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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 869 में से

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पृष्ठ 533

उन्नीसवाँ अध्याय ५१७
नहीं रहेगा। अब 'लाभ' क्या होता है ? यह प्रश्न भी तुमने पूछा है। उसका भी लक्षण सुनो। मेरी जो उत्तम भक्ति
है, वही सम्पूर्ण 'लाभ' है। मेरी उत्तम भक्ति करने से चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। बड़े-बड़े देवतागण
भी दण्डवत करते हैं। भक्ति से मुख्य रूप से मुझ लक्ष्मीपति का लाभ होता है। यह लाभ प्राप्त न कर धन आदि
का होने वाला लाभ नरक गति देनेवाला तथा हानि प्रदान करने वाला है। इसलिये सबसे श्रेष्ठ लाभ मेरी भक्ति ही
है। क्योंकि उसके द्वारा मुझ श्रीपति का लाभ होता है। अब 'विद्या' के बारे में स्पष्टीकरण सुनो। उसे मैं यथार्थ
रूप से बताता हूँ। वासना से दृढ़ सम्बन्ध जोड़कर जो आत्मा को जीवरूप प्रदान करती है तथा अभेद में भेद
उत्पन्न करती है उसे 'अविद्या बाधा' कहते हैं। देह के माथे वर्णाश्रम और आश्रम के माथे कर्म और उस कर्म के
प्रबल अभिमान के कारण 'मैं ही देह हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है। यही 'जीवधर्म' है। जो जीव की बाधा नष्ट
कर उसे चिदानंद स्वरूप प्राप्त कराती है, उसी का नाम शुद्ध 'आत्मविद्या' है। बाकी सब एकझार 'अविद्या' ही
हैं। जो अविद्या को नष्ट करती है, वही 'शुद्धविद्या' कहलाती है। अन्य शास्त्र आदि जो चौदह विद्या हैं वे पल्लव
निकली हुई अविद्या ही हैं। जीव की बाधा जिसके योग से नष्ट होती है, उसी को शुद्ध 'आत्मविद्या' कहते हैं;
अब 'ह्री' अर्थात् 'लज्जा' का स्वरूप सुनो। निंद्य कर्म के प्रति लज्जा का अनुभव होना यही वास्तव में लज्जा है।
केवल इन्द्रियों को ढँकने को ही 'लज्जा' कौन कहेगा ? तो जीवप्राण भी चला जाय तो भी अकर्म नहीं करना,
यही वास्तव में 'लज्जा' है।
श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः।
दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्॥ ४१॥
चौदह भुवनों के साम्राज्य वैभव के साथ यदि लक्ष्मी प्राप्त हो जाय तो भी जो उसकी ओर नहीं देखता,
उसकी जो यह निरपेक्षता है, वही उत्कृष्ट 'श्री' है। श्रीमंत को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ, फिर इतरों की
क्या बात की जाय ? जिसे लक्ष्मी की भी आकांक्षा नहीं है वह निरन्तर मेरे मस्तक पर ही रहता है। उसकी अपेक्षा
लाडला मुझे कोई नहीं है। उद्धव ! सुख और महादुःख इन दोनों को समाप्त कर जो 'स्वाभाविक' आनन्द प्रकट
होता है उसी का नाम है 'सुख'। जहाँ दूसरे की आवश्यकता नहीं पड़ती, इन्द्रियों की कमी नहीं पड़ती और
विषयों की भी आवश्यकता नहीं होती; ऐसी स्थिति में हृदय में जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसका नाम है,
'निजात्मसुख'। इस आत्मसुख को भूलकर विषय की इच्छा करना इसी का नाम है 'महादुःख' जिसका सेवन
शुद्ध मूर्ख ही करते हैं। रोज-रोज भी यदि विषय प्राप्त हो जायँ तो भी इच्छा की तृप्ति नहीं होती। विषय की
इच्छा ही मनुष्य को दुःख के भँवर में डालती है। जो बंध और मोक्ष को जानता है, 'अनुमान' नहीं करता वही
'पण्डित' है। ऐसी अवस्था न प्राप्त कर केवल वेदशास्त्रों का अध्ययन कर 'सज्ञान' होना ऐसा विद्वत्ता का
अभिमान यहाँ काम नहीं करता। तो जिसे सच्ची 'शान्ति' और वास्तविक समाधान प्राप्त हुआ है, 'बंध' और मोक्ष
का यथार्थ ज्ञान है, वही 'महापण्डित' है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं।
मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्निगमः स्मृतः।
उत्पथश्चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः॥ ४२॥
वेदशास्त्र न जानने वाले को लोग मूर्ख कहते हैं लेकिन यहाँ मूर्ख का वह अर्थ नहीं है। तो जो केवल
देहाभिमानी होता है उसे ही 'मूर्ख' समझा जाता है। जो नष्ट होने वाले देह को ही 'मैं' समझ लेता है और हर्षित
होता है तथा देह के अभिमान से नरक भोगता है उससे अधिक मूर्ख कौन है ? अशौच से ही देह की उत्पत्ति