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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

४५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं है और निःशस्त्र है, उस पर वह आक्रमण नहीं करता, जो महाशूर होते हैं वे भागने वाले शत्रु पर भी प्रहार
नहीं करते। रणभूमि में शत्रु से सामना होने पर पीछे वे हटने का नाम नहीं लेते, अकेले ही हजारों वीरों का
सफाया कर देते हैं। स्वधर्म के अनुसार यही सच्ची वीरता है। सबसे बड़ा शत्रु मृत्यु है। उसके जैसा शत्रु अन्य
कोई नहीं है। वह उसी का विनाश कर देता है। उसकी वीरता का वर्णन देवदानव भी करते हैं। इस प्रकार अपने
शौर्य से सारी पृथ्वी को 'शत्रुरहित' कर देना यही 'शौर्य' है और यही क्षत्रिय धर्म के अनुसार क्षत्रियों का चौथा
गुण है। भले ही मस्तक पर शस्त्रों का प्रहार हो अथवा बाण शरीर में पूरी तरह घुस जाएँ लेकिन वह रणभूमि में
पीछे नहीं हटता यही क्षत्रियों की 'सहिष्णुता' है। हाथियों के झुण्ड सामने आ जाएँ, बड़े-बड़े वीर जोश में
सामना करने आ जाएँ लेकिन वह वीर शिरोमणि उनका वह आवेग सहन करता है। इसी का नाम है सच्ची
सहिष्णुता। समुद्र की लहरों के प्रहार से जिस प्रकार महापर्वत पीछे नहीं हटता, उसी प्रकार जो शत्रु की सेना के
प्रहार से रणभूमि से पीछे नहीं हटता अथवा यश अपयश, सुख-दुःख, हर्ष-विषाद क्षत्रिय के चित्त को बाधा नहीं
पहुँचाते। इसी को सम्पूर्ण सहिष्णुता कहते हैं। इसी को 'तितिक्षा' भी कहते हैं। यह क्षत्रियों का पाँचवाँ लक्षण
है। अब क्षत्रियों का औदार्य का गुण अर्थात् दातृत्व शक्ति के बारे में भी सुनो। क्षत्रियों के लिये धन तृणसमान
होता है इसलिये वे याचकों का मन तृप्त होने तक उसे दान देते रहते हैं। देश, काल, सत्पात्र देखकर
सम्मानपूर्वक तथा मन में किसी भी प्रकार का संकोच न लाकर विधिपूर्वक दान देना। चन्द्र एक बार चकोर को
देख भर ले फिर वह उसे अमृत देने में जिस प्रकार नहीं सकुचाता उसी प्रकार इसकी वृत्ति याचक के प्रति रहती
है। क्षत्रिय उससे कभी पीछे नहीं हटता। इस प्रकार स्वाभाविक रूप में दान देना यही क्षत्रियों का स्वाभाविक गुण
है। इसी का नाम है 'औदार्य'। यह क्षत्रियों का छठां लक्षण है। क्षत्रियों का परमार्थ प्राप्ति का उपाय है
स्वधर्मनिष्ठा। उसके अनुसार जो भी प्रयास किया जाता है उसे 'उद्यम' कहते हैं। अपने प्राण तक देकर गोब्राह्मण
की रक्षा करना, स्वधर्म से प्रजा का पालन करना और किसी को भी कष्ट न देकर पृथ्वी की रक्षा करना, इसी का
नाम 'उद्यम' है, इसे ध्यान में रखो। यही क्षत्रियों का सातवाँ लक्षण है। अब उनके धर्म के 'स्थैर्य' नामक गुण
का भी लक्षण सुनो। गोब्राह्मणों की रक्षा करते समय तथा स्वधर्म से प्रजा का पालन करते समय उनका मन थक
नहीं जाता। यही क्षत्रियों की स्थिरता है। स्वधर्म के प्रति यह 'स्थिरत्व' ही क्षत्रियों का आठवाँ लक्षण है। अब
उनका ब्राह्मण भक्ति का लक्षण बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियों को परमार्थ प्राप्ति के लिये ब्राह्मण 'गुरु' है। उस ब्राह्मण
का ब्रह्मभाव से भजन करना चाहिये। ब्राह्मण के प्रति ब्रह्मभावना रखकर, यथाविधि उनका सम्मान कर जो
प्रतिदिन भक्तिभाव से ब्राह्मण का पूजन करेगा उसमें मेरे ही प्रति भावना होगी, वह ब्राह्मणों को संतोष प्रदान
करेगा। उद्धव! यह मेरी आत्मा है। उसने मुझ श्रीकृष्ण की ही पूजा की ऐसा समझ लो। क्षत्रिय सम्मान के साथ
ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, इसीलिये उन्हें ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ब्राह्मण ब्राह्मणों का ही द्वेष करते हैं इसलिये वे
दारिद्रय का दुःख भोगते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण का भजन करने से मैं परब्रह्म उसके अधीन हो जाता हूँ। उसका
ऐश्वर्य का चिह्न यही दसवाँ लक्षण है। ब्राह्मण का भजन न करें तो ऐश्वर्य नहीं प्राप्त होगा; मैंने ब्राह्मण के पैर
अपने पेट से लगा लिये इसीलिये षड्गुण ऐश्वर्य सम्पन्न हो गया हूँ। ब्राह्मण भजन के मार्ग पर लगने पर
ब्रह्मसायुज्य पैरों का स्पर्श करता है फिर भी ब्राह्मण भजन के लिये भक्त उसे स्वीकार नहीं करते। ब्राह्मण भजन
करने से अपने आप ही मेरी सत्ता उनके पास आती है। इसलिये सचमुच ही उसकी आज्ञा देवदानव भी
शिरसावंद्य करते हैं। उसकी आज्ञा के भय से अकाल भी नहीं पड़ता। न्याय से प्रजा का पालन और धर्म का
संरक्षण भी उसके ही कारण होता है। इसी अत्यन्त उत्कृष्ट स्वधर्म के योग से भरत, पुरुरवा, जनक आदि ऐश्वर्य

सत्रहवाँ अध्याय ४५९
के ऊँचे स्थान तक पहुँच गये। इस प्रकार ब्राह्मण की सेवा बड़ी अलौकिक है। इस प्रकार क्षत्रियों के दस लक्षण
तुम्हें बतलाये। इसके मुख्य रूप से ब्राह्मण भजन ही सबके लिये श्रेयस्कर है। वैश्यों की प्रकृति के स्वाभाविक
पाँच लक्षण हैं जिन्हें यथार्थ रीति से श्रवण करो।
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १८ ॥
वैश्यों के स्वभाव में द्रव्यलोभ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कितने ही करोड़ का मालिक क्यों न हो जाय लेकिन
उसकी इच्छा तृप्त होना जानती ही नहीं। 'आस्तिकता' केवल द्रव्यसंग्रह की ही होती है। अधिक धन कमाऊँगा
इस विश्वास के साथ एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक माल ले जाता है। वेदशास्त्र पर अत्यधिक विश्वास यही मुख्य
रूप से वैश्य की 'आस्तिकता' है। वेद ने जो भी स्वधर्म बतलाया है उसके प्रति जरा भी उदासीन न रहना। वैश्य
का स्वधर्माचरण होता है, दान देना। प्राणांत के समय भी दान देने की प्रक्रिया अखण्ड चलती रहती है। परलोक
प्राप्ति का प्रमुख साधन है 'ब्राह्मण की सेवा'। ब्राह्मण की आज्ञा परम प्रमाण। उससे भी विशेष है गुरु की सेवा।
वेदशास्त्रों में भी 'सद्गुरु ही परब्रह्म' है, ऐसा प्रमाण है। ब्राह्मण भी तद्रूप ही हैं यह मानकर उनकी सेवा के लिये
प्राण भी दे देना। बड़े-बड़े लोगों में सम्मान प्राप्त हो अथवा समाज में प्रतिष्ठा बढ़े, इस प्रकार का दंभ वैश्यों को
स्पर्श नहीं करता। कपट छोड़कर, लोभ और दंभ का त्याग कर ब्राह्मण की सेवा में प्राण भी खर्च कर देना यही
वैश्यों का लक्षण है। इससे ही वैश्य जाति को परमार्थ की प्राप्ति होती है। सारांश वैश्य की ऐसी स्वाभाविक
प्रकृति होती है। हे उद्धव! शूद्र की प्रकृति के भी तीन प्रकार के कर्म होते हैं उन्हें भी तुम्हें निश्चय करके बताता
हूँ, सुनो।
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन संतोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १९ ॥
शूद्र जाति का स्वधर्म यही है कि वह मनःपूर्वक ब्राह्मण की सेवा करे, उनकी सेवा निष्कपट भाव से करने
से, उनकी ही कृपा से उनकी उपजीविका चलती है। जहाँ घास और पानी हो वहाँ गृहस्थों की गायें ले जाये,
जंगली जानवर उन पर आक्रमण करें तो प्राण देकर भी उनकी रक्षा करे। गोरक्षा में प्राण देने पर उत्तम गति प्राप्त
होती है। जिसे गौ के प्रति दयाभाव रहता है, उसका मैं श्रीकृष्ण सदा सहायक होता हूँ। ब्राह्मण की चाकरी तथा
जानवरों की देखभाल का काम न मिले तो शूद्र उपजीविका चलाने के लिये मन्दिर में समार्जन करे। निष्कपट
भाव से श्रीहरि का आँगन झाडू पोंछा लगाकर लीप कर स्वच्छ रखे और वहाँ जो प्राप्ति हो उस पर निर्वाह करे।
वहाँ जब भी, जो भी मिले उससे अपना निर्वाह करे। यही शूद्र के स्वभाव की स्वधर्म कर्म स्थिति है। ब्राह्मण के
घर अग्निहोत्र आदि कर्म होते हैं और शूद्र इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं। इससे दोनों के ही धर्म का
निर्वाह होता है। गृहस्थाश्रम धर्म है तीनों आश्रमों को आश्रय देना, साथ ही तीनों आश्रमों के लोगों को अन्न-वस्त्र
देकर उनका संरक्षण करना। ब्रह्मचर्याश्रम का आचरण है गुरु की सेवा करना तथा वेदाध्ययन करते हुए जीवन-
यापन करना। उसे दान देने का अधिकार नहीं होता। ब्रह्मचारी को जो कुछ भी प्राप्त हो वह उसे गुरु को अर्पण
करना चाहिये। गुरु के सिवा यदि वह किसी अन्य को दानधर्म करेगा तो वह अधर्म होगा। वानप्रस्थाश्रम में
विशेषरूप से तप ही प्रमुख है। वेदोक्तविधि के अनुसार उसे अग्नि की सेवा करनी चाहिये। संन्यासी, ब्रह्मचारी
अथवा दीन-दुःखी आश्रम में आयें तो उन्हें यथाशक्ति अन्न देना चाहिये। यही वानप्रस्थ का आश्रमधर्म है।

