद होते हैं। इसलिये स्वर्ग, नरक अथवा मृत्युलोक इन तीनों की ही प्रीति छोड़कर ज्ञान अथवा
भक्ति ही प्राप्त करनी चाहिये। ज्ञान सम्पादन करने के लिये विशेष कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। प्रेम
से मेरा भजन करने से ज्ञान दूर भगाने पर भी घर में ही घुसता है। गेहूँ का भण्डार मिलने पर उससे मनचाहे
पकवान बनाये जा सकते हैं। उसी प्रकार मेरी भक्ति प्राप्त होते ही ज्ञानसम्पत्ति घर में प्रवेश करती है। हाथ में
पैसा होने पर सभी चीजें घर बैठे आ जाती हैं, उसी प्रकार मेरी भक्ति साध्य करने से भुक्ति और मुक्ति दोनों
दासी बनकर रहती हैं। इस पर शायद तुम यह कहोगे कि मेरी भक्ति करने पर छल करने के लिये विघ्न भी
आयेंगे। तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि हाथ में सुदर्शन लेकर मैं अपने भक्तों का रात-दिन संरक्षण करता हूँ। पक्षी
के बहाने नामस्मरण करने पर मैंने वेश्या का भी उद्धार किया है। विघ्न के दाँत तोड़ कर मैंने उस
व्यभिचारिणी का भी उद्धार किया। इसलिये नरदेह प्राप्त होने पर जो मेरा भजन करता है, वही इस संसार में
धन्य कहलाता है। मनोभाव से मेरी भक्ति करने पर मैं श्रीकृष्ण उस भाविक का उद्धार करता हूँ और जो
ज्ञानाभिमान में रहते हैं उन्हें मैं यम के सुपुर्द करता हूँ। मेरी भक्ति अथवा ज्ञान सम्पादन करते समय जिन्हें
ज्ञानाभिमान होता है, उन्हें मैं अपने हाथों दोषों के सुपुर्द करता हूँ। अब उद्धव! तुम यह कहोगे कि उन्हें यम
के सुपुर्द क्यों करता हूँ? तो वह इसीलिये कि वह उन महादोषी जनों को यातना देकर उन्हें ज्ञानाभिमान से
मुक्त करता है। इसलिये देहाभिमान छोड़कर भक्तिभाव से मेरा भजन कर पूर्व के ज्ञानसम्पन्न साधु नरदेह से ही
मुझ तक आ पहुँचे हैं।
एतद् विद्वान् पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः।
अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम् ॥ १४॥
देह तो केवल अस्थि, चर्म और मलमूत्र से ही बना है और अत्यन्त अमंगल है किन्तु उससे परिपूर्ण और
निश्चल ब्रह्म का निर्मल फल प्राप्त होता है। पूर्व के ज्ञानसम्पन्न लोगों ने नरदेह का कारण ध्यान में रखकर
देहाभिमान छोड़ा और वे ब्रह्मसुख तक पहुँच गये। देह निंद्य है इसलिये उसे छोड़ दिया जाय तो हाथ से इतना
बड़ा लाभ छूट जाता है; यदि उसे वन्दनीय मान कर उसका पोषण करें तो निश्चय ही रौरव नरक प्राप्त होता है।
इसलिये देह का न तिरस्कार ही करें और न विशेष आदर ही करें। हाँ, उससे परमार्थ साध लेना चाहिये। उद्धव!
उसे कैसे साध्य किया जाय इसका गुप्त रहस्य तुम्हें बताता हूँ। ध्यान देकर श्रवण करो। जिस देह के कारण
संसार का भाव बढ़ता है, उसी देह के कारण संसार का ही अभाव हो जाता है, हाँ अन्धकार का अवश्य त्याग
करना चाहिये। पूर्व के ज्ञानसम्पन्न साधु देहाभिमान छोड़ने के लिये नित्य जागरूक रहकर मत्स्वरूप प्राप्त कर
ब्रह्मस्वरूप हो गये। "नरदेह से ब्रह्मप्राप्ति होती है तो फिर पहले विषयभोगों का उपभोग कर फिर ब्रह्मप्राप्ति
करूँगा" ऐसा शायद तुम कहोगे। लेकिन ऐसा विश्वास मन में रखने से अपना ही नुकसान होगा। क्योंकि, देह
के ही साथ मृत्यु पीछा करती रहती है। हरिहर भी उसे नहीं टाल सकते। सारांश, देह की मृत्यु अटल है। वह
कब आयेगी, मालूम नहीं होगा। इसलिये उसके आने से पहले अपना स्वार्थ साध लेना चाहिये। अपने देह पर
यदि हम लुब्ध हो गये तो यम अचानक उस पर हमला करता है और उसमें हमारा स्वार्थ डूब जाता है। इस
सम्बन्ध का निर्णय श्रीकृष्ण बताते हैं।

५२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्।
खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः ॥ १५॥
किसी वृक्ष की चोटी पर कोई पक्षी घोंसला बना कर रहता है और कोई निर्दय व्यक्ति उस वृक्ष की जड़
काटने लगता है। यदि वह पक्षी यह देखकर अपने घोंसले से पलायन करता है तभी उसका कल्याण होता है।
यदि वह वहीं रह गया तो उसकी मृत्यु निश्चित है। उस वृक्ष की ही तरह देह का मरण भी अटल है, उसमें जीव
