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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

४७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक और सम्मान से यथाशक्ति अन्नदान करते हैं, उन पर मैं जनार्दन सन्तुष्ट होता हूँ।
अभिमान छोड़कर सभी प्राणीमात्रों के प्रति नम्रता का भाव रखना, यही 'महद्धर्म' है और यही धर्म का शुद्ध
लक्षण है। इस प्रकार का धर्माचरण कर्ता के लिये भूषणास्पद होता है। इस धर्म में दोष देने के लिये जरा सी भी
जगह नहीं रहती। इसी का नाम है, 'अति शुद्धाचरण'। चित्तवृत्ति मुझ में रंग जाने के कारण घर संसार की
आसक्ति जो प्रायः भूल ही जाता है उसे गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है, आत्मज्ञान यही उसकी सुख
सम्पत्ति हो जाती है। जो निर्धन हैं, उन्हें इस प्रकार गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है। अब जो साधन है उन्हें
मेरी प्राप्ति कैसे होती है, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो। धनी होते हुए यदि वह ज्ञानी है तो उसे बिना अधिक साधन
किये ही मेरी प्राप्ति करना अत्यन्त सुलभ है, सुनो।
समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।
तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात्॥४४॥
ब्राह्मण वैसे भी पूज्य है ही, तिस पर यदि वह मेरा भक्त हो तो मेरे भजन से अत्यन्त सम्पन्न और मद्भावना
से पूर्ण तथा परिपक्व अवस्था में पहुँचा हो; उसी प्रकार कभी किसी से कुछ नहीं माँगने का मेरे भक्त का जो
निश्चय रहता है, उसे पीड़ा देने वाली क्षुधादि व्यथाओं का जो निवारण करता है; उसे अन्न, धन, वस्त्र, पात्र,
नमक आदि देता है तथा अपना धन देकर जो मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे देते समय जो उसका तिरस्कार
नहीं करता और किसी प्रकार का उपकार करने की भावना मन में न लाकर अत्यन्त सम्मान और नम्रता से मेरे
भक्त का संरक्षण करता है, माँ जिस वात्सल्य से अपने बच्चे को खिलाती है उसी प्रकार वह अपना स्वार्थ छोड़कर
मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे मैं अपने भक्त को भी पीछे छोड़कर अपने मस्तक पर धारण करता हूँ और
फिर उसे वैकुण्ठ ही क्या उससे भी ऊपर ले जाता हूँ। जिसे मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ उसे कौन सी
वस्तु दुर्लभ होगी ? उद्धव ! मेरे भक्तों का जो संरक्षण करता है, उसका उद्धारक मैं हूँ। मेरे भक्तों के संकट जो
स्वयं होकर दूर करेगा, उसे मैं तत्काल संसार सागर पार कराता हूँ। उद्धव ! जिस प्रकार नौका धनवान को समुद्र
पार कराती है, उसी प्रकार मेरे भक्तों की रक्षा करने वालों का मैं संसार से उद्धार करता हूँ। इस प्रकार जो धनवान
पुरुष मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसका देवकी वसुदेव की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं उसका उद्धार करता
हूँ। सबके संकट का निवारण राजा को स्वयं करना चाहिये, उस राजधर्म का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः।
आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥४५॥
दीन, दुर्बल ब्राह्मण और अयाचित भक्त हों तो उनकी खोज कर राजा को उनका संकट में संरक्षण करना
चाहिये। अपने बच्चे पर संकट आने पर जिस प्रकार पिता उसके संरक्षण के लिये कमर कस लेता है, उसी प्रकार
राजा को भी आस्थापूर्वक अपनी प्रजा का संकटों से संरक्षण करने के लिये तत्पर रहना चाहिये। प्रजा का संरक्षण
कर उस पर आयी हुई आपत्ति का निवारण स्वयं करना राजा का स्वधर्म है। हाथी दलदल में फँस जाय तो भी वह
अपने ही बल से बाहर निकलता है और दलदल में फँसी हुई हथिनी तथा उसके कितने घावों को बाहर निकालता
है इसकी तो कोई गिनती ही नहीं है। उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा को अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिये, साथ ही
अपने संकटों का सामना भी अपनी ही शक्ति से करना चाहिये। ऐसे स्वधर्माचरण से जो राजा सम्मानपूर्वक
व्यवहार करता है उसे उस स्वधर्माचरण से कैसी फलप्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीपति स्वयं बता रहे हैं।

सत्रहवाँ अध्याय ४७१
एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा।
विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते॥ ४६॥
इस प्रकार जो राजा इस लोक में राज्य प्राप्त होने पर अधर्म का नाश कर स्वधर्म स्थिति से आचरण करता
है, उसे स्वर्ग प्राप्त होता है। ज्ञानी लोग 'राज्य का अन्त नरक' इस उक्ति से करते हैं, लेकिन उस नरकभोग को
टाल कर अनेक राजा स्वर्ग गये हैं। वे स्वर्गलोक में सूर्यप्रभा जैसे देदीप्यमान विमान में बैठकर इन्द्र का सा सुख
भोगते हैं। गृहस्थाश्रम अत्यन्त कठिन है। उसमें स्वधर्माचरण करते समय अनेक बार बिकट प्रसंग आते हैं। उस
समय के आपात धर्म बताता हूँ, सुनो।
सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्।
खङ्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४७॥
ब्राह्मणों को यदि स्वधर्म में पीड़ा का अनुभव होता हो तो उन्हें वैश्यवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उन्हें
क्षात्रधर्म स्वीकार कर हिंसा आदि दोष नहीं करने चाहिये क्योंकि वे अत्यन्त खराब हैं। ब्राह्मण के लिए हिंसाकर्म
अधर्म है लेकिन यदि कोई विकल्प न हो तो उसे अवश्य क्षत्रिय धर्म स्वीकार करना चाहिये। वैश्य का व्यवसाय
स्वीकार करने पर उसे तिल्ली, राई तथा रूई, नमक, तेल, घृत आदि पदार्थ नहीं बेचने चाहिये। उन्हें बेचने में
महादोष है। इन सारे दोषों से बचकर वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। खाने का पान और वस्त्र निर्दोष हैं।
इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करने पर भी निर्वाह न होता हो
तो उसे हाथ में शस्त्र लेकर क्षात्रवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उसमें हिचकिचाना नहीं चाहिये। समरभूमि से
वापस नहीं लौटना चाहिये। स्वामिकार्य के योग में देहत्याग के लिये तत्पर रहना चाहिये। इस प्रकार क्षत्रियवृत्ति
से ब्राह्मण को अपनी आपत्ति दूर करनी चाहिये, लेकिन प्राण जाने पर भी श्वान की वृत्ति के अनुसार नीच की
सेवा नहीं करनी चाहिये। अब यदि स्वधर्म के अनुसार चलने पर भी क्षत्रिय पर आपदा आ जाये तो इसे कैसा
आचरण करना चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव से सविस्तार बता रहे हैं।
वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।
चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४८॥
क्षत्रिय पर भी यदि संकट आ जाय तो वह पहले कहे अनुसार वणिक् का व्यवसाय करे; अथवा जंगल
में शिकार कर अपना संकट दूर करे। इतना करने पर भी दारिद्र्य न जाय तो ब्राह्मण की तरह भिक्षा माँगे,
लेकिन प्राण जाने पर भी नीच की सेवा न करे। अब यदि वैश्य को स्वधर्म के अनुसार चलने पर दरिद्र दशा
प्राप्त हो जाय तो उसे किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये उस पर कृपा की मूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं।
शूद्रवृत्तिं भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम्।
कृच्छ्रान्मुक्तोन गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९॥
वैश्य पर यदि संकट आ जाये तो उसे शूद्र वृत्ति स्वीकार करनी चाहिये, अर्थात् निष्कपट होकर तीन वर्णों
की सेवा करनी चाहिये। उद्धव! वैश्य पर यदि संकट आ पड़े तो उसे कभी भी ब्राह्मण का अथवा क्षत्रिय का
व्यवसाय नहीं करना चाहिये। वैश्य पर कितनी भी आपत्ति आये लेकिन उसे नीच की सेवा नहीं ही करनी चाहिये।

४७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शूद्र पर यदि संकट आये तो उसे कुत्ते की तरह नीच सेवा नहीं करनी चाहिये। वह हाथ से चटाई बुन कर
उपजीविका कमाये। डोर या छीकें बेचकर धनार्जन करे अथवा सिलबट्टा वा दीपक बेचे। नहीं तो पेट भरने के
लिये सिर पर माल ढोये। आपातकाल में चारों वर्णों को अपना-अपना निर्वाह कैसे करना चाहिये इसके बारे में
तुम्हें बतलाया। फिर भी जहाँ तक हो सके स्ववृत्ति नहीं छोड़नी चाहिये। आपत्काल में, दूसरा कोई उपाय न होने
के कारण जो धंधा शुरू किया हो उसे आपत्काल समाप्त होते ही छोड़ देना चाहिये और फिर से अपने स्वधर्म के
अनुसार चलना चाहिये। अब गृहस्थ का जो विहित कर्म है, उसके आवश्यक धर्म तथा उसमें भी ब्रह्मार्पण करने
का मर्म भगवान स्वयं बता रहे हैं।
वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम्।
देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥ ५० ॥
स्वाध्याय का अर्थ है वेदाध्ययन करना, वेदों में कहे अनुसार ब्रह्मयज्ञ करना, स्वधा अर्थात् पितरों को तर्पण
करना और स्वाहा अर्थात् देवाधिदेवों को हवि देना। बलिदान की तरह दान करना चाहिये जिससे भूतगण तृप्त
होते हैं। मनुष्यों को अन्नोदक का दान करना चाहिये। ये पंचमहायज्ञ ही ब्राह्मण का नित्यकर्म हैं। इसी का नाम है
ब्रह्मकर्म। अब जिसके द्वारा ब्रह्मार्पण होता है, उस अर्पण की पहचान तुम्हें पूर्ण रूपसे बताता हूँ। इसमें यदि कर्म
करने वाला मैं हूँ यह भावना चित्त से निकाल दी जाय तथा प्राणिमात्र भगवत्स्वरूप है यह भावना धारण की जाय
तो वह कर्म सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। कर्म का अभिमान छोड़ने पर वह कर्म ब्रह्मार्पण ही होता है। उद्धव!
संकल्प के बिना कर्म के ब्रह्मार्पण होने की यह पहचान है। मेरे द्वारा यह कर्म हुआ और उसे मैं कृष्णार्पण किया
ऐसा संकल्प करने पर उसका कर्तृत्व अपने माथे पर लगता है और जो स्वयं को कर्म का कर्त्ता कहता है वही
भोक्ता भी बन जाता है। इसलिये हे उद्धव! अहंता ही मुख्य रूप से बाधक है। जिसमें अहंता होती है उसमें
निजबद्धता भी होती है; और जो निरभिमानी और निर्मम होता है उसके साथ.निजमुक्तता भी रहती है। इसलिये
अभिमान त्याग कर पंचमहायज्ञ करते रहना चाहिये। गृहस्थ उसे रोज ही करता रहता है इसलिये उसका कर्म
सहज ही ब्रह्मार्पण होता है। जिस रीति से गृहस्थ का नित्यकर्म भगवान को अर्पण होता है उसका मैंने यथार्थ
रीति से वर्णन किया। अब यज्ञ आदि की कथा सुनाता हूँ, सुनो। जिसके पास कम से कम बारह हजार रुपये हों
और जिसे वेद के सम्पूर्ण यज्ञ का ज्ञान है वह यज्ञ करने का अधिकारी बनता है।
यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।
धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥ ५१ ॥
व्यापार में अधर्म से प्राप्त किया अथवा निषिद्ध दान में मिला हुआ अथवा दूसरों का छल करके लाया
हुआ अथवा दूसरे की गरज से लाभ उठाकर लाया हुआ, या किसी ने जलभुन कर दिया हुआ अथवा शिष्य को
संकट में डालकर लाया हुआ धन यज्ञ करने के लिये अयोग्य है। ईश्वर की इच्छा से जो सहज प्राप्त हुआ हो
अथवा जो शुद्ध प्रवृत्ति से, अर्थात् ब्राह्मण के घर पौरोहित्य कर, सदाचरण से प्राप्त किया हो या सुखमय उपायों
से प्राप्त हुआ हो ऐसे धन को खर्च करना उचित है। परिवारजनों को भूखा रख, सारा धन यज्ञ में खर्च नहीं करना
चाहिये क्योंकि उससे भी अधर्म ही होता है अथवा जिसके आसरे चरितार्थ चलता है जैसे खेत आदि, उसे बेच
कर यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो यश प्राप्त करने के लिये यज्ञ करते हैं, वे भी मन्दबुद्धि होते हैं। कर्म का
अहंकार न कर पवित्र मार्ग से धन उपार्जन कर यज्ञ करना चाहिये। यही गृहस्थ के स्वधर्म का लक्षण है। मन की