४६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
संन्यासी के लिये अहिंसा ही प्रमुख है। ज्ञान परिपाक से पूर्ण शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ परिपथ न हो वहाँ जाकर
भिक्षा माँगना यही चतुर्थाश्रम का मुख्य धर्म है। अब इस वर्णाश्रम के बाहर के जो अंत्यज आदि लोग हैं उनके
स्वभाव का लक्षण भी भगवान बताते हैं।
अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः।
कामः क्रोधश्च तर्षश्च स्वभावोऽन्तेवसायिनाम्॥२०॥
इस श्लोक के आठ गुण त्यागने का जिसका मन नहीं होता वह भी अंत्यज की ही तरह है। स्वभाव का
यह लक्षण अत्यन्त निंदनीय है। जिसे स्नान, संध्या, स्वच्छता तथा अपना कर्तव्यकर्म अच्छा नहीं लगता, उसके
अन्तर में कृष्ण सर्प की तरह अपार विकल्प भरे रहते हैं। धतूरे का फल देखने में गोलमटोल होता है किन्तु
उसके अन्दर नशा और बाहर काँटे होते हैं। उसी प्रकार जो अंतर्बाह्य खरा है उसी का नाम है 'अशौच' अर्थात्
अमंगलता। शरीर श्वेत कुष्ट से भरा हुआ, नाक भी दिखाई न दे, मुँहफट अनर्गल पति की निंदा करने वाली स्त्री
जिस प्रकार अंतर्बाह्य अमंगल होती है वैसा ही अमंगल। इस प्रकार स्वभावतः ही जिसमें 'अशौचता' या
अमंगलता होती है वही अंत्यज का पहला गुण है। उसी प्रकार जिसके स्वभाव में दिन-रात नटखटपन नाचता
रहता है, वह अपने झूठे स्वभाव के कारण माँ, बाप तथा गुरु को भी ठगता है। होली के मौसम में जिस प्रकार
कोई रामकृष्ण नहीं कहता बल्कि आनंदोल्हास से जननेन्द्रिय दर्शक वीभत्स शब्दों का ही उच्चार करते हैं, उसी
प्रकार जिसे जागृति में, स्वप्न में अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य ही अच्छा लगता है उसे प्रकृति स्वभाव के
अनुसार 'अंत्यज' ही समझना चाहिये। गाड़ कर रखी हुई माँ-बाप की दौलत भी एक बार देखने पर वह उसे
खोदकर निकालने से बाज नहीं आता वह बार-बार विश्वास दिलाकर गुरु की गठरी भी गायब कर देता है। कोई
धनवान मिल जाय तो नीचता के अनेक उपाय लगाकर अथवा बलात्कार से उसका सब कुछ लूट लेता है। इस
प्रकार दूसरे का माल हड़प करने के लिये चाहे जैसा अधर्म करने में जिसकी आसक्ति रहती है उसे 'चोरी' कहते
हैं। स्वधर्म कर्म पर जिसके मन में स्वभावतः ही विश्वास नहीं होता, जो वेद, शास्त्र, पुराण आदि को बकवास
समझता है, इसी का नाम है 'नास्तिकता'। उसमें स्वभाव से ही आस्तिक बुद्धि का अभाव रहता है। गाँठ में,
लाखों की दौलत होते हुए भी उसके मुँह में सदा 'नास्तिकता' ही भरी रहती है, परिवारजनों को भी विपत्तियों के
संकट में झोंकता है, यही अंत्यज का स्वभाव है। बिना कारण झगड़ा-टंटा, दूसरों का छल तथा हमेशा दाँत
कटकटाते रहना यह अंत्यज का जातिस्वभाव है। उसके पेट में सदा विद्रोह भड़कता रहता है, ऊपर से मीठी बातें
करता है, दृष्टि हमेशा क्रूर तथा पेट में द्वेष की आग भड़कती रहती है। कोई जीवनभर उपकार करे लेकिन जरा
सी बात पर उसका नाश करने का गुप्त संकल्प मन में धरता है। उपकार करने वाले पर अंत्यज प्राणांत भी
अपकार नहीं करता लेकिन उस प्रकार का द्वेष मन में रखता है जिसे 'शुष्कविग्रह' कहते हैं। जो इष्ट मित्रों में
फूट डालता है, बड़ों-बड़ों को संकट में डालता है, अमंगलता तथा नास्तिकता तो शिखर पर रहती है, ऐसे पुरुष
को 'अतिविग्रही' कहना चाहिये। अपना रत्तीभर लाभ न होते हुए भी दूसरे के कार्य का नाश करना, ऐसे व्यक्ति
को 'शुष्कविग्रही' कहते हैं। उद्धव ! जिसका ऐसा स्वभाव हो उससे अंत्यज भी डरते हैं। अब उसकी छलांग
कितनी लम्बी होती है, सुनो। कनक और कांता के लोभ की पराकाष्ठा रहती है। मन को क्षणभर के लिये भी
शान्ति नहीं रहती। स्त्री भोग की इच्छा के सम्बन्ध में तो पूछिये मत। बस, वह स्त्री हो इतना पर्याप्त है, फिर
सेव्यासेव्य का विचार मन को छूता भी नहीं। उसी प्रकार धन, फिर वह किसी भी मार्ग से क्यों न मिले। अनुचित
मार्ग से इच्छा की पूर्ति करना यही उसके स्वभाव की प्रवृत्ति होती है। उद्धव ! ऐसे जो हैं वे अंत्यज स्वभाव के

सत्रहवाँ अध्याय ४६१
हैं। देखो! जो ऐसे कामी या लोभी होते हैं उनके अंतःकरण में सदा क्रोध की आग भड़कती रहती है। इच्छा पूरी
नहीं हो रही है यह देख उसका गुस्सा प्रलयांत भड़क उठता है। शरीर क्रोध के अधीन होने के कारण शान्ति तो
क्षण भर के लिये भी नहीं मिलती, वृत्ति से सदा जलाभुना हुआ, ऐसा नीच स्वभाव होता है। प्राप्त सुख से सन्तुष्ट
न होना, जो सुने उस सुख के लिये निरन्तर मन में आस धर के रहना यह स्वभाव भी अत्यन्त नीच है। इन जिन
आठ गुणों के बारे में तुम्हें बताया वह किसी भी वर्ण वाले का स्वभाव क्यों न हो, उसमें अंत्यज भाव है यह
निश्चित रूप से जान लो। ये जो सारे दुर्गुण बतलाये उनमें से कोई भी एक नरक देने के लिये प्रसिद्ध है। फिर
जहाँ आठों गुण मिल जाय तो फिर उनसे कैसे छुटकारा मिले ? इन गुणों का त्याग करने के लिये ही मैंने तुम्हें
उनके लक्षण बताये। अरे! इन गुणों को जो स्वीकार करते हैं वह नरक जाते हैं और जो उनका त्याग करते हैं वे
मेरे पद तक पहुँचते हैं। अब जिससे मेरे पद की प्राप्ति हो और किसी भी वर्ण को उत्तम गति प्राप्त हो ऐसे गुणों
के लक्षण हे उद्धव ! तुम्हें बताता हूँ। जो सारे लक्षणों का सार है, समस्त गुह्य गुणों का भण्डार है और जिसके
योग से संसार से मुक्त हुआ जा सकता है उसे सुन लो। जो सारे वर्णों का सहजधर्म है, जिसके योग से परब्रह्म
की प्राप्ति होती है, जिसके योग से मन का भ्रम दूर होता है, वे उत्तम गुण सुनो।
अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।
भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः॥ २१॥
जिससे दूसरे को सुख प्राप्त हो ऐसे उपाय करना जिससे मुझे सुख प्राप्त हो। उसी गुण को मैं श्रीकृष्ण
वन्दनीय मानता हूँ। उसी प्रकार किसी को कष्ट न देना, परपीड़ा न देना, दूसरे को दुःख न देना इस योग से भी हे
उद्धव ! मुझे सुख प्राप्त होता है यह जान लो। दुःख न देकर सुख देना इसी को 'अहिंसा' कहते हैं जो पहला गुण
है। अब दूसरा गुण 'सत्य' है जिसके लक्षण सुनो। सत्य इस प्रकार का होता है— जिसका मन और वाणी, जागृति
स्वप्न अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य का जरा भी स्पर्श नहीं करते, निन्दा और नरस्तुति तथा झूठ बोलना जिसे
नहीं आता, वाणी को जो पवित्र रखता है उसे 'सत्य' कहते हैं। अधर्म से एक कौड़ी से लेकर एक करोड़ लाभ
का भी वह विचार नहीं करता, दूसरे की कानी कौड़ी को भी वह स्पर्श नहीं करता, चोरी करने का अथवा किसी
की आँख बचाकर उसकी वस्तु ले लेना या बिना पूछे वस्तु ले लेना ऐसा विचार उसके मन में नहीं आता।
अन्याय से प्राप्त किये धन को वह स्वप्न में भी स्पर्श नहीं करता। उद्धव ! यह अचैर्य का लक्षण है। यही तीसरा
गुण है। स्वधर्म से हाथ में धन आ जाय इतना भी धनलोभ जिसमें नहीं होता, कामिनी-काम की वार्ता भी जिसके
कानों तक नहीं पहुँचती, परस्त्री को जो माता के समान मानता है, इतना ही नहीं अपनी स्त्री के प्रति भी जिसका
मन आसक्त नहीं होता, गृहस्थाश्रम में रहने के लिये ही स्त्री का पालन करना उद्धव ! इसी का नाम है 'अकामता'
अथवा अनिच्छा। यही चौथा लक्षण है। अब अक्रोध का लक्षण सुनो। जहाँ काम का जोर नहीं रहता वहाँ क्रोध
का भी कुछ नहीं चलता। जिस प्रकार आकाश को शस्त्र नहीं चुभता अथवा बीज कितना भी अच्छा हो लेकिन
जमीन के सिवा वह अन्यत्र कहीं अंकुरित नहीं होता उसी प्रकार काम के बिना क्रोध कभी नहीं बढ़ता। जिस
प्रकार गर्भवती स्त्री की मृत्यु के बाद गर्भ की भी मृत्यु हो जाती है उसी प्रकार काम के साथ क्रोध की भी
समाप्ति हो जाती है, मस्तक कट जाने पर जिस प्रकार हाथ-पैर की क्रिया बन्द हो जाती है उसी प्रकार काम
समाप्त होने पर क्रोध भी समाप्त हो जाता है और जहाँ काम-क्रोध ही न हो, वहाँ लोभ किस बात का होगा ?
जिसके जड़ में मिट्टी न हो वह वृक्ष कभी नहीं बढ़ेगा। सर का मुण्डन कराने से जिस प्रकार वहाँ जूँ नहीं रह