रहता है तो उसे भयंकर दुःख भोगना पड़ता है, वह कभी नहीं टलता।
अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।
मुक्तसङ्गः परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति ॥ १६ ॥
रात-दिन आयु कम होती रहती है। कलिकाल का वेग तो भयंकर रहता है। यह एक नित्य नया रोग शरीर
में लगा हुआ है। काल कालमान के अनुसार आयु का क्षय करता रहता है। इसी में आयुष्य का विनाश होता है,
यह ध्यान में रखकर और नरदेह का कभी भी पतन होगा यह जानकर जो घरबार के प्रति उदासीन होता है वह
देह की क्षणभंगुरता जानकर देहाभिमान छोड़कर भक्तिज्ञान प्राप्त करने के प्रति अत्यन्त जागृत रहता है। यदि
देहाभिमान नहीं छोड़ा तो मृत्यु कभी भी शरीर पर आक्रमण करेगा इस भय से उसका शरीर काँप उठता है और
वह पूर्ण वैराग्य धारण करता है। वैराग्ययुक्त भक्ति करने से देहाभिमान की निवृत्ति होती है। तब ज्ञान सम्पत्ति घर
में प्रवेश करती है और चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। इस प्रकार निजात्मप्राप्ति होने पर प्रवृत्ति अपने
आप रुक जाती है और निवृत्ति की भी निवृत्ति हो जाती है और फिर संसार की अपने आप शान्ति हो जाती है।
इस प्रकार नरदेह प्राप्त कर अनेक लोगों ने आत्मानंदसुख प्राप्त किया। ऐसा होते हुए मूर्ख लोग अपना सुख नहीं
साधते, उसकी श्रीकृष्ण निंदा कर रहे हैं।
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥ १७॥
चौरासी लाख जीवयोनी हैं। इसमें मनुष्य देह के सिवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का कोई अधिकारी नहीं है।
नरदेह से मेरी प्राप्ति होती है इसलिये देह को 'आद्य' कहा गया है। इसकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। बड़े भाग्य
से नरदेह प्राप्त होता है। सुदृढ़ अर्थात् सभी अवयवों से युक्त, कहीं कोई व्यंग्य नहीं, न बहरा, न अन्धा, न पंगु,
न गूँगा, इस प्रकार सर्वांग से सम्पूर्ण और यह सब भरतखण्ड में प्राप्त होना, अत्यन्त भाग्य का लक्षण है और
तिस पर यदि अंतःकरण में परमार्थ के बारे में विवेक है तो मैं परमात्मा उसका आज्ञाधारक बन जाता हूँ। जब
स्वयं मैं ही उसका आज्ञाधारक हूँ तो बाकी देवताओं और मनुष्यों की क्या बिसात है ? लेकिन यह नरदेह पुनः
प्राप्त नहीं होगा। पुण्य और पाप का पलड़ा जब बराबर रहता है तभी नरदेह प्राप्त होता है, यह ध्यान में रखो।
ऐसा नरदेह ही पुनः मिलेगा यह नाप कर कोई कर्माचरण नहीं कर सकता। पुण्य अधिक हो जाय तो स्वर्ग
भोगना आवश्यक हो जाता है और पापों का पलड़ा भारी हो जाय तो नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार कर्म
की गति अत्यन्त गहन है। उसमें काकतालीय न्याय से ही संसाररूपी भवसागर पार करने के लिये नरदेहरूपी
जहाज अपने भाग्य से मिलता है। 'सुलभ' अर्थात् अविकल, और 'सुकल्प' अर्थात् विचारशील को उस पार ले
जाने वाला नाविक केवल गुरु ही है। गुरु मंत्र कान में देता है इसलिये उसे 'कर्णधार' कहते हैं। भक्तों का
उद्धार कान पकड़कर करने के कारण गुरु सभी दृष्टियों से 'कर्णधार' है। संसाररूपी सागर में नरदेह ही जहाज

बीसवाँ अध्याय ५२९
है। वहाँ सद्गुरु ही नाविक है। जहाज को उस पार पहुँचाने के लिये मैं श्रीहरि अनुकूल बहने वाली वायु हूँ।
'गुरु कर्णधार की कुशलता का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? भँवरे, प्रपात, पानी की तेज धारा, विकल्प के
कल्लोल आदि से बचाकर वह अपनी नौका को आगे बढ़ाता है। विवेक का पतवार लगाकर कर्माकर्म का जल
प्रवाह काटा जाता है और भजनरूप मस्तूल के बल पर नौका धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती है। कामक्रोध की
बड़ी-बड़ी मछलियाँ चारे की खोज में छिपी बैठी रहती हैं, उस पर शान्ति का जाल डालकर वह अपना जहाज
बड़ी कुशलता से आगे बढ़ाता रहता है। सह में सारूप्य की गोदी आती है, तो वहाँ नाव में गजर होने लगता है।
अनाहत के ध्वज फहराते हैं, जय-जयकार की गर्जना होने लगती है। सलोकता के बाजार में जाने पर जहाज
