श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः।
आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः ॥ २०॥
सदासर्वदा शरीर में परिपूर्ण वैराग्य, वह किसी मित्र या सखा की इच्छा नहीं करता। मन से निःसंग होकर
पृथ्वी पर आनन्दपूर्वक विचरण करता रहता है। इन्द्रियों को चित्त के पग से बाँध कर चित्त को चैतन्य में स्थिर
करता है। इससे उसे सर्वत्र चिन्मय स्वरूप ही दिखायी देने लगता है। देह में देहत्व का स्मरण नहीं होता।
आत्मस्थिति का उद्यम ऐसा ही होता है, इससे उसे आत्मक्रीड़ा में ही आराम मिलता है। अब आत्मसुख का
उत्साह और श्रेष्ठ अनुभव कैसा होता है, उसे सुनो। आत्मस्थिति से निजात्मयुक्त होने के कारण वह आत्मानंद में
ही निमग्न रहता है तथा सर्वत्र ऐक्यभाव से डोलते रहकर वह समरस से भर जाता है। ऐसे समत्वसुख का लाभ
मिल सके इसलिये वह सदा एकान्त में ही अकेला रहता है। यही बात श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाश्यः।
आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनिः॥ २१॥
पवित्र और निर्जन, विस्तृत तथा एकान्त स्थान देखकर वह सद्भक्ति से सदासर्वदा मेरा ध्यान करे। ऐसे
साधक को संसार दुःख में लीन हुए लोगों का साथ छोड़ कर निरन्तर एकान्त में ही रममाण होकर रहना चाहिये
क्योंकि मद्भावयुक्त रहने से साधकों को आत्मसुख की प्राप्ति होती है और जिसे आत्मसुख की प्राप्ति हुई वह
अनन्यभाव से मेरी शरण में आता है। उसे इस संसार में मेरे सिवा अन्य किसी बात में अर्थ ही नहीं दिखायी
देता। इस प्रकार मेरा अनन्य ध्यान करने से साधक 'मैं' और 'तू' का दूजापन भूल जाता है। भेदभाव नष्ट हो
जाने के कारण वह चैतन्यधन मत्स्वरूप होकर ही रहता है। मेरे उस स्वरूप की ऐसी स्थिति रहती है कि
आत्मदृष्टि से देखने पर 'न मैं हूँ', 'न वह है' ऐसी स्थिति हो जाती है। इसी स्थिति को अभेद प्राप्ति कहते हैं।
जब तक द्वैतभावना रहती है, तब तक साधक को संसारमय की बाधा रहती है। एक बार अभेद भावना प्राप्त होने
पर साधक निर्भय हो जाता है क्योंकि अभेद भावना जहाँ रहती है वहाँ बन्ध और मोक्ष की बात ही नहीं रह
जाती। अब जहाँ बन्ध और मोक्ष की गर्जना चलती रहती है उसके बारे में श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।
बंध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः ॥ २२॥
ऐक्यस्वरूप पर पहुँच कर एकात्मा प्राप्त होने के बाद बंध मोक्ष की ओर देखने पर वे दोनों मायिक और
मिथ्या लगने लगते हैं। बन्ध और मोक्ष ये दोनों मनुष्य की प्रवृत्ति में ही होते हैं। इन दोनों में भेद यही है कि
इन्द्रियों की विषयासक्ति का नाम 'दृढ़बन्धन' है और हे उद्धव ! काया, वाचा तथा मन से विषयों की शुद्ध विरक्ति
यही वास्तव में मुक्ति है। इसीलिये जिसे सचमुच ही मुक्ति की इच्छा है उसे विषयों की निवृत्ति करनी चाहिये।
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण मुख्य रूप से इसी का उपाय बता रहे हैं।
तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनिः।
विरक्तः क्षुल्लकामभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत् ॥ २३॥
इस दृष्टि से विचार करें तो जिस विषयासक्ति से दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता है; उन विषयों का ही यदि त्याग
करें तो 'मुक्ति' सहज सिद्ध है। लेकिन वह विरक्ति हमें कैसे प्राप्त हो ? इसके लिये साधक को ऐसा प्रयत्न