४६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सकती उसी प्रकार काम और क्रोध के जाने पर लोभ को रहने का ठिकाना ही नहीं मिलता। पति की मृत्यु जिस
प्रकार स्त्री का सौभाग्य ले जाती है उसी प्रकार कामक्रोध के बिना लोभ के लिये कोई ठिकाना नहीं रह जाता।
इसी का नाम है 'निलोभता'। सचमुच क्रोध और लोभ को बढ़ाने वाला काम ही है। जहाँ काम का कार्य अधूरा
रह जाता है वहीं क्रोध का तेज बढ़ता है और जब काम के मनोरथ पूर्ण होते हैं तो लोभ का विद्रोह नाचने लगता
है। जिस प्रकार दीपक की लौ तेज और काजल को एक साथ बढ़ाती है, उसी प्रकार क्रोध और लोभ का
बड़प्पन सदा काम के पास ही रहता है। जाड़े की ठंडक के साथ जिस प्रकार पसीना और ज्वर रहता है उसी
प्रकार काम भी सदा क्रोध और लोभ से युक्त रहता है। जहाँ काम का कोई मूल्य नहीं है वहाँ सहज ही क्रोध
और लोभ का त्याग होता है। स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं, यही उपाय सवसे उत्तम है। अब प्राणिमात्र का हित कैसे
साधा जा सकता है, यह भी बताता हूँ। जितना अपना सामर्थ्य हो उसके अनुसार प्राणिमात्र का हित करते रहना
चाहिये। उन्हें जिस वस्तु की जब-जब आवश्यकता हो उसे देते रहना चाहिये। अंतःकरण की ममता से अन्न,
वस्त्र, दान आदि देकर प्राणिमात्र के प्रति प्रिय आचरण करते रहना चाहिये। यह सभी का स्वधर्म है इसे ध्यान में
रखो। प्राणिमात्र का ऐसा प्रिय करना चाहिये जिससे उसका हित हो। जो प्रिय उसके हित के लिये बाधक हो उसे
कभी नहीं करना चाहिये। प्राणिमात्र का प्रिय और हित करने वाला संसार में जो भी पुरुष हो उसके घर में
भगवान सदा कल्याण ही करता है। वह प्राणिमात्र का प्रिय और हित कर रहा होता है तभी मैं श्रीकृष्ण उसके
संकटों की होली जला देता हूँ। जो सद्भाव से सचमुच प्राणियों का हित करते रहने के कारण समस्त प्राणिमात्र में
प्रिय रहता है उसका संसार में सबके अंतःकरण में रहने वाला परमात्मा सुखमय बना देता हूँ। अहिंसा आदि जो
सात गुण इस श्लोक में बताये गये हैं वह सभी का स्वधर्म है। सभी आश्रमों और सभी वर्णों के लिये मुख्य रूप
से यही धर्म है। अव हे उद्धव! अब मैं तुम्हें आश्रमों के धर्म के वारे में बताता हूँ। उसमें पहला धर्म है, ब्रह्मचर्य,
सुनो। ब्रह्मचर्य के दो प्रकार हैं, एक का नाम है पूर्ण 'नैष्ठिक्य' तथा दूसरा है 'उपकुर्वाण'। अब उन दोनों के
लक्षण सुनो। उपनयन के बाद वेदाध्ययन होने के बाद जो परमार्थ को लक्ष्य बनाकर गृहस्थाश्रम की ओर नहीं
देखता उसी का नाम है 'नैष्ठिक्य' ब्रह्मचर्य। दूसरा, वेदशास्त्र आदि का पठन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा दे कर ब्रह्मचर्य
व्रत की समाप्ति कर तदुपरान्त यथाविधि स्त्री का पाणिग्रहण करना इसे 'उपकुर्वाण' कहते हैं।
द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विजः।
वसन् गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहूतः ॥ २२॥
मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् ।
जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठः कुशान् दधत्॥ २३॥
स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यतः।
नच्छिद्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि ॥ २४॥
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म, अन्नप्राशन ये सारे कर्म चौल तक पहले भी होते थे। उसके बाद उपनयन तथा
गुरु द्वारा गायत्री मंत्रोपदेश होने के बाद उसका दूसरा 'सावित्र' जन्म होता है जिसे 'व्रतबंध' कहते हैं। इस प्रकार
गायत्री मंत्र से तीनों वर्ण के दो जन्म हो जाते हैं। यह ब्रह्मचर्याश्रम है। यह व्रतधारण केवल वेदाध्ययन के लिये
होता है। इसलिये वेदाध्ययन करने के निश्चय से ब्रह्मचारी गुरु के घर रहता है। वहाँ उसका व्रत किस प्रकार

चलता है, सुनो। कमरबंध, जनेऊ, कृष्णाजिन, पलाश का दण्ड तथा पानी लाने के लिये कमण्डल रखना चाहिये।
केशवपन नहीं कराना चाहिये, तैलाभ्यंगस्नान नहीं करना चाहिये, दंतधावन नहीं करना चाहिये और केश में कंघी
नहीं लगानी चाहिये। नाखून नहीं निकालने चाहिये, काँख तथा गुप्त स्थान के केश नहीं काटने चाहिये। धोबी
द्वारा धोकर लाये कपड़े नहीं पहनने चाहिये। प्रातःकाल और दोपहर में बहते पानी के जलाशय में स्नान करना
चाहिये। श्वेत आसन पर सफेद वस्त्र बिछाना चाहिये और जप के लिये रुद्राक्ष की अथवा कमल के बीज की
माला रखनी चाहिये। कुश आदि के साथ पवित्र दर्भ हाथ में रखने चाहिये। अब मौन के सम्बन्ध में भी बताता
हूँ। उसे भी सुनो। मलमूत्रविसर्जन तथा स्नान करते समय तथा जप, होम, भजन और दोनों समय की संध्या करते
समय नियमतः मौनव्रत धारण करना चाहिये। अभ्यंग स्नान न करने से तथा बालों में कंघी का प्रयोग नहीं करने
से केशों में स्वयमेव जटाओं का निर्माण हो जाता है। यह नियमतः किया जाने वाला व्रत ब्रह्मचारी के लिये
बताया गया है। इनका पालन करते हुए गुरु की सेवा करनी चाहिये। गुरु जब कहे तभी वेदपाठन करना चाहिये।
उसकी आज्ञा शिरसावंद्य कर निष्कपट भाव से गुरु की सेवा करनी चाहिये। जल्दी-जल्दी पाठ नहीं पढ़ाता
इसलिये एक गुरु को छोड़कर दूसरे के पास जाने में महादोष है। गुरु को दया आये इसलिये दिन-रात उसकी
सेवा करनी चाहिये। उस दया से वही दिन-रात पढ़ा सकेगा। गुरुचरण पर भक्ति रखकर वेदशास्त्र का पठन करें
तथा परमार्थ बुद्धि से वेद का तत्वार्थ सम्पादित करना चाहिये।
रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।
अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत् ॥ २५ ॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। ब्रह्मचारी को जानबूझ कर वीर्य त्याग नहीं करना चाहिये।
यही ब्रह्मचर्य का प्रमुख व्रत है। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो शास्त्रोक्त पद्धति से स्नान करना चाहिये और फिर
प्रायश्चित्त के लिये गायत्री का स्मरण करना चाहिये। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी को जानबूझ कर वीर्य
त्याग करने का अधिकार नहीं है। ऐसा जो करेगा उसका आश्रमधर्म डूब जायेगा। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो
मृत्तिका लगा कर अभ्यंग स्नान करना चाहिये और फिर प्रायश्चित्त के लिये विधिपूर्वक जाप करना चाहिये।
अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचिः।
समाहित उपासीत संध्ये च यतवाग् जपन् ॥ २६ ॥
जो गायत्रीमंत्र देता है वह आचार्य है। माता और पिता भी गुरु ही हैं। अग्नि, सूर्य आदि समस्त देवतागण तथा
गौ, ब्राह्मण और ज्येष्ठ लोग, इन सबकी उपासना करने के लिये बाह्य शुद्धि और अन्तर का समाधान चाहिये।
गुरुचरणों की शरण में रहकर माता, पितरों की आज्ञा का पालन करना चाहिये। अग्नि में हवन करे, इन्द्रादि देवताओं
की स्तुति करें, ब्राह्मणों को निरन्तर पूज्य मानें तथा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। पिता को साष्टांग दण्डवत करे, गौ के
शरीर को सहलाये, सायं प्रातः संध्या में मौन रखे। मध्याह्न संध्या में मौन आवश्यक नहीं है। सद्गुरु की बात तो
बहुत बड़ी है; गुरुतत्त्व सब में श्रेष्ठ तथा सर्ववंद्य है, उसका प्रताप प्रसिद्ध है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत् सर्वदेवमयो गुरुः॥ २७॥
अंतर्यामी ईश्वर, विश्वात्मा, विश्वम्भर, अनंत और अपार मैं, वही शिष्य का श्रीगुरु है। जिसे गुरुनाम कहते
हैं वह सचमुच भगवान ही है। भजन का भक्तिभाव देखकर शिष्य का मनोरथ मैं ही पूर्ण करता हूँ। जिस सद्गुरु