कहीं उलट न जाय अथवा समीप के मार्ग पर ले जाने पर कहीं दोनों ओर से डगमगा न उठे इसलिये जहाज
को सरूपता की गोदी में ही स्थिर किया जाय ऐसा विचार मन में आता है लेकिन वहाँ बहुत भीड़ रहती है
इसलिये सारी बातों का विचार कर जहाज को सायुज्य गोदी में ले जाते हैं। वहाँ धार्मिक लोगों की निर्मल
धर्मपेठ (बाजार) ही लगी रहती है। न शोरगुल है न झगड़ा-टंटा है। सभी सामान निर्मल है। जो माल चाहे
एकसाथ ले सकते हैं। ऐसा यह नरदेह का दुर्लभ जहाज है तथा श्रीगुरुरूप से मैं ही उसका कर्णधार अर्थात्
नाविक हूँ। इस जहाज के सहारे जो भवसागर को पार नहीं करेगा, उस पुरुष को आत्मघाती समझना चाहिये।
यदि आगे जाकर नरक यातना भोगने के लिये ही यह देह विषयों में खर्च किया तो वह अपने ही हाथ से सीने
में शस्त्र घुसेड़ने जैसी बात होगी। उस पार जाना आवश्यक है इसलिये नौका तोड़कर उस पर चना भूज कर
खाये अथवा बुद्धिमान लोग जाड़े के भय से ओढ़ना जला कर उस आग से तापें, उसी प्रकार यहाँ होता है।
लोग व्यर्थ ही नरदेह को खो देते हैं। आगे दुःख के दुर्धर पर्वत आ जाते हैं। सचमुच, सभी योनियों में
विषयासक्ति सभी को लगी है। नरदेह में भी विषय सम्बन्ध से वैसी ही स्थिति रही तो उसके मुँह में मिट्टी ही
पड़ेगी। ऐसा श्रेष्ठ नरशरीर प्राप्त होने पर भी जो संसार के उस पार नहीं जायेगा, वह उद्धव! सचमुच
आत्मघाती पुरुष ही होगा। सहस्रों ब्रह्महत्या अथवा गोहत्या करने पर भी शास्त्रों में प्रायश्चित्त का विधान है,
लेकिन जो आत्महत्या कर लेता है उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं होता क्योंकि जो आत्महत्या करके मरता
है, वह तत्काल नरक में जाता है, फिर प्रायश्चित्त करने के लिये बचा कौन? और शास्त्रार्थ भी किसे बताया
जाय ? अमृत बेच कर यदि कोई माड पिये, उसी प्रकार नरदेह प्राप्त कर विषयभोग में लिप्त रहे तो जीव का
सच्चा स्वार्थ डूबकर वह अपनी हानि कर लेता है। उत्तम शरीर प्राप्त कर विषयासक्ति के कारण अनेक लोग
डूबते हैं, ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। लेकिन ये मूर्खों की बातें रहने दो। अब वेदार्थ के अनुसार चलकर, अपने हित
पर दृष्टि रखकर सावधान रहने वाले उत्तम लोगों की पद्धति सुनो। जो स्वभाव से ही अत्यन्त विरक्त रहते हैं
उन्हें कौन-सा कर्तव्य करना चाहिये ? किस वस्तु का त्याग करें ? यही बात भगवान बताते हैं।
यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।
अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८ ॥
जो कर्म के आरम्भ में ही विरक्त रहता है, फल की आशा जिसके चित्त को स्पर्श नहीं करती; मोक्ष
मिलने की इच्छा का जिसे स्मरण नहीं होता, वैराग्य की दृष्टि कठोर होने के कारण जो इन्द्रियों को विषय की
बात भी नहीं करने देता, इतना कठोर मनोनिग्रह होता है उसका। वह धारणा निग्रह दृढ़ रखता है। श्रवण और
मनन कर मेरे स्वरूप का अनुसन्धान करता है। अखण्ड मेरा ही ध्यान करता है। मन को तिलभर के लिये भी
ढलने नहीं देता। धारण के बल से आत्मस्वरूप में मन स्थिर रखता है, जरा भी नहीं ढलने देता। निजबोध से

५३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसे निश्चल रखता है। लेकिन मन आत्मस्वरूप में किस प्रकार निश्चल होता है? उसका उपाय भी श्रीकृष्ण
बता रहे हैं।
धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम्।
अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥१९॥
आत्मस्वरूप में ही ध्यान केन्द्रित कर बैठने से यदि मन स्थिर न रह पाये, अपने चंचल स्वभाव के कारण
वह अपना गुण न छोड़े, अथवा साधक आलस्य के कारण विकल हो जाय या विषयों के सुख का स्मरण करने
लगे, तो उससे मन अपने चंचल स्वभाव के कारण स्वरूप में से पलायित हो जाता है। ऐसी अवस्था में अपना
आसन अटल कर, स्वयं सावधान होकर सद्गुरु के चरणों का स्मरण कर मन को स्वरूप में ही रखना चाहिये।
मन को यदि विषयदान न दिया जाय तो वह हठ से कुछ अधिक ही क्षुब्ध हो जाता है। ऐसे समय
