श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय
हे कर्मप्रकाशक ! हे ब्रह्मविद्योपदेश विवेक ! हे कर्मधर्म प्रतिपालक ! हे जगन्नायक ! हे ॐकारस्वरूप
गुरुवर्य ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। हे गोविन्द ! वर्णाश्रम की मर्यादा के तुम आधार हो। वेदानुवाद का कारण तुम ही
हो और विवाद का और संवाद का मूल भी तुम ही हो। तुम शब्दसृष्टि के देदीप्यमान सूर्य हो; तुम वेद के गूढ़ार्थ
के प्रकाशक हो, तुम एक होते हुए अनेक हो गये हो; व्याप्य और व्यापक भी तुम्ही हो। विधि और विधान तुम्हीं
हो, वाचाल भी तुम्हीं हो और मौन भी तुम्हीं हो; हे गुरुराजा ! एका और जनार्दन ये दोनों भी पूर्ण रूप से तुम्ही
हो। इसलिये श्रीभागवत की कविता तुम्हीं हो और अर्थ भी तुम्हीं हो। अर्थज्ञान भी तुम्हीं हो और हमलोगों से
बात कराने वाले भी तुम्हीं हो। जिस प्रकार अपना ही शब्द प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर देता है, उसी प्रकार मेरे
मुख से कवित्व बोलने वाले तुम्हीं हो। श्रीभागवत में कृपामूर्ति श्रीकृष्ण ही वक्ता है। उसने वर्णाश्रम की उत्पत्ति
यथार्थ ढंग से बता दी है। सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य धर्म सुगम ढंग से बतलाया और गृहस्थ के
स्वधर्म का तथा नित्य कर्म का निरूपण किया। अब अठारहवें अध्याय में वानप्रस्थाश्रम का लक्षण तथा संन्यास
धर्म का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।
वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः ॥ १ ॥
अब क्रम के अनुसार वानप्रस्थ का निरूपण आता है। उसे वन में जाने के लिये जीवन के विभाग ही
कारण हैं। श्रुति में पुरुष के जीवन की मर्यादा सौ वर्ष बतायी गयी है; उसमें के दो भाग बीत कर तीसरा भाग
शुरू होने पर अर्थात् छासठवाँ लगने पर वन में जाने की तैयारी करनी चाहिये। वन जाने के पूर्व पत्नी को पुत्र के
सुपुर्द कर देना चाहिये और स्वयं वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करने के लिये वन में जाना चाहिये। महान साध्वी सती
तथा पतिव्रता स्त्री जो पति को ईश्वरस्वरूप मानकर आचरण करती है तथा पति वानप्रस्थाश्रम में जाने के लिये
तैयार होता है तो वह पुत्र के साथ रहने के लिये तैयार नहीं होती। पति की सेवा से वंचित होना उसे कल्पांत की
तरह लगता है, ऐसे पति के चरणों की दासी को अपने साथ वन में ले जाना चाहिये। उसे आश्रम में स्त्रीकाम से
विरत रहकर वही व्रत दृढ़ होकर आगे चलाना चाहिये। जिसने वानप्रस्थ स्वीकार कर लिया उसे मन में शान्ति
धारण करनी चाहिये, कामक्रोध को स्पर्श नहीं करना चाहिये। यह व्रत उसके लिये आवश्यक है।
कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत् ।
व सीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च ॥ २ ॥
वन में ऋतु के अनुसार जो कंदमूल और फल उपलब्ध हों उनमें से अत्यन्त निर्मल और पवित्र फल चुन
कर उन पर निर्वाह करना चाहिये। वनवास में हों तब तक वल्कल, व्याघ्रांबर अथवा मृगचर्म आदि वस्त्र ही
परिधान करें अथवा केवल तृण पहनें या पेड़ के पत्तों का वस्त्र बनायें। अब वानप्रस्थ आश्रम में कौन-सा व्रत
करना चाहिये उसके बारे में भी सुनो। उन व्रतों का निरूपण स्वयं नारायण कर रहे हैं।