श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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होती है; अशौच से ही देह की वृद्धि होती है और अशौच में ही देह का निधन होता है। इस प्रकार देह के पास
ही अशौच की बस्ती होती है। ऐसे इस देह का स्वरूप देखें तो अस्थि, चर्म, विष्ठा और मूत्र। ऐसे ही देह को जो
'मैं' कहकर अभिमान करता है वह वास्तव में 'मूर्ख' है। देह के इसी अभिमान का नाम 'मूर्खता' है। मेरे
वेदमार्ग पर चलना ही 'सन्मार्ग' है। जिसका चित्तभ्रंश हुआ है वही गुरु और परमात्मा की निन्दा करता है। जो
वेदशास्त्र नहीं मानता वही गलत रास्ते पर गिर पड़ता है। जो ईर्ष्यावश गुरु में दोष देखता है, जो सुहृद और
सम्बन्धियों से अशिष्ट व्यवहार करता है जो माता-पिता का धिःकार करता है उसका नाम है 'चित्तविक्षेप'। जो
दूसरों का दोष गिनता है, जो दूसरों की निन्दा करता है, जो स्त्री की बात पर विश्वास करता है उसे चित्तभ्रंश का
विकार हुआ है यह मान लो। जो सन्मार्ग से भटक कर अधर्म अथवा अकर्म में पड़ता है उसे भी हे उद्धव!
चित्तभ्रंश हुआ समझ लो। मैं सचमुच परब्रह्म हूँ यह मानना ही उत्तम 'वेदमार्ग' है। यह न जानकर लालच से
व्यवहार करना ही बड़ा 'असन्मार्ग' है। अब स्वर्ग का अर्थ जिससे आत्मसुख की प्राप्ति होती है ऐसे सत्त्वगुण से
इन्द्रलोक पहुँचने का नाम स्वर्ग नहीं है क्योंकि इस प्रकार इन्द्रलोक पहुँचने वाले वापस लौट आते हैं लेकिन जो
शुद्धसत्त्व में मिल जाते हैं और निजसुख तक पहुँच जाते हैं ऐसे उस सत्त्वगुण को 'स्वर्ग' समझना चाहिये। अब
तुम्हें नरक का लक्षण बताता हूँ।
नरकस्तमउन्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे।
गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याढ्य उच्यते ॥ ४३॥
काम, क्रोध और लोभ का जो उद्रेक होता है, उससे महामोह खौल उठता है, वह ज्ञान के साथ-साथ
विवेक को भी डुबो देता है; उस समय अकेला तमोगुण ही बढ़ता रहता है। अरुणोदय के समय चारों ओर
धुँधलका ही छाया रहता है, गहरा अँधेरा रहता है और सूर्य चन्द्रमा दोनों ही दिखाई न देने के कारण दिन है या
रात है यह भी मालूम नहीं होता। इस प्रकार मन में अंधतम वृत्ति बढ़ती जाती है और क्या कर्तव्य है और क्या
अकर्तव्य है इसका भान नहीं रहता। इस प्रकार तमोगुण का जो उद्रेक होता है, उसी का नाम 'महानरक' है।
यमयातना के दुःख को नरक नहीं कहना चाहिये क्योंकि यमयातना से पाप झड़ जात' है। यमलोक के नरक
उसके सामने तुच्छ हैं। महामोह के नरक को ही महानरक समझना चाहिये। काम, क्रोध और लोभ ये तीनों ही
नरक देने वाले हैं, उसमें महामोह भी मिल जाय तो 'अंधतम' बनता है। इतना समुदाय जब एकसाथ मिलता है
तो उसे 'तमउन्नाह' कहते हैं। ऐसी स्थिति जिस पुरुष की हो जाय उसे 'नरकरूप' ही समझना चाहिये जो घोर
नरक में जाता है उसका वहाँ से उद्धार हो जाता है; लेकिन जिसे 'तमउन्नाह' प्राप्त होता है उसका महाकल्पांत में
भी उद्धार नहीं होता। ऐसे 'तमउन्नाह' की ख्याति सुनकर उद्धव का मन ऊब गया और वह मन ही मन विचार
करने लगा कि ऐसी तमोवृत्ति में डूबने वाले जीवों का कौन उद्धार करेगा? उद्धव के मन की बात जानकर
देवाधिदेव बोले, ऐसे डूबने वाले लोगों का सखा जो गुरु है, वह उद्धार करता है। अब, ऐसा गुरु कौन है? तो
नित्य जिसका पैर छूते हैं, जो चिन्मात्र ब्रह्मरूप प्राप्त कराता है, उसी को 'गुरु' कहते हैं। सचमुच, उस गुरु की
योग्यता ब्रह्मा से भी अधिक है क्योंकि ब्रह्मा केवल 'यह ब्रह्म है' इतने का ही प्रतिपादन करता है अन्यथा ब्रह्म
की बात कौन पूछता है? जो अज है, अव्यय है; उसी प्रकार अनंत, अच्छेद्य और अपरिमित है, ऐसे ब्रह्मा की
महिमा संसार में सद्गुरुओं ने ही प्रस्तुत की है। इसे सद्गुरु की कीर्ति श्रवण करने से जड़जीवों का उद्धार होता
है। 'गुरु' नाम की बहुत ख्याति है। उसे सुनकर यम और काल भी काँप उठते हैं। उस सद्गुरु की महिमा ही