श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ अध्याय ४८९
अनासक्त रहता है; मेरी प्राप्ति के लिये जिसका चित्त सदा उत्सुक रहता है; जो स्वधर्म कर्म पर ही चलता है और
वेदशास्त्रों का विचार करता है; ऐहिक तथा पारलौकिक सुख से जिसका चित्त त्रस्त रहता है, ऐसा जो नित्य
विरक्त तथा विख्यात मुमुक्षु हो, वह जो ब्रह्मज्ञान साधने के लिये साधनों में मन लगाए और यदि उसका स्वधर्म
कर्म विपरीत हो जाय तो उन दोषों के कारण ही उसकी हानि होती है। इसलिये उसे विधिपूर्वक कर्मों का त्याग
कर संन्यास ग्रहण कर सद्गुरु की शरण में जाना चाहिये जिससे उसे श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। लेकिन कई
लोग केवल भावार्थी होते हैं। वे स्वधर्म कर्म के प्रकार नहीं जानते। उन्हें शास्त्रश्रवण की भी जानकारी नहीं
होती। लेकिन मेरे प्रति उनका प्रेम असीम रहता है। उसे भी संन्यास ग्रहण कर गुरु की शरण में जाना चाहिये।
उसे भी गुरुकृपा से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जिसे गुरु बनायें वह परोक्षापरोक्ष ज्ञान में पारंगत होना चाहिये।
अब उसकी सेवा का भावार्थ स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।
यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः ॥ ३९ ॥
गुरु के प्रति, वह अचल, निर्मल, परा से परे का परमेश्वर, परब्रह्म और ईश्वर है ऐसा विश्वास रखना
चाहिये। इस दृढ़ विश्वास की आदत से गुरुचरणों के प्रति अपूर्व लगाव उत्पन्न हो कर भजन में नित नया और
अधिकाधिक माधुर्य आने लगता है। इस प्रकार भजन में रुचि उत्पन्न होने पर अंतःकरण में अत्यन्त श्रद्धा उफन
आती है, गुरु की आज्ञा का वह रत्तीभर भी उल्लंघन नहीं करता और आलस को झटकार देता है। गुरुवचन के
श्रवण के बहाने विकल्प की जड़ काट देता है और संकल्प को सूली पर चढ़ाकर अभिमान का विनाश करता है।
उस समय ईर्ष्या किस तरह सिर उठाएगी ? वह भय के मारे वहीं समाप्त हो जाती है। इस प्रकार गुरु के प्रति
अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न होती है; वह परब्रह्म दृष्टि से ही गुरु को देखता है। जो निर्गुण और निराकार है वही साक्षात
मेरा गुरु है। नित्य और निर्विकल्प जो समाधिसुख है वह मेरे गुरु के चरणों का तीर्थ है। गुरु को इस प्रकार
ब्रह्मस्वरूप से देखने पर शिष्य को भी ब्रह्मस्वरूप की ही पुष्टि प्राप्त होती है। वह सारी सृष्टि को ही ब्रह्मरूप में
देखने लगता है और आत्मा की एकता से गुरुचरणों पर गिर जाता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप से ऐक्य होने पर भी
गुरु की सेवा करनी ही पड़ती है। ब्रह्म से ऐक्य होने पर भी अखण्डत्व के कारण सेवा नहीं टूटती। कर्पूर पानी में
डालने पर स्वयं पिघल जाता है लेकिन साथ ही वह जल को भी सुगन्धित कर देता है। उसी प्रकार अहंभाव नष्ट
होने पर भी वह सर्वदा गुरुचरणों की सेवा करता रहता है। ऐसी अवस्था प्राप्त न कर केवल मस्तक का मुण्डन
करा कर स्वयं को बड़ा संन्यासी कहलाना अनुचित है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं। संन्यास लेकर जो ब्रह्मस्वरूप का
साक्षात्कार नहीं कर लेता उसका श्रीकृष्ण धिःकार करते हैं और दोष लगाते हैं।
यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसार्थिः।
ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीव ति ॥ ४० ॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।
अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते ॥ ४१ ॥
कुछ लोग देह में वैराग्य की भावना हुए बिना ही, विषयों के प्रति विरक्ति न होते हुए भी, दूसरों की
देखादेखी, केवल अन्न के लिये संन्यास ग्रहण करते हैं। संन्यास लेने के पूर्व अंतःकरण में जो भी वैराग्य था, वह
भी संन्यास लेने के बाद तुरन्त चला जाता है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और छठवाँ मन यही छः शत्रु हैं। उनका निर्मूलन