स्वरूपानुसंधान न छोड़, उसे विधिपूर्वक दाना पानी देते रहना चाहिये। (आशंका) सर्प को अमृत पिलाने से वह
विष ही हो जाता है; उसी प्रकार मन को भी विषयसुख देने से वह पहले से भी अधिक क्षुब्ध हो उठेगा। इसलिये
मन को ऐसे विषयभोग देने चाहिये जिसके योग से वह स्वतंत्र रहे। इसी अर्थ का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण अगले
श्लोक में बताते हैं।
मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रियः।
सत्त्वसम्पन्नया बुद्ध्या मन आत्मवशं नयेत्॥२०॥
मन को स्वतंत्र न छोड़, स्वरूपानुसंधान न छोड़ अन्न, पानी और निद्रा ये विषय मन को देना अपने हित
में रहता है। साधक भले ही साधन के द्वारा इन्द्रियों को और प्राणों को जीत ले लेकिन मन को उसे स्वतंत्र नहीं
छोड़ना चाहिये। उसे स्वरूप में ही स्थिर रखना चाहिये। जो मन पर विश्वास करता है उसे कामक्रोध कहीं का
नहीं छोड़ते; संकल्पविकल्प उसे लूट लेते हैं और महामोह ग्रस लेता है। मन का बल बहुत बड़ा है यह ध्यान
में रखकर उसके पैर में विवेक की सिकड़ी बाँध देनी चाहिये। मन और विवेक इन दोनों का ऐक्य होते ही
बुद्धि सत्त्वगुण से युक्त होकर विषय की जड़ ही उखाड़ देती है और विकारयुक्त उपाधि तोड़ देती है। मन
जिधर-जिधर भागने का प्रयास करता है, उधर-उधर विवेक उसका पीछा करता रहता है और फिर वह
सात्त्विक बुद्धि के सहारे मन के पैर ही तोड़ देता है। इस प्रकार मन का बल टूट जाने पर जिस प्रकार पानी का
प्रवाह नदी के जल में ही रहता है, उसी प्रकार मन भी स्थिर रहता है। इस प्रकार जब मन स्वयं ही स्वरूप में
शान्त हो जाता है, तभी योग श्रेष्ठ होने के कारण उसके योग से जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है।
जीव और परमात्मा में ऐक्य स्थापित करना यही वास्तव में 'श्रेष्ठ योग' है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण
अश्व के दृष्टांत से करते हैं।
एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।
हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवाव॑तो मुहुः॥२१॥
अश्व पर जीन चढ़ाये बिना घुड़सवार जिस प्रकार घोड़े को अपने हुक्म से वश में करता है, उसके पृष्ठ
भाग पर चाबुक मारता है, जहाँ पैर सँभाल कर चलता है तो वह उसे पुचकारता है। लेकिन जहाँ उसका पैर
गलत पड़ता है वहाँ उसके मर्म पर चाबुक मारता है। यदि अश्व हठ के कारण अपनी आदत नहीं छोड़ता तो वह
उसे थोड़ी छूट दे देता है लेकिन उसे पूरी तरह खुला नहीं छोड़ता और न उसे पीड़ा ही देता है। इस प्रकार वह

बीसवाँ अध्याय ५३१
अश्व को अपने वश में करता है। अपने वश में रखने की मालिक की इच्छा अश्व जानता है और घोड़े का मन
एक होने पर घोड़ा भी बिना लगाम के मालिक की आज्ञा से काम करने लगता है। अड़ना, उछलना-कूदना वह
छोड़ देता है और मालिक की मर्जी से उसकी इच्छा के अनुसार नाचने लगता है। इसी प्रकार मन का भी नियंत्रण
करना चाहिये। मुख्यतः हमें अपने मन पर विजय प्राप्त करनी चाहिये, यही परमयोग का साधन है। यही मैंने
तुम्हें पिछले श्लोक में बताया है। 'नृदेहमाद्यं' इस श्लोक के अन्त में कर्मवैराग्य के द्वारा मुक्ति मिलने की बात
कही थी। अब इस श्लोक में, उत्तम गति अभ्यास से ही प्राप्त होती है यह बताया है। लेकिन मुख्यरूप से
सांख्ययोग से ही मेरी प्राप्ति होती है, यही बात मैं तुम्हें बताने वाला हूँ। उसका सारांश यही है कि संसार की
स्फूर्ति मिथ्या है और ब्रह्मसाक्षात्कार ही सत्य है। यह निरूपण गहन ज्ञानात्मक है। फिर भी वह गुह्यज्ञान मैं तुम्हें
बताऊँगा। वह त्रिगुण में विद्यमान होते हुए भी गुणकार्य से अलिप्त रहता है। मैं तुम्हें गुह्यज्ञान बताऊँगा यह
सुनकर उद्धव स्वयं कान बन गया और श्रवण करने के लिये अत्यन्त सावधान होकर बैठ गया। उद्धव की यह
आतुरता देखकर व्याकुल चित्तरूपी चकोर को तृप्त करने वाला चन्द्रमा तथा आत्मज्ञानरूपी गुणों के समुद्र
यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने क्या कहा ?
