श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४७३
विषय कामना त्याग कर, घरबार की आसक्ति छोड़कर गृहस्थ को निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिये यही
स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥५२॥
घर की परिस्थिति घरबार, पत्नी और बच्चों के कारण भले ही सम्पन्न हो जाय लेकिन उसमें आसक्ति नहीं
रखनी चाहिये; परमात्म युक्ति के साधनों से चित्तवृत्ति को सावधान रखें। कल्पना, प्रमाद का संग छोड़ तथा
स्त्रियों से बच कर, उत्कृष्ट ईश्वर निष्ठा रख कर वृत्ति को अभंग रखे। उद्धव! गृहस्थ के परिवार में विषय की
स्थिति का विचार करके देखो तो उसका परिणाम अशाश्वत ही होता है यह जान लो। इसी प्रकार जो परिणाम
इस लोक का है वही स्वर्गलोक का होता है। दोनों ही नश्वर और मायिक होने के कारण मिथ्या हैं। स्त्री, बच्चे
और सम्पत्ति ये सब स्वप्न की ही तरह क्षणभंगुर हैं। इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं निरूपण करते हैं।
पुत्रदाराप्तबन्धूनां सङ्गमः पान्थसङ्गमः।
अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥५३॥
जिस प्रकार पथिक क्षण भर के लिये वृक्ष के नीचे एकत्र होते हैं, उसी प्रकार पत्नी, पुत्र व आप्तजन इन
सबका समागम भी क्षणिक ही है। जब दो नदियों के प्रवाह एक स्थान पर मिलते हैं तो उनके साथ बह कर आने
वाली लकड़ियाँ भी संगम पर एकत्र होती हैं, उसी प्रकार इष्टमित्र भी एक जगह एकत्र होते हैं और बड़ी लहर
आते ही जिस प्रकार वे लकड़ियाँ चारों दिशाओं में बिखर जाती हैं उसी प्रकार इष्ट मित्रों की भी स्थिति होती है।
जीव जिस योनि में जन्म लेता है उसी योनि के सम्बन्धी भी मिलते हैं। संसार में ऐसे अनंत जन्म हुए रहते हैं
अतः उन सारे जन्मों के सम्बन्धियों की संख्या भी अगणित है। किन्तु जिस प्रकार इस स्वप्न के पदार्थ दूसरे
स्वप्न में नहीं दिखायी देते, उसी प्रकार इस जन्म के सम्बन्धी दूसरे जन्म के सम्बन्धियों को नहीं पहचानते। इस
प्रकार जो पत्नी, बच्चे, भाई तथा सम्बन्धी इन रिश्तों को माया समझ कर, वे केवल काल्पनिक हैं, यह मान कर
चलते हैं, वे सचमुच धन्य हैं।
इत्थं परिमृशन् मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन्।
न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः ॥५४॥
जिसके मन में ऐसा विवेक आता है, उसे मोह और माया की कभी बाधा नहीं होती। वह घर में अतिथि
की तरह रह कर अलिप्त रहता है। इस प्रकार जिसने मान, मोह और ममता का त्याग किया है, जो घर में रहकर
भी उदासीन, इच्छाहीन और निर्लोभ रहता है उसे अहंता की बाधा नहीं होती। निर्मोह और निरभिमान होने का
मुख्य कारण गुरु का भजन है। उससे गुरुभक्तों को वैराग्य, विवेक और ज्ञान सहज ढंग से प्राप्त होता है। हे
उद्धव! ऐसे वैराग्य विवेक से रहने पर गृहस्थ को घर में रहकर ही निजमुक्ति प्राप्त होती है। अब अन्य आश्रमों
के आचार विचार, भक्ति, विरक्ति तथा शान्ति आदि आश्रम विभाग के अनुसार बता रहे हैं।
कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।
तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत् ॥ ५५ ॥
जो व्यक्ति घर में रहकर आश्रम धर्म का पालन करते हुए मेरी भक्ति करता है उस भक्त को अन्य आश्रमों