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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 869 में से

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पृष्ठ 539

बीसवाँ अध्याय ५२३
ज्ञान के बिना हाथ नहीं लगेगा। वेद में बताये गये कर्म त्याग का विधि किये बिना यदि उन्मत्त होकर कर्म का
त्याग कर दिया जाय तो मोक्ष तो मिलने से रहा, उलटे पाखण्ड ही हाथ लगेगा। इसलिये वेदों में बतायी गयी
विधि के ही अनुसार कर्मत्याग करने से वेद का बन्धन नहीं पड़ेगा ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह भी ठीक नहीं है
क्योंकि गुरुवाक्य श्रवण करने के लिये संन्यास लेना पड़ता है उस श्रवण का भी विधि विधान है। गुरुमुख से
महावाक्य श्रवण करना यह भी वेदार्थ है। (आशंका) अब देव तथा पितरों के लिये यदि यज्ञ करें तो शायद वे
भी प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करें; लेकिन वह भी वेद के बिना सम्भव नहीं है। स्वाहाकार से देवता तृप्त होते हैं
और स्वधाकार से पितर तृप्त होते हैं। सारांश, वेदविधि के बिना देवता अथवा पितर कोई भी प्रसन्न नहीं होगा।
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुस्तवेश्वर।
श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि॥ ४॥
मिथ्यारूप यह स्थावर और जंगम संसार, तथा देवता मनुष्य और पितर इन सबका दर्शन वेद ही कराता है,
और वे पूज्य तथा महान हैं यह भी प्रतिपादित करता है। लेकिन उनमें भी परस्पर अत्यन्त विरुद्ध, उत्तम, मध्यम
और कनिष्ठ इस प्रकार के तीन भेद करने का प्रयास भी वेदों का ही है। इस प्रकार गुण-दोषों के लक्षणों का
विस्तार भी तुमने ही किया है। तुम्हारे ऐसे उल्टे-सीधे भाषण से तुम्हारी बातों में ही विरोध उत्पन्न होता है और
इसी कारण गुण-दोषों का प्रकार बढ़कर उसकी बाधा का तत्काल अनुभव होता है। उसमें एक स्वर्ग, एक नरक,
यह मोक्ष, यह मोक्ष, यह बन्धन जैसे वेदवचन सुनाकर तुमने ही लोगों को भ्रमित करके रखा है। पहले लोगों के
मन में गुण दोषों की बात ही नहीं थी लेकिन तुम्हारे वेदवचन के कारण गुणदोषों में दृष्टि दृढ़ हो गयी। सारांश,
तुम्हारे इस भाषण से लोगों का नुकसान ही हुआ है। दारुण नरक भोगने के लिये तुम्हारी यह भ्रमित करने वाली
वेदोक्ति ही कारण है।
गुणदोषभिदा दृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वतः।
निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रमः ॥ ५॥
सारांश अनेक गुणदोषों की दृष्टि की सृष्टि तुम्हारे वेदों ने ही की है। अन्यथा लोगों के मन में गुणदोषों की
बात बिलकुल नहीं थी। तुम्हारी वेदाज्ञा के अनुसार ही ये गुणदोष उत्पन्न होने के कारण वे अब जोरजबरदस्ती से
भी उनके चित्त से निकल नहीं पायेंगे। वेद अनादि हैं तथा प्रामाणिक हैं यह तुम्हारा ही वेदवचन है। इसलिये
अब गुणदोष न देखने का तुम्हारा भाषण स्वीकार्य नहीं है। इसलिये हे कृपामूर्ति, यह भ्रम समाप्त कर दो। उद्धव
का यह भाषण सुनकर श्रीकृष्ण ने क्या कहा ? उद्धव की यह विनती सुनकर, तीन योगों की उपपत्ति अर्थात्
अधिकार भेद के अनुसार वेदार्थ की प्राप्ति कैसे होती है, यह स्वयं श्रीकृष्ण बताने लगे।
श्रीभगवानुवाच
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥ ६॥
मेघगर्जना हो रही हो ऐसी गम्भीर वाणी में भगवान बोले, मेरी पूर्ण कृपा के बिना मेरी वेदवाणी समझ में
नहीं आती। वेदशास्त्र में कितने ही निष्णात क्यों न हो जाए लेकिन बिना मेरे प्रसाद के वेद का अर्थ समझ में
नहीं आयेगा। ब्रह्मदेव चार मुख से वेद पढ़ता है लेकिन जब उसे भी वेदार्थ का सच्चा रहस्य समझ में नहीं आता,