श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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होती है। अब अन्य मार्ग का क्या अर्थ है ? उसका भी लक्षण बताता हूँ। पराया धन और परायी स्त्री की आसक्ति
तथा परनिंदा में रुचि, इसी को उद्धव ! 'नरक का मार्ग' कहते हैं। स्वर्ग सुख की बात सुनकर जो उसके लिये मन
बना लेता है और उसके अनुकूल कर्म करता है उसे अचूक स्वर्गभाग प्राप्त होता है। ये दोनों 'अन्यगति' अर्थात्
विपरीत स्थितियाँ हैं। इनसे वृत्ति हटाकर यज्ञादिक कर्मों से मेरा यजन करने से, नित्यनैमित्तिक कर्मों से ही
वैराग्यस्थिति अर्थात् नैराश्य प्राप्त होता है। तब स्वर्ग में भी नहीं रहना पड़ता अथवा नरक में भी नहीं जाना होता।
इहलोक में ही विरक्तता प्राप्त होती है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अस्मिंल्लोके वर्तमानः स्वधर्मस्थोऽनघः शुचिः।
ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥११॥
इस लोक में विचरण करते समय, इस प्रकार स्वधर्माचरण करते रहने से पुण्य और पाप इन दोनों का ही
क्षालन हो जाता है तथा वह निर्मलत्व से अत्यन्त पवित्र हो जाता है। तब संसार का भान नष्ट होकर उसे मेरा
'शुद्ध ज्ञान' अथवा मेरा सप्रेम भजन अर्थात् 'पराभक्ति' प्राप्त होती है। ऐसी भक्ति में मैं सदा भक्त के अधीन
होकर रहता हूँ। तब ज्ञान मोक्ष के साथ ही स्वयं भक्त के चरणों पर आकर गिरता है। अब इस ज्ञान का परिणाम
सुनो। वह संसार को 'महादुःख' तथा मोक्ष को 'परमसुख' कहता है। परन्तु मेरा भक्त इन दोनों को नहीं मानता।
प्रेम से मेरा भजन करते समय संसार भय का स्मरण ही नहीं होता। उधर मोक्ष को कौन पूछता है ? मेरे भक्तों को
भक्ति का ही पूर्ण उल्हास रहता है। जिसे 'महादुःख' कहते हैं वह भक्तों के लिये भगवद्रूप ही होता है; उसी
प्रकार जिसे महासुख कहते हैं वह भी उनके लिये भगवद्रूप ही रहता है। इस प्रकार मेरा भक्त मेरे भजन में सुख
और दुःख दोनों को भूलता है। मुझ भगवन्त के सिवा उसे दुनिया में दूसरा कुछ दिखायी ही नहीं देता। लेकिन
मेरी यह पूर्ण भक्ति कहीं से लाकर नहीं आती। मैं जब प्रसन्न रहता हूँ, तभी संयोग से वह प्राप्त होती है। अब
तुम सोचोगे कि मैं किससे प्रसन्न होता हूँ तो मैं बताता हूँ कि मेरे प्रसन्न होने के लिये नरदेह ही एक कारण है।
स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा।
साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्॥१२॥
जिन्हें स्वर्गभोग से अत्यन्त प्रेम है, उन्होंने अमरत्व की पताका फहरायी है और स्वर्ग के बन्दीखाने में पड़े
हुए हैं, वे भी बड़ी चाह से नरदेह की इच्छा करते हैं। उसी प्रकार जिन्होंने भयंकर नरक यातनाएँ भोगी हैं, वे
प्राणी भी बड़ी चाह से नरदेह की इच्छा करते हैं। नरदेह अत्यन्त पवित्र वस्तु है तथा भक्ति और ज्ञान का वह
आश्रय स्थान है। जिसके योग से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, वह नरदेह धन्य है। इस नरदेह के कारण ही जन्म-मरण
का बन्धन समाप्त हो जाता है, जीव को समाधान प्राप्त होता है और स्वयं स्वानंदघन हो जाता है। जिस नरदेह
की संगति से अविद्या की निवृत्ति होती है और भगवत्पद की प्राप्ति होती है, उस नरदेह की यह कीर्ति प्रसिद्ध ही
है। सभी प्राणी नरदेह की इच्छा करते हैं। साक्षात् ब्रह्मदेव भी नरदेह की इच्छा करते हैं। नरदेह इतना श्रेष्ठ है
क्योंकि इसमें भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है; लेकिन भक्तिज्ञान से मनुष्य देह नहीं प्राप्त होता।
न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्नारकीं वा विचक्षणः।
नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥१३॥
नरदेह की प्राप्ति होने पर भी, अधर्म का आचरण करने पर नरक में ही जाना पड़ता है तथा पुण्य संग्रह
करने पर निश्चित रूप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वर्ग मिलने पर पुनर्जन्म के चक्कर में फँसना होता है