सांख्येन सर्वभावानां पतिलोमानुलोमतः।
भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत् प्रसीदति ॥ २२ ॥
सृष्टि के प्रारम्भ में जो अलिप्त रहता है और सृष्टि की स्थिति में महत्तत्त्वादिकों से लेकर देह तक व्याप्त
रहने वाला जो तत्त्व होता है, वह ब्रह्म है। सृष्टि की विशेष स्थिति में गुणकार्य को वही प्रकाशित करता है,
अन्त में गुणकार्य को ग्रस लेता है और अवशेष भी वही रहता है। अलंकार बनवाने से पहले भी वह सुवर्ण
रहता है, अलंकार बनवाने पर भी उसका सुवर्ण वाला गुण कम नहीं होता और अलंकार तुड़वाने पर भी सुवर्ण
को कोई भय नहीं है। बादल आने के पहले आकाश शुद्ध रहता है और बादलों के भीतर, बाहर भी आकाश ही
रहता है। उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय इनके अन्त में परब्रह्म अलिप्त स्थिति में एकत्र रहता है।
उद्धव ! उससे सम्बन्धित विचार भी तुम्हें सुनाऊँगा। कुम्हार जो भी बर्तन तैयार करता है उसमें मृत्तिका व्याप्त
रहती है, उसी प्रकार जो-जो तत्त्व उत्पन्न होता है, वह सब परब्रह्म से व्याप्त रहता है। समुद्र में जो लहर उत्पन्न
होती है, उसमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, उसी प्रकार महत्तत्त्व से देह तक भीतर-बाहर केवल चित्तस्वरूप
ही रहता है अथवा जो भी पदार्थ उत्पन्न होता है, वह निश्चय ही आकाश से ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार जो
भी तत्त्व उत्पन्न होता है, वह चैतन्यरूप से ही व्याप्त रहता है। इस प्रकार परब्रह्म से अलग कुछ भी नहीं
दिखायी देता। उसी प्रकार पृथ्वी से प्रकृति तक लय देखें तो जिस प्रकार जल का प्रवाह जल में ही रहता है,
उसी प्रकार सारे तत्त्वों की लय भी उस चित्स्वरूप में ही रहती है। प्रकृति आदि तत्त्व प्रबल होते हैं जो विकार
के कारण विलीन हो जाते हैं। परन्तु परब्रह्म वस्तु अलिप्त अवस्था में उसी प्रकार विद्यमान रहती है। उद्धव !
