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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 538, कुल 869 में से

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पृष्ठ 538

५२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव ने कहा, हे कमलनयन श्रीकृष्ण! वेद की आज्ञा तुम्हारी आज्ञा है यह प्रसिद्ध है। उसमें ही विधि
निषेध लक्षण यह गुण और दोष है ऐसा बताया गया है। तुम्हारे ही वेद के जो विधि हैं, इसीलिये बुद्धि गुणदोषों
में दृढ़ हो गयी। हे कृपानिधि! वही मैं स्पष्ट कर दिखाता हूँ, श्रवण करो।
वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्।
द्रव्यदेशवयःकालान् स्वर्गं नरकमेव च॥२॥
आप की ही जो वेदवाणी है, वही गुणदोषों की खान है। उसी ने उत्तम, मध्यम और अधम ऐसे विभाग
बनाकर वर्णाश्रम का भेद दिखाया है। धन भी कौन सयोग्य है और कौन-सा अयोग्य है, यह भेद भी वेदों ने ही
बताया है। उसी प्रकार पवित्र स्थल कौन-सा है और अपवित्र कौन सा, उचित काल कौन-सा है और अनुचित
काल कौन-सा यह भी उसी ने बताया है। पूर्ववय में मन स्थिर रहता है, यौवन में वह कामलोलुप होता है और
वार्धक्य में वही अत्यन्त कुश्चित। इस प्रकार तुम्हारे वेद ने ही गुणदोष उत्पन्न किये हैं। भगवन्! देखिये। तुम्हारा
ही वेद स्वर्ग और नरक की बात करता है और उसके लिये कर्म की आवश्यकता बता कर साधक-बाधक कर्मों
का भी वर्णन करता है। वर्णाश्रम में भी 'प्रतिलोमज', 'अनुलोमज' आदि नाना प्रकार के भेदों को नचाता है।
उच्चवर्ण की स्त्री यदि हीनवर्ण से गर्भ धारण करे तो उसकी संतति को 'प्रतिलोमज' कहा जाता है। ऐसी संततियाँ
सूत, वैदेह तथा मागध इस नाम से प्रसिद्ध हुई हैं और हीन जाति की स्त्री को उच्चवर्ण का गर्भ रहने पर जो
संतति उत्पन्न होती है, उसे शास्त्रों के विद्वान 'अनुलोमज' इस नाम से पुकारते हैं। अंबष्ट, मूर्धावसिक्त, पारशव
तथा सात्वत आदि नाम से जो प्रसिद्ध हैं उन्हें 'अनुलोमज' समझना चाहिये। इस प्रकार जो नाना प्रकार के भेद
हैं, उनमें 'विधि-अविधि' का प्रकार भी वेदों का ही बताया हुआ है। इसलिये तुम्हारा वेद ही गुण-दोषों का
मायका है।
गुणदोषभिदा दृष्टिमन्तरेण वचस्तव।
निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥३॥
ये गुण हैं और ये दोष हैं, यह कहने पर दोनों में बैर हो जाता है और वे गुण दोष स्पष्ट करने वाला तुम्हारा
वेद ही है। वेदवाणी ने ही यह बैर लगाकर गुणदोषों का झगड़ा खड़ा किया है तब वेदवचन से प्राणी को मोक्ष
कैसे मिलेगा? भगवन् आपने स्वयं गुणदोषों की ओर न देखने के लिये कहा है और तुम ही वेद को प्रमाण बताते
हो उन्हें सच माना जाय तो गुण-दोषों को देखना पड़ेगा। अर्थात् तुम्हारा भाषण सुनने से दोनों ओर से अड़चन
उत्पन्न होती है। तुम्हारे ऐसे भाषण से बड़े-बड़े ज्ञानी भी संभ्रम में पड़ जाते हैं, फिर औरों की क्या बात की
जाय ? मेरे भाषण और वेदवचन दोनों को ही प्रामाणिक कहते हो तो फिर गुणदोष दर्शन में दोनों में मतभेद क्यों
है? यदि हाथ से वेद का विधान न हो पाये और वेदार्थ का ज्ञान भी न हो सके तो मोक्ष प्राप्ति नहीं होती,
इसीलिये तुम वेद को प्रमाण मानते हो। लेकिन उस मोक्ष को प्राप्त करने में क्या कठिनाई है? यदि सारे कर्म ही
छोड़ दिये जाएँ तो मोक्ष बिना माँगे, स्वयं घर तक चल कर आयेगा। अब शायद तुम यह कहोगे कि यदि वेद का
अर्थ समझ में न आये तो कर्म करने पर या कर्म का त्याग करने पर भी मोक्ष की कभी प्राप्ति नहीं होगी। रस्सी
को ही यदि सर्प समझ लिया जाय तो हजारों मंत्रों का जप करने अथवा बाजों का शोर करने से वह केशमात्र भी
वहाँ से नहीं हिलेगा। लेकिन यदि ठीक से देखा जाय तो वह सर्प अदृश्य हो जाता है। उसी प्रकार वेदवचनों का
योग्य विचार करने से संसार का भय नष्ट हो जाता है। भवभय के निर्मूलन का ही अर्थ है 'मोक्ष'! वह वेदार्थ