४६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के अंगुष्ट में ब्रह्मादिक अगणित देवताओं की भीड़ रहती है, जिसका नाम वैकुण्ठ और कैलाश में भी पूजनीय
है, जिसका नाम सुनते ही यम और काल थरथर काँपते हैं और ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों हाथ जोड़कर
खड़े रहते हैं, उसी प्रकार जो सारे वेदों का रहस्य है, वही सद्गुरु का स्वरूप है, यही शिष्य की निश्चित धारणा
होनी चाहिये। उसे साधारण मनुष्य समझ कर कभी उसका अनादर नहीं करना चाहिये। गुरु की निन्दा मुँह से
निकले तो समझ लो सर्वस्व नाश हो गया। यदि कोई निकट सम्बन्धी एकांत में सद्गुरु की निन्दा करने आये तो
जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वाले का बहिष्कार किया जाता है, उसी प्रकार उसका त्याग करना चाहिये। यदि
यह सम्भव न हो तो स्वयं वहाँ से भाग जाये। यदि वह स्वयं ही सद्गुरु की निन्दा की बात करता है तो समझ
लो सब कुछ डूब गया, परमार्थ मिट्टी में मिल गया। ऐसे गुरु के प्रति पत्र, पुष्प, अन्न, धन इस सम्बन्ध में कभी
प्रवंचना न करे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्।
यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयतः ॥ २८॥
प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल अन्न, द्रव्य, पुष्प, फल आदि जो भी भिक्षा में प्राप्त हो उसे गुरु को देकर
उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहे। यदि गुरु आज्ञा दें तो उसमें से केवल उदर निर्वाह लायक अन्न लेकर ग्रहण
करें। ब्रह्मचारी को अन्न के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ग्रहण नहीं करनी चाहिये। सुबह और शाम भोजन करना
ब्रह्मचारी के लिये विहित है। गुरु की आज्ञा से जितना भी अन्न मिले उससे क्षुधाशान्ति करनी चाहिये। उसे कभी
अच्छा या खराब नहीं कहना चाहिये। जिह्वा का लाड़ नहीं करना चाहिये। विषय विस्तार नहीं बढ़ाना चाहिये।
देह का निर्वाह हो इतना ही पर्याप्त है, ऐसी शिष्य की इच्छा होनी चाहिये। भोजन करते समय कुछ माँगना नहीं
चाहिये, उसके लिये मौन रहना चाहिये। अधिक अन्न खाने से वह गुरुसेवा में प्रतिबंध होता है। अधिक अन्न
खाने से निद्रा और आलस होता है और बहुत कम खाने से शरीर अपंग हो जाता है। गुरु सेवा के लिये वृत्ति
सावधान रखनी चाहिये। इसके लिये शिष्य का भोजन मर्यादित होना चाहिये। गुरु की सेवा के लिये शरीर सुदृढ़
रखना चाहिये। गुरुसेवा का यह लक्षण स्वयं जनार्दन बता रहे हैं।
शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत् नीचवत्।
यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताञ्जलिः ॥ २९ ॥
गुरुसेवा में तिलमात्र का भी अन्तर न करते हुए सदा उल्हास से तत्पर रहना चाहिये। गुरु यदि किसी वाहन
पर आरूढ़ हों तो स्वयं उनके साथ-साथ उत्साह से चलना चाहिये। वे यदि पैदल चल रहे हों तो उनका सामान
हाथ में लेकर उनके पीछे-पीछे चलना चाहिये। उनका मन देखकर उन्हें पानी, पान आदि देना चाहिये, वह जहाँ
बैठने वाले हों वहाँ आसन बिछाना चाहिये और उनके पैर दबाने चाहिये। सद्गुरु जब आसन पर बैठ जाएँ तो न
उनके बहुत निकट बैठना चाहिये और न बहुत दूर ही बैठना चाहिये। हमेशा उनके दृष्टिपथ में रहें। हाथ जोड़कर
सामने खड़े रहें। गुरु संकेत दें वह काम करना चाहिये। गुरु बिस्तर पर सोये हों उस समय उनके पास नहीं रहना
चाहिये। रात को यदि वे बुलायें तो सुनायी पड़े इतने अन्तर पर रहें। सेवा करने वाला एक मैं ही हूँ ऐसा
अभिमान करने से सारी सेवा व्यर्थ हो जायेगी। सेवा करते समय सारे सेवकों में मैं केवल रंकों में भी रंक हूँ यही
भाव रखना चाहिये। उसी प्रकार सेवा का कोई क्षुद्र काम करने में लज्जा नहीं करनी चाहिये। मन में किसी भी
प्रकार का आलस न धर गुरुजनों के प्रति सदा उल्लास का भाव रखना चाहिये।

सत्रहवाँ अध्याय ४६५
एवंवृत्ता गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जितः।
विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम्॥ ३०॥
सारे सुखोपभोग त्याग कर गुरु के घर रह कर वहाँ गुरु की सेवा के व्रत से ही वह सबका प्रिय बन जाता
है। इस प्रकार गुरुसेवा कर तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर, वेदशास्त्र में प्रवीण होकर सारा अध्ययन
समाप्त हो जाता है और सारी विद्या जब पूर्ण हो जाती है तो नैष्ठिक और उपकुर्वाण व्रत का पालन कैसे किया
जाय यह श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।
गुरवे विन्यसेद् देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः॥ ३१॥
ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते समय जो उसी आश्रम को निरन्तर चलते रखने का निश्चय करता है व वेदों
में लिखे अनुसार सत्यलोक से वैकुण्ठ तक मेरी प्राप्ति की इच्छा करता है। उसे स्वयं जीवनपर्यंत गुरुभजन
व्यवस्थित होने के लिये सारा देह ही गुरुचरण में अर्पित करना चाहिये। रोज नये प्रेम से गुरु का भजन करना
चाहिये। गुरुचरणों में आत्मभावना रखने से उसी की लगन लग जाती है। ऐसा पुरुष पहले से रखा हुआ
ब्रह्मचर्यव्रत आगे चालू रखता है और उसी को दृढ़ करता है। वही 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी बनता है और गुरुभजन पर
ही निश्चय रखता है। वह मानसम्मान की इच्छा नहीं करता, विषय से प्रेम नहीं रखता, संसार से मोह नहीं
रखता; अपने व्रत में दृढ़तापूर्वक लगा रहता है। ऐसे व्रत का पालन कर जो महान व्रतधारी बनता है, उसकी
गुरुजनों पर वैसी ही निष्ठा जमती है और वह सद्गुरु के साथ स्वाध्यायपूर्वक वेदांतरहस्य का ही विचार करता
रहता है। 'स्व' का अर्थ है आत्मा यह ध्यान में रखो। उसी का नित्य अनुसंधान करना, इसी को ज्ञानीजन
'स्वाध्याय' कहते हैं। इस प्रकार के साधक के लिये सर्वत्र ब्रह्म की ही भावना रखना उचित होता है। यही बात
श्रीकृष्ण अपने मुख से अगले श्लोक में बता रहे हैं।
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।
अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्यकल्मषः॥ ३२॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्यव्रत धारण करने से शरीर पर ब्रह्मतेज चढ़ता है। सद्गुरु के भजन से तथा आत्मवृत्ति से
वह निष्पाप हो जाता है। उसे अग्नि, गुरु, स्वयं तथा समस्त प्राणिमात्र में अभिन्न ब्रह्मभावना धारण कर निरन्तर
वही अनुसन्धान करते रहना चाहिये। ऐसा करने से जब भी कोई दृश्य पदार्थ उसकी दृष्टि के सामने आता है उसे
वह शुद्ध ब्रह्मरूप ही लगता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप होकर सद्भाव के साथ वह मेरी उपासना करता रहता है।
सारांश नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत वानप्रस्थ तथा संन्यासियों जैसा ही होता है। इसमें आचरण का जो प्रमुख धर्म है
उसका मर्म है त्याग।
स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।
प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा वन में रहने वाले वानप्रस्थ इन्हें मुख्य रूप से स्त्रियों की ओर नहीं देखना
चाहिये, यही उनका मुख्य धर्म है। यदि स्त्री दिखायी पड़े तो तत्काल अपनी झोपड़ी छोड़कर भाग जाना चाहिये।
फिर उससे बात करना कैसे सम्भव होगा? इन तीनों को स्वप्न में भी स्त्री का स्पर्श नहीं करना चाहिये। करने से

४६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदन उनका वीर्यस्खलन करा देगा। उन स्त्रियों से हास्यविनोद करने से धर्म का मूल बीज ही नष्ट हो जायेगा।
इसलिये शुद्ध ज्ञानी लोग स्त्रीगुणों का वर्णन नहीं करते। स्त्रियों के हावभाव देखना, उनसे एकान्त करना, गुह्य
बातें करना, अनेक प्रकार के विनोद करना, शरीर से घर्षण करना, हँसी-मज़ाक अथवा श्रृंगारिक भाषण करना,
इतना भी यदि हो जाय तो वहाँ काम का आघात पड़ेगा और स्वधर्म डूब जायेगा तथा धैर्य का जो मूलतत्त्व है
उसका विनाश होगा। गृहस्थ की भी यदि परस्त्री से व्यवहार करने की यही प्रवृत्ति हो तो वह भी संकट में
पड़ेगा। स्त्री अग्नि के कुण्ड की तरह है और पुरुष घृत के घट की तरह है। अग्नि का सम्पर्क होते ही घृत
पिघलने लगता है। उसी प्रकार वृद्धावस्था में भी स्त्रियों के साथ एकान्त करने पर तथा हँसी मजाक की बातें
करने से उस पर भी काम का प्रहार हो सकता है। इसलिये स्त्रियों की संगत टालनी चाहिये, यही परमार्थ का
प्रमुख भाग है, यही बात श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव को बतलायी। पराशर सरीखा महंत भी मत्स्योदरी से
रममाण हुआ। इससे स्त्री का एकान्त पुरुष के लिये अनर्थ का कारण है यह निश्चित रूप से समझना चाहिये।
पशु-पक्षी आदि मैथुन कर रहे हों तो उन्हें जानबूझ कर नहीं देखना चाहिये। देखने से काम उद्दीप्त होता है।
मत्स्य का मैथुन आँखों से देखने के कारण काम की ज्वाला भड़क उठी और ऋषिश्रेष्ठ सौभर ने मैथुन के लिये
करोड़ों तप नष्ट कर दिये। इसलिये काम का दर्शन या काम का स्मरण भी पुरुष के लिये बाधक है। इसलिये
काम का स्मरण भी नहीं करना चाहिये। हृदय में काम का संचार ही न हो ऐसा आचरण रखना चाहिये। श्रीकृष्ण
कहते हैं, सभी प्राणिमात्र मत्स्वरूप हैं यह मानना चाहिये। यही महत्व की बात है।
शौचमाचमनं स्नानं संध्योपासनमार्जवम्।
तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासम्भाष्यवर्जनम्॥ ३४॥
शौच, आचमन, स्नान, संध्या, तर्पण, पूजा, अर्चा, जपादि अनुष्ठान, भक्ति से करना चाहिये तथा तीर्थसेवन
आदि करना चाहिये। अधर्म का अथवा अकर्म का जरा भी स्पर्श नहीं होने देना चाहिये, संकटकाल होने पर भी
अभक्ष्य का सेवन नहीं करना चाहिये। जो व्रतस्थ हो उसे रजस्वला अथवा निंद्य लोगों से भाषण नहीं करना
चाहिये। निंदा अथवा स्तुति इस सम्बन्ध में मौन रखना चाहिये। श्रीकृष्ण कहते हैं, उद्धव! अब सभी आश्रमों के
स्वधर्म नियमों का क्या लक्षण होता है, उसे अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन।
मद्भावः सर्वभूतेषु मनावाक्कायसंयमः॥ ३५॥
हे यदुकुलदीपक सूज्ञ उद्धव! सुनो। सभी वर्णाश्रम धर्म लक्षणों की निष्ठा एक ही है। वह यही है कि
काया, वाचा तथा मन से अपना संयमन कर समस्त प्राणिमात्रों के प्रति ब्रह्मस्वरूप की अखण्ड भावना रखनी
चाहिये। श्रीहरि कहते हैं, इस प्रकार समस्त प्राणिभाग पर मत्स्वरूप की दृढ़ भावना अंकित होने पर ऐसे नैष्ठिक
ब्रह्मचारी को मोक्षफल की प्राप्ति होती है।
एवं बृहद्व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन्।
मद्भक्तस्तीव्रतपसादग्धकर्माशयोऽमलः॥ ३६॥
इस प्रकार जो ब्रह्मचारी इस कठोर व्रत का पालन करता है, सभी प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना रखता है
और वह भावना अंतःकरण में निरन्तर रखता है तथा इस प्रकार मेरे भजन करने के कारण उसकी वासनायें