सत्रहवाँ अध्याय ४७३
विषय कामना त्याग कर, घरबार की आसक्ति छोड़कर गृहस्थ को निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिये यही
स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥५२॥
घर की परिस्थिति घरबार, पत्नी और बच्चों के कारण भले ही सम्पन्न हो जाय लेकिन उसमें आसक्ति नहीं
रखनी चाहिये; परमात्म युक्ति के साधनों से चित्तवृत्ति को सावधान रखें। कल्पना, प्रमाद का संग छोड़ तथा
स्त्रियों से बच कर, उत्कृष्ट ईश्वर निष्ठा रख कर वृत्ति को अभंग रखे। उद्धव! गृहस्थ के परिवार में विषय की
स्थिति का विचार करके देखो तो उसका परिणाम अशाश्वत ही होता है यह जान लो। इसी प्रकार जो परिणाम
इस लोक का है वही स्वर्गलोक का होता है। दोनों ही नश्वर और मायिक होने के कारण मिथ्या हैं। स्त्री, बच्चे
और सम्पत्ति ये सब स्वप्न की ही तरह क्षणभंगुर हैं। इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं निरूपण करते हैं।
पुत्रदाराप्तबन्धूनां सङ्गमः पान्थसङ्गमः।
अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥५३॥
जिस प्रकार पथिक क्षण भर के लिये वृक्ष के नीचे एकत्र होते हैं, उसी प्रकार पत्नी, पुत्र व आप्तजन इन
सबका समागम भी क्षणिक ही है। जब दो नदियों के प्रवाह एक स्थान पर मिलते हैं तो उनके साथ बह कर आने
वाली लकड़ियाँ भी संगम पर एकत्र होती हैं, उसी प्रकार इष्टमित्र भी एक जगह एकत्र होते हैं और बड़ी लहर
आते ही जिस प्रकार वे लकड़ियाँ चारों दिशाओं में बिखर जाती हैं उसी प्रकार इष्ट मित्रों की भी स्थिति होती है।
जीव जिस योनि में जन्म लेता है उसी योनि के सम्बन्धी भी मिलते हैं। संसार में ऐसे अनंत जन्म हुए रहते हैं
अतः उन सारे जन्मों के सम्बन्धियों की संख्या भी अगणित है। किन्तु जिस प्रकार इस स्वप्न के पदार्थ दूसरे
स्वप्न में नहीं दिखायी देते, उसी प्रकार इस जन्म के सम्बन्धी दूसरे जन्म के सम्बन्धियों को नहीं पहचानते। इस
प्रकार जो पत्नी, बच्चे, भाई तथा सम्बन्धी इन रिश्तों को माया समझ कर, वे केवल काल्पनिक हैं, यह मान कर
चलते हैं, वे सचमुच धन्य हैं।
इत्थं परिमृशन् मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन्।
न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः ॥५४॥
जिसके मन में ऐसा विवेक आता है, उसे मोह और माया की कभी बाधा नहीं होती। वह घर में अतिथि
की तरह रह कर अलिप्त रहता है। इस प्रकार जिसने मान, मोह और ममता का त्याग किया है, जो घर में रहकर
भी उदासीन, इच्छाहीन और निर्लोभ रहता है उसे अहंता की बाधा नहीं होती। निर्मोह और निरभिमान होने का
मुख्य कारण गुरु का भजन है। उससे गुरुभक्तों को वैराग्य, विवेक और ज्ञान सहज ढंग से प्राप्त होता है। हे
उद्धव! ऐसे वैराग्य विवेक से रहने पर गृहस्थ को घर में रहकर ही निजमुक्ति प्राप्त होती है। अब अन्य आश्रमों
के आचार विचार, भक्ति, विरक्ति तथा शान्ति आदि आश्रम विभाग के अनुसार बता रहे हैं।
कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।
तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत् ॥ ५५ ॥
जो व्यक्ति घर में रहकर आश्रम धर्म का पालन करते हुए मेरी भक्ति करता है उस भक्त को अन्य आश्रमों

४७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
की आवश्यकता ही नहीं होती। समय हो या असमय हो उसके मन में भजन का विकल्प आता ही नहीं है। ऐसी
जिस गृहस्थ की स्थिति होगी, उसे निरन्तर गृहस्थाश्रम में ही रहना चाहिये। जिसे कर्म की अत्यन्त आसक्ति है
किन्तु विषय के प्रति आसक्ति नहीं है, साथ ही चित्त में ज्ञानयुक्त शान्ति नहीं है, उसे वानप्रस्थ आश्रम का
अधिकारी समझना चाहिये और जिसे विरक्ति, शान्ति और ज्ञान करकमल की तरह उपलब्ध है वही सचमुच
संन्यासग्रहण का अधिकारी है। पुत्र संतति प्राप्त होने पर भार्या को पुत्र को सौंप कर स्वयं संन्यास ग्रहण करना
चाहिये। श्रुति भी इसकी संस्तुति करती है। गृहस्थाश्रम में जिसे भक्ति अच्छी नहीं लगती, अगणित संतति होने
पर भी जो विरक्त नहीं होता और जो वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश नहीं करता, जिसका विषय से मोह नहीं छूटता
है और जो निष्कर्म संन्यासी नहीं बनता उसके निंद्यकर्म के बारे में पुरुषोत्तम स्वयं बता रहे हैं।
यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः।
स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते॥ ५६ ॥
जिसे घर गृहस्थी से विशेष आसक्ति है; जिसका पुत्र प्रेम, धन प्रेम तथा स्त्री प्रेम प्रबल है, जो विकारों का
नितांत लंपट तथा धन का अत्यन्त लोभी है, जो विकारों का अंकित है, जो अहंकार का पोषण करता है, जो स्त्री
पर जी जान से बिक गया है वह अज्ञान की गहरी गर्त में गिरता है। जो आशा के भ्रम से इन्द्रियों का दास बनता
है, वह जीव भाव से बद्धता का गुलाम बनता है। उस बद्धता का रूप और उस मूर्ख की बकवास स्वयं श्रीकृष्ण
उद्धव को बतला रहे हैं।
अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः।
अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः॥ ५७॥
वह कहता है, मेरे माँ-बाप वृद्ध हैं, पत्नी छोटी है और बच्चे नन्हे-मुन्ने हैं; इनसे मैं दूर रहा तो वे तत्काल
मर जायेंगे। इस प्रकार अपनी मृत्यु से भी भयंकर अनेक कल्पनाएँ कर वह परिवार की चिन्ता करता है। कभी
असमय ही यदि मेरी मृत्यु हो गयी तो मेरे ये बच्चे और पत्नी क्या करेंगे? यह कहकर वह रोने लगता है। माँ-
बाप की बात छोड़ो लेकिन पत्नी तो फुक्का फाड़ कर रोयेगी, बच्चे रो-रोकर गला खराब कर लेंगे, यह सोच कर
अपना सिर पीट लेता है। मेरे मरने पर दुःख के मारे ये कैसे जीवित रह पायेंगे? क्या इस प्रकार वह जीवित रह
पायेंगे? इस प्रकार वह जीवित अवस्था में ही उनकी चिन्ता करने लगता है। इसीलिये वह मूढ़ है। इस प्रकार
जहाँ मूर्खता की अपार बाढ़ आती है, वहाँ विपरीत अर्थ में विवेक का जहाज डूब जाता है।
एवं गृहाशाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम्।
अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः॥ ५८ ॥
इस प्रकार गृहस्थी में आसक्त, विषयों के प्रति सदा अतृप्त, स्त्री बच्चों की अखण्ड चिन्ता करने वाला तथा
अंतःकरण में मोह से ग्रस्त, उसकी बुद्धि मोह की मोहकता से मूढ़ हो जाती है और ऐसी स्थिति में जिसकी मृत्यु
हो जाती है वह अंधतम नामक नरक में जाता है। उस अज्ञानतम शक्ति से ज्ञान अन्धा हो जाता है। जहाँ सूर्य की
आँखें भी फूट जाँय ऐसे गहरे अंधतम नरक में वह तामसी लोटपोट होता रहता है। अरेरे! ऐसे मूढ़मति और
नितांत मंदबुद्धि जीव कल्पान्त में भी जहाँ से मुक्तता नहीं होगी, ऐसे 'अंधतम' नामक नरक में जाते हैं और मोह
के पीछे नश्वर विषय के चक्कर में अनंत सुख के अवसर चूक कर कोटि-कोटि दुःख भोगते रहते हैं। इसलिये

