श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसे स्वयं ही देता रहता हूँ। इसलिये धर्म ही इष्ट धन है। यही मेरा यथार्थ वचन है। अब 'यज्ञ' का अर्थ सुनो।
उसे भी समझाता हूँ। अग्नि मेरा मुख है और यज्ञ का भोक्ता मैं नारायण हूँ, यह जान लो। अधिक क्या कहूँ, सारा
यज्ञ ही मैं श्रीकृष्ण हूँ। इसका वेद में भी प्रमाण है। उसमें ब्राह्मण मेरा स्वरूप है। यज्ञ दीक्षा लिये हुए जो दीक्षित
ब्राह्मण हैं उन्होंने भक्तिभाव से मेरा यजन कर मेरा पूर्ण सुख प्राप्त कर लिया है। लेकिन जो अधर्म से धन एकत्र
कर, अविधि से केवल ढोंग के लिये यज्ञ करते हैं और वह याग मेरे मुँह में पड़ते हुए भी स्वयं कोरे के कोरे रह
जाते हैं। विधि से वे पशु का वध अवश्य करते हैं लेकिन उस अवदान से मैं सन्तुष्ट नहीं होता। दंभ के कारण वे
अवश्य कुंभीपाक महारौरव नरक में जाते हैं। समस्त प्राणिमात्र के मुख में जो कुछ अर्पण करना चाहिये वह मुझ
यज्ञपुरुष को ही पहुँचता है लेकिन यह दीक्षारहस्य यज्ञकर्ताओं को न मालूम होने के कारण हिंसादोष के कारण
नरक में जाते हैं। जो मेरे भक्ति भाव की दीक्षा लेकर, सारा विश्व ही मेरा मुख है यह सोचकर प्राणिमात्र के मुख
में अवदान करते हैं, उनका यज्ञ मैं अर्थात् मैं नारायण हूँ। अब 'दक्षिणा' का भी अर्थ समझ लो। यज्ञ का कोई
मोल नहीं है। उसमें ज्ञान यही अमूल्य दक्षिणा है। वह प्राप्त होते ही याज्ञिक को 'महासुख' प्राप्त होता है।
ज्ञानस्वरूप दक्षिणा मिलने पर याज्ञिक लोग अत्यन्त सम्पन्न होकर रहते हैं। वह धन कल्पांत में भी खर्च नहीं
होता। इससे जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है। सबमें प्राण अत्यन्त प्रबल है प्राण से ही सबको बल
प्राप्त होता है। प्राण के ही कारण मन चपल बनता है। प्राण के स्पंदन से ही वह अत्यन्त चपल हुआ है। प्राण
इतना बलवान है और मन निरन्तर प्राण के ही अधीन रहता है। ऐसे प्राण को जीतना, इसी का नाम 'बलवंत' है।
प्राण को बिना जीते, केवल हाथी का पैर पकड़ कर उसे फेंक देना अथवा एक घाव में सिंह को चकनाचूर कर
देना यह किसी शूर के बल का प्रमाण नहीं है क्योंकि जीव और मन दोनों प्राण के ही अधीन रहते हैं। उस प्राण
का दमन कर वह स्वयं उसे अपने नियंत्रण में रखता है, इसी का नाम है 'अतिबल' अर्थात् अपार सामर्थ्य ! जब
प्राणायाम अच्छी तरह सध जाता है तो बड़ा देवता भागा-भागा उससे मिलने आता है और जब एक बार आ जाता
है तो आलिंगन नहीं छोड़ता। प्राणायाम करने वाला संसार में इतना बलिष्ट हो जाता है।
भगो मे ऐश्वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तमः ।
विद्याऽऽत्मनि भिदावाधो जुगुप्साहीरकंर्मसु ॥ ४० ॥
उद्धव ने 'दया' किसे कहते हैं, यह प्रश्न पूछा था उसका उत्तर न देकर श्रीकृष्ण 'महद्भाग्य' का ही
निरूपण करने लगे। इसका कारण यही है कि भाग्य के बिना दया व्यर्थ है। इसलिये श्रीकृष्ण भाग्य का ही लक्षण
बताते हैं। तुम कहोगे कि एकआध कंजूस भी भाग्यवान रहता है, लेकिन वह भाग्यवान होते हुए भी अभागा है।
इसलिये जो दया का ही पोषण करता है, उसका ही भाग्य उत्तम है। उस उत्तम भाग्य का सम्पूर्ण लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। उस भाग्य की उत्कृष्टता रहस्यपूर्वक बताता हूँ, सुनो। 'ज्ञान' और 'पूर्ण वैराग्य', 'लक्ष्मी' और
'औदार्य', 'ऐश्वर्य' और 'यश' ये छह गुण ही 'महाभाग्य' है। ये षड्गुण ही मेरा भाग्य है। ऐसा भाग्य जिसे
सौभाग्य से प्राप्त होता है, वही दया का विधिपूर्वक पोषण कर सकता है। इन छह गुणों से जो परिपूर्ण रहता है,
वही 'दीनदयालु' है। वही दानसम्मान करना जानता है और दारिद्रय भी दूर कर सकता है। ऐसे भाग्यवान से भेंट
होने के लिये भी वैसा ही भाग्य चाहिये। सारांश मेरे जैसा भाग्य संसार में किसी को नहीं मिलेगा इस ऐश्वर्य से
जो सम्पन्न रहता है, वही 'दया' का मायका है। वही उसका लाड़-प्यार करता है और उसके ही कारण दया
समर्थ हो उठती है। इसीलिये भाग्य की बात बतायी। जिसके अंतःकरण में भूतदया है वह संसार में कभी अभागा