श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तो फिर औरों की क्या बात की जाय? यदि ब्रह्मदेव को वेद का अर्थ मालूम हुआ होता तो शंखासुर वेद क्यों ले
गये होते? ब्रह्मदेव को यदि वेदार्थ का मर्म समझ में आया होता तो वह सरस्वती की अभिलाषा न करता। अब
तुम्हें मेरे वेद का निर्धार भी बता देता हूँ। उद्धव! अच्छी तरह ध्यान देकर श्रवण करो। वेद का विचार इस प्रकार
है। मेरा वेद व्यर्थ की बकबक करना नहीं जानता। ज्ञान, भक्ति और कर्म यही तीन काण्ड वेदों ने बताये हैं। मेरे
वेदों की जो वाणी है वह इन्हीं तीन योगों का प्रतिपादन करती है। इसलिये उद्धव! मोक्ष प्राप्त करने के लिये
अन्य कोई उपाय नहीं हैं यह ध्यान में रखो। तो ये तीन योग कौन से हैं? उनके अधिकार के कौन-कौन से
विभाग हैं? यदि तुम ठीक प्रकार से पूछ रहे हो तो तुम्हें सविस्तार बताता हूँ।
निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।
तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥७॥
जो अंतःकरण से ब्रह्मलोक के भोगों से विरक्त रहते हैं, जो विधिपूर्वक तथा संकल्पयुक्त संन्यास लेकर
कर्म का त्याग करते हैं, ऐसे अधिकारियों के लिये मैंने 'ज्ञानयोग' प्रकट किया है। उस आत्मज्ञान के साधन से
मेरी मद्रूपता प्रकट होती है। अब इस लोक में जो केवल अविरक्त है, विषय के लिये कामासक्त हुए रहते हैं,
उनके लिये मैंने कर्मयोग प्रकट किया है। इस प्रकार मैंने श्रेष्ठ और कनिष्ठ इन दोनों के बारे में स्पष्ट रूप से
बताया। अब उत्कृष्ट और अलौकिक तीसरा अधिकारी है, उसके बारे में सुनो।
यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्।
न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः॥८॥
हरि की कथा सभी सुनते हैं, लेकिन मेरे प्रति उनके मन में श्रद्धा कभी नहीं उत्पन्न होती; लेकिन किसी को
कथा श्रवण से ही विलक्षण श्रद्धा उत्पन्न होती है। उस श्रद्धा का लक्षण सुनो। वह जो भी श्रवण करता रहता है
उसका अनुसंधान उसके हृदय में चलता रहता है। इससे उसका मनन भी उत्साहयुक्त प्रेम से होने लगता है। कथा
प्रेम इतना विचित्र है कि उससे मन में हर्ष उफनने लगता है और हृदय में स्वानंद की पताका फहराने लगती है।
श्रवण करने में उसकी इतनी अधिक रुचि रहती है। उसके कारण विषय दोषयुक्त दिखायी देने लगते हैं। इसमें
मुख्य रूप से स्त्री और धन यही अधिक बाधक हैं। इसलिये जिह्वा और जननेन्द्रिय पर नियन्त्रण रखना है, इसका
स्मरण रात-दिन मन में रहना चाहिये। घाव में यदि बाण का फल घुसा हो तो उसे खींच कर निकाले बिना घाव
अच्छा नहीं होता, उसी प्रकार विषयों के दोष भोग कर ही विषय कभी नष्ट नहीं होंगे। मृत्यु को सामने देखकर
मनुष्य जिस प्रकार थर-थर काँपने लगता है, उसी प्रकार विषयभोग देखकर वह (सच्चा साधक) थर-थर काँपने
लगता है। इस प्रकार वह विषयों के दोष निरन्तर देखता रहता है, लेकिन उनका त्याग करने का सामर्थ्य भी
उसमें नहीं होता। सेवक राजा को बन्दीगृह में डाल दें और भले ही वे उसे स्त्री, चन्दन आदि विलास दें लेकिन
वे उसे विषसमान लगते हैं। उन भोगों में वह उद्विग्न ही रहता है। सारांश, भोग भोगते समय वह अपने छुटकारे
की बाट जोहता रहता है। इसी प्रकार यह भी दिन-रात विषयों का भोग करते हुए ऊब जाता है। इस प्रकार जो
विषयासक्त भी नहीं है और सचमुच विरक्त भी नहीं है, ऐसी मध्यम स्थिति के व्यक्ति के ही लिये मैंने वेदमुख से
भक्तिमार्ग दिखाया है। ऐसे लोग जब मेरी भक्ति करते हैं तो उन्हें मेरे स्वरूप पर प्रेम उपजता है और अपने आप
विरक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मेरी भक्ति सिद्धि देने वाली है। मैंने स्वयं वेद में जो कहा है वे ये तीन योग ही हैं।
इन तीन योगों के योग से ही वेदवाणी का ज्ञान, कर्म तथा उपासना ये तीन विभाग बन गये हैं। इसमें किसी को