श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ॥ ४६ ॥
सर्वत्र एक परिपूर्ण ब्रह्म ही है। इसमें दोष कौन से और गुण कौन हैं? अविद्या क्षुब्ध होती है, तभी गुणदोष
बढ़ते हैं। इसलिये जो गुणदोषों को देखने लगता है, समझ लो उसकी अविद्या क्षुब्ध हो गयी और जो गुणदोष
नहीं देखते, वह समझ लो ब्रह्मसम्पन्न हो गया। दूसरों के गुणदोष देखना यही सबसे बड़ा दोष है और गुणदोष न
देखना यही सबसे अच्छा गुण है। ब्रह्म में कोई गुणदोष नहीं है यह सर्वथैव सत्य है। अर्थात् जो गुणदोष देखता
है उसमें ब्रह्मत्व नहीं है। यह सहज सिद्ध है। जो गुणदोष देखने लगते हैं, उनका ब्रह्मत्व किस तरह लुप्त होता
है ? क्या वह उनसे रूठ कर चला जाता है ? जिस समय राहु रविबिंब को ग्रसता है, उस समय दिन में भी नक्षत्र
दिखायी पड़ते हैं। उसी प्रकार अविद्या जब ब्रह्मत्व को ग्रस लेती है, तो गुणदोष दिखायी पड़ने लगते हैं। श्रीकृष्ण
आदरपूर्वक कहते हैं कि जीव को किसी का भी गुणदोष नहीं देखना चाहिये। संसार में चौरासी लाख योनी हैं
उनमें से यदि मनुष्य योनि के ही गुणदोष न देखो तो उतने से ही तुम नित्यमुक्त हो जाओगे। अब शायद तुम यह
कहोगे कि स्वधर्माचरण करते समय गुणदोष तो देखने ही चाहिये। लेकिन उद्धव ! यह बात बिलकुल गलत है
क्योंकि स्वधर्माचरण की प्रकृति बिलकुल भिन्न है। अपने दोषों को नष्ट करने के लिये ही स्वधर्माचरण किया
जाता है और वही अगर गुणदोष देखने लगे तो वह नंगी दौड़ जैसा होगा। धान पैदा करने के लिये खेत में पत्ते
आदि जलाकर जमीन को तैयार करते हैं, यदि उसके बदले फसल को ही जला दें तो किसान को मिट्टी ही खानी
पड़ेगी। दोषों का क्षालन करने के लिये ही वेदों ने धर्म की प्रवृत्ति बतायी है; यदि उस स्वधर्म से दोष ही देखने
लगे तो वह अपने हितों से ही वंचित हो जायेगा। स्त्री पुरुष स्वांग बनाकर अनेक प्रकार के हावभाव दिखलाते
हैं, अनेक प्रकार की शृंगारिक बातें करते हैं, लेकिन वह भाव वे अपने मन से नहीं करते। उसी वृष्टि से स्वधर्म
का आचरण करना चाहिये। बिना गुण-दोष देखे, बिना स्वधर्म की मर्यादा छोड़े स्वधर्म का आचरण करना
चाहिये, यही स्वधर्म कर्म का प्रमुख लक्षण है। ऐसे स्वधर्माचरण से कर्म के मैल धुल जाते हैं। ऐसे स्वधर्माचरण
से कर्म के मैल धुल जाते हैं। गुणदोष की बात छोड़ने पर ही साधकों को निजात्मपद की प्राप्ति होती है। गुणदोष
देह में होते हैं लेकिन आत्मा तो नित्य विदेही ही रहती है। सिद्ध को तो वे दिखायी ही नहीं देते। तिस पर भी
यदि उसे गुणदोष दिखायी देने लगे तो दोनों की खैर नहीं। इससे साधक की हानि होती है और उसकी सिद्धि
तत्काल नष्ट हो जाती है। इस प्रकार उद्धव ! गुणदोषों का यह संकट दोनों ओर एक जैसा है। सारा संसार
गुणदोषों से भरा हुआ है लेकिन हमें उधर ध्यान ही नहीं देना चाहिये। यही बात श्रीकृष्ण ने अत्यन्त भावुक
होकर उद्धव को बतलायी। यदि गुणदोषों को देखना इतना निषिद्ध है तो फिर श्रीकृष्ण ने वेदमुख से इतना स्पष्ट
क्यों बताया है ? ऐसा प्रश्न उद्धव आगे कहने वाला है। उस पर व्यास का निरूपण सुनकर जीव और शिव दोनों
को ही शान्ति मिलेगी। इसमें श्रीकृष्ण सकाम-भक्ति और निष्काम भक्ति के अधिकार विशद करेंगे। वह कथा
अत्यंत अद्भुत है। अतः संत उधर ध्यान दें और श्रोता सावधान हो जाएँ। ऐसी विनती एकाजनार्दन कर रहा है।
अगला निरूपण रस से सराबोर है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकार टीकायां
भगवदुद्धव संवादे एकोनविंश अध्यायः ॥ १९ ॥