सत्रहवाँ अध्याय ४७५
मनुष्य देह प्राप्त करने पर भगवद्भजन कर जन्म-मरण से बचना चाहिये और अपना उद्धार स्वयं ही करना
चाहिये। जीव को जिस-जिस योनी में जन्म लेना पड़ता है उस-उस योनी में विषय की आसक्ति है ही। वही
विषयासक्ति यदि मनुष्य देह में रखें तो फिर परमार्थ प्राप्ति किस देह में की जाय ? जिसके नित्यकर्म में ही
परब्रह्म की प्राप्ति नितांत सुगम और सहज ढंग से होती है, उस ब्राह्मण जन्म को पाने के बाद फिर किस बात की
कमी है ? वे यदि प्रतिदिन संध्या वन्दन करें तो उनके पातकों की तीन-त्रिकाल निवृत्ति होती है। सभी सारों का
मूर्तिमंत सार गायत्री मंत्र जिसके हाथ में रहता है, वेद भी उनके मुखापेक्षी होते हैं। इतनी उनकी महानता होती
है। ब्राह्मणों के हृदय में वेदरूप में स्वयं नारायण विराजते हैं। इसलिये ब्राह्मण त्रैलोक्य में धन्य हैं। जिन ब्राह्मणों
को बड़े-बड़े देवतागण भी शिरसा वंदन करते हैं और जिस ब्राह्मण का चरण साक्षात नारायण भी अपने हृदय पर
धारण करते हैं, उनकी योग्यता का क्या वर्णन किया जाय ? संध्या करते रहने के कारण रत्ती भर भी पातक नहीं
रह जाता इसलिये ब्राह्मण पुण्यमूर्ति हैं ऐसा स्वयं रमापति ने कहा है। 'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः' इस वचन से
भगवान ब्राह्मण का ही वर्णन करते हैं। इस गीता वचन से उपर्युक्त वचन की ही पुष्टि होती है। ब्राह्मण होकर
यदि भगवद्भजन भी हो तो समझो सारा भाग्य एक स्थान पर एकत्र हो गया। उसके लिये अप्राप्य क्या होगा ?
क्योंकि उसकी इच्छा का पालन करने के लिये साक्षात भगवान तत्पर रहते हैं। अहो ! ब्राह्मण लकड़ी अथवा
पत्थर की जिस प्रतिमा की प्रतिष्ठा करें वहाँ भगवान प्रकट होते हैं। ब्राह्मण में इतनी सद्भावना और सहज सामर्थ्य
होता है। ऐसा होते हुए यदि ब्राह्मण का जन्म लेकर वह क्षुद्र विषय का कर्म करता रहे तो उसके हाथ से
पुरुषोत्तम चले जाते हैं। वह ब्राह्मण 'अंधतम' नरक में जाता है। इसलिये एका जनार्दन की सबसे प्रार्थना है कि
मनुष्य देह प्राप्त होने पर भगवद्भक्ति कर निजात्मस्वरूप की प्राप्ति अवश्य कर ले।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
ब्रह्मचर्य गृहस्थ कर्म धर्म निरूपणे एकाकार टीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

अठारहवाँ अध्याय
हे कर्मप्रकाशक ! हे ब्रह्मविद्योपदेश विवेक ! हे कर्मधर्म प्रतिपालक ! हे जगन्नायक ! हे ॐकारस्वरूप
गुरुवर्य ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। हे गोविन्द ! वर्णाश्रम की मर्यादा के तुम आधार हो। वेदानुवाद का कारण तुम ही
हो और विवाद का और संवाद का मूल भी तुम ही हो। तुम शब्दसृष्टि के देदीप्यमान सूर्य हो; तुम वेद के गूढ़ार्थ
के प्रकाशक हो, तुम एक होते हुए अनेक हो गये हो; व्याप्य और व्यापक भी तुम्ही हो। विधि और विधान तुम्हीं
हो, वाचाल भी तुम्हीं हो और मौन भी तुम्हीं हो; हे गुरुराजा ! एका और जनार्दन ये दोनों भी पूर्ण रूप से तुम्ही
हो। इसलिये श्रीभागवत की कविता तुम्हीं हो और अर्थ भी तुम्हीं हो। अर्थज्ञान भी तुम्हीं हो और हमलोगों से
बात कराने वाले भी तुम्हीं हो। जिस प्रकार अपना ही शब्द प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर देता है, उसी प्रकार मेरे
मुख से कवित्व बोलने वाले तुम्हीं हो। श्रीभागवत में कृपामूर्ति श्रीकृष्ण ही वक्ता है। उसने वर्णाश्रम की उत्पत्ति
यथार्थ ढंग से बता दी है। सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य धर्म सुगम ढंग से बतलाया और गृहस्थ के
स्वधर्म का तथा नित्य कर्म का निरूपण किया। अब अठारहवें अध्याय में वानप्रस्थाश्रम का लक्षण तथा संन्यास
धर्म का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।
वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः ॥ १ ॥
अब क्रम के अनुसार वानप्रस्थ का निरूपण आता है। उसे वन में जाने के लिये जीवन के विभाग ही
कारण हैं। श्रुति में पुरुष के जीवन की मर्यादा सौ वर्ष बतायी गयी है; उसमें के दो भाग बीत कर तीसरा भाग
शुरू होने पर अर्थात् छासठवाँ लगने पर वन में जाने की तैयारी करनी चाहिये। वन जाने के पूर्व पत्नी को पुत्र के
सुपुर्द कर देना चाहिये और स्वयं वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करने के लिये वन में जाना चाहिये। महान साध्वी सती
तथा पतिव्रता स्त्री जो पति को ईश्वरस्वरूप मानकर आचरण करती है तथा पति वानप्रस्थाश्रम में जाने के लिये
तैयार होता है तो वह पुत्र के साथ रहने के लिये तैयार नहीं होती। पति की सेवा से वंचित होना उसे कल्पांत की
तरह लगता है, ऐसे पति के चरणों की दासी को अपने साथ वन में ले जाना चाहिये। उसे आश्रम में स्त्रीकाम से
विरत रहकर वही व्रत दृढ़ होकर आगे चलाना चाहिये। जिसने वानप्रस्थ स्वीकार कर लिया उसे मन में शान्ति
धारण करनी चाहिये, कामक्रोध को स्पर्श नहीं करना चाहिये। यह व्रत उसके लिये आवश्यक है।
कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत् ।
व सीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च ॥ २ ॥
वन में ऋतु के अनुसार जो कंदमूल और फल उपलब्ध हों उनमें से अत्यन्त निर्मल और पवित्र फल चुन
कर उन पर निर्वाह करना चाहिये। वनवास में हों तब तक वल्कल, व्याघ्रांबर अथवा मृगचर्म आदि वस्त्र ही
परिधान करें अथवा केवल तृण पहनें या पेड़ के पत्तों का वस्त्र बनायें। अब वानप्रस्थ आश्रम में कौन-सा व्रत
करना चाहिये उसके बारे में भी सुनो। उन व्रतों का निरूपण स्वयं नारायण कर रहे हैं।

अठारहवाँ अध्याय ४७७
केशरोमनखश्मश्रूमलानि बिभृयाद् दतः।
न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः ॥ ३ ॥
जो मस्तक पर आते हैं, वे 'केश', जो मुख पर आते हैं वे 'श्मश्रु' और जो बगल तथा गुह्यभाग में आते हैं
वे 'रोम' इन सबको नहीं काटना चाहिये। मस्तक का कभी वपन नहीं करना चाहिये। श्मश्रु अथवा गुह्य स्थान के
बाल, नाखून नहीं काटने चाहिये। दाँत भी साफ नहीं करने चाहिये। स्नान अवश्य तीन बार करना चाहिये लेकिन
उसी तरह जैसे मूसल को पानी में डुबोकर निकाला जाता है। शरीर पर का मल नहीं धोना चाहिये। वानप्रस्थ का
यही बड़ा व्रत है। सदा जमीन पर सोना चाहिये। नीचे घास भी नहीं बिछानी चाहिये। इस प्रकार वानप्रस्थ का
दृढ़ व्रत धारण कर तप करना चाहिये। उस तप के लक्षण सुनो।
ग्रीष्मे तप्येत पञ्चाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।
आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत् ॥ ४ ॥
गर्मी में पंचाग्निसाधन करना चाहिये। चारों दिशाओं में चार अग्निकुण्ड प्रज्वलित करने चाहिये ताकि ऐसा
लगे जैसे मध्याह्न का सूर्य आकाश पर चमक रहा है। इसे 'पंचाग्नि साधन' कहते हैं। बरसात में ऊँचे स्थान पर
मचान बनाकर मूसलाधार बारिश में उस पर बैठना चाहिये। यह वर्षाकाल का तप है। जाड़े के दिन हों तो रात को
गले तक पानी में डूब कर बैठना चाहिये। यही वानप्रस्थ का तपाचरण है। तप की यह क्रिया वानप्रस्थ के लिये
प्रतिवर्ष के लिये है। अब उम्र के हिसाब से कौन से पदार्थ खाने चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
अग्निपक्वं समश्नीयात् कालपक्वमथापि वा।
उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा ॥ ५ ॥
आग पर पकाये हुए (या आग में भुने हुए कंदमूल) अथवा मौसम के अनुसार पके हुए फल तपस्वी को
उदरनिर्वाह के लिये उपयुक्त हैं। दाँत मजबूत हों तो वह सभी प्रकार के फल खाये और अगर सभी दाँत गिर गये
हों तो उन्हें ओखली में कूट कर खाये। वन में यदि ऊखल प्राप्त न हो तो पत्थर से कूच कर खाना चाहिये। स्वाद
का विचार न कर केवल भूख निवारण का ही उद्देश्य होना चाहिये।
स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।
देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम् ॥ ६ ॥
फलों के मौसम में वे काफी मिलते हैं इसलिये भविष्य के लिये उनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यही
वानप्रस्थ का व्रत है। एक दिन पहले खाये हुए फल यदि बच जाएँ तो उन्हें फेंक देना चाहिये। शास्त्रों में उन्हें
खाने के लिये निषिद्ध माना गया है। प्रतिदिन खाने के लिये ताजा फल लाने चाहिये। बासी फल खाना वानप्रस्थ
के लिये निषिद्ध है यह जान लो। उसी प्रकार किसी दूसरे द्वारा लाये गये फल भी खाने के योग्य नहीं हैं। अपने
ही परिश्रम से स्वयं लाये हुए फल ही आहार के लिये योग्य हैं। देश, काल और वर्तमान आदि का पूर्ण ज्ञान होने
पर भी किसी प्रकार का संग्रह नहीं करना चाहिये। भाग्य पर विश्वास करके रहना चाहिये। दूसरे ने दिया हुआ
दान कभी भी नहीं लेना चाहिये। इस प्रकार का प्रतिग्रह लेने से वानप्रस्थ व्रत भंग होता है।
वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान्।
न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥ ७ ॥

