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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 869 में से

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पृष्ठ 500

४८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नैतद्वस्तुतया पश्येद्दृश्यमानं विनश्यति।
असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात् ॥ २६ ॥
इस लोक में जो भी कुछ दिखायी देता है, उसका नाश होता है यह सबको दिखाई देता है लेकिन विषय
के वश में रह कर तथा उसमें लिप्त होकर लोग कैसे छलावे में पड़े रहते हैं। इसके लिये शुद्ध भिक्षा की प्राप्ति
से जिसकी वृत्ति शुद्ध सत्त्वात्मक हो गयी है उसे सत्यत्त्व के कारण विषय दिखायी ही नहीं देते, फिर विषयासक्ति
कैसे होगी? इस प्रकार विषय का मिथ्या होने का जिसे भान होता है, उसका मन विषयासक्त नहीं होता। इसलिये
संसार के अथवा स्वर्ग के साधनों को वह स्पर्श ही नहीं करता। इस प्रकार जो विषय से विरक्त रहता है, उसी का
चित्त परमार्थ की ओर लगा रहता है और वह निजबोध से परमार्थयुक्त होकर संसार में अनासक्त होकर विचरण
करता रहता है। उसके निजबोध का लक्षण अथवा प्रपंच का मिथ्यापन तथा आत्मस्वरूप से आने वाले समाधान
के बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक् प्राणसंहतम्।
सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत् स्मरेत् ॥ २७॥
मन, वाणी और प्राण इनके प्रवाह में अहंकार ने उत्पन्न किये हुए देह तथा अन्य संसार आत्मा को मिथ्या
और मायावी है ऐसा ही भास होता है। रस्सी में सर्प का भास सीप में चाँदी का आभास तथा धूप में मृगजल का
जिस प्रकार भास होता है, उसी प्रकार चिन्मात्र ब्रह्मस्वरूप में संसार का भास होता है। स्वप्न की बातें जिस
प्रकार मालूम होती है वैसा ही यह चराचर दिखायी देता है और इस प्रकार यह सारा मिथ्या है ऐसा विश्वास होने
पर स्मरण के सम्बन्ध में कोई आदर नहीं रह जाता। जो अच्छी तरह जग जाता है उसका मन स्वप्न के सुख की
इच्छा नहीं करता; उसी प्रकार स्वस्वरूप में जिसका मन स्थिर हो जाता है वह किसी भी प्रपंच की वस्तु का
स्मरण नहीं करता। इस प्रकार 'त्रिदंडी' और 'बहूदक' यह संन्यासियों का कर्म तुम्हें सुगम करके बतलाया। अब
'हंस' और 'परमहंस' के धर्म भी तुम्हें क्रमानुसार बताता हूँ। संन्यास भी चार प्रकार का है यह ध्यान में रखो।
एक 'हंस' और दूसरा 'परमहंस', तीसरा 'बहूदक' तथा चौथा जो पहले से भिन्न है, वह 'कुटीचक' कहलाता
है। कर्म का त्याग कर जो संन्यासी बना लेकिन मन में न ध्यान है, न ज्ञान है और अन्न के लिये अपने गाँव में ही
रहता है, उसे 'कुटीचक' कहते हैं। कुटीचक में संन्यासी वार्धक्य में 'अग्निहोत्र' और स्त्री का त्याग करता है
किन्तु शिखासूत्र नहीं त्यागता इसलिये उसे गायत्री मंत्र का अधिकार रहता है। नित्य पुत्र के ही घर भिक्षा लेता है,
उसके ही घर में पर्णकुटी बाँधता है और मठी छोड़कर दूर कहीं नहीं जाता इसलिये उसका नाम 'कटीचक' है।
शिखासूत्र का त्याग कर, त्रिदण्डी ग्रहण कर, केवल कर्माचरण करता है; लेकिन ज्ञान बिलकुल नहीं होता। न
निस्सीम वैराग्य रहता है; ज्ञान पर निष्ठा भी अच्छी नहीं रहती लेकिन वह अत्यन्त कर्मठ रहता है। वही
'बहूदकां' में श्रेष्ठ माना जाता है और वैराग्य के निश्चय से ज्ञानसाधना का विचार करने वाला; शिखासूत्र तथा
कर्म का त्याग कर आत्मचिन्तन पर ही जिसकी श्रद्धा रहती है उसे 'विविदर्श' संन्यास कहते हैं और जो इस
प्रकार दृढ़ निष्ठा से आचरण करता है, उसे 'हंस' कहते हैं। कुछ लोग इन्हें 'परमहंस' भी कहते हैं। अब
'परमहंस' का लक्षण सुनो। वह ज्ञाननिष्ठा से परिपूर्ण रहता है इसलिये उसके द्वार. पर 'शान्ति' भी चाकरी करती
है। वह तीनों गुणों को मिथ्या मानता है। कर्म की बात वह मिथ्या ही मानता है और वह स्वयं निष्कर्म ही है यह
वह जानता है। उसी प्रकार कर्म, क्रिया और कर्त्तव्यता यह प्रारब्ध के अनुसार प्रकृति पर ही निर्भर है। ऐसी