सारांश यही है कि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होने पर भी परब्रह्म अविनाशी होते हुए अलिप्त ही रहता है। वह
नित्य शुद्ध-बद्ध-मुक्त स्वभाव का ही रहता है इसे ध्यान में रखो। जहाँ ऐसा परब्रह्म है वहाँ संसार की कल्पना
ही मिथ्या है। जिस प्रकार भ्रमित मनुष्य रस्सी को सर्प समझ कर व्यर्थ ही काँप उठता है, उस सर्प को बाहर
फेंक कर रस्सी को शुद्ध नहीं कर लेता, उसी प्रकार चारों ओर परमानन्द ही भरा हुआ है ऐसा श्रीकृष्ण ने
कहा। ऐसी वस्तु जहाँ है वहाँ मन भी अपना मन भूल जाता है और इसी साधन से साधक भी पूरी तरह

५३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। अब यह श्रेष्ठ किन्तु कठिन साधन जिससे नहीं होगा, उसका मन निश्चल होने के
लिये भगवन् एक अन्य साधन बताते हैं।
निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिनः।
मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३॥
जन्म-मरण के भयंकर भँवर में गोते लगाते हुए साधक वैराग्य से अत्यन्त संतप्त होता है इसलिये विष
मिलाये हुए पकवान की तरह उसे विषय में विरक्ति प्राप्त होती है। खुशबूदार अमृतफल हो और उस पर सर्प
जहर उगल दे, उसी प्रकार सभी विषयों में उसे अत्यन्त बाधा दिखाई देती है। ऐसे विवेक से जो विवेकशील
हुआ है; साथ ही श्रद्धायुक्त गुरुभक्त, गुरु ने बताया हुआ अर्थ जो हृदय से नहीं भूलता, गुरु के उपदेश को सदा
हृदय में धारण करता है और मन में जिस अर्थ का विचार किया है उसी अर्थ का पुनः पुनः मनन करता है।
प्रत्यगात्मा का अखण्ड चिन्तन करने से मन संकल्प विकल्प छोड़ देता है। फिर वह स्वयं देहाभिमान छोड़ कर
स्वयं ब्रह्मसम्पन्न हो जाता है। ऐसे ब्रह्मसम्पन्न होने पर मन स्वरूप में लीन हो जाता है। इस एक उपाय को भी
ध्यान में रखो। लेकिन यदि यह भी न हो सके तो एक और उपाय बताता हूँ, सुनो।
यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।
ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४॥
सारे विषय भोग छोड़कर यमनियमों के साथ योगमार्ग का आश्रय करें। अच्छी तरह आसन पर बैठकर
(गुदस्थान की ओर के) 'मूलाधार' चक्र पर दृष्टि केन्द्रित कर मुद्रा साधें। उस समय अपानवायु ऊर्ध्वमुख से
(लिंगस्थान की ओर के) 'स्वाधिष्ठान' चक्र तक पहुँचने तक बढ़ता जाता है और प्राणवायु प्राणायाम से अटक
कर पुनः नाभिस्थान की ओर लौट जाता है। तब प्राण और अपान ये दोनों जब सम हो जाते हैं तो स्वयं वायु
शरीर का मलक्षालन कर पिण्ड ब्रह्माण्ड की शुद्धि करती है। कफ और पित्त दोनों को खाकर नाड़ी का शोधन
कराती है। पुराने मल संचित रहते हैं, उन्हें भी तत्काल नष्ट कर डालता है। वायु का सामर्थ्य बहुत अधिक और
विलक्षण है। वह पिण्डों के और ब्रह्माण्ड के सारे मल साफ कर निर्मल कर देता है। इतनी पवित्रता केवल इस
महायोग से होती है। लेकिन उस समय अनेक रोग प्रकट हो जाते हैं। बड़े-बड़े विघ्न आ जाते हैं। नाना विकल्प
मन में उभरते हैं और सिद्धियों को लूटना चाहते हैं। उद्धव! इतने विघ्न सिर पर आ जाए तो साधक यदि धैर्य
नहीं खोता, तभी प्राणापान सम होगा यह ध्यान में रखो। प्राणापान का मिलन होने पर 'कुण्डलिनी' शक्ति जागृत
होती है और वह उन प्राणापान को लेकर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है। वह असाधारण आदि शक्ति पश्चिम
का बड़ा घाट (मेरुदण्ड) चढ़ने लगती है। वहाँ के षडचक्रों का कोलाहल समाप्त कर वायु पहले से ही उसका
मार्ग समतल कर देती है। उस मार्ग से जब कुण्डलिनी जाने लगती है तो आधिव्याधि की लहरें बंद हो जाती हैं।
विकल्प की राहें बन्द हो जाती हैं और बड़े-बड़े विघ्नों की झड़ी भी बाधा नहीं पहुँचाती। उल्हाट शक्ति की बाट
लाँघ कर आगे बढ़ने पर ब्रह्मरन्ध्र का द्वार खुलता है और सहस्रदल कमलों में से अत्यन्त शुद्ध और मधुर
चन्द्रामृत के झरने बहने लगते हैं। कुण्डलिनी बाला उसका प्राशन कर, सन्तोष से गरल निकाल देती है। इससे
शरीर पर तेज उभरने लगता है जिससे देहभाव बदलने लगता है। कला शरीराकार में उलीची जाने के कारण
उसका शरीर अत्यन्त सोज्ज्वल दिखायी देने लगता है इतना कि वह ब्रह्मरस का पुतला प्रतीत होने लगता है या
कि जैसे ब्रह्मसुख की कली खिली हो। उसके अवयवों का क्या वर्णन किया जाय? जीव का जीवन खिल जाए

या ब्रह्मविद्या पर फल लग जाए अथवा चैतन्य को अंकुर फूटे इस प्रकार अवयव शोभित होने लगते हैं। देह के
सूक्ष्मत्व के कारण वह संसार की आँखों में समा जाता है और जीव में संचार कर वह अपने स्वभाव के अनुसार