४७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो वानप्रस्थ स्त्री के साथ वन में जाता है उसे अग्निहोत्र का पालन करना चाहिये। इसके लिये उसे वन में
रहकर भी सारे वेदोक्त कर्म करने चाहिये। वन में रहने पर जिस मौसम में जो फल मिलें, उनसे ही चरु और
पुरोडाश कर उनसे ही यथोक्त मंत्र से, मुझ यज्ञपुरुष के लिये यज्ञ करें। श्रौतकर्मविधान के अनुसार वानप्रस्थ में
यज्ञ के लिये पशुवध नहीं करना चाहिये। उसे वन के फलों से ही यज्ञ करना चाहिये।
अग्निहोत्रं च दर्शश्च पूर्णमासश्च पूर्ववत्।
चातुर्मास्यानि च मुनेराम्नातानि च नैगमैः ॥ ८ ॥
पहले जिस प्रकार के अग्निहोत्र आदि कर्म गृहस्थ अपने घर में करता था, उसी प्रकार उसे वानप्रस्थाश्रम
में वेदाज्ञा के अनुसार करने चाहिये। वैदिक क्रिया तथा शास्त्र का आधार लेकर यज्ञ करते रहना चाहिये। उसी
प्रकार वेद की आज्ञा के अनुसार दर्श, पूर्णमास तथा चातुर्मासयाग आदि कार्य भी निष्काम भाव से करने चाहिये।
वन में रहने वाले ऐसे तेजस्वी और तपस्वी मुनीश्वर को क्या फल मिलता है, श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसंततः।
मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैतिमाम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार वेद में कहे अनुसार आस्ति भाव से तथा आदरपूर्वक निरन्तर तप का आचरण करते देह का
केवल अस्थिपंजर रह जाता है। शरीर का ढाँचा भले ही सूख गया हो त्वचा से शिरायें ढकी रहती हों लेकिन
उसका सामर्थ्य बहुत बड़ा होता है। तपोनिष्ठा से वह कभी पीछे नहीं रहता। इस प्रकार जीवनपर्यन्त तप करते
रहने के कारण वह अंतर्बाह्य निष्पाप हो जाता है और उसे सत्यज्ञान प्राप्त होकर वह मेरे निजस्वरूप तक पहुँचता
है। वासना भले ही थोड़ी शेष रहती हो लेकिन सूक्ष्मरूप से उसका प्रतिबन्ध तो होता ही है क्योंकि तप के
अभिमान से देह अहंता भी अणुमात्र रहती ही है। लेकिन जिसमें फल की आशा नहीं रहती वह देहधारी मृत्यु के
बाद पहले ऋषिलोक पहुँचता है और फिर मेरे पास आता है। जो ऋषिलोक जाता है वह क्रमिक मुक्ति के मार्ग
पर लग जाता है और उसी क्रम में वह मेरे पास आता है। इस प्रकार वानप्रस्थ का उद्धार होता है।
यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत्।
कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः॥ १०॥
इस प्रकार जो वानप्रस्थ अत्यन्त कष्ट सहकर तथा तपादिक साधनों का संकट सहन कर फल की आशा
का त्याग करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। जिसके योग से सत्यलोकादि मंगल मोक्षफल हाथ में आता है उन
निर्मल तपादिसाधनों का उपयोग केवल कामनापूर्ति के लिये करते हैं। जिस प्रकार कोई चिन्तामणि के बदले
खपरैल का टुकड़ा माँगे अथवा पारस पत्थर के बदले काली कलूटी ईंट माँगे उसी प्रकार जो मनुष्यों में ब्राह्मण
का जन्म लेकर तप करते हैं, लेकिन कामोपभोग की इच्छा कर तप व्यर्थ कर देते हैं, वे मूर्ख हैं। वानप्रस्थ का
अगला लक्षण शास्त्रसम्मत तथा यथार्थ रूप में सम्पूर्ण बताता हूँ। जो वानप्रस्थ तपादि साधनों से अत्यन्त क्षीण हो
गया हो, फिर भी वैराग्य और ज्ञान उत्पन्न नहीं होता; पचास वर्ष गृहस्थाश्रम में रह कर चौबीस वर्ष वानप्रस्थाश्रम
किया फिर भी वैराग्ययुक्त ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ; जीवन के तीन भाग इस प्रकार खर्च हो गये और चौथा भाग शेष
रहते-रहते वह शरीर से क्षीण और जर्जर हो जाता है। इस प्रकार शरीर क्षीण हो जाय और उसमें यदि थोड़ा-सा
भी वैराग्य उत्पन्न हो जाय, तो संन्यास ग्रहण कर यथाशक्ति कर्म करते रहना चाहिये। अब वानप्रस्थ लेकर भी
जिसे जरा भी वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, उसका अधिकार श्रीकृष्ण बताते हैं।

अठारहवाँ अध्याय ४७९
यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्निं समाविशेत् ॥ ११॥
देह में जरा भी वैराग्य उत्पन्न नहीं हुआ, बैठे-बैठे वृद्धावस्था आ धमकी, स्वधर्म पर चलने की भी शक्ति
नहीं रही, सारा शरीर काँपने लगा, ऐसी स्थिति में यदि वानप्रस्थी वन में हो तो वह आत्मस्वरूप में अग्नि का
समारोप कर, मन में मेरा दृढ़ ध्यान लगा कर अग्नि में प्रवेश करे। अब यदि वानप्रस्थाश्रमी वन में रहकर अत्यन्त
विरक्त हो जाय तो वह कैसा आचरण करे इस बारे में भगवान स्वयं बता रहे हैं।
यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।
विरागो जायते सम्यङ्न्यस्ताग्निः प्रव्रजेत्ततः ॥ १२ ॥
वानप्रस्थाश्रम में योग्य अनुष्ठान होकर अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हो जाय और इन्द्रलोक, चन्द्रलोक तथा
सत्यलोक भी उसे नरक जैसे मालूम पड़ने लगे; सारांश, जिसमें इतना असीम वैराग्य उत्पन्न हो जाय उसे विध्युक्त
ढंग से अपनी विहिताग्नि का विसर्जन करना चाहिये तथा सर्वस्व का त्याग कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये।
संन्यासग्रहण का वह कल्याणकारी प्रकार यथाशास्त्र तथा सम्प्रदाय के अनुसार श्रीकृष्ण यथार्थ रीति से बता रहे हैं।
इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।
अग्नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ १३ ॥
यथाविधि आठ श्राद्ध कर तथा प्रजापत्य नाम की इष्टि कर मुझ भगवन का यजन कर ऋत्विज को सर्वस्व
का दान करें। मुख्य रूप से मूर्त जो अग्नि है उसकी अपने हृदय में स्थापना कर, आशा पूर्ण रूप से छोड़कर
संन्यास दीक्षा ग्रहण कर इच्छारहित हो जाना चाहिए। संन्यास ग्रहण करते समय अनेक विघ्न उपस्थित होते हैं,
उन सबको ठुकरा कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये।
विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः।
विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४॥
ब्राह्मण जब संन्यास लेने लगता है तो समस्त देवतागण अनेक स्त्रियों का रूप लेकर विघ्न उत्पन्न करने
लगते हैं। इसका कारण यह है कि देवताओं का पशु जो मनुष्य है, वह हमेशा देवताओं को बली देता रहता है
तथा उनके अधीन होकर रहता है। अगर वह संन्यास ले ले तो वह हमें देवताओं को भविष्य में बलि नहीं देगा,
इतना ही नहीं बल्कि हमारे सिर पर पैर रखकर ब्रह्मपद भी ले लेगा। यह सोच कर देवतागण सदा उसके लिये
विघ्न उपस्थित करते रहते हैं। ऐसी अवस्था में वैराग्य के बल पर विघ्नों को लात मार कर समस्त देवताओं को
एक ओर हटा कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये। ऐसे वैराग्य से सम्पन्न तथा विवेकज्ञान से अत्यन्त श्रेष्ठ पुरुष
विधि से संन्यास लेकर पूज्य बन जाता है। इस प्रकार संन्यास ग्रहण करने के बाद उसे विधिपूर्वक कैसा आचरण
करना चाहिये इस बारे में नारायण संन्यासी का स्वधर्म लक्षण स्वयं बता रहे हैं।
बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम्।
त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किं चिदनापदि॥ १५॥
प्राणिमात्र को अभयदान देने के लिये संकल्पपूर्वक प्रेमोच्चार करने के बाद उसका देहमात्र दिखाई देता है।
शेष सभी चीजों का उसने पहले से ही त्याग किया रहता है। जो गुरुवाक्य श्रवण के बाद सहज ब्रह्मस्वरूप हो

४८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
जाता है और देहबुद्धि का घेरा उड़ जाता है तथा कर्म का बन्धन भी टूट जाता है, उससे शास्त्रविधि के अनुसार
आचरण करने की बात भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि हाथ में मक्खन आ जाने पर खाली मट्ठा कौन मथता
रहता है ? कपूर अग्नि में मिलने पर वह पुनः लौट कर नहीं आयेगा। इस प्रकार गुरुवाक्य श्रवण से जो ब्रह्मरूप
हो गया उस पर विधि निषेध का कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। लेकिन यदि सचमुच गुरुवाक्य से उसकी ऐसी
अवस्था न हुई तो वो उसका आचरण सुनो। गुरुवाक्य का मनन करते समय यदि नग्न रहने में लज्जा आती हो तो
लिंग को ढँकने के लिये कौपीन का प्रयोग करें और यदि उससे निर्वाह होता न लग रहा हो तो किसी योग्य
कपड़े के टुकड़े का प्रयोग करना चाहिये। जब तक दण्ड और कमण्डल रहता है तब तक कौपीन भी अंगवस्त्र
के साथ रहता है और जब दण्ड का त्याग हो जाता है तो उस समय उसके साथ कपड़े का भी त्याग होता है।
संन्यासी यदि विपत्ति में हो अथवा किसी रोग से ग्रस्त हो या वृद्धावस्था के कारण देह जर्जर हो गया हो तो उसे
जो वह माँगे दिया जाय। गुरुवाक्य का श्रवण-मनन कर जो साधना करता है उस साधक का लक्षण श्रीकृष्ण
स्वयं बता रहे हैं।
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ १६॥
भूमि पर दृष्टि रखकर, पवित्र जमीन देखकर जो आत्मवृत्ति का अनुसंधान कर हंसगति से चलता है, कहीं
राह में जीव दिखायी दे तो प्राण जाने पर भी आगे नहीं बढ़ता, उस जीव को एक ओर हटाकर ही पैर अत्यन्त
निर्मल स्थान पर रखता है। गंगाजल वैसे भी पवित्र है लेकिन उसे भी वस्त्र से छानकर वे उसे निर्मल बनाकर
पीता है। जिसकी वाचा के द्वार पर एकत्र असत्यरूपी कचरा वैराग्यरूपी अग्नि से जलाकर वहाँ सत्य का
कल्पवृक्ष लगाता है। उस कल्पवृक्ष के वचनरूपी फल अत्यन्त रसीले तथा परिपक्व, मधुर रस से सने हुए,
अत्यन्त निर्मल तथा मधुर रहते हैं। उसे श्रवण से चखने पर अत्यन्त मधुर, श्रोताओं की इच्छा तृप्त करने वाली
तथा जीव की इच्छा पूर्ण करने वाली होती है। 'सत्यपूत' अर्थात् सत्य से पावन होने वाली वाणी यही है।
संन्यासी का स्वाभाविक ध्यान अर्थात् 'नारायण' मैं ही हूँ। इस भावना को दृढ़ कर मन पवित्र करना चाहिये। मन
को पवित्र कर पृथ्वी का पर्यटन करना चाहिये, सर्वत्र आत्मस्वरूप देखना यही मन की पवित्रता है। संन्यासी के
धर्म का मुख्य लक्षण यही है कि अंतःकरण पवित्र कर सर्वत्र नारायण स्वरूप की ही भावना धारण की जाय।
उद्धव ! इसी का नाम मन की पवित्रता है। त्रिदंड संन्यासी का क्या लक्षण होता है, यह भी सुनो।
मौनानिहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।
न ह्येते यस्य सन्त्यङ्ग वेणुभिर्न भवेद् यतिः ॥ १७॥
मौन या सत्यभाषण अथवा श्रीराम का नामस्मरण अथवा ओंकार का उच्चार, इसी का नाम है वाग्दण्ड।
शरीर की जो भी कुछ हलचल है वह सब प्राण की शक्ति से होती है। उस प्राण का प्राणायाम से निरोध करें।
प्राणायाम से प्राणों को जीत कर अपने नियंत्रण में रखो। इसका नाम है 'देहदण्ड'। अब मनोदण्ड का लक्षण
सुनो। संकल्प और विकल्प यही मन की चपलता है। उसका छेदन करने के लिये ब्रह्मस्वरूप का अनुसंधान
करें। मेरा रूप सर्वव्यापी है, उस पर दृढ़ भावना से चित्त धारण करने से संकल्प-विकल्प के कारण मन जिधर
भी जाता है वहाँ मेरा स्वरूप रहता ही है। इस प्रकार मन को सावधान रखने तथा ब्रह्मस्वरूप का अनुसन्धान
लगने से संकल्प-विकल्प अपने आप ही क्षीण हो जाते हैं। काया, वाचा और मन इस त्रिदण्ड का सारा लक्षण

