श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 537, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप चित्समुद्र, सद्गुरुराया ! तुम्हें मेरा प्रणाम ! मुक्तरूपी मोतियों को तुझमें ही आश्रय प्राप्त
होता है और ज्ञानवैराग्यरूपी सीप के रूप में तुम उसे भाग्यवान पुरुषों को देते हो । तुम्हारा आवास तो असीम है।
उसमें नाना प्रकार के चिद्रत्न भरे हुए हैं। निजबोधरूपी चन्द्रमा को देखते ही तुम में ज्वार आता है जिसमें
स्वानंद में उफान आने पर भी तुम गुरुमर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हो। स्वानंद की लहरें निरन्तर तुम्हारी सतह
पर उछलती रहती हैं। ब्रह्मविद्या एक बहुत बड़ा बन्दरगाह है जिसमें निजभक्ति नाम का बहुत बड़ा जहाज है।
उसे चलाने वाले नाविक तुम हो। तुम्हीं उस पर प्रेम की पाल लगाते हो और भक्त, संत और ज्ञानसम्पन्न लोगों को
उस पार लगाते हो। उनका वार-बार आना-जाना सचमुच हीं रुक जाता है। किसी किनारे पर लाकर भवसागर में
विचरण कराते हो। उसे महाकल्पांत में भी डूबने की बाधा नहीं आती। जो भक्तिरस में डूबता है उसे शेषशायी के
पास पहुँचा देते हो, किसी को अटल स्थान पर पहुँचा देते हो जहाँ से ब्रह्मादिक देवता भी नहीं हिला सकते।
तुम्हारे सागरपन का गुण ऐसा है कि किसी को तिलमात्र के लिये भी विजातीय नहीं रहने देते हो। तुम्हारी यह
शक्ति बड़ी अद्भुत है। यह जब प्रलय काल में भी ऊपर चढ़ता जाता है, उस समय संसार नाम का गाँव भी डूब
जाता है। यह वैकुण्ठ, कैलास के भी ऊपर चढ़ता जाता है। आगे, पीछे सर्वत्र यही दिखायी देता है। ऐसे इस
सद्गुरुरूपी समुद्रोदक में एकनाथ एकता से खो गया। उसमें गिरते ही जनार्दन ने उसका अंगीकार किया। उस
जनार्दन ने ही स्वयं एकादश स्कन्ध पर यह भाष्य तैयार किया। उसने अभंग में एकनाथ का नाम देकर लोगों को
उसके कवित्व से परिचय कराया। जनार्दन को एकत्व प्रिय है। मैं एका उनसे मिलने के कारण, निजात्मभाव से
दोनों में एकत्व स्थापित हुआ और उन्होंने अपने निजसुख का मुझे उपभोग कराया। निजसुख की कथा वह स्वयं
कहता है और श्रोता भी वह स्वयं ही बनता है। फिर उसके अर्थ का समाधान भी वह स्वयं ही करता है। इस
प्रकार उस जनार्दन ने यह एकादश स्कन्ध सुलभ करा दिया। उन्नीसवें अध्याय के अन्त में गुण-दोषों की कुछ
बातें उद्धव को बतायी थीं। वह यह कि गुणदोष देखने को सबसे बड़ा 'दोष' मानना चाहिये और गुणदोष न
देखना सबसे बड़ा गुण मानना चाहिये। यह बात मुझ श्रीकृष्ण को स्वीकार है। भगवान का यह भाषण सुनकर
उद्धव को बड़ा चमत्कार लगा। उसने कहा, घर-घर में गुणदोषों का विचार क्या लोगों ने किया है ? आपने स्वयं
ही वेदमुख से गुणदोषों का लक्षण बताया है। आपकी वेद की बातें कैसे अस्वीकार कर दी जाएँ ? विधिनिषेध
लक्षण का विचार करने पर वह वेद का ही वचन मालूम होता है ? ऐसा होते हुए श्रीकृष्ण उसका निषेध क्यों
करते हैं ? यही प्रश्न उद्धव स्वयं पूछ रहे हैं। बीसवें अध्याय में गुणदोष लक्षण बताने के लिये भक्ति, ज्ञान और
कर्म इन तीन भिन्न-भिन्न अधिकारों के बारे में भगवान बतायेंगे। उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! तुमने स्वयं ही वेद
के रूप में गुणदोषों का विवेचन किया है। उसी को हम प्रमाण मान कर चल रहे हैं। यह विधि और निषेध, तुम्हें
वेद स्वयं ही स्पष्ट कर रहे हैं। वह वेदानुवाद में तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। सुनो।
उद्धव उवाच
विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते।
अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम् ॥ १ ॥