सत्रहवाँ अध्याय ४६७
कर्मबीज के साथ जल जाती हैं। उसी समय मेरी पूर्ण भक्ति भक्त के अंतःकरण में भर जाती है। बिना किसी
उपाय या प्रयास के, सहज स्थिति से उसमें मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न होती है। उस समय वह जिस दृश्य व्यक्ति को
देखता है उसमें चिद्रूप मैं ही हूँ ऐसा उसे प्रतीत होता है। ऐसी भक्ति होने पर वह आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन
पंक्तियों से ऊपर उठ कर चिन्मात्रैक चौथी भक्ति प्राप्त करता है। सचमुच जिस भक्ति के कारण चारों मुक्तियाँ पैरों
पर लोटती हैं, वह स्वानंद मेरे भक्तों की देह में पूर्णतयः उल्हास प्राप्त करता है। उस समय उन्हें मुक्तता प्राप्त
करने का स्मरण भी नहीं होता। अथवा 'मेरा बन्धन समाप्त हो गया' यह भी उसे याद नहीं रहता। सारांश, मेरे
भजनसुख में ही वह सारे सुख और दुःख भूल जाता है और मेरी भक्ति के आनन्द में स्वानंद सुख में सन्तुष्ट
रहता है। इस प्रकार का 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी अपने स्वधर्म से मत्स्वरूप तक पहुँचता है। अस्तु! अब दूसरी स्थिति
अर्थात् 'उपकुर्वाण' ब्रह्मचर्य के बारे में तुझे बताता हूँ। सुनो।
अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः ।
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः ॥ ३७ ॥
सारा अध्ययन पूर्ण होने पर, वेदशास्त्र में निपुण हो जाने के बाद यदि विषयोपभोग की इच्छा हो तो उसे
गुरु की आज्ञा लेकर व्रत का विसर्जन करना चाहिये। विषयोपभोग की इच्छा अथवा अनिच्छा—जैसी उसकी
प्रवृत्ति हो उसका अच्छी तरह विचार कर, जैसा शिष्य का अधिकार होता है, उसके अनुसार गुरु आज्ञा देते हैं।
जिसे गृहस्थाश्रम की इच्छा हो उसे गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्रह्मचर्य व्रत की समाप्ति करनी चाहिये।
समावर्त्तन करने के लिये गुरु की आज्ञा लेकर मंगल स्नान करना चाहिये और तब व्रतबंध का विसर्जन करना
चाहिये। यहाँ श्रीकृष्ण अधिकार भेद का वर्णन कर रहे हैं। वैराग्य के सम्बन्ध में प्राप्त होने वाले उसी अधिकार
का अगले श्लोक में वर्णन करता हूँ।
गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तमः ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेद्वान्यथा मत्परश्चरेत् ॥ ३८ ॥
जिसमें जरा भी वैराग्य नहीं है, अंतःकरण में स्त्री के उपभोग की चाह है उसे दूसरा अर्थात् गृहस्थाश्रम
स्वीकार करना चाहिये अथवा जिसे स्त्रीकाम तो अच्छा नहीं लगता किन्तु थोड़ा बहुत विवेक वैराग्य रहता है;
स्त्री सुख की विशेष चाह नहीं होती लेकिन विवेक-वैराग्यपूर्ण नहीं होता, ऐसी स्थिति हो तो उसे तत्काल
वानप्रस्थ की ओर प्रस्थान करना चाहिये। जो विवेक के तेज से देदीप्यमान हो, जिसके पास सदा वैराग्य जागृत
रहता हो, जो किसी भी विषय में बिलकुल विरक्त हो उसके लिये ही संन्यास आश्रम उपयुक्त है। जो जन्मतः
ब्राह्मण हो उसी को द्विजोत्तम कहना चाहिये। उसी के लिये चतुर्थाश्रम बताया गया है। वैश्य और क्षत्रियों के लिये
चतुर्थाश्रम का नियम नहीं बताया गया है। क्षत्रिय यदि संन्यास लें तो उन्हें तीर्थाटन पर जाना चाहिये, दण्ड-
कमण्डल का विधान उनके लिये नहीं है। ब्राह्मण को यदि ब्रह्मचर्याश्रम में ही प्रखर वैराग्य उत्पन्न हो जाय तो
उसे तत्काल संन्यास लेना चाहिये। विवाह के समय यदि भार्या के सामने पीढ़े पर बैठते ही वैराग्य उत्पन्न हो जाय
तो तत्काल संन्यास ले लेना चाहिये ऐसा श्रेष्ठ लोगों का कहना है। संन्यास ग्रहण के लिये जिसका वैराग्य पूरी
तरह परिपक्व नहीं है, उसे संन्यास ग्रहण की योग्यता ही नहीं है ऐसा समझना चाहिये। जिसे विषयोपभोग का
सुख अच्छा नहीं लगता उसी को संन्यास का अधिकार है। जिसे विषय विकार से जरा भी बाधा नहीं होती, वही
सचमुच संन्यासी है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते समय यदि वैराग्य हाथ न लग रहा हो तो उसे गृहस्थ बनकर

४६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वधर्म का आचरण करना चाहिये। उसमें स्वधर्म के अनुरूप विषय सेवन कर वास्तविक विरक्तता साधे। यदि
उनमें भी वैराग्य न उत्पन्न हो तो वानप्रस्थ स्वीकार करना चाहिये। इस प्रकार एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाते
हुए वैराग्य सम्पादित कर फिर संन्यास ग्रहण करना चाहिये। लेकिन बिना किसी आश्रम के किसी को रहने का
अधिकार नहीं है। पूर्वाश्रम छोड़कर जो कोई दूसरे आश्रम में जाता है उसे उसके अगले आश्रम में जाने का
अधिकार है। लेकिन पुनः पिछले आश्रम में लौटने का विधि शास्त्र में नहीं है। जो मेरा भक्त तत्परता से मेरे भजन
में लग जाता है उसके लिये इन आश्रमों का नियम नहीं है। हे उद्धव! वह मेरे भजन से ही कृतकृत्य होता है यह
जान लो। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से विवेक युक्त वैराग्य की योग्यता प्राप्त होती है, मेरी पूर्ण सत्ता ही उसके
हाथ लग जाती है, इसमें वह सायुज्यतामुक्ति देने पर भी उसे ग्रहण नहीं करता। ऐसे जो मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं उन्हें
आश्रम का नियम लागू नहीं है। उनका सारा स्वधर्म मैं ही हूँ ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। उस श्रीपति ने पुनः कहा, हे
उद्धव! अब तुम्हें गृहस्थ के स्वधर्म का भी वर्णन करता हूँ, सुनो।
गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम्।
यवीयसीं तु वयसा तां सवर्णामनु क्रमात्॥ ३९॥
समापवर्तन करने के बाद व्रतबंध का भी विसर्जन करे और गुरु की आज्ञा लेकर विवाह कर ले। भार्या
अपने ही वर्ण की हो, अन्य तीन वर्णों की न हो। यदि अपने ही गोत्र की हो तो उसे वर्ज्य कर अपने ही वेदशाखा
की जाति की लड़की से विवाह करना चाहिये। जिसके माता और पिता दोनों पवित्र कुल के हों ऐसी दस लक्षणों
से युक्त अनिंद्य तथा जिसका कन्यादान करने में माता-पिता को आनन्द हो रहा हो वही उपयुक्त सम्बन्ध समझना
चाहिये। जन्मपत्रिका के अनुसार जो उम्र में पति से बड़ी है या समवयस्क है तो उन दोनों कन्याओं को त्याज्य
समझना चाहिये। जो लड़की पति से पाँच-सात वर्षों से छोटी हो उसी के साथ स्वधर्म के अनुसार विवाह करना
चाहिये। वही भार्या उत्तम है। कन्या आठ से लेकर दस वर्ष तक की हो उसी का पाणिग्रहण करना चाहिये।
इससे अधिक उम्र की लड़की 'वृषली' होती है ऐसा शास्त्रों ने निश्चित किया है। उसी प्रकार गर्भ धारण के लिये
आठ वर्ष से नीचे की भार्या अयोग्य है ऐसा शास्त्रों में लिखा है। ऐसे लक्षणों की जिसे बाधा नहीं है ऐसी पवित्र
कन्या देखकर उससे विवाह करें। अब शास्त्र के अविरुद्ध शुद्ध आश्रमधर्म कैसा होता है, सुनो।
इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणास्यैव याजनम्॥ ४०॥
ब्राह्मण को करने के लिये यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, प्रतिग्रह और दान ये छः कर्म हैं। तीन वर्ण
द्विजन्मा हैं फिर भी वैश्य और क्षत्रिय को यजन, दान और अध्ययन इन तीन कर्मों का ही अधिकार है। किन्तु जो
जन्म से ब्राह्मण हैं उन्हें ही षट्कर्म का अधिकार है। इनमें से तीन अर्थात् यजन, अध्यापन और दान ये कर्म करने
से उन्हें परमार्थ की प्राप्ति होती है और शेष तीन कर्मों से उपजीविका चलती है। कौन से कर्म उपजीविका के
लिये उपयोगी हैं और किन कर्मों से परमार्थ की प्राप्ति होती है इन कर्मों का भेद तुम्हें बताता हूँ, सुनो। 'यजन'
अर्थात् यज्ञ करना, 'अध्ययन' अर्थात् वेद पठन करना और 'दान' अर्थात् दूसरों को धनधान्य देना ये तीन कर्म
परमार्थ का लाभ कराने वाले हैं। स्वयं गुरुत्व अर्थात् पौरोहित्य स्वीकार कर दूसरे से यज्ञ करवाना उसे 'याजन',
दूसरे को वेद पढ़ाना इसे अध्यापन और स्वयं दान देने को 'प्रतिग्रह' कहते हैं। अच्छे शिष्य मिल जाएँ तो इन
तीन कर्मों के योग से उपजीविका चलती है और गुरु बनने पर गुरुपूजा का सम्मान मिलता है जिससे जीविका भी

