श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुगमता से मिले, उस पर मुनि शयन करते हैं। मैं एक भोक्ता अथवा शयनकर्ता हूँ, यह अहंकार उसमें नहीं
रहता। स्नान आदि कार्यों में भी वह निरभिमानी होता है। श्रीकृष्ण बताते हैं।
शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।
अन्यांश्च नियमाज्ञांनीं यथाहं लीलयेश्वरः ॥ ३६ ॥
आचमन, स्नान अथवा प्रातःविधि करते समय वह शास्त्रविधि का दास बनकर नहीं रहता क्योंकि उसका
कर्माभिमान ही टूट जाता है। सारांश, जैसे मैं अवतारी हूँ, उसी प्रकार वह भी रहता है। जिस प्रकार मैं अलिप्त
होकर सारे कर्म करता हूँ उसी प्रकार योगी भी करता है। जिसके अंतःकरण में विधि का भय नहीं होता वह
कभी कर्म करने के लिये नहीं उठता। इसी बात का रहस्य श्रीकृष्ण विस्तार से बता रहे हैं।
न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।
आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया ॥ ३७ ॥
मेरा दर्शन हो जाने के कारण, कर्म करना अथवा कर्म न करना यह संदेह ही मिट जाता है और संकल्प का
प्राण ही निकल जाता है। मुझ परमात्मा को देखते ही संकल्प मन में ही विलीन हो जाता है, लिंगदेह की गाँठ
खुल जाती है और भेद की त्रिपुटी का लोप हो जाता है। जिसको भेद का ही भान नहीं होता, उसके देह का
पालन-पोषण, स्नान, पान, खाना, भोजन, बैठना-उठना, आना-जाना भी कैसे होगा? जिसने विकल्प के भ्रम को
जीत लिया और अद्वैतस्वरूप में मिल गया, उसके देह की स्थिति और चलन प्रारब्ध के ही हाथ में रहता है। वृक्ष
समूल उखड़ कर गिर भी जाय, तो भी उसमें आर्द्रता तो रहती ही है। पान खाकर निगल भी लें तो भी उसकी
लाली होठों पर रहती ही है। कन्यादान करने के बाद दामाद कन्या को बिदा कराकर ले भी गया लेकिन मान-
सम्मान तो रहता है और मरने तक रूठना और मनाना समाप्त नहीं होता। उसके अनुसार अभिमान के कारण मैं
जबर्दस्ती कर्मकर्ता बनता हूँ, वह अहंता ज्ञान के बल से समाप्त होती है। फिर भी शरीर प्रारब्ध से चलता है।
कुम्हार डंडा और बर्तन लेकर जाता है लेकिन पहिया (चाक) घूमता ही रहता है। उसी प्रकार अभिमान नष्ट होने
पर भी प्रारब्ध से देह चलता ही रहता है। उस देह का पालन-पोषण देह ही करता है इसे ध्यान में रखो। ज्ञाता
को सचमुच ही प्रपंच का भान ही नहीं रहता। जिस प्रकार देह के पास मिथ्यारूप छाया रहती है, उसी प्रकार
ज्ञाता को देह दिखायी पड़ता है। इसीलिये उसे 'देह मैं ही हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न नहीं होती। छाया पालकी में बैठे
या विष्ठा पर पड़ी हो, लेकिन उस छाया के अभिमान से पुरुष को उसका कोई सुख या दुःख नहीं होता। उसके
अनुसार देह का मान-सम्मान ज्ञानी की स्थिति में बिलकुल बाधक नहीं होता। प्रारब्ध को क्षय होने पर उन्हें
विदेह मोक्ष प्राप्त होता है। पानी की लहर जिस प्रकार समुद्र के जल में मिल जाती है उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें ही
विदेह अवस्था में समरस हो जाता है। जब तक उद्गम-संगम प्रवाह रहता है तब तक नदी के नामरूप की
ख्याति रहती है लेकिन प्रलय होने पर वह समाप्त हो जाती है। उसी प्रकार ज्ञाता मुझमें एकरूप हो जाते हैं।
उद्धव ! ब्रह्मसाक्षात्कार प्राप्त किये हुए संन्यासी कैसे रहते हैं और उनकी स्वधर्म की रीति कैसी होती है इसके
बारे में तुम्हें बतलाया। अब मुमुक्षु संन्यासी कैसा होता है, सुनो।
दुःखोदर्कैषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।
अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत् ॥ ३८ ॥
चोटी से मूल तक, जिसके फल उत्तरोत्तर दुःखदायी होते हैं, ऐसे अत्यंत बाधक विषयजाल के प्रति वह