श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 493, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ४७७
केशरोमनखश्मश्रूमलानि बिभृयाद् दतः।
न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः ॥ ३ ॥
जो मस्तक पर आते हैं, वे 'केश', जो मुख पर आते हैं वे 'श्मश्रु' और जो बगल तथा गुह्यभाग में आते हैं
वे 'रोम' इन सबको नहीं काटना चाहिये। मस्तक का कभी वपन नहीं करना चाहिये। श्मश्रु अथवा गुह्य स्थान के
बाल, नाखून नहीं काटने चाहिये। दाँत भी साफ नहीं करने चाहिये। स्नान अवश्य तीन बार करना चाहिये लेकिन
उसी तरह जैसे मूसल को पानी में डुबोकर निकाला जाता है। शरीर पर का मल नहीं धोना चाहिये। वानप्रस्थ का
यही बड़ा व्रत है। सदा जमीन पर सोना चाहिये। नीचे घास भी नहीं बिछानी चाहिये। इस प्रकार वानप्रस्थ का
दृढ़ व्रत धारण कर तप करना चाहिये। उस तप के लक्षण सुनो।
ग्रीष्मे तप्येत पञ्चाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।
आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत् ॥ ४ ॥
गर्मी में पंचाग्निसाधन करना चाहिये। चारों दिशाओं में चार अग्निकुण्ड प्रज्वलित करने चाहिये ताकि ऐसा
लगे जैसे मध्याह्न का सूर्य आकाश पर चमक रहा है। इसे 'पंचाग्नि साधन' कहते हैं। बरसात में ऊँचे स्थान पर
मचान बनाकर मूसलाधार बारिश में उस पर बैठना चाहिये। यह वर्षाकाल का तप है। जाड़े के दिन हों तो रात को
गले तक पानी में डूब कर बैठना चाहिये। यही वानप्रस्थ का तपाचरण है। तप की यह क्रिया वानप्रस्थ के लिये
प्रतिवर्ष के लिये है। अब उम्र के हिसाब से कौन से पदार्थ खाने चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
अग्निपक्वं समश्नीयात् कालपक्वमथापि वा।
उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा ॥ ५ ॥
आग पर पकाये हुए (या आग में भुने हुए कंदमूल) अथवा मौसम के अनुसार पके हुए फल तपस्वी को
उदरनिर्वाह के लिये उपयुक्त हैं। दाँत मजबूत हों तो वह सभी प्रकार के फल खाये और अगर सभी दाँत गिर गये
हों तो उन्हें ओखली में कूट कर खाये। वन में यदि ऊखल प्राप्त न हो तो पत्थर से कूच कर खाना चाहिये। स्वाद
का विचार न कर केवल भूख निवारण का ही उद्देश्य होना चाहिये।
स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।
देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम् ॥ ६ ॥
फलों के मौसम में वे काफी मिलते हैं इसलिये भविष्य के लिये उनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यही
वानप्रस्थ का व्रत है। एक दिन पहले खाये हुए फल यदि बच जाएँ तो उन्हें फेंक देना चाहिये। शास्त्रों में उन्हें
खाने के लिये निषिद्ध माना गया है। प्रतिदिन खाने के लिये ताजा फल लाने चाहिये। बासी फल खाना वानप्रस्थ
के लिये निषिद्ध है यह जान लो। उसी प्रकार किसी दूसरे द्वारा लाये गये फल भी खाने के योग्य नहीं हैं। अपने
ही परिश्रम से स्वयं लाये हुए फल ही आहार के लिये योग्य हैं। देश, काल और वर्तमान आदि का पूर्ण ज्ञान होने
पर भी किसी प्रकार का संग्रह नहीं करना चाहिये। भाग्य पर विश्वास करके रहना चाहिये। दूसरे ने दिया हुआ
दान कभी भी नहीं लेना चाहिये। इस प्रकार का प्रतिग्रह लेने से वानप्रस्थ व्रत भंग होता है।
वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान्।
न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥ ७ ॥