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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 869 में से

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पृष्ठ 531

उन्नीसवाँ अध्याय ५१५
में लगा हुआ है उसे जो महावीर जीत लेता है उसे ही सच्चा शूरवीर समझना चाहिये। "मैं सदा सदाचरण ही कर
रहा हूँ, निःसन्देह ज्ञानी हूँ, मेरी पवित्र ब्राह्मण देह है" यही जीव का जीवभाव है। देह के माथे पर वर्णाश्रम,
आश्रम के माथे पर कर्म, उस कर्म पर जिसे अत्यन्त अभिमान है, उसे अपार देहभ्रम रहता है। इसलिये
जीवस्वभाव को जीत कर, चिदानंद के राज्य पर बैठकर, अपने आत्मरूप स्वराज्य वैभव का सुख भोगना यही
'शौर्य' का बड़प्पन है। अब जिसे 'सत्य' कहते हैं उसके बारे में भी तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ। उद्धव !
सदासर्वदा सर्वत्र समब्रह्म देखना, यही 'परम सत्य' है। 'परब्रह्म' को सर्वत्र समान रूप से भरा न देख उसे विषम
अर्थात् भिन्न-भिन्न देखना, यही अत्यन्त दुर्गम 'असत्य' है और ब्रह्म सर्वव्यापी तथा सर्वत्र सम है। ऐसा समझना
'सत्य' है। सारांश केवल सत्यभाषण ही निज सत्य नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण और भी निरूपण कर रहे हैं।
ऋतं च सूनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता ।
कर्मस्वसंगमः शौचं त्यागः संन्यास उच्यते ॥ ३८ ॥
कितने ही लोग 'ऋत' को ही सत्य कहते हैं। प्रवृत्ति की दृष्टि से देखने पर वह सच है। किन्तु निवृत्ति की
दृष्टि से सम ब्रह्म को 'सत्य' कहना ही उचित है। श्रोताओं का दुःख सम्बन्ध रहित हित करने वाली सत्यवाणी
को ही वास्तव में 'ऋत' कहना चाहिये। जिस प्रकार चित्त में देखने पर भिन्नता दिखायी देती है लेकिन वह
दीवार जिस पर चित्र बना रहता है, वह सदा सम ही रहती है उसी प्रकार संसार विषम अर्थात् भिन्न-भिन्न दिखाई
पड़ने पर भी ज्ञाताओं को निजबोध के कारण सर्वत्र समब्रह्म ही दिखायी देता है। इसी का नाम 'सत्य' है यह
ध्यान में रखो। उद्धव ने जो प्रश्न किये थे उसमें 'शौच' के सम्बन्ध में प्रश्न नहीं था, लेकिन भगवान स्वयं होकर
उसका निरूपण कर रहे हैं। अंतःकरण की शुद्धि न हो तो त्याग अथवा संन्यास सम्भव नहीं है। इसलिये
अंतःकरण की शुद्धि के लिये पूर्ण शौच अर्थात् निर्मल स्वरूप का जो स्वधर्माचरण है उसका निरूपण श्रीकृष्ण
कर रहे हैं। अंतःकरण में कर्मों का मैल रहता है उसका क्षालन स्वधर्म से करना चाहिये। कर्म से ही कर्म का
निर्दलन कर स्वयं निष्कर्म हो जाना चाहिये। स्वधर्म से फल की आशा छोड़ने से कर्म के बन्धन टूट जाते हैं।
इसलिये फल के प्रति निराश होकर अंतःकरण की शुद्धि कर लेनी चाहिये। नैराश्य वृत्ती से स्वधर्माचरण करने से
अंतःकरण के मलों का क्षालन हो जाता है। इसी का नाम शौच है। अंतःकरण की ऐसी शुद्धता ही संन्यासग्रहण
की भूमिका की नींव है। इसीलिये प्रश्न न करने पर भी श्रीकृष्ण ने उसका निरूपण किया। सारे संकल्पों का
त्याग करना ही उत्तम 'संन्यास' है। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वे इसे उत्कृष्ट त्याग भी कहते हैं। मैं ही देह हूँ ऐसी
कल्पना मन में रहती है इसलिये संकल्प-विकल्प के कारण मन में नित्य नयी छटपटाहट होती रहती है। बाह्य
आडम्बरों में दण्ड, कमण्डल, भगवा वस्त्र यह साज तो मात्र लौकिकता है।
धर्म इष्टं धनं नृणां यज्ञोऽहं भगवत्तमः ।
दक्षिणा ज्ञानसंदेशः प्राणायामः परं बलम् ॥ ३९ ॥
धन धान्य, गायें-भैंसें आदि प्राणी का लाभकारी धन नहीं है, मोक्ष के मार्ग में सबल धर्म ही हितकारी धर्म
है। घर में जो धन गाड़ कर रखा जाता है वह घर में ही रह जाता है लेकिन धर्म साथ में रहने वाला धर्म है। वह
अपने साथ किसी प्रकार का बन्धन नहीं रखता। धार्मिक व्यक्ति जैसा कंजूस मैंने कहीं नहीं देखा। क्योंकि मरने
पर पर भी वह स्त्री-पुत्रों को ठग कर सारा धन साथ ही ले जाता है। उन्होंने अपना धन धर्मार्थ खर्च कर मुझ
नारायण को उसका भण्डारी बना दिया है। इसलिये उन्हें जब भी जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है वह मैं