श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअट्ठारहवाँ अध्याय ४८३
करना चाहिये जिससे वैराग्य उत्पन्न हो। अंतःकरण में वासना दृढ़मूल रहती है; उसमें विषयरूप शाखायें फूटती हैं
जो काफी संख्या में बढ़ती है, इसलिये उस वासना को ही समूल नष्ट करने के लिये कठोर वैराग्य की साधना
करनी चाहिये। स्वधर्म कर्म करके वह मुझे अर्पण करना चाहिये, यही वैराग्य प्राप्ति का मुख्य साधन है। कर्म
करके उसका कर्त्तापन छोड़ देना इसी का नाम मदर्पण है। मदर्पण बुद्धि से कर्म करने पर मुझसे प्रेम उत्पन्न होता
है। चित्त में मेरा ही नाम, मेरी ही कीर्ति और मेरा ही चिन्तन होने लगता है। इस प्रकार मेरे प्रति प्रेम का उदय
होने पर वैराग्य उत्पन्न होता है और इस प्रकार विषयों से विरक्ति होकर धीरे-धीरे मेरे सुख की प्राप्ति होती है।
मेरे सुख के कारण मेरा भजन बढ़ने लगता है और सर्वत्र मेरी ब्रह्मत्व से पूर्ण भावना अंकित होती है। इसलिये
सर्वत्र एक ब्रह्म ही भरा हुआ है ऐसी भावना धारण कर, ब्रह्मसुख पर दृष्टि रखकर जब तक मन वानसारहित न
हो जाय तब तक पर्यटन करते रहना चाहिये।
पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत्।
पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४॥
अच्छे-अच्छे पुण्यक्षेत्रों में जाकर पृथ्वी पर्यटन करना चाहिये। पवित्र कुरुक्षेत्र, अत्यन्त पवित्र सात पुरी
(अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, जगन्नाथपुरी तथा द्वारका) पुष्कर, प्रयागराज आदि तीर्थ,
कृतमाला, पयस्विनी, पुण्यस्वरूप ताम्रपर्णी, गोदावरी, नर्मदा, त्रिवेणी, परमपवित्र गोमती; कृष्णा, वेण्या, तुंगभद्रा,
तापी, पयोष्णी, चंद्रभागा, यमुना, भागीरथी, नीरा अथवा गंगा समुद्र से जहाँ मिलती है, वह संगम। ऋष्यमूक,
श्रीशैल, व्यंकटाद्रि (व्यंकटगिरी) मूलपीठ का सह्याद्रि अथवा गौतमी के तट का ब्रह्मगिरी आदि की यात्रा करने
से सारे पातकों का संहार होता है। इसलिये मुनिश्रेष्ठों को वह यात्रा अवश्य करनी चाहिये। दण्डकारण्य नाम का
बड़ा अरण्य, नैमिषारण्य, आनन्दवन (काशी के निकट) आदि वनों में संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये।
च्यवन, कपिल तथा न्यास के आश्रम, गौतम और वामन के उत्तम आश्रम, उसी प्रकार सारे श्रम का परिहार करने
वाली बदरिकाश्रम की यात्रा, ऐसे जो पवित्र स्थल हैं वहाँ संन्यासी को अवश्य जाना चाहिये। अब मार्ग में भिक्षा
के लिये कहाँ जायें इसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। जहाँ उत्तम से उत्तम बाजार और रास्ते होते हैं, उसे ज्ञानी
लोग 'पुर' अथवा शहर कहते हैं। जिस गाँव में बड़ी-बड़ी सड़कें और बाजार न हों उसे 'ग्राम' कहते हैं। वहाँ
जाकर भिक्षा का रोज का व्रत पूरा करना चाहिये। गौ तथा ग्वाले जहाँ रहते हैं उसे 'व्रज' अर्थात् 'ग्वालों का
बाड़ा' कहते हैं। उसी प्रकार 'साय' अर्थात् 'प्याऊ' जहाँ हो वहाँ अथवा यात्रिक जनसमूह में भिक्षा के लिये
घूमते रहना चाहिये। इसी बात का निरूपण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।
संसिद्ध्येत्याश्वसम्मोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५॥
अंतःकरण शुद्ध करने के लिये वानप्रस्थाश्रम में जो पुरुष हो, उसके द्वार पर भिक्षा के लिये बड़े आदर के
साथ खड़े हो जाना चाहिये। सात्विक के अन्न का सेवन करने से साधक के शरीर में भी प्रत्येक ग्रास के साथ
शुद्ध सात्विकता उत्पन्न होती है। ऐसे शुद्ध अन्न की महिमा है। इसके लिये वानप्रस्थ का द्वार देखकर वहाँ बार-
बार जाना चाहिये। इससे साधकों की निरन्तर शुद्धि होती है। शुद्ध भिक्षा मिलने पर वृत्ति भी सत्त्वशुद्ध होती है
और इससे वासना भी निःशेष होकर आत्मशांति प्रकट होती है। निःशेष वासना समाप्त होने पर उसे सत्यत्व से
संसार दिखायी ही नहीं देता। फिर विषय वासना कहाँ रहेगी ? उस समय अर्थात् ही वैराग्य उत्पन्न होता है।