श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४७१
एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा।
विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते॥ ४६॥
इस प्रकार जो राजा इस लोक में राज्य प्राप्त होने पर अधर्म का नाश कर स्वधर्म स्थिति से आचरण करता
है, उसे स्वर्ग प्राप्त होता है। ज्ञानी लोग 'राज्य का अन्त नरक' इस उक्ति से करते हैं, लेकिन उस नरकभोग को
टाल कर अनेक राजा स्वर्ग गये हैं। वे स्वर्गलोक में सूर्यप्रभा जैसे देदीप्यमान विमान में बैठकर इन्द्र का सा सुख
भोगते हैं। गृहस्थाश्रम अत्यन्त कठिन है। उसमें स्वधर्माचरण करते समय अनेक बार बिकट प्रसंग आते हैं। उस
समय के आपात धर्म बताता हूँ, सुनो।
सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्।
खङ्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४७॥
ब्राह्मणों को यदि स्वधर्म में पीड़ा का अनुभव होता हो तो उन्हें वैश्यवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उन्हें
क्षात्रधर्म स्वीकार कर हिंसा आदि दोष नहीं करने चाहिये क्योंकि वे अत्यन्त खराब हैं। ब्राह्मण के लिए हिंसाकर्म
अधर्म है लेकिन यदि कोई विकल्प न हो तो उसे अवश्य क्षत्रिय धर्म स्वीकार करना चाहिये। वैश्य का व्यवसाय
स्वीकार करने पर उसे तिल्ली, राई तथा रूई, नमक, तेल, घृत आदि पदार्थ नहीं बेचने चाहिये। उन्हें बेचने में
महादोष है। इन सारे दोषों से बचकर वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। खाने का पान और वस्त्र निर्दोष हैं।
इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करने पर भी निर्वाह न होता हो
तो उसे हाथ में शस्त्र लेकर क्षात्रवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उसमें हिचकिचाना नहीं चाहिये। समरभूमि से
वापस नहीं लौटना चाहिये। स्वामिकार्य के योग में देहत्याग के लिये तत्पर रहना चाहिये। इस प्रकार क्षत्रियवृत्ति
से ब्राह्मण को अपनी आपत्ति दूर करनी चाहिये, लेकिन प्राण जाने पर भी श्वान की वृत्ति के अनुसार नीच की
सेवा नहीं करनी चाहिये। अब यदि स्वधर्म के अनुसार चलने पर भी क्षत्रिय पर आपदा आ जाये तो इसे कैसा
आचरण करना चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव से सविस्तार बता रहे हैं।
वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।
चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४८॥
क्षत्रिय पर भी यदि संकट आ जाय तो वह पहले कहे अनुसार वणिक् का व्यवसाय करे; अथवा जंगल
में शिकार कर अपना संकट दूर करे। इतना करने पर भी दारिद्र्य न जाय तो ब्राह्मण की तरह भिक्षा माँगे,
लेकिन प्राण जाने पर भी नीच की सेवा न करे। अब यदि वैश्य को स्वधर्म के अनुसार चलने पर दरिद्र दशा
प्राप्त हो जाय तो उसे किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये उस पर कृपा की मूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं।
शूद्रवृत्तिं भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम्।
कृच्छ्रान्मुक्तोन गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९॥
वैश्य पर यदि संकट आ जाये तो उसे शूद्र वृत्ति स्वीकार करनी चाहिये, अर्थात् निष्कपट होकर तीन वर्णों
की सेवा करनी चाहिये। उद्धव! वैश्य पर यदि संकट आ पड़े तो उसे कभी भी ब्राह्मण का अथवा क्षत्रिय का
व्यवसाय नहीं करना चाहिये। वैश्य पर कितनी भी आपत्ति आये लेकिन उसे नीच की सेवा नहीं ही करनी चाहिये।