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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 869 में से

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पृष्ठ 497

अठारहवाँ अध्याय ४८१
मैंने तुम्हें बताया। इसी के योग से सच्चा संन्यास प्राप्त होता है। ये तीनों दण्ड न हों तो केवल बाँस का दण्ड लेने
से संन्यास प्राप्त नहीं होता। केवल दंभ के लिये संन्यास लेना शुद्ध देह की विडम्बना है। अब संन्यासी का
स्वधर्मयुक्त आहार विहार, आचार-विचार, आना-जाना आदि कैसा हो इसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्हान् वर्जयंश्चरेत्।
सप्तागारान्संकॢप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता ॥ १८ ॥
पहले संन्यासियों को चारों वर्णों में भिक्षा थी। लेकिन कलियुग में ब्राह्मणों में ही चार वर्ण हो गये। जिस
वृत्ति के योग से ब्राह्मण का उदरनिर्वाह होता है, वही उस ब्राह्मण का वर्ण होता है। इसलिये उसे भी सुनो।
जीविका के प्रकार बताता हूँ। ब्राह्मण की उपजीविका की मुख्य वृत्ति है शिल उंछ अथवा कोरात्र; उसी प्रकार
अयाचित, अध्यापन अथवा याजन ये भी उपजीविका के साधन हैं। जो उपजीविका के लिये हाथ में शस्त्र लेकर
शूरवृत्ति से अपना निर्वाह करता है उसे ब्राह्मणों में 'क्षत्रिय' समझा जाय। जो नित्य वणिक का व्यवसाय कर
अपनी उपजीविका चलाता है वह सचमुच ब्राह्मणों में वैश्य है और जो शूद्र की वृत्ति पर ही सदा अपनी
उपजीविका कमाता है वह अपने कर्म के कारण शूद्र है। जब 'उत्तम' ब्राह्मण से भिक्षा नहीं मिलती तब क्षत्रिय
वृत्ति से रहने वाले ब्राह्मण से भिक्षा लेनी चाहिये। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों ब्राह्मणों में भिक्षा न
मिलती हो तो शूद्रवृत्ति पर निर्वाह करने वाले ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने का अधिकार है। उन ब्राह्मणों में भी जो
निंद्य हों, अपराधी या बहिष्कृत हों तो उनकी भिक्षा को हाथ नहीं लगाना चाहिये। यही भिक्षा का धर्म है। भिक्षा
लेनी है उसे नियमपूर्वक लें। किसी को पता न लगने दे कि मैं भिक्षा लेने आ रहा हूँ। गिन कर सात घर से ही
भिक्षा लेनी चाहिये और उसमें जो मिले उसमें सन्तुष्ट रहना चाहिये। अब सात घरों में जो भिक्षा मिलेगी, उस
भिक्षा का स्मृतिशास्त्र में विहित धर्म क्या है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यतः।
विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम् ॥ १९॥
मिली हुई भिक्षा हाथ में लेकर गाँव के बाहर नदी के तट पर अथवा सरोवर के किनारे जाएँ और आचमन
करें। भिक्षा माँग कर लाये हुए अन्न का बारह प्रणव मंत्रों से अभिमंत्रण करें। मंत्रोदक से प्रोक्षण करने पर वह
अन्न पवित्र होता है। फिर उस अन्न के चार भाग करें। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और जीवमल इस प्रकार उसके चार
अधिकारी हुए। उन्हें वह कैसे अर्पण किया जाय, सुनो। विष्णु प्रीत्यर्थ जो भाग निकाला हो उसे पानी में डालें
और जीवों के लिये जो भाग निकाला हो उसे ठीक ढंग से जमीन पर रखना चाहिये। जो दो भाग रह गये उसे
सेवन करने का संन्यासी को अधिकार है। या अगर उतने में कोई गरीब माँगने आ जाय तो भूतदया की दृष्टि से
उसे तत्काल अन्न देना चाहिये। लेकिन मैं एक अन्नदाता हूँ ऐसी वृत्ति मन में नहीं उठने देनी चाहिये। दाता का
अभिमान होते ही वह संन्यासव्रत में अधर्म ही समझना चाहिये। कोई गरीब रोज ही अन्न माँगने आता है इसलिये
उसके लिये मधुकरी में अधिक अन्न नहीं माँगना चाहिये। मधुकरी का अन्न भक्षण करते समय यदि अन्न बच
जाए तो उसे फेंकने में दोष लगता है। इसलिये उसका पूरा भक्षण करना चाहिये। लेकिन संन्यासधर्म में सदा लघु
आहार ही करना चाहिये। अधिक भोजन करने से अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। निद्रा और आलस्य का
अत्यधिक कष्ट होता है। अब जिसके लिये संन्यासधर्म ग्रहण किया जाता है, वह संन्यासी का मुख्य धर्म है
जिससे आत्मपद की प्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।