श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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जो वानप्रस्थ स्त्री के साथ वन में जाता है उसे अग्निहोत्र का पालन करना चाहिये। इसके लिये उसे वन में
रहकर भी सारे वेदोक्त कर्म करने चाहिये। वन में रहने पर जिस मौसम में जो फल मिलें, उनसे ही चरु और
पुरोडाश कर उनसे ही यथोक्त मंत्र से, मुझ यज्ञपुरुष के लिये यज्ञ करें। श्रौतकर्मविधान के अनुसार वानप्रस्थ में
यज्ञ के लिये पशुवध नहीं करना चाहिये। उसे वन के फलों से ही यज्ञ करना चाहिये।
अग्निहोत्रं च दर्शश्च पूर्णमासश्च पूर्ववत्।
चातुर्मास्यानि च मुनेराम्नातानि च नैगमैः ॥ ८ ॥
पहले जिस प्रकार के अग्निहोत्र आदि कर्म गृहस्थ अपने घर में करता था, उसी प्रकार उसे वानप्रस्थाश्रम
में वेदाज्ञा के अनुसार करने चाहिये। वैदिक क्रिया तथा शास्त्र का आधार लेकर यज्ञ करते रहना चाहिये। उसी
प्रकार वेद की आज्ञा के अनुसार दर्श, पूर्णमास तथा चातुर्मासयाग आदि कार्य भी निष्काम भाव से करने चाहिये।
वन में रहने वाले ऐसे तेजस्वी और तपस्वी मुनीश्वर को क्या फल मिलता है, श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसंततः।
मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैतिमाम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार वेद में कहे अनुसार आस्ति भाव से तथा आदरपूर्वक निरन्तर तप का आचरण करते देह का
केवल अस्थिपंजर रह जाता है। शरीर का ढाँचा भले ही सूख गया हो त्वचा से शिरायें ढकी रहती हों लेकिन
उसका सामर्थ्य बहुत बड़ा होता है। तपोनिष्ठा से वह कभी पीछे नहीं रहता। इस प्रकार जीवनपर्यन्त तप करते
रहने के कारण वह अंतर्बाह्य निष्पाप हो जाता है और उसे सत्यज्ञान प्राप्त होकर वह मेरे निजस्वरूप तक पहुँचता
है। वासना भले ही थोड़ी शेष रहती हो लेकिन सूक्ष्मरूप से उसका प्रतिबन्ध तो होता ही है क्योंकि तप के
अभिमान से देह अहंता भी अणुमात्र रहती ही है। लेकिन जिसमें फल की आशा नहीं रहती वह देहधारी मृत्यु के
बाद पहले ऋषिलोक पहुँचता है और फिर मेरे पास आता है। जो ऋषिलोक जाता है वह क्रमिक मुक्ति के मार्ग
पर लग जाता है और उसी क्रम में वह मेरे पास आता है। इस प्रकार वानप्रस्थ का उद्धार होता है।
यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत्।
कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः॥ १०॥
इस प्रकार जो वानप्रस्थ अत्यन्त कष्ट सहकर तथा तपादिक साधनों का संकट सहन कर फल की आशा
का त्याग करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। जिसके योग से सत्यलोकादि मंगल मोक्षफल हाथ में आता है उन
निर्मल तपादिसाधनों का उपयोग केवल कामनापूर्ति के लिये करते हैं। जिस प्रकार कोई चिन्तामणि के बदले
खपरैल का टुकड़ा माँगे अथवा पारस पत्थर के बदले काली कलूटी ईंट माँगे उसी प्रकार जो मनुष्यों में ब्राह्मण
का जन्म लेकर तप करते हैं, लेकिन कामोपभोग की इच्छा कर तप व्यर्थ कर देते हैं, वे मूर्ख हैं। वानप्रस्थ का
अगला लक्षण शास्त्रसम्मत तथा यथार्थ रूप में सम्पूर्ण बताता हूँ। जो वानप्रस्थ तपादि साधनों से अत्यन्त क्षीण हो
गया हो, फिर भी वैराग्य और ज्ञान उत्पन्न नहीं होता; पचास वर्ष गृहस्थाश्रम में रह कर चौबीस वर्ष वानप्रस्थाश्रम
किया फिर भी वैराग्ययुक्त ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ; जीवन के तीन भाग इस प्रकार खर्च हो गये और चौथा भाग शेष
रहते-रहते वह शरीर से क्षीण और जर्जर हो जाता है। इस प्रकार शरीर क्षीण हो जाय और उसमें यदि थोड़ा-सा
भी वैराग्य उत्पन्न हो जाय, तो संन्यास ग्रहण कर यथाशक्ति कर्म करते रहना चाहिये। अब वानप्रस्थ लेकर भी
जिसे जरा भी वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, उसका अधिकार श्रीकृष्ण बताते हैं।