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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 869 में से

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पृष्ठ 502

४८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सम्बन्धी नानाप्रकार के विवाद वह नहीं करता। जिसे आत्मानंद का अनुभव होता है, वह तर्कशास्त्र के अनुसार
तर्क, वितर्क अथवा कुतर्क प्रारम्भ कर विवाद नहीं करता। प्रख्यात वितंडवादी जो मुँह से ब्रह्मज्ञान की गर्जना
करते हैं और मन में विषयवासना भरी रहती है वही वास्तव में पाखंडी है। सचमुच ब्रह्म का अनुभव न रहते हुए
जो पुरुष अपना आचार त्याग देता है, वह शुद्ध पाखण्डी, अपना पेट भरने वाला तथा दुष्ट स्वरूप का मनुष्य है।
जिसकी वाणी में वाद-विवाद का मैल नहीं है वही आत्मज्ञान से निर्मल रहता है। 'शुष्कवाद' अर्थात् निरर्थक
बकवास से भी वाद उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञानी होता है वह ऐसे वाद-विवाद की बातें देखना भी नहीं चाहता।
फिर वह स्वयं ऐसे विवादों में उलझे यह तो सम्भव ही नहीं है। शास्त्रार्थ चल रहा हो और युक्ति-प्रयुक्ति से पक्ष,
विपक्ष पर साधार बहस चल रही हो तो भी वह किसी का पक्ष नहीं लेता। सच्चाई वह जानता है, लेकिन मुँह से
कुछ नहीं कहता। श्रुतिस्मृति के विरोध में चल रहा वितंडावाद वह देखता रहता है और सही पक्ष क्या है, यह भी
वह जानता है, फिर भी वह किसी के भी समर्थन में नहीं बोलता। वाद-विवाद में बोलने से किसी के मन पर
आघात होगा या अपने ही अंतःकरण में क्रोध उत्पन्न होगा इसलिये वह एक भी शब्द नहीं बोलता।
नोद्विजेत जनाद् धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु।
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचनं।
देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित्॥ ३१ ॥
जो ज्ञाता है वह लोगों के प्रति मन में उद्वेग नहीं रखता। कोई निन्दा करता है, कोई तिरस्कार करता है, कोई
अपमान करता है, फिर भी वह आत्मस्थिति से उसे स्वयं सहन करता है। लोग जो भी उपद्रव देते हैं उसे वह इस
प्रकार सहन करता है। प्राणिमात्र में एक ही आत्मा भरा हुआ है, ऐसी उसकी भावना होने के कारण उसे उसका
दुःख नहीं होता। अपने ही अवयव से कोई प्रमाद हो जाने पर जिस प्रकार चित्त में उद्वेग नहीं होता, उसी प्रकार
समस्त प्राणियों में एकात्मा की ही भावना होने के कारण वह उससे दुःखी नहीं होता। उसी प्रकार उसके संसर्ग से
प्राणिमात्र को उद्वेग नहीं होता, उल्टे जीवमात्र को सुख ही होता है। समस्त प्राणियों में भगवान का वास होने के
कारण कहीं उसे कष्ट न हो इसलिये हाथ-पैर हिलाते समय वह काफी सावधान रहता है। जोर से पुकारने से
कहीं भगवान चौंक पड़ेंगे या जप की माला जोर से घुमाने से कहीं भगवान के सिर पर चोट लगेगी इसलिये
हाथ-पैर की चेष्टाओं को निजात्मनिष्ठा से नियंत्रित कर वह प्राणी को भी धक्का नहीं लगने देता। भूतात्मा सभी
भूतों में भरा हुआ है यह जानकर वह जोर से भाषण भी नहीं करता फिर वितंडवाद में वह मुँह किस तरह
खोलेगा? अपने प्राणों पर भी संकट क्यों न आये लेकिन उससे किसी का अपमान नहीं होता। कोई भी जीव क्यों
न हो लेकिन उसका अपमान नहीं करना है, क्योंकि समस्त प्राणिमात्र में श्रीहरि ही विराजमान हैं यह उसे दिखायी
देता है। ज्ञाता को जनता से कोई उद्वेग नहीं होता और ज्ञाता से जनता को भी कभी उद्वेग नहीं होता। जिसकी ऐसी
आत्मस्थिति रहती है वह किसी से बैर नहीं करता। इसी अर्थ का भाषण श्रीकृष्ण सुना रहे हैं।
एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।
यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥३२॥
केवल पशु जैसे देह का अहंकार कर वह किसी से बैर नहीं करता। उसके बारे में भी सुनो। ज्ञानस्वरूप
आत्मा प्रकृति से परे रहता है, वही सारे प्राणियों का आत्मा है और मुझमें भी वही रहता है, यही सोच कर वह
एकात्मा का निर्वाह करता है। सचमुच, जब मेरा ही आत्मस्वरूप प्राणिमात्र में भरा हुआ है तो उसे अपना कौन