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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 869 में से

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पृष्ठ 543

बीसवाँ अध्याय ५२७
और नरक में तो असह्य दुःख भोगना होता है। इसीलिये इन दोनों की प्रीति छोड़कर नरदेह से प्रीति करना
चाहते हैं। मनुष्य देह की चाह भी देहबुद्धि ही है। इसके कारण काम-क्रोध की युति बनती है। क्षण-क्षण पर
असंख्य प्रमाद होते हैं। इसलिये स्वर्ग, नरक अथवा मृत्युलोक इन तीनों की ही प्रीति छोड़कर ज्ञान अथवा
भक्ति ही प्राप्त करनी चाहिये। ज्ञान सम्पादन करने के लिये विशेष कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। प्रेम
से मेरा भजन करने से ज्ञान दूर भगाने पर भी घर में ही घुसता है। गेहूँ का भण्डार मिलने पर उससे मनचाहे
पकवान बनाये जा सकते हैं। उसी प्रकार मेरी भक्ति प्राप्त होते ही ज्ञानसम्पत्ति घर में प्रवेश करती है। हाथ में
पैसा होने पर सभी चीजें घर बैठे आ जाती हैं, उसी प्रकार मेरी भक्ति साध्य करने से भुक्ति और मुक्ति दोनों
दासी बनकर रहती हैं। इस पर शायद तुम यह कहोगे कि मेरी भक्ति करने पर छल करने के लिये विघ्न भी
आयेंगे। तो मैं तुम्हें बताता हूँ कि हाथ में सुदर्शन लेकर मैं अपने भक्तों का रात-दिन संरक्षण करता हूँ। पक्षी
के बहाने नामस्मरण करने पर मैंने वेश्या का भी उद्धार किया है। विघ्न के दाँत तोड़ कर मैंने उस
व्यभिचारिणी का भी उद्धार किया। इसलिये नरदेह प्राप्त होने पर जो मेरा भजन करता है, वही इस संसार में
धन्य कहलाता है। मनोभाव से मेरी भक्ति करने पर मैं श्रीकृष्ण उस भाविक का उद्धार करता हूँ और जो
ज्ञानाभिमान में रहते हैं उन्हें मैं यम के सुपुर्द करता हूँ। मेरी भक्ति अथवा ज्ञान सम्पादन करते समय जिन्हें
ज्ञानाभिमान होता है, उन्हें मैं अपने हाथों दोषों के सुपुर्द करता हूँ। अब उद्धव! तुम यह कहोगे कि उन्हें यम
के सुपुर्द क्यों करता हूँ? तो वह इसीलिये कि वह उन महादोषी जनों को यातना देकर उन्हें ज्ञानाभिमान से
मुक्त करता है। इसलिये देहाभिमान छोड़कर भक्तिभाव से मेरा भजन कर पूर्व के ज्ञानसम्पन्न साधु नरदेह से ही
मुझ तक आ पहुँचे हैं।
एतद् विद्वान् पुरा मृत्योरभवाय घटेत सः।
अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम् ॥ १४॥
देह तो केवल अस्थि, चर्म और मलमूत्र से ही बना है और अत्यन्त अमंगल है किन्तु उससे परिपूर्ण और
निश्चल ब्रह्म का निर्मल फल प्राप्त होता है। पूर्व के ज्ञानसम्पन्न लोगों ने नरदेह का कारण ध्यान में रखकर
देहाभिमान छोड़ा और वे ब्रह्मसुख तक पहुँच गये। देह निंद्य है इसलिये उसे छोड़ दिया जाय तो हाथ से इतना
बड़ा लाभ छूट जाता है; यदि उसे वन्दनीय मान कर उसका पोषण करें तो निश्चय ही रौरव नरक प्राप्त होता है।
इसलिये देह का न तिरस्कार ही करें और न विशेष आदर ही करें। हाँ, उससे परमार्थ साध लेना चाहिये। उद्धव!
उसे कैसे साध्य किया जाय इसका गुप्त रहस्य तुम्हें बताता हूँ। ध्यान देकर श्रवण करो। जिस देह के कारण
संसार का भाव बढ़ता है, उसी देह के कारण संसार का ही अभाव हो जाता है, हाँ अन्धकार का अवश्य त्याग
करना चाहिये। पूर्व के ज्ञानसम्पन्न साधु देहाभिमान छोड़ने के लिये नित्य जागरूक रहकर मत्स्वरूप प्राप्त कर
ब्रह्मस्वरूप हो गये। "नरदेह से ब्रह्मप्राप्ति होती है तो फिर पहले विषयभोगों का उपभोग कर फिर ब्रह्मप्राप्ति
करूँगा" ऐसा शायद तुम कहोगे। लेकिन ऐसा विश्वास मन में रखने से अपना ही नुकसान होगा। क्योंकि, देह
के ही साथ मृत्यु पीछा करती रहती है। हरिहर भी उसे नहीं टाल सकते। सारांश, देह की मृत्यु अटल है। वह
कब आयेगी, मालूम नहीं होगा। इसलिये उसके आने से पहले अपना स्वार्थ साध लेना चाहिये। अपने देह पर
यदि हम लुब्ध हो गये तो यम अचानक उस पर हमला करता है और उसमें हमारा स्वार्थ डूब जाता है। इस
सम्बन्ध का निर्णय श्रीकृष्ण बताते हैं।