सत्रहवाँ अध्याय ४६९

चलती है। क्षत्रिय और वैश्य भी द्विजन्मा हैं लेकिन उन्हें गुरु होने का अधिकार नहीं है। इसलिये इन तीनों कर्मों
का निषेध ही किया गया है। अब ब्राह्मण का लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं कि हे उद्धव! उनके साधारण, श्रेष्ठ
और अत्यन्त श्रेष्ठ ये तीन भेद हैं।
प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्।
अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वा दोषदृक् तयोः ॥ ४१ ॥
स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण के पास तप, तेज, धैर्य और यश का संग्रह रहता है लेकिन प्रतिग्रह इन सबके विनाश
के लिये कारणीभूत होता है। स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिग्रह स्वीकार करता है उसे 'साधारण' ब्राह्मण
समझना चाहिये। यह एक प्रकार के ब्राह्मण का लक्षण है। जो ब्राह्मण प्रतिग्रह स्वीकार नहीं करता उसे याजन
और अध्यापन कर स्वधर्म से ही धन उपार्जन करना चाहिये और अपनी जीविका चलानी चाहिये। धन की आशा
मन में रख कर किसी से यज्ञ नहीं करवाना चाहिये तथा वेदाध्ययन कर शिष्य से द्रव्य की इच्छा नहीं करनी
चाहिये। जो वेदाध्ययन करा कर शिष्य से बिलकुल धन नहीं लेता, ऐसे वैराग्य से परिपूर्ण व्यक्ति ही 'शुद्ध
ब्राह्मण' है। उसका जीविकावर्तन भी बताता हूँ, सुनो। उसे 'शिल' वृत्ति से अथवा 'उंछ' वृत्ति से अपना उदर
निर्वाह करना चाहिये। उसका भी यथार्थ लक्षण बताता हूँ। कटाई के बाद खेत में जो बाल या दाने बचे रहते हैं
उस पर चरितार्थ चलाना, इसे शिलवृत्ति कहते हैं। अब 'उंछवृत्ति' का लक्षण सुनो। बाजार में कुछ ऐसे धान्य के
दाने मिलते हैं जिनका कोई मालिक नहीं होता। उन्हें इकट्ठा कर उस पर निर्वाह करना, इसी का नाम है
'उंछवृत्ति'। यही ब्राह्मण की अत्यन्त पवित्र स्थिति है। इसलिये श्रीकृष्ण ने इसके बारे में भी उद्धव को बताया।
ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।
कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥ ४२ ॥
सभी वर्णों में उत्तम वर्ण ब्राह्मण का है। ब्राह्मण का देह भगवान ने किसी क्षुद्र काम के लिये नहीं बनाया
है। पशु-पक्षी आदि योनियों में काम के सिवा और कुछ नहीं होता। वही अगर ब्राह्मण के देह में हो तो फिर
उसकी विशेषता ही क्या है? स्वधर्म का अनुष्ठान करना यही ब्राह्मण के देह का कर्तव्य है। कृच्छ्रचांद्रायण आदि
तप उसे मेरे लिये ही करने चाहिये। मुझ अनंत को मन में धारण कर तथा पूर्ण वैराग्ययुक्त होकर जो ब्राह्मण
तपादि साधनों में अपने देह को निरन्तर कष्ट देते हैं उन्हें देह के पतन के बाद मेरे अनंत सुख की प्राप्ति होती है।
उस समय स्वर्गसुख आदि का ऐश्वर्य तत्काल लुप्त हो जाता है। जिस सुख की आनन्दमय स्थिति में संसार की
स्फूर्ति भी शेष नहीं रहती, जहाँ पुनः जन्म लेने का भय नष्ट हो जाता है, ऐसे सुख की प्राप्ति उन ब्राह्मणों को
होती है। कृच्छ्रादि साधनों के आश्रय से ब्राह्मणों को जिस ब्रह्मसुख की प्राप्ति होती है, शिलोछं वृत्ति की साधना
करने वालों को उसी सुख का वैभव प्राप्त होता है।
शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः।
मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठन् नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम् ॥ ४३ ॥
जो ब्राह्मण शिल अथवा उंछवृत्ति धारण कर अपनी चित्तवृत्ति को सन्तुष्ट रखते हैं तथा विषय वैराग्य से
मुझे प्राप्त कर लेते हैं तथा अतिथि का मद्भाव से पूजन करते हैं, अतिथि के आने पर उसे प्राणांत होने पर भी
पराङ्मुख नहीं होने देते, समय पर अपनी भूख-प्यास का ख्याल न कर अतिथि को आवश्यक अन्न देते हैं, तथा

४७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार अत्यन्त आदरपूर्वक और सम्मान से यथाशक्ति अन्नदान करते हैं, उन पर मैं जनार्दन सन्तुष्ट होता हूँ।
अभिमान छोड़कर सभी प्राणीमात्रों के प्रति नम्रता का भाव रखना, यही 'महद्धर्म' है और यही धर्म का शुद्ध
लक्षण है। इस प्रकार का धर्माचरण कर्ता के लिये भूषणास्पद होता है। इस धर्म में दोष देने के लिये जरा सी भी
जगह नहीं रहती। इसी का नाम है, 'अति शुद्धाचरण'। चित्तवृत्ति मुझ में रंग जाने के कारण घर संसार की
आसक्ति जो प्रायः भूल ही जाता है उसे गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है, आत्मज्ञान यही उसकी सुख
सम्पत्ति हो जाती है। जो निर्धन हैं, उन्हें इस प्रकार गृहस्थाश्रम में ही मेरी प्राप्ति होती है। अब जो साधन है उन्हें
मेरी प्राप्ति कैसे होती है, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो। धनी होते हुए यदि वह ज्ञानी है तो उसे बिना अधिक साधन
किये ही मेरी प्राप्ति करना अत्यन्त सुलभ है, सुनो।
समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।
तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात्॥४४॥
ब्राह्मण वैसे भी पूज्य है ही, तिस पर यदि वह मेरा भक्त हो तो मेरे भजन से अत्यन्त सम्पन्न और मद्भावना
से पूर्ण तथा परिपक्व अवस्था में पहुँचा हो; उसी प्रकार कभी किसी से कुछ नहीं माँगने का मेरे भक्त का जो
निश्चय रहता है, उसे पीड़ा देने वाली क्षुधादि व्यथाओं का जो निवारण करता है; उसे अन्न, धन, वस्त्र, पात्र,
नमक आदि देता है तथा अपना धन देकर जो मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे देते समय जो उसका तिरस्कार
नहीं करता और किसी प्रकार का उपकार करने की भावना मन में न लाकर अत्यन्त सम्मान और नम्रता से मेरे
भक्त का संरक्षण करता है, माँ जिस वात्सल्य से अपने बच्चे को खिलाती है उसी प्रकार वह अपना स्वार्थ छोड़कर
मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसे मैं अपने भक्त को भी पीछे छोड़कर अपने मस्तक पर धारण करता हूँ और
फिर उसे वैकुण्ठ ही क्या उससे भी ऊपर ले जाता हूँ। जिसे मैं अपने मस्तक पर धारण करता हूँ उसे कौन सी
वस्तु दुर्लभ होगी ? उद्धव ! मेरे भक्तों का जो संरक्षण करता है, उसका उद्धारक मैं हूँ। मेरे भक्तों के संकट जो
स्वयं होकर दूर करेगा, उसे मैं तत्काल संसार सागर पार कराता हूँ। उद्धव ! जिस प्रकार नौका धनवान को समुद्र
पार कराती है, उसी प्रकार मेरे भक्तों की रक्षा करने वालों का मैं संसार से उद्धार करता हूँ। इस प्रकार जो धनवान
पुरुष मेरे भक्त का संरक्षण करता है, उसका देवकी वसुदेव की शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं उसका उद्धार करता
हूँ। सबके संकट का निवारण राजा को स्वयं करना चाहिये, उस राजधर्म का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः।
आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥४५॥
दीन, दुर्बल ब्राह्मण और अयाचित भक्त हों तो उनकी खोज कर राजा को उनका संकट में संरक्षण करना
चाहिये। अपने बच्चे पर संकट आने पर जिस प्रकार पिता उसके संरक्षण के लिये कमर कस लेता है, उसी प्रकार
राजा को भी आस्थापूर्वक अपनी प्रजा का संकटों से संरक्षण करने के लिये तत्पर रहना चाहिये। प्रजा का संरक्षण
कर उस पर आयी हुई आपत्ति का निवारण स्वयं करना राजा का स्वधर्म है। हाथी दलदल में फँस जाय तो भी वह
अपने ही बल से बाहर निकलता है और दलदल में फँसी हुई हथिनी तथा उसके कितने घावों को बाहर निकालता
है इसकी तो कोई गिनती ही नहीं है। उसी प्रकार पृथ्वीपति राजा को अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिये, साथ ही
अपने संकटों का सामना भी अपनी ही शक्ति से करना चाहिये। ऐसे स्वधर्माचरण से जो राजा सम्मानपूर्वक
व्यवहार करता है उसे उस स्वधर्माचरण से कैसी फलप्राप्ति होती है उसके बारे में श्रीपति स्वयं बता रहे हैं।

