श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअट्ठारहवाँ अध्याय ४८५
स्थिति में जो समाधान में रहता है उसे 'परमहंस' कहते हैं। उसे मठ, मठी आदि की आवश्यकता नहीं होती।
वह नित्य उदास तथा निराश्रय में रहता है। अब हे उद्धव! उस हंस-परमहंस के धर्म तथा उसके मर्म का सुगमता
से वर्णन करता हूँ, सुनो। इतना कह कर श्रीकृष्ण स्वयं कहने लगे।
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।
सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः ॥ २८ ॥
जिसे विषय की वार्ता भी अच्छी नहीं लगती, ज्ञानप्राप्ति के लिये जो उद्यत रहता है, ऐसे अत्यन्त विरक्त
को 'संन्यासी' कहते हैं। वह ज्ञाननिष्ठा से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, उसका सदा मन स्वरूप में लीन रहता है।
उसका आत्मस्वरूप का अनुसन्धान कभी नहीं टूटता। यह हंस भी परमहंस की ही तरह है। भगवद्भक्ति करते-
करते उसकी सारी इच्छाओं की शान्ति हो जाती है। उसके मन में मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती। वही संन्यास
पद्धति सबसे उत्तम है। जो ज्ञाननिष्ठ मेरे भक्त होंगे, उन्हें दंडादिक आश्रमधर्म का अंतःकरण से त्याग करना
चाहिये और केवल बाह्य चिह्न लोकशिक्षा के लिये रखने चाहिये। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण आगे करने
वाले हैं। फिलहाल त्याग के लक्षण सुनो, ऐसा श्रीहरि ने कहा। वह आश्रमधर्म, सभी करता है लेकिन विधि का
दास बनकर नहीं रहता। जल में प्रतिबिम्ब भले ही काँप रहा हो लेकिन बाहर का बिम्ब नहीं काँपता। उसके
अनुसार स्वधर्म कर्म कर्तव्यता का पालन वह करता है लेकिन उसकी कर्मठता नहीं स्वीकारता। अपने सभी कर्मों
में वह अपनी कर्मातीतता अच्छी तरह जानता है। इस प्रकार वह स्वधर्म कर्म करता है लेकिन विधि का भय मन
में नहीं रखता। विधिनिषेध को पैरों तले रौंद कर वह बिना किसी उद्देश्य के कर्म करता है। अपने आश्रमकर्म को
स्पर्श नहीं करता और दण्डादि चिह्न भी हाथ में नहीं रखता। ऐसे सर्वस्व त्याग का लक्षण श्रीकृष्ण आगे बताने
वाले हैं। केवल लोकाचार के लिये वह दण्डादि चिह्न हाथ में धारण करता है और अंतःकरण में निष्काम रहता
है। उसी का लक्षण श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।
वदेदुन्मत्तवद् विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत्॥ २९॥
उसमें शुद्ध विवेकज्ञान रहता है, लेकिन वह बालक की तरह व्यवहार करता है। देहाभिमान त्याग कर मान
अथवा अपमान जो भी प्राप्त हो उसे सुख के साथ सहन करता है। वह अपने नैष्कर्म्य में अत्यन्त प्रवीण रहता है;
लेकिन कर्मठ की तरह वह सारे कर्मों का आचरण करता है, कहीं किसी बात की कमी दीखने नहीं देता। धर्म का
और अधर्म का लक्षण वह अच्छी तरह जानता है, सभी बातों में वह ज्ञानसम्पन्न रहता है, लेकिन यदि कोई प्रश्न करे
तो उसका समाधान नहीं करता। किसी अज्ञानी की तरह वह कुछ तो बकता रहता है। प्रश्न का समाधान करने पर
कहीं लोग मेरा मान-सम्मान न करें, इसलिये जानबूझ कर मतवाले की तरह बोलता रहता है। वेद का अर्थ तथा
निहित शास्त्रों का अर्थ वह जानता रहता है लेकिन लोगों में उसका प्रदर्शन नहीं करता है। इतना ही नहीं, अपितु
लोग उसे मूर्ख कहें इसके लिये वह अपनी पशुतुल्यता प्रदर्शित करता है। वह वेदवाद-संवाद-विवाद कुछ नहीं
करता, व्यर्थ का वितंडावाद भी नहीं करता। यही बात स्वयं श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
वेदवादरतो न स्यान्न पाखण्डी न हेतुकः।
शुष्कवाद विवादे न कंचित् पक्षं समाश्रयेत् ॥ ३० ॥
निजात्म बोध में पक्का होने के कारण वह मीमांसकों का अभिप्राय, कर्मकाण्डों का शास्त्रार्थ अथवा कर्म