श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ४८७
और पराया कौन ? और बैर भी किससे करना ? सभी प्राणियों में एक ही आत्मा किस तरह है इसी बात का
दृष्टांत भगवान श्रीकृष्ण दे रहे हैं और उद्धव श्रोता बनकर अत्यन्त सावधान चित्त से श्रवण कर रहा है।
अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित्।
लब्ध्वा न हृष्येद् धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥ ३३॥
हजारों गागरों में पानी भरा हो लेकिन उसमें एक ही चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब रहता है; उसी प्रकार समस्त
प्राणियों में एक ही आत्मा भरी हुई है। प्राणियों की आकृतियाँ भिन्न-भिन्न दिखायी देती हैं, लेकिन परम कारण से
वे अभिन्न हैं। जिस प्रकार अलंकारों के सुवर्ण में भेद नहीं होता अथवा मिट्टी के गोकुल (नंद, यशोदा, कृष्ण
आदि) बनाएँ तो निराले आकारों में भी वे पूजा के योग्य होते हैं, उन सबमें मिट्टी ही भरी होती है। उसी प्रकार
भगवान में भी प्राणियों का भास होता है अथवा सूत को बुनकर वस्त्र बनाने पर उससे साफा, दुपट्टा, साड़ी आदि
बनते हैं। उसी प्रकार यहाँ ब्रह्म ही संसार के रूप प्रतिभासित होता है। इस प्रकार चाहे साकार हो या निराकार हो,
दोनों ब्रह्म ही है। जिसके ज्ञान का यह निश्चय होता है उसका आहार सुनो। जिस समय खाने को कुछ नहीं
मिलता उस समय भी वह दुःखी नहीं होता। वह अन्न के लिये बेचैन नहीं होता। उसका मनोनिग्रह इतना
शक्तिशाली होता हैं। उत्तम आहार मिलने पर उसे हर्ष भी नहीं होता क्योंकि वह मानता है कि सारी बातें मनुष्य
के कर्म पर निर्भर है। सारांश मिलना या न मिलना ईश्वर के अधीन है इसलिये उसका सुख या दुःख उसके मन
को स्पर्श नहीं करता। प्राणी को जब लाभ भी भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर वह भिक्षा के लिये क्यों
घूमता है ? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं।
आहारार्थं समीहेत युक्तं तत्प्राणधारणम्।
तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते ॥ ३४॥
आश्रमधर्म का पालन करने के लिये भिक्षा के लिये अवश्य घूमना चाहिये। संन्यासी के धर्म के लिये मधुकरी
अत्यन्त योग्य है। साधकों को भी आहार के लिये अवश्य घूमना पड़ता है क्योंकि आहार के बिना उनका चित्त
चंचल होने लगता है। उन्हें रस की आसक्ति छोड़कर भिक्षा का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि आहार के बिना उनका
मन सभी अर्थों में क्षीण होने लगता है। आहार के बिना साधकों से श्रवण-मनन नहीं हो सकता। ध्यान-चिन्तन नहीं
होता इसलिये अनुसंधान भी नहीं टिकता। संन्यासी का यदि ध्यान न लगे तो उसके आश्रमधर्म का जहाज डूबने
लगता है। इसलिये अपने ही हित के लिये उसे भिक्षा के लिये जाना पड़ता है। भिक्षा मिलेगी ऐसी आशा न कर
केवल परमार्थ साधने के लिये भिक्षा का ही शौक रखना चाहिये। आहार सेवन करने से साधक को साधन की प्राप्ति
होती है, साधन मिलने से ज्ञानप्राप्ति होती है और ज्ञानप्राप्ति से मोक्ष का लाभ होता है। मिष्टान्न की तो कभी भी
इच्छा नहीं करनी चाहिये। फिर भीख किसकी माँगनी चाहिये ? इसी बात का उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं।
यदृच्छयोपपन्नामद्याच्छ्रेष्ठमुताऽपरम्।
तथां वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनिः ॥ ३५ ॥
रूखा-सूखा या मीठा, जैसा भी सुगमता से मिले, उससे ही प्राण धारण करना चाहिये। जिह्वा की लालच
छोड़ देनी चाहिये। निद्रा अथवा आलस्य अपना प्रभाव न दिखाये इस प्रकार का प्राणधारण करें। आसन अथवा
ध्यान ठीक तरह से लगे इस ढंग से खायें, इसे मुक्ताहार कहते हैं। पेड़ की छाल अथवा मृगचर्म, नया या पुराना
वस्त्र जो भी सुगमता से मिले उसे आनन्दपूर्वक ओढ़ें। कथरी अथवा मुलायम बिस्तर, पुआल या जमीन जो भी