श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ५१९
डूबते का उद्धार करती है और जन्म-मरण का बन्धन समाप्त कर शिष्य को समाधान देता है। शिष्य का आप्त,
सखा, बन्धु सभी सद्गुरु होते हैं यह प्रसिद्ध है। वही नरक से बचा कर परमानंद सुख प्रदान करने वाला है। अब
तुम्हें 'गृह' का लक्षण बताता हूँ। मंजिलें, अट्टालिकायें, बंगले ये सब घर नहीं हैं। बल्कि मनुष्य देह यही गृहाश्रम
है, उसमें ही मैं पुरुषोत्तम विशेष रूप से रहता हूँ। उस गृह के स्वधर्म कर्म करने से आत्माराम सन्तुष्ट होता है।
जिस नरदेह की प्राप्ति की इच्छा इन्द्रादि देवता भी करते हैं और वेद भी जिस देह की कीर्ति का वर्णन करते हैं,
उस नरदेह में ही मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिये जिसे अपना 'घर' कहते हैं उसे नरशरीर समझना चाहिये। अब
आढ्यता (घमण्ड) का भी विचार सुनो। जो ज्ञानगुण से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, जो धन कल्पांत में भी समाप्त
नहीं होता, उसी को 'आढ्य' अर्थात् श्रीमान कहना चाहिये क्योंकि और सभी धन नश्वर है। नश्वर धन की
घमण्ड निश्चित रूप से अधःपात का कारण बनती है, किन्तु ज्ञानधन की सम्पन्नता से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः।
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४४ ॥
अब दरिद्र का लक्षण सुनो। करोड़ों की सम्पत्ति पास में होने पर भी जिसका मन तृप्त नहीं होता उसी का
नाम है 'दरिद्र'। किन्तु जिसकी गाँठ में एक कौड़ी भी नहीं है किन्तु मन में संतोष है, वही संसार में 'सम्पन्न' है,
यह जान लो। पास में धन होते हुए भी जो पेट भर नहीं खाता, सदा सर्वदा मन में लालच भरी रहती है, इसी का
नाम है 'दरिद्रलक्षण'। अब इसके बाद कृपण (कंजूस) किसे कहते हैं, यह भी सुनो। जिस प्रकार राजा को
उसके सेवक बाँध कर रखें, उसी प्रकार वह इन्द्रियों के वश में रहता है। अपने स्वरूप का विचार करें तो सबके
राजा हम स्वयं हैं। यह भूलकर वह दीन होकर इन्द्रियों के अधीन हो जाता है। वास्तव में मन आत्मा का चाकर
होता है और इन्द्रियाँ मन की चाकरी करती हैं किन्तु यह उनका भी दासानुदास बनता है। इस प्रकार इन्द्रियों के
अधीन होने के कारण 'कृपणत्व' दीनता आती है। अपने चाकरों के चाकर जो इन्द्रिय हैं, उनकी यह पूजा करता
रहता है। इस प्रकार इन्द्रियों को महत्त्व देने से शरीर में 'कृपणता' आती है। अब हे उद्धव! ईश्वरत्व का
वास्तविक लक्षण बताता हूँ। उद्धव! जिसे कनक और कामिनी अच्छी नहीं लगती, वही सचमुच त्रिभुवन का
'ईश्वर' है। मेरी यह बात त्रिवार सत्य है। तुमने जितने प्रश्न पूछे थे उतने ही गुण जिसके पास होते हैं, लेकिन
जो उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार 'ईश्वर' यह नाम शोभा देता है। लेकिन उद्धव! कनक और कामिनी से
जिसे मन से आसक्ति रहती है, वह संसार का 'अनीश्वर' है इसे निश्चयपूर्वक जान लो। इस प्रकार शमादि प्रश्नों
का उत्तर मैंने बतलाया। उनके विपरीत जो लक्षण हैं, अर्थात् अशमादिक गुणों का होना, यही 'अनीश्वरत्व' है,
यह जान लो।
एत उद्धव ते प्रश्नाः सर्वे साधु निरूपिताः।
किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः ॥ ४५ ॥
उद्धव! मैंने तुम्हारे सारे प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। जिससे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त हो सके, ऐसा ही
व्याख्यान दिया। संसार में गुणदोषों की संख्या असंख्य है। कहने से कम नहीं होगी। गुणदोषों का विवेचन करना
अत्यन्त कठिन है। इसलिये मौन रहना ही अच्छा है क्योंकि गुणदोषों को न कानों से सुनना चाहिये, न आँखों से
देखना चाहिये और न मुँह से कहना चाहिये। गुणदोषों के बारे में मन में भी नहीं सोचना चाहिये। अब ब्रह्मज्ञान
के लक्षण का निरूपण बहुत अधिक नहीं है। उसे श्रीकृष्ण आधे ही श्लोक में बता रहे हैं।