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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 869 में से

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पृष्ठ 491

सत्रहवाँ अध्याय ४७५
मनुष्य देह प्राप्त करने पर भगवद्भजन कर जन्म-मरण से बचना चाहिये और अपना उद्धार स्वयं ही करना
चाहिये। जीव को जिस-जिस योनी में जन्म लेना पड़ता है उस-उस योनी में विषय की आसक्ति है ही। वही
विषयासक्ति यदि मनुष्य देह में रखें तो फिर परमार्थ प्राप्ति किस देह में की जाय ? जिसके नित्यकर्म में ही
परब्रह्म की प्राप्ति नितांत सुगम और सहज ढंग से होती है, उस ब्राह्मण जन्म को पाने के बाद फिर किस बात की
कमी है ? वे यदि प्रतिदिन संध्या वन्दन करें तो उनके पातकों की तीन-त्रिकाल निवृत्ति होती है। सभी सारों का
मूर्तिमंत सार गायत्री मंत्र जिसके हाथ में रहता है, वेद भी उनके मुखापेक्षी होते हैं। इतनी उनकी महानता होती
है। ब्राह्मणों के हृदय में वेदरूप में स्वयं नारायण विराजते हैं। इसलिये ब्राह्मण त्रैलोक्य में धन्य हैं। जिन ब्राह्मणों
को बड़े-बड़े देवतागण भी शिरसा वंदन करते हैं और जिस ब्राह्मण का चरण साक्षात नारायण भी अपने हृदय पर
धारण करते हैं, उनकी योग्यता का क्या वर्णन किया जाय ? संध्या करते रहने के कारण रत्ती भर भी पातक नहीं
रह जाता इसलिये ब्राह्मण पुण्यमूर्ति हैं ऐसा स्वयं रमापति ने कहा है। 'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः' इस वचन से
भगवान ब्राह्मण का ही वर्णन करते हैं। इस गीता वचन से उपर्युक्त वचन की ही पुष्टि होती है। ब्राह्मण होकर
यदि भगवद्भजन भी हो तो समझो सारा भाग्य एक स्थान पर एकत्र हो गया। उसके लिये अप्राप्य क्या होगा ?
क्योंकि उसकी इच्छा का पालन करने के लिये साक्षात भगवान तत्पर रहते हैं। अहो ! ब्राह्मण लकड़ी अथवा
पत्थर की जिस प्रतिमा की प्रतिष्ठा करें वहाँ भगवान प्रकट होते हैं। ब्राह्मण में इतनी सद्भावना और सहज सामर्थ्य
होता है। ऐसा होते हुए यदि ब्राह्मण का जन्म लेकर वह क्षुद्र विषय का कर्म करता रहे तो उसके हाथ से
पुरुषोत्तम चले जाते हैं। वह ब्राह्मण 'अंधतम' नरक में जाता है। इसलिये एका जनार्दन की सबसे प्रार्थना है कि
मनुष्य देह प्राप्त होने पर भगवद्भक्ति कर निजात्मस्वरूप की प्राप्ति अवश्य कर ले।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
ब्रह्मचर्य गृहस्थ कर्म धर्म निरूपणे एकाकार टीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।