सत्रहवाँ अध्याय ४७१
एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा।
विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते॥ ४६॥
इस प्रकार जो राजा इस लोक में राज्य प्राप्त होने पर अधर्म का नाश कर स्वधर्म स्थिति से आचरण करता
है, उसे स्वर्ग प्राप्त होता है। ज्ञानी लोग 'राज्य का अन्त नरक' इस उक्ति से करते हैं, लेकिन उस नरकभोग को
टाल कर अनेक राजा स्वर्ग गये हैं। वे स्वर्गलोक में सूर्यप्रभा जैसे देदीप्यमान विमान में बैठकर इन्द्र का सा सुख
भोगते हैं। गृहस्थाश्रम अत्यन्त कठिन है। उसमें स्वधर्माचरण करते समय अनेक बार बिकट प्रसंग आते हैं। उस
समय के आपात धर्म बताता हूँ, सुनो।
सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्।
खङ्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४७॥
ब्राह्मणों को यदि स्वधर्म में पीड़ा का अनुभव होता हो तो उन्हें वैश्यवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उन्हें
क्षात्रधर्म स्वीकार कर हिंसा आदि दोष नहीं करने चाहिये क्योंकि वे अत्यन्त खराब हैं। ब्राह्मण के लिए हिंसाकर्म
अधर्म है लेकिन यदि कोई विकल्प न हो तो उसे अवश्य क्षत्रिय धर्म स्वीकार करना चाहिये। वैश्य का व्यवसाय
स्वीकार करने पर उसे तिल्ली, राई तथा रूई, नमक, तेल, घृत आदि पदार्थ नहीं बेचने चाहिये। उन्हें बेचने में
महादोष है। इन सारे दोषों से बचकर वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। खाने का पान और वस्त्र निर्दोष हैं।
इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करना चाहिये। इस प्रकार वणिक् का व्यवसाय करने पर भी निर्वाह न होता हो
तो उसे हाथ में शस्त्र लेकर क्षात्रवृत्ति स्वीकार करनी चाहिये। उसमें हिचकिचाना नहीं चाहिये। समरभूमि से
वापस नहीं लौटना चाहिये। स्वामिकार्य के योग में देहत्याग के लिये तत्पर रहना चाहिये। इस प्रकार क्षत्रियवृत्ति
से ब्राह्मण को अपनी आपत्ति दूर करनी चाहिये, लेकिन प्राण जाने पर भी श्वान की वृत्ति के अनुसार नीच की
सेवा नहीं करनी चाहिये। अब यदि स्वधर्म के अनुसार चलने पर भी क्षत्रिय पर आपदा आ जाये तो इसे कैसा
आचरण करना चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव से सविस्तार बता रहे हैं।
वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।
चरेद् वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४८॥
क्षत्रिय पर भी यदि संकट आ जाय तो वह पहले कहे अनुसार वणिक् का व्यवसाय करे; अथवा जंगल
में शिकार कर अपना संकट दूर करे। इतना करने पर भी दारिद्र्य न जाय तो ब्राह्मण की तरह भिक्षा माँगे,
लेकिन प्राण जाने पर भी नीच की सेवा न करे। अब यदि वैश्य को स्वधर्म के अनुसार चलने पर दरिद्र दशा
प्राप्त हो जाय तो उसे किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये उस पर कृपा की मूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं।
शूद्रवृत्तिं भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम्।
कृच्छ्रान्मुक्तोन गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९॥
वैश्य पर यदि संकट आ जाये तो उसे शूद्र वृत्ति स्वीकार करनी चाहिये, अर्थात् निष्कपट होकर तीन वर्णों
की सेवा करनी चाहिये। उद्धव! वैश्य पर यदि संकट आ पड़े तो उसे कभी भी ब्राह्मण का अथवा क्षत्रिय का
व्यवसाय नहीं करना चाहिये। वैश्य पर कितनी भी आपत्ति आये लेकिन उसे नीच की सेवा नहीं ही करनी चाहिये।

४७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शूद्र पर यदि संकट आये तो उसे कुत्ते की तरह नीच सेवा नहीं करनी चाहिये। वह हाथ से चटाई बुन कर
उपजीविका कमाये। डोर या छीकें बेचकर धनार्जन करे अथवा सिलबट्टा वा दीपक बेचे। नहीं तो पेट भरने के
लिये सिर पर माल ढोये। आपातकाल में चारों वर्णों को अपना-अपना निर्वाह कैसे करना चाहिये इसके बारे में
तुम्हें बतलाया। फिर भी जहाँ तक हो सके स्ववृत्ति नहीं छोड़नी चाहिये। आपत्काल में, दूसरा कोई उपाय न होने
के कारण जो धंधा शुरू किया हो उसे आपत्काल समाप्त होते ही छोड़ देना चाहिये और फिर से अपने स्वधर्म के
अनुसार चलना चाहिये। अब गृहस्थ का जो विहित कर्म है, उसके आवश्यक धर्म तथा उसमें भी ब्रह्मार्पण करने
का मर्म भगवान स्वयं बता रहे हैं।
वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम्।
देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत् ॥ ५० ॥
स्वाध्याय का अर्थ है वेदाध्ययन करना, वेदों में कहे अनुसार ब्रह्मयज्ञ करना, स्वधा अर्थात् पितरों को तर्पण
करना और स्वाहा अर्थात् देवाधिदेवों को हवि देना। बलिदान की तरह दान करना चाहिये जिससे भूतगण तृप्त
होते हैं। मनुष्यों को अन्नोदक का दान करना चाहिये। ये पंचमहायज्ञ ही ब्राह्मण का नित्यकर्म हैं। इसी का नाम है
ब्रह्मकर्म। अब जिसके द्वारा ब्रह्मार्पण होता है, उस अर्पण की पहचान तुम्हें पूर्ण रूपसे बताता हूँ। इसमें यदि कर्म
करने वाला मैं हूँ यह भावना चित्त से निकाल दी जाय तथा प्राणिमात्र भगवत्स्वरूप है यह भावना धारण की जाय
तो वह कर्म सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। कर्म का अभिमान छोड़ने पर वह कर्म ब्रह्मार्पण ही होता है। उद्धव!
संकल्प के बिना कर्म के ब्रह्मार्पण होने की यह पहचान है। मेरे द्वारा यह कर्म हुआ और उसे मैं कृष्णार्पण किया
ऐसा संकल्प करने पर उसका कर्तृत्व अपने माथे पर लगता है और जो स्वयं को कर्म का कर्त्ता कहता है वही
भोक्ता भी बन जाता है। इसलिये हे उद्धव! अहंता ही मुख्य रूप से बाधक है। जिसमें अहंता होती है उसमें
निजबद्धता भी होती है; और जो निरभिमानी और निर्मम होता है उसके साथ.निजमुक्तता भी रहती है। इसलिये
अभिमान त्याग कर पंचमहायज्ञ करते रहना चाहिये। गृहस्थ उसे रोज ही करता रहता है इसलिये उसका कर्म
सहज ही ब्रह्मार्पण होता है। जिस रीति से गृहस्थ का नित्यकर्म भगवान को अर्पण होता है उसका मैंने यथार्थ
रीति से वर्णन किया। अब यज्ञ आदि की कथा सुनाता हूँ, सुनो। जिसके पास कम से कम बारह हजार रुपये हों
और जिसे वेद के सम्पूर्ण यज्ञ का ज्ञान है वह यज्ञ करने का अधिकारी बनता है।
यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।
धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून् ॥ ५१ ॥
व्यापार में अधर्म से प्राप्त किया अथवा निषिद्ध दान में मिला हुआ अथवा दूसरों का छल करके लाया
हुआ अथवा दूसरे की गरज से लाभ उठाकर लाया हुआ, या किसी ने जलभुन कर दिया हुआ अथवा शिष्य को
संकट में डालकर लाया हुआ धन यज्ञ करने के लिये अयोग्य है। ईश्वर की इच्छा से जो सहज प्राप्त हुआ हो
अथवा जो शुद्ध प्रवृत्ति से, अर्थात् ब्राह्मण के घर पौरोहित्य कर, सदाचरण से प्राप्त किया हो या सुखमय उपायों
से प्राप्त हुआ हो ऐसे धन को खर्च करना उचित है। परिवारजनों को भूखा रख, सारा धन यज्ञ में खर्च नहीं करना
चाहिये क्योंकि उससे भी अधर्म ही होता है अथवा जिसके आसरे चरितार्थ चलता है जैसे खेत आदि, उसे बेच
कर यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो यश प्राप्त करने के लिये यज्ञ करते हैं, वे भी मन्दबुद्धि होते हैं। कर्म का
अहंकार न कर पवित्र मार्ग से धन उपार्जन कर यज्ञ करना चाहिये। यही गृहस्थ के स्वधर्म का लक्षण है। मन की