अठारहवाँ अध्याय ४८१
मैंने तुम्हें बताया। इसी के योग से सच्चा संन्यास प्राप्त होता है। ये तीनों दण्ड न हों तो केवल बाँस का दण्ड लेने
से संन्यास प्राप्त नहीं होता। केवल दंभ के लिये संन्यास लेना शुद्ध देह की विडम्बना है। अब संन्यासी का
स्वधर्मयुक्त आहार विहार, आचार-विचार, आना-जाना आदि कैसा हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्हान् वर्जयंश्चरेत्।
सप्तागारान्संकॢप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता ॥ १८ ॥
पहले संन्यासियों को चारों वर्णों में भिक्षा थी। लेकिन कलियुग में ब्राह्मणों में ही चार वर्ण हो गये। जिस
वृत्ति के योग से ब्राह्मण का उदरनिर्वाह होता है, वही उस ब्राह्मण का वर्ण होता है। इसलिये उसे भी सुनो।
जीविका के प्रकार बताता हूँ। ब्राह्मण की उपजीविका की मुख्य वृत्ति है शिल उंछ अथवा कोरात्र; उसी प्रकार
अयाचित, अध्यापन अथवा याजन ये भी उपजीविका के साधन हैं। जो उपजीविका के लिये हाथ में शस्त्र लेकर
शूरवृत्ति से अपना निर्वाह करता है उसे ब्राह्मणों में 'क्षत्रिय' समझा जाय। जो नित्य वणिक का व्यवसाय कर
अपनी उपजीविका चलाता है वह सचमुच ब्राह्मणों में वैश्य है और जो शूद्र की वृत्ति पर ही सदा अपनी
उपजीविका कमाता है वह अपने कर्म के कारण शूद्र है। जब 'उत्तम' ब्राह्मण से भिक्षा नहीं मिलती तब क्षत्रिय
वृत्ति से रहने वाले ब्राह्मण से भिक्षा लेनी चाहिये। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों ब्राह्मणों में भिक्षा न
मिलती हो तो शूद्रवृत्ति पर निर्वाह करने वाले ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने का अधिकार है। उन ब्राह्मणों में भी जो
निंद्य हों, अपराधी या बहिष्कृत हों तो उनकी भिक्षा को हाथ नहीं लगाना चाहिये। यही भिक्षा का धर्म है। भिक्षा
लेनी है उसे नियमपूर्वक लें। किसी को पता न लगने दे कि मैं भिक्षा लेने आ रहा हूँ। गिन कर सात घर से ही
भिक्षा लेनी चाहिये और उसमें जो मिले उसमें सन्तुष्ट रहना चाहिये। अब सात घरों में जो भिक्षा मिलेगी, उस
भिक्षा का स्मृतिशास्त्र में विहित धर्म क्या है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।
विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम् ॥ १९॥
मिली हुई भिक्षा हाथ में लेकर गाँव के बाहर नदी के तट पर अथवा सरोवर के किनारे जाएँ और आचमन
करें। भिक्षा माँग कर लाये हुए अन्न का बारह प्रणव मंत्रों से अभिमंत्रण करें। मंत्रोदक से प्रोक्षण करने पर वह
अन्न पवित्र होता है। फिर उस अन्न के चार भाग करें। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और जीवमल इस प्रकार उसके चार
अधिकारी हुए। उन्हें वह कैसे अर्पण किया जाय, सुनो। विष्णु प्रीत्यर्थ जो भाग निकाला हो उसे पानी में डालें
और जीवों के लिये जो भाग निकाला हो उसे ठीक ढंग से जमीन पर रखना चाहिये। जो दो भाग रह गये उसे
सेवन करने का संन्यासी को अधिकार है। या अगर उतने में कोई गरीब माँगने आ जाय तो भूतदया की दृष्टि से
उसे तत्काल अन्न देना चाहिये। लेकिन मैं एक अन्नदाता हूँ ऐसी वृत्ति मन में नहीं उठने देनी चाहिये। दाता का
अभिमान होते ही वह संन्यासव्रत में अधर्म ही समझना चाहिये। कोई गरीब रोज ही अन्न माँगने आता है इसलिये
उसके लिये मधुकरी में अधिक अन्न नहीं माँगना चाहिये। मधुकरी का अन्न भक्षण करते समय यदि अन्न बच
जाए तो उसे फेंकने में दोष लगता है। इसलिये उसका पूरा भक्षण करना चाहिये। लेकिन संन्यासधर्म में सदा लघु
आहार ही करना चाहिये। अधिक भोजन करने से अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। निद्रा और आलस्य का
अत्यधिक कष्ट होता है। अब जिसके लिये संन्यासधर्म ग्रहण किया जाता है, वह संन्यासी का मुख्य धर्म है
जिससे आत्मपद की प्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।

४८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः।
आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः ॥ २०॥
सदासर्वदा शरीर में परिपूर्ण वैराग्य, वह किसी मित्र या सखा की इच्छा नहीं करता। मन से निःसंग होकर
पृथ्वी पर आनन्दपूर्वक विचरण करता रहता है। इन्द्रियों को चित्त के पग से बाँध कर चित्त को चैतन्य में स्थिर
करता है। इससे उसे सर्वत्र चिन्मय स्वरूप ही दिखायी देने लगता है। देह में देहत्व का स्मरण नहीं होता।
आत्मस्थिति का उद्यम ऐसा ही होता है, इससे उसे आत्मक्रीड़ा में ही आराम मिलता है। अब आत्मसुख का
उत्साह और श्रेष्ठ अनुभव कैसा होता है, उसे सुनो। आत्मस्थिति से निजात्मयुक्त होने के कारण वह आत्मानंद में
ही निमग्न रहता है तथा सर्वत्र ऐक्यभाव से डोलते रहकर वह समरस से भर जाता है। ऐसे समत्वसुख का लाभ
मिल सके इसलिये वह सदा एकान्त में ही अकेला रहता है। यही बात श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाश्यः।
आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः॥ २१॥
पवित्र और निर्जन, विस्तृत तथा एकान्त स्थान देखकर वह सद्भक्ति से सदासर्वदा मेरा ध्यान करे। ऐसे
साधक को संसार दुःख में लीन हुए लोगों का साथ छोड़ कर निरन्तर एकान्त में ही रममाण होकर रहना चाहिये
क्योंकि मद्भावयुक्त रहने से साधकों को आत्मसुख की प्राप्ति होती है और जिसे आत्मसुख की प्राप्ति हुई वह
अनन्यभाव से मेरी शरण में आता है। उसे इस संसार में मेरे सिवा अन्य किसी बात में अर्थ ही नहीं दिखायी
देता। इस प्रकार मेरा अनन्य ध्यान करने से साधक 'मैं' और 'तू' का दूजापन भूल जाता है। भेदभाव नष्ट हो
जाने के कारण वह चैतन्यधन मत्स्वरूप होकर ही रहता है। मेरे उस स्वरूप की ऐसी स्थिति रहती है कि
आत्मदृष्टि से देखने पर 'न मैं हूँ', 'न वह है' ऐसी स्थिति हो जाती है। इसी स्थिति को अभेद प्राप्ति कहते हैं।
जब तक द्वैतभावना रहती है, तब तक साधक को संसारमय की बाधा रहती है। एक बार अभेद भावना प्राप्त होने
पर साधक निर्भय हो जाता है क्योंकि अभेद भावना जहाँ रहती है वहाँ बन्ध और मोक्ष की बात ही नहीं रह
जाती। अब जहाँ बन्ध और मोक्ष की गर्जना चलती रहती है उसके बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।
बंध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः ॥ २२॥
ऐक्यस्वरूप पर पहुँच कर एकात्मा प्राप्त होने के बाद बंध मोक्ष की ओर देखने पर वे दोनों मायिक और
मिथ्या लगने लगते हैं। बन्ध और मोक्ष ये दोनों मनुष्य की प्रवृत्ति में ही होते हैं। इन दोनों में भेद यही है कि
इन्द्रियों की विषयासक्ति का नाम 'दृढ़बन्धन' है और हे उद्धव ! काया, वाचा तथा मन से विषयों की शुद्ध विरक्ति
यही वास्तव में मुक्ति है। इसीलिये जिसे सचमुच ही मुक्ति की इच्छा है उसे विषयों की निवृत्ति करनी चाहिये।
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण मुख्य रूप से इसी का उपाय बता रहे हैं।
तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः।
विरक्तः क्षुल्लकामभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत् ॥ २३॥
इस दृष्टि से विचार करें तो जिस विषयासक्ति से दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता है; उन विषयों का ही यदि त्याग
करें तो 'मुक्ति' सहज सिद्ध है। लेकिन वह विरक्ति हमें कैसे प्राप्त हो ? इसके लिये साधक को ऐसा प्रयत्न