विचरण कर सकता है। वह वायु की सीढ़ी बनाकर सुख से गगन पर विचरण करता है। इसी को सिद्ध पुरुष
'परम खेचरी' मुद्रा कहते हैं। उसके शरीर की दीप्ति से सूर्य भी जुगनू की तरह दिखायी देने लगता है। अमरपति
इन्द्र चन्द्र भी उसके चरणामृत की इच्छा करते हैं। वह औट पीठ गोल्हार लाँघ कर, भ्रमरगुंफा के अन्त तक
जाकर, सोहंहंस का पीठ भेद कर परमात्मा के रूप में प्रकट होकर बैठ जाता है। इस अभ्यास के कारण यह योग
बहुत कठिन है। बहुत कम लोग ही इसे साध पाते हैं। यह मार्ग अत्यन्त कठिन है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण भी कहते
हैं। अगर यह मार्ग उन्हें स्वीकार्य होता तो वे दूसरा साधन बताते ही नहीं। मूल श्लोक देखने से सज्जन लोग
समझ जायेंगे। सुनने में यह अच्छा लगता है लेकिन करते समय कलेजा फट जाता है। कोई साधु कितना ही हठ
क्यों न करे लेकिन उससे यह साधन नहीं सधता। बड़े-बड़े देवतागण और साधु भी इसमें फँस गये हैं। इस
कठिन साधन को छोड़िये। तुम्हें मैं एक दूसरा साधन बताता हूँ। वह है 'आन्वीक्षिकी' विद्या ! इसमें 'त्वंपद-
शोधन' का विवेक है। पंचभूतात्मक तत्त्वों का गोलक तत्पद से भिन्न है। वह सर्वव्यापक से बच कर कहीं एक
देशी बन कर रहा है। अनादि माया के प्रवाह के कारण तन्मात्रारूप विषय की संगत से, मन के संकल्प के बिना
उसने अपने को भिन्न माना है। भेद मन ने माना है, इसलिये उसे ही अभेद का उपदेश करें। इसी अर्थ का विवेक
स्वयं श्रीकृष्ण विशद करके बताते हैं। शरीर पंचभूतात्मक है यह सत्य है लेकिन उसमें की 'पृथ्वी' पानी में घुल
जाती है। पृथ्वी में 'गंध' जल में भर कर पृथ्वी ही निःशेष हो जाती है। जल के 'जलरस' का जब 'अग्नि'
शोषण कर लेता है, तब जल का ह्रास होता है। इससे तेजतत्त्व निःशेष हो जाता है। लेकिन 'वायु' का प्रताप उस
'तेज' और उसके कारण 'रूप' को ग्रस लेता है। वायु का झोंका लगते ही तेज का स्वरूप भी मलिन हो जाता
है। इस वायु का 'स्पर्श गुण' जब गगन ले जाता है तो वायु का भी भान नहीं रहता। 'वायु' आकाश में लीन हो
जाता है और केवल आकाश ही शेष रहता है। अकेले आकाश का कोई रूप ही नहीं रहता। वह गुणकार्यों के
साथ अहंकार में प्रवेश करता है, अहंकार माया में प्रवेश करता है और माया परमेश्वर में लीन होने पर मिथ्या हो
जाती है। रात अपनी प्रौढ़ता से अन्धकार फैलाती है तब सहस्रों नक्षत्र और जुगनूं अपने-अपने तेज से आकाश में
चमकने लगते हैं। लेकिन वह रात जब सूर्य के सामने आती है तो अपने कार्य के साथ अदृश्य हो जाती है। आगे
पीछे देखने पर कोई भी नहीं दिखाई देता। उसी प्रकार परमेश्वर के सामने माया अपने कार्यकारण के साथ लुप्त
हो जाती है। मिथ्या ही होने के कारण उसका कोई स्वरूप शेष नहीं रह जाता है। उसका अस्तित्व ही नहीं रह
जाता। माया प्रतिबिम्बित चैतन्य को 'जीव' यह नाम प्राप्त होता है। जब माया ही नष्ट हो जाती है तो जीवत्व भी
नष्ट हो जाता है। जीवशिव का भान नहीं रहता। मन का अपनापन उड़ जाता है, चारों ओर चैतन्य ही भर जाता
है और साधनों को अत्यन्त समाधान होता है। इस प्रकार त्वंपद का शोधन करने से तत्पद में समाधान होता है।
इसका नाम 'आन्वीक्षिकी विद्या' है। यह विवेकी लोगों को ही साध्य होती है। अब न योगसाधन की
आवश्यकता है और न त्वंपद के शोधन की। मैं तुम्हें इससे भी सुलभ अन्य साधन बताता हूँ। इसमें कष्ट तो
बहुत कम है लेकिन योग का सारा फल जुड़ता है। त्वंपद शोधन उसके आगे लाचार होकर बैठ जाता है। वह
क्या है ? वह है मेरी भक्ति । मेरी रामकृष्णदि जो मूर्तियाँ हैं उनकी अत्यन्त प्रेमपूर्वक पूजा करने से मैं श्रीपति
अत्यन्त सन्तुष्ट होता हूँ। मेरा गुणानुवाद सुनें, मेरा कीर्तन करें, मेरा नामस्मरण करें, मेरा ही ध्यान, मेरा ही भजन
इस प्रकार सदासर्वदा मेरा ही चिन्तन करते रहें। अंतःकरण में सदा मेरा ही ध्यान, मुख से मेरा ही नाम और मेरा

५३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही स्तवन, कान में मेरी ही कथा और मेरा ही कीर्तन और हाथों से सदासर्वदा मेरा ही पूजन। पैरों से प्रदक्षिणा
करें अथवा यात्रा पर जायें। अष्टांगों ने सर्वकाल मुझे ही नमन करें। इस प्रकार अनन्य भाव से मेरा भजन कर,
मेरी ही भक्ति में लीन रहना। इस प्रकार जो मेरी भक्ति में निमग्न रहते हैं, उनका मैं चक्रपाणी दास बन जाता हूँ।
त्रिभुवन में उसके सिवा मैं किसी को नहीं चाहता। इस प्रकार मेरा भजन करने पर योग आदि का स्मरण भी
आवश्यक नहीं है। उद्धव ! मैं श्रीकृष्ण भक्ति के सिवा और किसी भी वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकता। अस्तु !
