श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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की आवश्यकता ही नहीं होती। समय हो या असमय हो उसके मन में भजन का विकल्प आता ही नहीं है। ऐसी
जिस गृहस्थ की स्थिति होगी, उसे निरन्तर गृहस्थाश्रम में ही रहना चाहिये। जिसे कर्म की अत्यन्त आसक्ति है
किन्तु विषय के प्रति आसक्ति नहीं है, साथ ही चित्त में ज्ञानयुक्त शान्ति नहीं है, उसे वानप्रस्थ आश्रम का
अधिकारी समझना चाहिये और जिसे विरक्ति, शान्ति और ज्ञान करकमल की तरह उपलब्ध है वही सचमुच
संन्यासग्रहण का अधिकारी है। पुत्र संतति प्राप्त होने पर भार्या को पुत्र को सौंप कर स्वयं संन्यास ग्रहण करना
चाहिये। श्रुति भी इसकी संस्तुति करती है। गृहस्थाश्रम में जिसे भक्ति अच्छी नहीं लगती, अगणित संतति होने
पर भी जो विरक्त नहीं होता और जो वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश नहीं करता, जिसका विषय से मोह नहीं छूटता
है और जो निष्कर्म संन्यासी नहीं बनता उसके निंद्यकर्म के बारे में पुरुषोत्तम स्वयं बता रहे हैं।
यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः।
स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते॥ ५६ ॥
जिसे घर गृहस्थी से विशेष आसक्ति है; जिसका पुत्र प्रेम, धन प्रेम तथा स्त्री प्रेम प्रबल है, जो विकारों का
नितांत लंपट तथा धन का अत्यन्त लोभी है, जो विकारों का अंकित है, जो अहंकार का पोषण करता है, जो स्त्री
पर जी जान से बिक गया है वह अज्ञान की गहरी गर्त में गिरता है। जो आशा के भ्रम से इन्द्रियों का दास बनता
है, वह जीव भाव से बद्धता का गुलाम बनता है। उस बद्धता का रूप और उस मूर्ख की बकवास स्वयं श्रीकृष्ण
उद्धव को बतला रहे हैं।
अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः।
अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः॥ ५७॥
वह कहता है, मेरे माँ-बाप वृद्ध हैं, पत्नी छोटी है और बच्चे नन्हे-मुन्ने हैं; इनसे मैं दूर रहा तो वे तत्काल
मर जायेंगे। इस प्रकार अपनी मृत्यु से भी भयंकर अनेक कल्पनाएँ कर वह परिवार की चिन्ता करता है। कभी
असमय ही यदि मेरी मृत्यु हो गयी तो मेरे ये बच्चे और पत्नी क्या करेंगे? यह कहकर वह रोने लगता है। माँ-
बाप की बात छोड़ो लेकिन पत्नी तो फुक्का फाड़ कर रोयेगी, बच्चे रो-रोकर गला खराब कर लेंगे, यह सोच कर
अपना सिर पीट लेता है। मेरे मरने पर दुःख के मारे ये कैसे जीवित रह पायेंगे? क्या इस प्रकार वह जीवित रह
पायेंगे? इस प्रकार वह जीवित अवस्था में ही उनकी चिन्ता करने लगता है। इसीलिये वह मूढ़ है। इस प्रकार
जहाँ मूर्खता की अपार बाढ़ आती है, वहाँ विपरीत अर्थ में विवेक का जहाज डूब जाता है।
एवं गृहाशाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम्।
अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः॥ ५८ ॥
इस प्रकार गृहस्थी में आसक्त, विषयों के प्रति सदा अतृप्त, स्त्री बच्चों की अखण्ड चिन्ता करने वाला तथा
अंतःकरण में मोह से ग्रस्त, उसकी बुद्धि मोह की मोहकता से मूढ़ हो जाती है और ऐसी स्थिति में जिसकी मृत्यु
हो जाती है वह अंधतम नामक नरक में जाता है। उस अज्ञानतम शक्ति से ज्ञान अन्धा हो जाता है। जहाँ सूर्य की
आँखें भी फूट जाँय ऐसे गहरे अंधतम नरक में वह तामसी लोटपोट होता रहता है। अरेरे! ऐसे मूढ़मति और
नितांत मंदबुद्धि जीव कल्पान्त में भी जहाँ से मुक्तता नहीं होगी, ऐसे 'अंधतम' नामक नरक में जाते हैं और मोह
के पीछे नश्वर विषय के चक्कर में अनंत सुख के अवसर चूक कर कोटि-कोटि दुःख भोगते रहते हैं। इसलिये