अट्ठारहवाँ अध्याय ४८३
करना चाहिये जिससे वैराग्य उत्पन्न हो। अंतःकरण में वासना दृढ़मूल रहती है; उसमें विषयरूप शाखायें फूटती हैं
जो काफी संख्या में बढ़ती है, इसलिये उस वासना को ही समूल नष्ट करने के लिये कठोर वैराग्य की साधना
करनी चाहिये। स्वधर्म कर्म करके वह मुझे अर्पण करना चाहिये, यही वैराग्य प्राप्ति का मुख्य साधन है। कर्म
करके उसका कर्त्तापन छोड़ देना इसी का नाम मदर्पण है। मदर्पण बुद्धि से कर्म करने पर मुझसे प्रेम उत्पन्न होता
है। चित्त में मेरा ही नाम, मेरी ही कीर्ति और मेरा ही चिन्तन होने लगता है। इस प्रकार मेरे प्रति प्रेम का उदय
होने पर वैराग्य उत्पन्न होता है और इस प्रकार विषयों से विरक्ति होकर धीरे-धीरे मेरे सुख की प्राप्ति होती है।
मेरे सुख के कारण मेरा भजन बढ़ने लगता है और सर्वत्र मेरी ब्रह्मत्व से पूर्ण भावना अंकित होती है। इसलिये
सर्वत्र एक ब्रह्म ही भरा हुआ है ऐसी भावना धारण कर, ब्रह्मसुख पर दृष्टि रखकर जब तक मन वानसारहित न
हो जाय तब तक पर्यटन करते रहना चाहिये।
पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत्।
पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४॥
अच्छे-अच्छे पुण्यक्षेत्रों में जाकर पृथ्वी पर्यटन करना चाहिये। पवित्र कुरुक्षेत्र, अत्यन्त पवित्र सात पुरी
(अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, जगन्नाथपुरी तथा द्वारका) पुष्कर, प्रयागराज आदि तीर्थ,
कृतमाला, पयस्विनी, पुण्यस्वरूप ताम्रपर्णी, गोदावरी, नर्मदा, त्रिवेणी, परमपवित्र गोमती; कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा,
तापी, पयोष्णी, चंद्रभागा, यमुना, भागीरथी, नीरा अथवा गंगा समुद्र से जहाँ मिलती है, वह संगम। ऋष्यमूक,
श्रीशैल, व्यंकटाद्रि (व्यंकटगिरी) मूलपीठ का सह्याद्रि अथवा गौतमी के तट का ब्रह्मगिरी आदि की यात्रा करने
से सारे पातकों का संहार होता है। इसलिये मुनिश्रेष्ठों को वह यात्रा अवश्य करनी चाहिये। दण्डकारण्य नाम का
बड़ा अरण्य, नैमिषारण्य, आनन्दवन (काशी के निकट) आदि वनों में संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये।
च्यवन, कपिल तथा न्यास के आश्रम, गौतम और वामन के उत्तम आश्रम, उसी प्रकार सारे श्रम का परिहार करने
वाली बदरिकाश्रम की यात्रा, ऐसे जो पवित्र स्थल हैं वहाँ संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये। अब मार्ग में भिक्षा
के लिये कहाँ जायें इसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। जहाँ उत्तम से उत्तम बाजार और रास्ते होते हैं, उसे ज्ञानी
लोग 'पुर' अथवा शहर कहते हैं। जिस गाँव में बड़ी-बड़ी सड़कें और बाजार न हों उसे 'ग्राम' कहते हैं। वहाँ
जाकर भिक्षा का रोज का व्रत पूरा करना चाहिये। गौ तथा ग्वाले जहाँ रहते हैं उसे 'व्रज' अर्थात् 'ग्वालों का
बाड़ा' कहते हैं। उसी प्रकार 'साय' अर्थात् 'प्याऊ' जहाँ हो वहाँ अथवा यात्रिक जनसमूह में भिक्षा के लिये
घूमते रहना चाहिये। इसी बात का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।
संसिद्ध्येत्याश्वसम्मोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५॥
अंतःकरण शुद्ध करने के लिये वानप्रस्थाश्रम में जो पुरुष हो, उसके द्वार पर भिक्षा के लिये बड़े आदर के
साथ खड़े हो जाना चाहिये। सात्विक के अन्न का सेवन करने से साधक के शरीर में भी प्रत्येक ग्रास के साथ
शुद्ध सात्विकता उत्पन्न होती है। ऐसे शुद्ध अन्न की महिमा है। इसके लिये वानप्रस्थ का द्वार देखकर वहाँ बार-
बार जाना चाहिये। इससे साधकों की निरन्तर शुद्धि होती है। शुद्ध भिक्षा मिलने पर वृत्ति भी सत्त्वशुद्ध होती है
और इससे वासना भी निःशेष होकर आत्मशांति प्रकट होती है। निःशेष वासना समाप्त होने पर उसे सत्यत्व से
संसार दिखायी ही नहीं देता। फिर विषय वासना कहाँ रहेगी ? उस समय अर्थात् ही वैराग्य उत्पन्न होता है।

४८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नैतद्वस्तुतया पश्येद्दृश्यमानं विनश्यति।
असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात् ॥ २६ ॥
इस लोक में जो भी कुछ दिखायी देता है, उसका नाश होता है यह सबको दिखाई देता है लेकिन विषय
के वश में रह कर तथा उसमें लिप्त होकर लोग कैसे छलावे में पड़े रहते हैं। इसके लिये शुद्ध भिक्षा की प्राप्ति
से जिसकी वृत्ति शुद्ध सत्त्वात्मक हो गयी है उसे सत्यत्त्व के कारण विषय दिखायी ही नहीं देते, फिर विषयासक्ति
कैसे होगी? इस प्रकार विषय का मिथ्या होने का जिसे भान होता है, उसका मन विषयासक्त नहीं होता। इसलिये
संसार के अथवा स्वर्ग के साधनों को वह स्पर्श ही नहीं करता। इस प्रकार जो विषय से विरक्त रहता है, उसी का
चित्त परमार्थ की ओर लगा रहता है और वह निजबोध से परमार्थयुक्त होकर संसार में अनासक्त होकर विचरण
करता रहता है। उसके निजबोध का लक्षण अथवा प्रपंच का मिथ्यापन तथा आत्मस्वरूप से आने वाले समाधान
के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक् प्राणसंहतम्।
सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ २७॥
मन, वाणी और प्राण इनके प्रवाह में अहंकार ने उत्पन्न किये हुए देह तथा अन्य संसार आत्मा को मिथ्या
और मायावी है ऐसा ही भास होता है। रस्सी में सर्प का भास सीप में चाँदी का आभास तथा धूप में मृगजल का
जिस प्रकार भास होता है, उसी प्रकार चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप में संसार का भास होता है। स्वप्न की बातें जिस
प्रकार मालूम होती है वैसा ही यह चराचर दिखायी देता है और इस प्रकार यह सारा मिथ्या है ऐसा विश्वास होने
पर स्मरण के सम्बन्ध में कोई आदर नहीं रह जाता। जो अच्छी तरह जग जाता है उसका मन स्वप्न के सुख की
इच्छा नहीं करता; उसी प्रकार स्वस्वरूप में जिसका मन स्थिर हो जाता है वह किसी भी प्रपंच की वस्तु का
स्मरण नहीं करता। इस प्रकार 'त्रिदंडी' और 'बहूदक' यह संन्यासियों का कर्म तुम्हें सुगम करके बतलाया। अब
'हंस' और 'परमहंस' के धर्म भी तुम्हें क्रमानुसार बताता हूँ। संन्यास भी चार प्रकार का है यह ध्यान में रखो।
एक 'हंस' और दूसरा 'परमहंस', तीसरा 'बहूदक' तथा चौथा जो पहले से भिन्न है, वह 'कुटीचक' कहलाता
है। कर्म का त्याग कर जो संन्यासी बना लेकिन मन में न ध्यान है, न ज्ञान है और अन्न के लिये अपने गाँव में ही
रहता है, उसे 'कुटीचक' कहते हैं। कुटीचक में संन्यासी वार्धक्य में 'अग्निहोत्र' और स्त्री का त्याग करता है
किन्तु शिखासूत्र नहीं त्यागता इसलिये उसे गायत्री मंत्र का अधिकार रहता है। नित्य पुत्र के ही घर भिक्षा लेता है,
उसके ही घर में पर्णकुटी बाँधता है और मठी छोड़कर दूर कहीं नहीं जाता इसलिये उसका नाम 'कटीचक' है।
शिखासूत्र का त्याग कर, त्रिदण्डी ग्रहण कर, केवल कर्माचरण करता है; लेकिन ज्ञान बिलकुल नहीं होता। न
निस्सीम वैराग्य रहता है; ज्ञान पर निष्ठा भी अच्छी नहीं रहती लेकिन वह अत्यन्त कर्मठ रहता है। वही
'बहूदकां' में श्रेष्ठ माना जाता है और वैराग्य के निश्चय से ज्ञानसाधना का विचार करने वाला; शिखासूत्र तथा
कर्म का त्याग कर आत्मचिन्तन पर ही जिसकी श्रद्धा रहती है उसे 'विविदर्श' संन्यास कहते हैं और जो इस
प्रकार दृढ़ निष्ठा से आचरण करता है, उसे 'हंस' कहते हैं। कुछ लोग इन्हें 'परमहंस' भी कहते हैं। अब
'परमहंस' का लक्षण सुनो। वह ज्ञाननिष्ठा से परिपूर्ण रहता है इसलिये उसके द्वार. पर 'शान्ति' भी चाकरी करती
है। वह तीनों गुणों को मिथ्या मानता है। कर्म की बात वह मिथ्या ही मानता है और वह स्वयं निष्कर्म ही है यह
वह जानता है। उसी प्रकार कर्म, क्रिया और कर्त्तव्यता यह प्रारब्ध के अनुसार प्रकृति पर ही निर्भर है। ऐसी

