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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 869 में से

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पृष्ठ 495

अठारहवाँ अध्याय ४७९
यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथुः।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्निं समाविशेत् ॥ ११॥
देह में जरा भी वैराग्य उत्पन्न नहीं हुआ, बैठे-बैठे वृद्धावस्था आ धमकी, स्वधर्म पर चलने की भी शक्ति
नहीं रही, सारा शरीर काँपने लगा, ऐसी स्थिति में यदि वानप्रस्थी वन में हो तो वह आत्मस्वरूप में अग्नि का
समारोप कर, मन में मेरा दृढ़ ध्यान लगा कर अग्नि में प्रवेश करे। अब यदि वानप्रस्थाश्रमी वन में रहकर अत्यन्त
विरक्त हो जाय तो वह कैसा आचरण करे इस बारे में भगवान स्वयं बता रहे हैं।
यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।
विरागो जायते सम्यङ्न्यस्ताग्निः प्रव्रजेत्ततः ॥ १२ ॥
वानप्रस्थाश्रम में योग्य अनुष्ठान होकर अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हो जाय और इन्द्रलोक, चन्द्रलोक तथा
सत्यलोक भी उसे नरक जैसे मालूम पड़ने लगे; सारांश, जिसमें इतना असीम वैराग्य उत्पन्न हो जाय उसे विध्युक्त
ढंग से अपनी विहिताग्नि का विसर्जन करना चाहिये तथा सर्वस्व का त्याग कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये।
संन्यासग्रहण का वह कल्याणकारी प्रकार यथाशास्त्र तथा सम्प्रदाय के अनुसार श्रीकृष्ण यथार्थ रीति से बता रहे हैं।
इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।
अग्नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ १३ ॥
यथाविधि आठ श्राद्ध कर तथा प्रजापत्य नाम की इष्टि कर मुझ भगवन का यजन कर ऋत्विज को सर्वस्व
का दान करें। मुख्य रूप से मूर्त जो अग्नि है उसकी अपने हृदय में स्थापना कर, आशा पूर्ण रूप से छोड़कर
संन्यास दीक्षा ग्रहण कर इच्छारहित हो जाना चाहिए। संन्यास ग्रहण करते समय अनेक विघ्न उपस्थित होते हैं,
उन सबको ठुकरा कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये।
विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः।
विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम् ॥ १४॥
ब्राह्मण जब संन्यास लेने लगता है तो समस्त देवतागण अनेक स्त्रियों का रूप लेकर विघ्न उत्पन्न करने
लगते हैं। इसका कारण यह है कि देवताओं का पशु जो मनुष्य है, वह हमेशा देवताओं को बली देता रहता है
तथा उनके अधीन होकर रहता है। अगर वह संन्यास ले ले तो वह हमें देवताओं को भविष्य में बलि नहीं देगा,
इतना ही नहीं बल्कि हमारे सिर पर पैर रखकर ब्रह्मपद भी ले लेगा। यह सोच कर देवतागण सदा उसके लिये
विघ्न उपस्थित करते रहते हैं। ऐसी अवस्था में वैराग्य के बल पर विघ्नों को लात मार कर समस्त देवताओं को
एक ओर हटा कर संन्यास ग्रहण करना चाहिये। ऐसे वैराग्य से सम्पन्न तथा विवेकज्ञान से अत्यन्त श्रेष्ठ पुरुष
विधि से संन्यास लेकर पूज्य बन जाता है। इस प्रकार संन्यास ग्रहण करने के बाद उसे विधिपूर्वक कैसा आचरण
करना चाहिये इस बारे में नारायण संन्यासी का स्वधर्म लक्षण स्वयं बता रहे हैं।
बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम्।
त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किं चिदनापदि॥ १५॥
प्राणिमात्र को अभयदान देने के लिये संकल्पपूर्वक प्रेमोच्चार करने के बाद उसका देहमात्र दिखाई देता है।
शेष सभी चीजों का उसने पहले से ही त्याग किया रहता है। जो गुरुवाक्य श्रवण के बाद सहज ब्रह्मस्वरूप हो