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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 869 में से

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पृष्ठ 488

४७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शूद्र पर यदि संकट आये तो उसे कुत्ते की तरह नीच सेवा नहीं करनी चाहिये। वह हाथ से चटाई बुन कर
उपजीविका कमाये। डोर या छीकें बेचकर धनार्जन करे अथवा सिलबट्टा वा दीपक बेचे। नहीं तो पेट भरने के
लिये सिर पर माल ढोये। आपातकाल में चारों वर्णों को अपना-अपना निर्वाह कैसे करना चाहिये इसके बारे में
तुम्हें बतलाया। फिर भी जहाँ तक हो सके स्ववृत्ति नहीं छोड़नी चाहिये। आपत्काल में, दूसरा कोई उपाय न होने
के कारण जो धंधा शुरू किया हो उसे आपत्काल समाप्त होते ही छोड़ देना चाहिये और फिर से अपने स्वधर्म के
अनुसार चलना चाहिये। अब गृहस्थ का जो विहित कर्म है, उसके आवश्यक धर्म तथा उसमें भी ब्रह्मार्पण करने
का मर्म भगवान स्वयं बता रहे हैं।
वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम्।
देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥ ५० ॥
स्वाध्याय का अर्थ है वेदाध्ययन करना, वेदों में कहे अनुसार ब्रह्मयज्ञ करना, स्वधा अर्थात् पितरों को तर्पण
करना और स्वाहा अर्थात् देवाधिदेवों को हवि देना। बलिदान की तरह दान करना चाहिये जिससे भूतगण तृप्त
होते हैं। मनुष्यों को अन्नोदक का दान करना चाहिये। ये पंचमहायज्ञ ही ब्राह्मण का नित्यकर्म हैं। इसी का नाम है
ब्रह्मकर्म। अब जिसके द्वारा ब्रह्मार्पण होता है, उस अर्पण की पहचान तुम्हें पूर्ण रूपसे बताता हूँ। इसमें यदि कर्म
करने वाला मैं हूँ यह भावना चित्त से निकाल दी जाय तथा प्राणिमात्र भगवत्स्वरूप है यह भावना धारण की जाय
तो वह कर्म सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। कर्म का अभिमान छोड़ने पर वह कर्म ब्रह्मार्पण ही होता है। उद्धव!
संकल्प के बिना कर्म के ब्रह्मार्पण होने की यह पहचान है। मेरे द्वारा यह कर्म हुआ और उसे मैं कृष्णार्पण किया
ऐसा संकल्प करने पर उसका कर्तृत्व अपने माथे पर लगता है और जो स्वयं को कर्म का कर्त्ता कहता है वही
भोक्ता भी बन जाता है। इसलिये हे उद्धव! अहंता ही मुख्य रूप से बाधक है। जिसमें अहंता होती है उसमें
निजबद्धता भी होती है; और जो निरभिमानी और निर्मम होता है उसके साथ.निजमुक्तता भी रहती है। इसलिये
अभिमान त्याग कर पंचमहायज्ञ करते रहना चाहिये। गृहस्थ उसे रोज ही करता रहता है इसलिये उसका कर्म
सहज ही ब्रह्मार्पण होता है। जिस रीति से गृहस्थ का नित्यकर्म भगवान को अर्पण होता है उसका मैंने यथार्थ
रीति से वर्णन किया। अब यज्ञ आदि की कथा सुनाता हूँ, सुनो। जिसके पास कम से कम बारह हजार रुपये हों
और जिसे वेद के सम्पूर्ण यज्ञ का ज्ञान है वह यज्ञ करने का अधिकारी बनता है।
यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।
धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥ ५१ ॥
व्यापार में अधर्म से प्राप्त किया अथवा निषिद्ध दान में मिला हुआ अथवा दूसरों का छल करके लाया
हुआ अथवा दूसरे की गरज से लाभ उठाकर लाया हुआ, या किसी ने जलभुन कर दिया हुआ अथवा शिष्य को
संकट में डालकर लाया हुआ धन यज्ञ करने के लिये अयोग्य है। ईश्वर की इच्छा से जो सहज प्राप्त हुआ हो
अथवा जो शुद्ध प्रवृत्ति से, अर्थात् ब्राह्मण के घर पौरोहित्य कर, सदाचरण से प्राप्त किया हो या सुखमय उपायों
से प्राप्त हुआ हो ऐसे धन को खर्च करना उचित है। परिवारजनों को भूखा रख, सारा धन यज्ञ में खर्च नहीं करना
चाहिये क्योंकि उससे भी अधर्म ही होता है अथवा जिसके आसरे चरितार्थ चलता है जैसे खेत आदि, उसे बेच
कर यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो यश प्राप्त करने के लिये यज्ञ करते हैं, वे भी मन्दबुद्धि होते हैं। कर्म का
अहंकार न कर पवित्र मार्ग से धन उपार्जन कर यज्ञ करना चाहिये। यही गृहस्थ के स्वधर्म का लक्षण है। मन की