श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 541, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय ५२५
गुणदोष दिखायी देते हैं, किसी को दोनों ही नहीं दिखायी देता, इसमें मध्यम रीति में कौन रहता है, उसके भी
लक्षण सुनो। जो विषय के प्रति आसक्त रहता है वही कर्म मार्ग का अधिकारी है। उसका गुणदोषों से छुटकारा
नहीं होता। यही बात श्रीकृष्ण अगले अध्याय में बताने वाले हैं। लेकिन जो सचमुच ही विरक्त होकर ज्ञान का
अधिकारी है, वह गुणदोषों से बिलकुल विरत रहता है और उसे सारे संसार में तिलमात्र के लिये भी गुणदोष नहीं
दिखायी देता। संसार पूर्ण ब्रह्मरूप है। उसमें गुण किसके कहें और दोष किसके ? जो ऐसे सम्पन्न हैं उन्हें दोष
दिखाई ही नहीं देते। जो अत्यन्त आसक्त नहीं हैं और अत्यन्त विरक्त भी नहीं हैं ऐसे मेरे भक्त पहले गुणदोष
देखते हैं; किन्तु बाद में विवेक से उन्हें छोड़ देते हैं। मैं परमात्मा प्रत्येक प्राणी में आत्मस्वरूप में विद्यमान हूँ।
उनमें गुणदोष नहीं देखने चाहिये। ऐसे जो भजननिष्ठ राजहंस होते हैं वे गुणदोष देखना छोड़ देते हैं। मैंने वेदार्थ
में जिन गुणदोषों को बताया है, वे केवल दोषों का त्याग करने के लिये। दूसरों के दोष देखने की बात वेद में
नहीं है। वेदार्थ का श्रवण इस प्रकार करना चाहिये कि दोषों का त्याग कर केवल गुण ग्रहण किये जाएँ। जो
दूसरों के दोष देखता है वह उसके पाप का भागी होता है। जो दूसरों के दोषों का वर्णन करता है, वह उसी दोष
से नरक जाता है। अब श्रीकृष्ण कर्म का अधिकार बता रहे हैं। उस पर विचार कर कर्म का आदर करें।
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ ९ ॥
जब तक सच्ची विरक्ति उत्पन्न न हो जाय तब तक कर्म करें। एक बार विरक्ति प्राप्त होने पर स्वर्ग और
संसार दोनों ही त्याज्य हो जाते हैं। वमन किये हुए मिष्टान्न पर जिस प्रकार जिह्वा की पुनः वासना नहीं होती; उसी
प्रकार जब सचमुच ही विषयवासना के प्रति मन में घृणा उत्पन्न होती है, तब उस सम्बन्ध के विचार समूल बन्द
हो जाते हैं अथवा संयोग से मेरी कथा सुनने के प्रति आदर उत्पन्न होता है। मेरी कथा श्रवण करते समय प्रेम से
अंतःकरण भर उठता है, घरबार का विस्मरण होता है, तब कर्मत्याग की बाधा नहीं होती। मेरी कथा का श्रवण
चलता है, तभी हृदय में मेरा स्मरण भी चलता है। ऐसी अवस्था में बाधा दोष नहीं रहता। मेरी कथा श्रवण करते
समय करते समय करोड़ों कर्मों का लोप भले ही हो जाय लेकिन कर्मलोप के दोष की बाधा नहीं होती। मेरी
कथा का ऐसा प्रभाव है।
(संमति श्लोक) मत्कर्म कुर्वतां पुंसां कर्मलोपो भवेद्यदि।
तत्कर्म तेषां कुर्वन्ति तिस्रः कोट्यो महर्षयः ॥ १॥
मेरी प्रेमपूर्वक भक्ति करते समय जब मेरे भक्तों के नित्यकर्म रह जाते हैं, तब उनके वे कर्म तैंतीस करोड़
ऋषि महंत पूर्ण करते रहते हैं। मेरी कथा की ऐसी महिमा है। मेरा पूजन और कीर्तन चल रहा हो, उस समय
विघ्नों की वहाँ आने की क्या हिम्मत है ? उन्हें मुँह दिखाने का भी साहस नहीं होता अथवा जब कोई पुरुष पूर्ण
विरक्त हो जाता है अथवा मेरी सेवा में तत्पर हो जाता है, उस समय उसके स्थान पर बेचारा कर्म दास बन कर
रहता है, ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं। उद्धव ! स्वधर्म के अनुसार कर्म करने से मेरी प्राप्ति होती है। उसके
सम्बन्ध में भी तुम्हें यथार्थ रूप से बताता हूँ, सुनो।
स्वधर्मस्थो यजन् यज्ञैरनाशीःकाम उद्धव।
न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत् ॥ १०॥
उद्धव ! गृहस्थाश्रम में स्वधर्मानुरूप ही रहें, अन्य मार्ग पर नहीं चलें तो यहीं निश्चित रूप से विरक्ति प्राप्त