संयोग से यदि योगयों के हाथ से पाप हो जाय तो उसे कर्मप्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं है। यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदि कुर्यात् प्रमादेन, योगी कर्म विगर्हितम्।
योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन ॥ २५॥
भक्त से हाथ से निंद्य कर्म होता नहीं है क्योंकि उसके आगे-पीछे उसकी सुरक्षा के लिये मैं रहता हूँ। तब
वह निंद्यकर्म योग के जिम्मे आता है। योग में कभी गलती से ऐसा घट जाता है। इस प्रकार गलती से जो पातक
होता है उसके लिये उसे अत्यन्त पश्चात्ताप होता है। जिस प्रकार अग्नि से सर्प डरता है उसी प्रकार वह पातक से
डरता रहता है। सिंह पर मधुमक्खी बैठने पर वह जिस प्रकार अंग झाड़ता है, उसी प्रकार योगी भी पातक को
देखकर अनुताप करता रहता है। ऐसे समय उसे सावधान होकर योगबल से ही सारे पातकों का क्षालन करना
चाहिये। यही योगी का प्रायश्चित्त है। यदि इस योगस्थिति को छोड़ वह देह में गोबर माटी लगाने दौड़े तो वह
निश्चय ही लुट जायेगा। इससे पापों का क्षालन नहीं होगा। यदि हृदय में अनुताप नहीं हुआ है और शास्त्रों के
वचन के अनुसार यदि दिखावे के लिये गोबर माटी लगाता है तो उससे पापों की निवृत्ति नहीं होगी। आधा क्षण
भी मेरा ध्यान करने से करोड़ों पातक भस्म हो जाते हैं फिर औरों की क्या कथा की जाय ? ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण
कहते हैं। जिसका अधिकार मुझे ध्यान करने के लिये उपयुक्त है उसे दूसरा कोई प्रायश्चित्त करने के लिये कहने
से कहने वाले को ही दोष लगेगा। इसलिये यहाँ मुख्य रूप से अधिकार ही प्रमाण है। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः ।
गुणदोषविधानेन सङ्गानां त्याजनेच्छया ॥ २६ ॥
मनुष्य की स्वभाव से ही विषय में प्रवृत्ति रहती है। उसकी निवृत्ति करने के लिये ही मेरी वेदोक्ति प्रकट
हुई है। विषयों का एकाएक त्याग करने में लोग असमर्थ रहते हैं, उन्हें विषय छोड़ने के लिये ही वेद उसके
गुणदोष दिखा देता है। यह माँ है, यह बहन है इनसे व्यभिचार नहीं करना चाहिये यह बात यदि वेद ने नहीं
बतायी होती तो विषयों के सम्बन्ध में चाहे जैसा व्यवहार हुआ होता। जब तक समाज में स्त्री-पुरुष हैं, तब
तक कामसंचार तो होगा ही इसलिये मैंने यदि वेदोक्ति से नियम न बना दिये होते तो भीषण व्यभिचार मच
गया होता। इसलिये और सारी स्त्रियों को छोड़कर अन्य वर्गों को छोड़कर आठ वर्ष की अपनी ही जाति की
स्त्री को विवाह योग्य समझना चाहिये। अग्नि और ब्राह्मण की साक्षि में वेदोक्त रीति से पाणिग्रहण करें तथा
अन्य स्त्रियों की आन लेकर यथाविधि स्वपत्नी से ही रममाण हों। इस प्रकार सभी लोगों को स्त्रीभोगों के प्रति
अत्यन्त आसक्त देखकर वेदोक्ति ने स्वदारागमन को ही सबसे योग्य निश्चित कर पुरुष को एकनिष्ठ बना दिया