श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 486, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें४७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक और सम्मान से यथाशक्ति अन्नदान करते हैं, उन पर मैं जनार्दन सन्तुष्ट होता हूँ।
अभिमान छोड़कर सभी प्राणीमात्रों के प्रति नम्रता का भाव रखना, यही 'महद्धर्म' है और यही धर्म का शुद्ध
लक्षण है। इस प्रकार का धर्माचरण कर्ता के लिये भूषणास्पद होता है। इस धर्म में दोष देने के लिये जरा सी भी
जगह नहीं रहती। इसी का नाम है, 'अति शुद्धाचरण'। चित्तवृत्ति मुझ में रंग जाने के कारण घर संसार की
आसक्ति जो प्रायः भूल ही जाता है उसे गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है, आत्मज्ञान यही उसकी सुख
सम्पत्ति हो जाती है। जो निर्धन हैं, उन्हें इस प्रकार गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है। अब जो साधन है उन्हें
मेरी प्राप्ति कैसे होती है, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो। धनी होते हुए यदि वह ज्ञानी है तो उसे बिना अधिक साधन
किये ही मेरी प्राप्ति करना अत्यन्त सुलभ है, सुनो।
समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।
तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात्॥४४॥
ब्राह्मण वैसे भी पूज्य है ही, तिस पर यदि वह मेरा भक्त हो तो मेरे भजन से अत्यन्त सम्पन्न और मद्भावना
से पूर्ण तथा परिपक्व अवस्था में पहुँचा हो; उसी प्रकार कभी किसी से कुछ नहीं माँगने का मेरे भक्त का जो
निश्चय रहता है, उसे पीड़ा देने वाली क्षुधादि व्यथाओं का जो निवारण करता है; उसे अन्न, धन, वस्त्र, पात्र,
नमक आदि देता है तथा अपना धन देकर जो मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे देते समय जो उसका तिरस्कार
नहीं करता और किसी प्रकार का उपकार करने की भावना मन में न लाकर अत्यन्त सम्मान और नम्रता से मेरे
भक्त का संरक्षण करता है, माँ जिस वात्सल्य से अपने बच्चे को खिलाती है उसी प्रकार वह अपना स्वार्थ छोड़कर
मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे मैं अपने भक्त को भी पीछे छोड़कर अपने मस्तक पर धारण करता हूँ और
फिर उसे वैकुण्ठ ही क्या उससे भी ऊपर ले जाता हूँ। जिसे मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ उसे कौन सी
वस्तु दुर्लभ होगी ? उद्धव ! मेरे भक्तों का जो संरक्षण करता है, उसका उद्धारक मैं हूँ। मेरे भक्तों के संकट जो
स्वयं होकर दूर करेगा, उसे मैं तत्काल संसार सागर पार कराता हूँ। उद्धव ! जिस प्रकार नौका धनवान को समुद्र
पार कराती है, उसी प्रकार मेरे भक्तों की रक्षा करने वालों का मैं संसार से उद्धार करता हूँ। इस प्रकार जो धनवान
पुरुष मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसका देवकी वसुदेव की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं उसका उद्धार करता
हूँ। सबके संकट का निवारण राजा को स्वयं करना चाहिये, उस राजधर्म का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः।
आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥४५॥
दीन, दुर्बल ब्राह्मण और अयाचित भक्त हों तो उनकी खोज कर राजा को उनका संकट में संरक्षण करना
चाहिये। अपने बच्चे पर संकट आने पर जिस प्रकार पिता उसके संरक्षण के लिये कमर कस लेता है, उसी प्रकार
राजा को भी आस्थापूर्वक अपनी प्रजा का संकटों से संरक्षण करने के लिये तत्पर रहना चाहिये। प्रजा का संरक्षण
कर उस पर आयी हुई आपत्ति का निवारण स्वयं करना राजा का स्वधर्म है। हाथी दलदल में फँस जाय तो भी वह
अपने ही बल से बाहर निकलता है और दलदल में फँसी हुई हथिनी तथा उसके कितने घावों को बाहर निकालता
है इसकी तो कोई गिनती ही नहीं है। उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा को अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिये, साथ ही
अपने संकटों का सामना भी अपनी ही शक्ति से करना चाहिये। ऐसे स्वधर्माचरण से जो राजा सम्मानपूर्वक
व्यवहार करता है उसे उस स्वधर्माचरण से कैसी फलप्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीपति स्वयं बता रहे हैं।