श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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जाता है और देहबुद्धि का घेरा उड़ जाता है तथा कर्म का बन्धन भी टूट जाता है, उससे शास्त्रविधि के अनुसार
आचरण करने की बात भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि हाथ में मक्खन आ जाने पर खाली मट्ठा कौन मथता
रहता है ? कपूर अग्नि में मिलने पर वह पुनः लौट कर नहीं आयेगा। इस प्रकार गुरुवाक्य श्रवण से जो ब्रह्मरूप
हो गया उस पर विधि निषेध का कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। लेकिन यदि सचमुच गुरुवाक्य से उसकी ऐसी
अवस्था न हुई तो वो उसका आचरण सुनो। गुरुवाक्य का मनन करते समय यदि नग्न रहने में लज्जा आती हो तो
लिंग को ढँकने के लिये कौपीन का प्रयोग करें और यदि उससे निर्वाह होता न लग रहा हो तो किसी योग्य
कपड़े के टुकड़े का प्रयोग करना चाहिये। जब तक दण्ड और कमण्डल रहता है तब तक कौपीन भी अंगवस्त्र
के साथ रहता है और जब दण्ड का त्याग हो जाता है तो उस समय उसके साथ कपड़े का भी त्याग होता है।
संन्यासी यदि विपत्ति में हो अथवा किसी रोग से ग्रस्त हो या वृद्धावस्था के कारण देह जर्जर हो गया हो तो उसे
जो वह माँगे दिया जाय। गुरुवाक्य का श्रवण-मनन कर जो साधना करता है उस साधक का लक्षण श्रीकृष्ण
स्वयं बता रहे हैं।
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ १६॥
भूमि पर दृष्टि रखकर, पवित्र जमीन देखकर जो आत्मवृत्ति का अनुसंधान कर हंसगति से चलता है, कहीं
राह में जीव दिखायी दे तो प्राण जाने पर भी आगे नहीं बढ़ता, उस जीव को एक ओर हटाकर ही पैर अत्यन्त
निर्मल स्थान पर रखता है। गंगाजल वैसे भी पवित्र है लेकिन उसे भी वस्त्र से छानकर वे उसे निर्मल बनाकर
पीता है। जिसकी वाचा के द्वार पर एकत्र असत्यरूपी कचरा वैराग्यरूपी अग्नि से जलाकर वहाँ सत्य का
कल्पवृक्ष लगाता है। उस कल्पवृक्ष के वचनरूपी फल अत्यन्त रसीले तथा परिपक्व, मधुर रस से सने हुए,
अत्यन्त निर्मल तथा मधुर रहते हैं। उसे श्रवण से चखने पर अत्यन्त मधुर, श्रोताओं की इच्छा तृप्त करने वाली
तथा जीव की इच्छा पूर्ण करने वाली होती है। 'सत्यपूत' अर्थात् सत्य से पावन होने वाली वाणी यही है।
संन्यासी का स्वाभाविक ध्यान अर्थात् 'नारायण' मैं ही हूँ। इस भावना को दृढ़ कर मन पवित्र करना चाहिये। मन
को पवित्र कर पृथ्वी का पर्यटन करना चाहिये, सर्वत्र आत्मस्वरूप देखना यही मन की पवित्रता है। संन्यासी के
धर्म का मुख्य लक्षण यही है कि अंतःकरण पवित्र कर सर्वत्र नारायण स्वरूप की ही भावना धारण की जाय।
उद्धव ! इसी का नाम मन की पवित्रता है। त्रिदंड संन्यासी का क्या लक्षण होता है, यह भी सुनो।
मौनानिहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।
न ह्येते यस्य सन्त्यङ्ग वेणुभिर्न भवेद् यतिः ॥ १७॥
मौन या सत्यभाषण अथवा श्रीराम का नामस्मरण अथवा ओंकार का उच्चार, इसी का नाम है वाग्दण्ड।
शरीर की जो भी कुछ हलचल है वह सब प्राण की शक्ति से होती है। उस प्राण का प्राणायाम से निरोध करें।
प्राणायाम से प्राणों को जीत कर अपने नियंत्रण में रखो। इसका नाम है 'देहदण्ड'। अब मनोदण्ड का लक्षण
सुनो। संकल्प और विकल्प यही मन की चपलता है। उसका छेदन करने के लिये ब्रह्मस्वरूप का अनुसंधान
करें। मेरा रूप सर्वव्यापी है, उस पर दृढ़ भावना से चित्त धारण करने से संकल्प-विकल्प के कारण मन जिधर
भी जाता है वहाँ मेरा स्वरूप रहता ही है। इस प्रकार मन को सावधान रखने तथा ब्रह्मस्वरूप का अनुसन्धान
लगने से संकल्प-विकल्प अपने आप ही क्षीण हो जाते हैं। काया, वाचा और मन इस त्रिदण्ड का सारा लक्षण