अट्ठारहवाँ अध्याय ४८५
स्थिति में जो समाधान में रहता है उसे 'परमहंस' कहते हैं। उसे मठ, मठी आदि की आवश्यकता नहीं होती।
वह नित्य उदास तथा निराश्रय में रहता है। अब हे उद्धव! उस हंस-परमहंस के धर्म तथा उसके मर्म का सुगमता
से वर्णन करता हूँ, सुनो। इतना कह कर श्रीकृष्ण स्वयं कहने लगे।
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।
सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः ॥ २८ ॥
जिसे विषय की वार्ता भी अच्छी नहीं लगती, ज्ञानप्राप्ति के लिये जो उद्यत रहता है, ऐसे अत्यन्त विरक्त
को 'संन्यासी' कहते हैं। वह ज्ञाननिष्ठा से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, उसका सदा मन स्वरूप में लीन रहता है।
उसका आत्मस्वरूप का अनुसन्धान कभी नहीं टूटता। यह हंस भी परमहंस की ही तरह है। भगवद्भक्ति करते-
करते उसकी सारी इच्छाओं की शान्ति हो जाती है। उसके मन में मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती। वही संन्यास
पद्धति सबसे उत्तम है। जो ज्ञाननिष्ठ मेरे भक्त होंगे, उन्हें दंडादिक आश्रमधर्म का अंतःकरण से त्याग करना
चाहिये और केवल बाह्य चिह्न लोकशिक्षा के लिये रखने चाहिये। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण आगे करने
वाले हैं। फिलहाल त्याग के लक्षण सुनो, ऐसा श्रीहरि ने कहा। वह आश्रमधर्म, सभी करता है लेकिन विधि का
दास बनकर नहीं रहता। जल में प्रतिबिम्ब भले ही काँप रहा हो लेकिन बाहर का बिम्ब नहीं काँपता। उसके
अनुसार स्वधर्म कर्म कर्तव्यता का पालन वह करता है लेकिन उसकी कर्मठता नहीं स्वीकारता। अपने सभी कर्मों
में वह अपनी कर्मातीतता अच्छी तरह जानता है। इस प्रकार वह स्वधर्म कर्म करता है लेकिन विधि का भय मन
में नहीं रखता। विधिनिषेध को पैरों तले रौंद कर वह बिना किसी उद्देश्य के कर्म करता है। अपने आश्रमकर्म को
स्पर्श नहीं करता और दण्डादि चिह्न भी हाथ में नहीं रखता। ऐसे सर्वस्व त्याग का लक्षण श्रीकृष्ण आगे बताने
वाले हैं। केवल लोकाचार के लिये वह दण्डादि चिह्न हाथ में धारण करता है और अंतःकरण में निष्काम रहता
है। उसी का लक्षण श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।
वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत्॥ २९॥
उसमें शुद्ध विवेकज्ञान रहता है, लेकिन वह बालक की तरह व्यवहार करता है। देहाभिमान त्याग कर मान
अथवा अपमान जो भी प्राप्त हो उसे सुख के साथ सहन करता है। वह अपने नैष्कर्म्य में अत्यन्त प्रवीण रहता है;
लेकिन कर्मठ की तरह वह सारे कर्मों का आचरण करता है, कहीं किसी बात की कमी दीखने नहीं देता। धर्म का
और अधर्म का लक्षण वह अच्छी तरह जानता है, सभी बातों में वह ज्ञानसम्पन्न रहता है, लेकिन यदि कोई प्रश्न करे
तो उसका समाधान नहीं करता। किसी अज्ञानी की तरह वह कुछ तो बकता रहता है। प्रश्न का समाधान करने पर
कहीं लोग मेरा मान-सम्मान न करें, इसलिये जानबूझ कर मतवाले की तरह बोलता रहता है। वेद का अर्थ तथा
निहित शास्त्रों का अर्थ वह जानता रहता है लेकिन लोगों में उसका प्रदर्शन नहीं करता है। इतना ही नहीं, अपितु
लोग उसे मूर्ख कहें इसके लिये वह अपनी पशुतुल्यता प्रदर्शित करता है। वह वेदवाद-संवाद-विवाद कुछ नहीं
करता, व्यर्थ का वितंडावाद भी नहीं करता। यही बात स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी न हेतुकः।
शुष्कवाद विवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत् ॥ ३० ॥
निजात्म बोध में पक्का होने के कारण वह मीमांसकों का अभिप्राय, कर्मकाण्डों का शास्त्रार्थ अथवा कर्म

४८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सम्बन्धी नानाप्रकार के विवाद वह नहीं करता। जिसे आत्मानंद का अनुभव होता है, वह तर्कशास्त्र के अनुसार
तर्क, वितर्क अथवा कुतर्क प्रारम्भ कर विवाद नहीं करता। प्रख्यात वितंडवादी जो मुँह से ब्रह्मज्ञान की गर्जना
करते हैं और मन में विषयवासना भरी रहती है वही वास्तव में पाखंडी है। सचमुच ब्रह्म का अनुभव न रहते हुए
जो पुरुष अपना आचार त्याग देता है, वह शुद्ध पाखण्डी, अपना पेट भरने वाला तथा दुष्ट स्वरूप का मनुष्य है।
जिसकी वाणी में वाद-विवाद का मैल नहीं है वही आत्मज्ञान से निर्मल रहता है। 'शुष्कवाद' अर्थात् निरर्थक
बकवास से भी वाद उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञानी होता है वह ऐसे वाद-विवाद की बातें देखना भी नहीं चाहता।
फिर वह स्वयं ऐसे विवादों में उलझे यह तो सम्भव ही नहीं है। शास्त्रार्थ चल रहा हो और युक्ति-प्रयुक्ति से पक्ष,
विपक्ष पर साधार बहस चल रही हो तो भी वह किसी का पक्ष नहीं लेता। सच्चाई वह जानता है, लेकिन मुँह से
कुछ नहीं कहता। श्रुतिस्मृति के विरोध में चल रहा वितंडावाद वह देखता रहता है और सही पक्ष क्या है, यह भी
वह जानता है, फिर भी वह किसी के भी समर्थन में नहीं बोलता। वाद-विवाद में बोलने से किसी के मन पर
आघात होगा या अपने ही अंतःकरण में क्रोध उत्पन्न होगा इसलिये वह एक भी शब्द नहीं बोलता।
नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु।
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचनं।
देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित्॥ ३१ ॥
जो ज्ञाता है वह लोगों के प्रति मन में उद्वेग नहीं रखता। कोई निन्दा करता है, कोई तिरस्कार करता है, कोई
अपमान करता है, फिर भी वह आत्मस्थिति से उसे स्वयं सहन करता है। लोग जो भी उपद्रव देते हैं उसे वह इस
प्रकार सहन करता है। प्राणिमात्र में एक ही आत्मा भरा हुआ है, ऐसी उसकी भावना होने के कारण उसे उसका
दुःख नहीं होता। अपने ही अवयव से कोई प्रमाद हो जाने पर जिस प्रकार चित्त में उद्वेग नहीं होता, उसी प्रकार
समस्त प्राणियों में एकात्मा की ही भावना होने के कारण वह उससे दुःखी नहीं होता। उसी प्रकार उसके संसर्ग से
प्राणिमात्र को उद्वेग नहीं होता, उल्टे जीवमात्र को सुख ही होता है। समस्त प्राणियों में भगवान का वास होने के
कारण कहीं उसे कष्ट न हो इसलिये हाथ-पैर हिलाते समय वह काफी सावधान रहता है। जोर से पुकारने से
कहीं भगवान चौंक पड़ेंगे या जप की माला जोर से घुमाने से कहीं भगवान के सिर पर चोट लगेगी इसलिये
हाथ-पैर की चेष्टाओं को निजात्मनिष्ठा से नियंत्रित कर वह प्राणी को भी धक्का नहीं लगने देता। भूतात्मा सभी
भूतों में भरा हुआ है यह जानकर वह जोर से भाषण भी नहीं करता फिर वितंडवाद में वह मुँह किस तरह
खोलेगा? अपने प्राणों पर भी संकट क्यों न आये लेकिन उससे किसी का अपमान नहीं होता। कोई भी जीव क्यों
न हो लेकिन उसका अपमान नहीं करना है, क्योंकि समस्त प्राणिमात्र में श्रीहरि ही विराजमान हैं यह उसे दिखायी
देता है। ज्ञाता को जनता से कोई उद्वेग नहीं होता और ज्ञाता से जनता को भी कभी उद्वेग नहीं होता। जिसकी ऐसी
आत्मस्थिति रहती है वह किसी से बैर नहीं करता। इसी अर्थ का भाषण श्रीकृष्ण सुना रहे हैं।
एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।
यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥३२॥
केवल पशु जैसे देह का अहंकार कर वह किसी से बैर नहीं करता। उसके बारे में भी सुनो। ज्ञानस्वरूप
आत्मा प्रकृति से परे रहता है, वही सारे प्राणियों का आत्मा है और मुझमें भी वही रहता है, यही सोच कर वह
एकात्मा का निर्वाह करता है। सचमुच, जब मेरा ही आत्मस्वरूप प्राणिमात्र में भरा हुआ है तो उसे अपना कौन

अठारहवाँ अध्याय ४८७
और पराया कौन ? और बैर भी किससे करना ? सभी प्राणियों में एक ही आत्मा किस तरह है इसी बात का
दृष्टांत भगवान श्रीकृष्ण दे रहे हैं और उद्धव श्रोता बनकर अत्यन्त सावधान चित्त से श्रवण कर रहा है।
अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित्।
लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥ ३३॥
हजारों गागरों में पानी भरा हो लेकिन उसमें एक ही चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है; उसी प्रकार समस्त
प्राणियों में एक ही आत्मा भरी हुई है। प्राणियों की आकृतियाँ भिन्न-भिन्न दिखायी देती हैं, लेकिन परम कारण से
वे अभिन्न हैं। जिस प्रकार अलंकारों के सुवर्ण में भेद नहीं होता अथवा मिट्टी के गोकुल (नंद, यशोदा, कृष्ण
आदि) बनाएँ तो निराले आकारों में भी वे पूजा के योग्य होते हैं, उन सबमें मिट्टी ही भरी होती है। उसी प्रकार
भगवान में भी प्राणियों का भास होता है अथवा सूत को बुनकर वस्त्र बनाने पर उससे साफा, दुपट्टा, साड़ी आदि
बनते हैं। उसी प्रकार यहाँ ब्रह्म ही संसार के रूप प्रतिभासित होता है। इस प्रकार चाहे साकार हो या निराकार हो,
दोनों ब्रह्म ही है। जिसके ज्ञान का यह निश्चय होता है उसका आहार सुनो। जिस समय खाने को कुछ नहीं
मिलता उस समय भी वह दुःखी नहीं होता। वह अन्न के लिये बेचैन नहीं होता। उसका मनोनिग्रह इतना
शक्तिशाली होता हैं। उत्तम आहार मिलने पर उसे हर्ष भी नहीं होता क्योंकि वह मानता है कि सारी बातें मनुष्य
के कर्म पर निर्भर है। सारांश मिलना या न मिलना ईश्वर के अधीन है इसलिये उसका सुख या दुःख उसके मन
को स्पर्श नहीं करता। प्राणी को जब लाभ भी भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर वह भिक्षा के लिये क्यों
घूमता है ? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं।
आहारार्थं समीहेत युक्तं तत्प्राणधारणम्।
तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते ॥ ३४॥
आश्रमधर्म का पालन करने के लिये भिक्षा के लिये अवश्य घूमना चाहिये। संन्यासी के धर्म के लिये मधुकरी
अत्यन्त योग्य है। साधकों को भी आहार के लिये अवश्य घूमना पड़ता है क्योंकि आहार के बिना उनका चित्त
चंचल होने लगता है। उन्हें रस की आसक्ति छोड़कर भिक्षा का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि आहार के बिना उनका
मन सभी अर्थों में क्षीण होने लगता है। आहार के बिना साधकों से श्रवण-मनन नहीं हो सकता। ध्यान-चिन्तन नहीं
होता इसलिये अनुसंधान भी नहीं टिकता। संन्यासी का यदि ध्यान न लगे तो उसके आश्रमधर्म का जहाज डूबने
लगता है। इसलिये अपने ही हित के लिये उसे भिक्षा के लिये जाना पड़ता है। भिक्षा मिलेगी ऐसी आशा न कर
केवल परमार्थ साधने के लिये भिक्षा का ही शौक रखना चाहिये। आहार सेवन करने से साधक को साधन की प्राप्ति
होती है, साधन मिलने से ज्ञानप्राप्ति होती है और ज्ञानप्राप्ति से मोक्ष का लाभ होता है। मिष्टान्न की तो कभी भी
इच्छा नहीं करनी चाहिये। फिर भीख किसकी माँगनी चाहिये ? इसी बात का उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं।
यदृच्छयोपपन्नामद्याच्छ्रेष्ठमुताऽपरम्।
तथां वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः ॥ ३५ ॥
रूखा-सूखा या मीठा, जैसा भी सुगमता से मिले, उससे ही प्राण धारण करना चाहिये। जिह्वा की लालच
छोड़ देनी चाहिये। निद्रा अथवा आलस्य अपना प्रभाव न दिखाये इस प्रकार का प्राणधारण करें। आसन अथवा
ध्यान ठीक तरह से लगे इस ढंग से खायें, इसे मुक्ताहार कहते हैं। पेड़ की छाल अथवा मृगचर्म, नया या पुराना
वस्त्र जो भी सुगमता से मिले उसे आनन्दपूर्वक ओढ़ें। कथरी अथवा मुलायम बिस्तर, पुआल या जमीन जो भी

४८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुगमता से मिले, उस पर मुनि शयन करते हैं। मैं एक भोक्ता अथवा शयनकर्ता हूँ, यह अहंकार उसमें नहीं
रहता। स्नान आदि कार्यों में भी वह निरभिमानी होता है। श्रीकृष्ण बताते हैं।
शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।
अन्यांश्च नियमाज्ञांनीं यथाहं लीलयेश्वरः ॥ ३६ ॥
आचमन, स्नान अथवा प्रातःविधि करते समय वह शास्त्रविधि का दास बनकर नहीं रहता क्योंकि उसका
कर्माभिमान ही टूट जाता है। सारांश, जैसे मैं अवतारी हूँ, उसी प्रकार वह भी रहता है। जिस प्रकार मैं अलिप्त
होकर सारे कर्म करता हूँ उसी प्रकार योगी भी करता है। जिसके अंतःकरण में विधि का भय नहीं होता वह
कभी कर्म करने के लिये नहीं उठता। इसी बात का रहस्य श्रीकृष्ण विस्तार से बता रहे हैं।
न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।
आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥ ३७ ॥
मेरा दर्शन हो जाने के कारण, कर्म करना अथवा कर्म न करना यह संदेह ही मिट जाता है और संकल्प का
प्राण ही निकल जाता है। मुझ परमात्मा को देखते ही संकल्प मन में ही विलीन हो जाता है, लिंगदेह की गाँठ
खुल जाती है और भेद की त्रिपुटी का लोप हो जाता है। जिसको भेद का ही भान नहीं होता, उसके देह का
पालन-पोषण, स्नान, पान, खाना, भोजन, बैठना-उठना, आना-जाना भी कैसे होगा? जिसने विकल्प के भ्रम को
जीत लिया और अद्वैतस्वरूप में मिल गया, उसके देह की स्थिति और चलन प्रारब्ध के ही हाथ में रहता है। वृक्ष
समूल उखड़ कर गिर भी जाय, तो भी उसमें आर्द्रता तो रहती ही है। पान खाकर निगल भी लें तो भी उसकी
लाली होठों पर रहती ही है। कन्यादान करने के बाद दामाद कन्या को बिदा कराकर ले भी गया लेकिन मान-
सम्मान तो रहता है और मरने तक रूठना और मनाना समाप्त नहीं होता। उसके अनुसार अभिमान के कारण मैं
जबर्दस्ती कर्मकर्ता बनता हूँ, वह अहंता ज्ञान के बल से समाप्त होती है। फिर भी शरीर प्रारब्ध से चलता है।
कुम्हार डंडा और बर्तन लेकर जाता है लेकिन पहिया (चाक) घूमता ही रहता है। उसी प्रकार अभिमान नष्ट होने
पर भी प्रारब्ध से देह चलता ही रहता है। उस देह का पालन-पोषण देह ही करता है इसे ध्यान में रखो। ज्ञाता
को सचमुच ही प्रपंच का भान ही नहीं रहता। जिस प्रकार देह के पास मिथ्यारूप छाया रहती है, उसी प्रकार
ज्ञाता को देह दिखायी पड़ता है। इसीलिये उसे 'देह मैं ही हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। छाया पालकी में बैठे
या विष्ठा पर पड़ी हो, लेकिन उस छाया के अभिमान से पुरुष को उसका कोई सुख या दुःख नहीं होता। उसके
अनुसार देह का मान-सम्मान ज्ञानी की स्थिति में बिलकुल बाधक नहीं होता। प्रारब्ध को क्षय होने पर उन्हें
विदेह मोक्ष प्राप्त होता है। पानी की लहर जिस प्रकार समुद्र के जल में मिल जाती है उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें ही
विदेह अवस्था में समरस हो जाता है। जब तक उद्गम-संगम प्रवाह रहता है तब तक नदी के नामरूप की
ख्याति रहती है लेकिन प्रलय होने पर वह समाप्त हो जाती है। उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें एकरूप हो जाते हैं।
उद्धव ! ब्रह्मसाक्षात्कार प्राप्त किये हुए संन्यासी कैसे रहते हैं और उनकी स्वधर्म की रीति कैसी होती है इसके
बारे में तुम्हें बतलाया। अब मुमुक्षु संन्यासी कैसा होता है, सुनो।
दुःखोदर्कैषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।
अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत् ॥ ३८ ॥
चोटी से मूल तक, जिसके फल उत्तरोत्तर दुःखदायी होते हैं, ऐसे अत्यंत बाधक विषयजाल के प्रति वह

अठारहवाँ अध्याय ४८९
अनासक्त रहता है; मेरी प्राप्ति के लिये जिसका चित्त सदा उत्सुक रहता है; जो स्वधर्म कर्म पर ही चलता है और
वेदशास्त्रों का विचार करता है; ऐहिक तथा पारलौकिक सुख से जिसका चित्त त्रस्त रहता है, ऐसा जो नित्य
विरक्त तथा विख्यात मुमुक्षु हो, वह जो ब्रह्मज्ञान साधने के लिये साधनों में मन लगाए और यदि उसका स्वधर्म
कर्म विपरीत हो जाय तो उन दोषों के कारण ही उसकी हानि होती है। इसलिये उसे विधिपूर्वक कर्मों का त्याग
कर संन्यास ग्रहण कर सद्गुरु की शरण में जाना चाहिये जिससे उसे श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। लेकिन कई
लोग केवल भावार्थी होते हैं। वे स्वधर्म कर्म के प्रकार नहीं जानते। उन्हें शास्त्रश्रवण की भी जानकारी नहीं
होती। लेकिन मेरे प्रति उनका प्रेम असीम रहता है। उसे भी संन्यास ग्रहण कर गुरु की शरण में जाना चाहिये।
उसे भी गुरुकृपा से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिसे गुरु बनायें वह परोक्षापरोक्ष ज्ञान में पारंगत होना चाहिये।
अब उसकी सेवा का भावार्थ स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।
यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ३९ ॥
गुरु के प्रति, वह अचल, निर्मल, परा से परे का परमेश्वर, परब्रह्म और ईश्वर है ऐसा विश्वास रखना
चाहिये। इस दृढ़ विश्वास की आदत से गुरुचरणों के प्रति अपूर्व लगाव उत्पन्न हो कर भजन में नित नया और
अधिकाधिक माधुर्य आने लगता है। इस प्रकार भजन में रुचि उत्पन्न होने पर अंतःकरण में अत्यन्त श्रद्धा उफन
आती है, गुरु की आज्ञा का वह रत्तीभर भी उल्लंघन नहीं करता और आलस को झटकार देता है। गुरुवचन के
श्रवण के बहाने विकल्प की जड़ काट देता है और संकल्प को सूली पर चढ़ाकर अभिमान का विनाश करता है।
उस समय ईर्ष्या किस तरह सिर उठाएगी ? वह भय के मारे वहीं समाप्त हो जाती है। इस प्रकार गुरु के प्रति
अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न होती है; वह परब्रह्म दृष्टि से ही गुरु को देखता है। जो निर्गुण और निराकार है वही साक्षात
मेरा गुरु है। नित्य और निर्विकल्प जो समाधिसुख है वह मेरे गुरु के चरणों का तीर्थ है। गुरु को इस प्रकार
ब्रह्मस्वरूप से देखने पर शिष्य को भी ब्रह्मस्वरूप की ही पुष्टि प्राप्त होती है। वह सारी सृष्टि को ही ब्रह्मरूप में
देखने लगता है और आत्मा की एकता से गुरुचरणों पर गिर जाता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप से ऐक्य होने पर भी
गुरु की सेवा करनी ही पड़ती है। ब्रह्म से ऐक्य होने पर भी अखण्डत्व के कारण सेवा नहीं टूटती। कर्पूर पानी में
डालने पर स्वयं पिघल जाता है लेकिन साथ ही वह जल को भी सुगन्धित कर देता है। उसी प्रकार अहंभाव नष्ट
होने पर भी वह सर्वदा गुरुचरणों की सेवा करता रहता है। ऐसी अवस्था प्राप्त न कर केवल मस्तक का मुण्डन
करा कर स्वयं को बड़ा संन्यासी कहलाना अनुचित है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं। संन्यास लेकर जो ब्रह्मस्वरूप का
साक्षात्कार नहीं कर लेता उसका श्रीकृष्ण धिःकार करते हैं और दोष लगाते हैं।
यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसार्थिः।
ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीव ति ॥ ४० ॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।
अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते ॥ ४१ ॥
कुछ लोग देह में वैराग्य की भावना हुए बिना ही, विषयों के प्रति विरक्ति न होते हुए भी, दूसरों की
देखादेखी, केवल अन्न के लिये संन्यास ग्रहण करते हैं। संन्यास लेने के पूर्व अंतःकरण में जो भी वैराग्य था, वह
भी संन्यास लेने के बाद तुरन्त चला जाता है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और छठवाँ मन यही छः शत्रु हैं। उनका निर्मूलन