सत्रहवाँ अध्याय ४७३
विषय कामना त्याग कर, घरबार की आसक्ति छोड़कर गृहस्थ को निवृत्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिये यही
स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत् कुटुम्ब्यपि।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥५२॥
घर की परिस्थिति घरबार, पत्नी और बच्चों के कारण भले ही सम्पन्न हो जाय लेकिन उसमें आसक्ति नहीं
रखनी चाहिये; परमात्म युक्ति के साधनों से चित्तवृत्ति को सावधान रखें। कल्पना, प्रमाद का संग छोड़ तथा
स्त्रियों से बच कर, उत्कृष्ट ईश्वर निष्ठा रख कर वृत्ति को अभंग रखे। उद्धव! गृहस्थ के परिवार में विषय की
स्थिति का विचार करके देखो तो उसका परिणाम अशाश्वत ही होता है यह जान लो। इसी प्रकार जो परिणाम
इस लोक का है वही स्वर्गलोक का होता है। दोनों ही नश्वर और मायिक होने के कारण मिथ्या हैं। स्त्री, बच्चे
और सम्पत्ति ये सब स्वप्न की ही तरह क्षणभंगुर हैं। इसके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण स्वयं निरूपण करते हैं।
पुत्रदाराप्तबन्धूनां सङ्गमः पान्थसङ्गमः।
अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥५३॥
जिस प्रकार पथिक क्षण भर के लिये वृक्ष के नीचे एकत्र होते हैं, उसी प्रकार पत्नी, पुत्र व आप्तजन इन
सबका समागम भी क्षणिक ही है। जब दो नदियों के प्रवाह एक स्थान पर मिलते हैं तो उनके साथ बह कर आने
वाली लकड़ियाँ भी संगम पर एकत्र होती हैं, उसी प्रकार इष्टमित्र भी एक जगह एकत्र होते हैं और बड़ी लहर
आते ही जिस प्रकार वे लकड़ियाँ चारों दिशाओं में बिखर जाती हैं उसी प्रकार इष्ट मित्रों की भी स्थिति होती है।
जीव जिस योनि में जन्म लेता है उसी योनि के सम्बन्धी भी मिलते हैं। संसार में ऐसे अनंत जन्म हुए रहते हैं
अतः उन सारे जन्मों के सम्बन्धियों की संख्या भी अगणित है। किन्तु जिस प्रकार इस स्वप्न के पदार्थ दूसरे
स्वप्न में नहीं दिखायी देते, उसी प्रकार इस जन्म के सम्बन्धी दूसरे जन्म के सम्बन्धियों को नहीं पहचानते। इस
प्रकार जो पत्नी, बच्चे, भाई तथा सम्बन्धी इन रिश्तों को माया समझ कर, वे केवल काल्पनिक हैं, यह मान कर
चलते हैं, वे सचमुच धन्य हैं।
इत्थं परिमृशन् मुक्तो गृहेष्वतिथिवद् वसन्।
न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहंकृतः ॥५४॥
जिसके मन में ऐसा विवेक आता है, उसे मोह और माया की कभी बाधा नहीं होती। वह घर में अतिथि
की तरह रह कर अलिप्त रहता है। इस प्रकार जिसने मान, मोह और ममता का त्याग किया है, जो घर में रहकर
भी उदासीन, इच्छाहीन और निर्लोभ रहता है उसे अहंता की बाधा नहीं होती। निर्मोह और निरभिमान होने का
मुख्य कारण गुरु का भजन है। उससे गुरुभक्तों को वैराग्य, विवेक और ज्ञान सहज ढंग से प्राप्त होता है। हे
उद्धव! ऐसे वैराग्य विवेक से रहने पर गृहस्थ को घर में रहकर ही निजमुक्ति प्राप्त होती है। अब अन्य आश्रमों
के आचार विचार, भक्ति, विरक्ति तथा शान्ति आदि आश्रम विभाग के अनुसार बता रहे हैं।
कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।
तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत् ॥ ५५ ॥
जो व्यक्ति घर में रहकर आश्रम धर्म का पालन करते हुए मेरी भक्ति करता है उस भक्त को अन्य आश्रमों

४७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
की आवश्यकता ही नहीं होती। समय हो या असमय हो उसके मन में भजन का विकल्प आता ही नहीं है। ऐसी
जिस गृहस्थ की स्थिति होगी, उसे निरन्तर गृहस्थाश्रम में ही रहना चाहिये। जिसे कर्म की अत्यन्त आसक्ति है
किन्तु विषय के प्रति आसक्ति नहीं है, साथ ही चित्त में ज्ञानयुक्त शान्ति नहीं है, उसे वानप्रस्थ आश्रम का
अधिकारी समझना चाहिये और जिसे विरक्ति, शान्ति और ज्ञान करकमल की तरह उपलब्ध है वही सचमुच
संन्यासग्रहण का अधिकारी है। पुत्र संतति प्राप्त होने पर भार्या को पुत्र को सौंप कर स्वयं संन्यास ग्रहण करना
चाहिये। श्रुति भी इसकी संस्तुति करती है। गृहस्थाश्रम में जिसे भक्ति अच्छी नहीं लगती, अगणित संतति होने
पर भी जो विरक्त नहीं होता और जो वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश नहीं करता, जिसका विषय से मोह नहीं छूटता
है और जो निष्कर्म संन्यासी नहीं बनता उसके निंद्यकर्म के बारे में पुरुषोत्तम स्वयं बता रहे हैं।
यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुरः।
स्त्रैणः कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते॥ ५६ ॥
जिसे घर गृहस्थी से विशेष आसक्ति है; जिसका पुत्र प्रेम, धन प्रेम तथा स्त्री प्रेम प्रबल है, जो विकारों का
नितांत लंपट तथा धन का अत्यन्त लोभी है, जो विकारों का अंकित है, जो अहंकार का पोषण करता है, जो स्त्री
पर जी जान से बिक गया है वह अज्ञान की गहरी गर्त में गिरता है। जो आशा के भ्रम से इन्द्रियों का दास बनता
है, वह जीव भाव से बद्धता का गुलाम बनता है। उस बद्धता का रूप और उस मूर्ख की बकवास स्वयं श्रीकृष्ण
उद्धव को बतला रहे हैं।
अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजाः।
अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः॥ ५७॥
वह कहता है, मेरे माँ-बाप वृद्ध हैं, पत्नी छोटी है और बच्चे नन्हे-मुन्ने हैं; इनसे मैं दूर रहा तो वे तत्काल
मर जायेंगे। इस प्रकार अपनी मृत्यु से भी भयंकर अनेक कल्पनाएँ कर वह परिवार की चिन्ता करता है। कभी
असमय ही यदि मेरी मृत्यु हो गयी तो मेरे ये बच्चे और पत्नी क्या करेंगे? यह कहकर वह रोने लगता है। माँ-
बाप की बात छोड़ो लेकिन पत्नी तो फुक्का फाड़ कर रोयेगी, बच्चे रो-रोकर गला खराब कर लेंगे, यह सोच कर
अपना सिर पीट लेता है। मेरे मरने पर दुःख के मारे ये कैसे जीवित रह पायेंगे? क्या इस प्रकार वह जीवित रह
पायेंगे? इस प्रकार वह जीवित अवस्था में ही उनकी चिन्ता करने लगता है। इसीलिये वह मूढ़ है। इस प्रकार
जहाँ मूर्खता की अपार बाढ़ आती है, वहाँ विपरीत अर्थ में विवेक का जहाज डूब जाता है।
एवं गृहाशाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम्।
अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तमः॥ ५८ ॥
इस प्रकार गृहस्थी में आसक्त, विषयों के प्रति सदा अतृप्त, स्त्री बच्चों की अखण्ड चिन्ता करने वाला तथा
अंतःकरण में मोह से ग्रस्त, उसकी बुद्धि मोह की मोहकता से मूढ़ हो जाती है और ऐसी स्थिति में जिसकी मृत्यु
हो जाती है वह अंधतम नामक नरक में जाता है। उस अज्ञानतम शक्ति से ज्ञान अन्धा हो जाता है। जहाँ सूर्य की
आँखें भी फूट जाँय ऐसे गहरे अंधतम नरक में वह तामसी लोटपोट होता रहता है। अरेरे! ऐसे मूढ़मति और
नितांत मंदबुद्धि जीव कल्पान्त में भी जहाँ से मुक्तता नहीं होगी, ऐसे 'अंधतम' नामक नरक में जाते हैं और मोह
के पीछे नश्वर विषय के चक्कर में अनंत सुख के अवसर चूक कर कोटि-कोटि दुःख भोगते रहते हैं। इसलिये

सत्रहवाँ अध्याय ४७५
मनुष्य देह प्राप्त करने पर भगवद्भजन कर जन्म-मरण से बचना चाहिये और अपना उद्धार स्वयं ही करना
चाहिये। जीव को जिस-जिस योनी में जन्म लेना पड़ता है उस-उस योनी में विषय की आसक्ति है ही। वही
विषयासक्ति यदि मनुष्य देह में रखें तो फिर परमार्थ प्राप्ति किस देह में की जाय ? जिसके नित्यकर्म में ही
परब्रह्म की प्राप्ति नितांत सुगम और सहज ढंग से होती है, उस ब्राह्मण जन्म को पाने के बाद फिर किस बात की
कमी है ? वे यदि प्रतिदिन संध्या वन्दन करें तो उनके पातकों की तीन-त्रिकाल निवृत्ति होती है। सभी सारों का
मूर्तिमंत सार गायत्री मंत्र जिसके हाथ में रहता है, वेद भी उनके मुखापेक्षी होते हैं। इतनी उनकी महानता होती
है। ब्राह्मणों के हृदय में वेदरूप में स्वयं नारायण विराजते हैं। इसलिये ब्राह्मण त्रैलोक्य में धन्य हैं। जिन ब्राह्मणों
को बड़े-बड़े देवतागण भी शिरसा वंदन करते हैं और जिस ब्राह्मण का चरण साक्षात नारायण भी अपने हृदय पर
धारण करते हैं, उनकी योग्यता का क्या वर्णन किया जाय ? संध्या करते रहने के कारण रत्ती भर भी पातक नहीं
रह जाता इसलिये ब्राह्मण पुण्यमूर्ति हैं ऐसा स्वयं रमापति ने कहा है। 'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्याः' इस वचन से
भगवान ब्राह्मण का ही वर्णन करते हैं। इस गीता वचन से उपर्युक्त वचन की ही पुष्टि होती है। ब्राह्मण होकर
यदि भगवद्भजन भी हो तो समझो सारा भाग्य एक स्थान पर एकत्र हो गया। उसके लिये अप्राप्य क्या होगा ?
क्योंकि उसकी इच्छा का पालन करने के लिये साक्षात भगवान तत्पर रहते हैं। अहो ! ब्राह्मण लकड़ी अथवा
पत्थर की जिस प्रतिमा की प्रतिष्ठा करें वहाँ भगवान प्रकट होते हैं। ब्राह्मण में इतनी सद्भावना और सहज सामर्थ्य
होता है। ऐसा होते हुए यदि ब्राह्मण का जन्म लेकर वह क्षुद्र विषय का कर्म करता रहे तो उसके हाथ से
पुरुषोत्तम चले जाते हैं। वह ब्राह्मण 'अंधतम' नरक में जाता है। इसलिये एका जनार्दन की सबसे प्रार्थना है कि
मनुष्य देह प्राप्त होने पर भगवद्भक्ति कर निजात्मस्वरूप की प्राप्ति अवश्य कर ले।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे
ब्रह्मचर्य गृहस्थ कर्म धर्म निरूपणे एकाकार टीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १७ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

अठारहवाँ अध्याय
हे कर्मप्रकाशक ! हे ब्रह्मविद्योपदेश विवेक ! हे कर्मधर्म प्रतिपालक ! हे जगन्नायक ! हे ॐकारस्वरूप
गुरुवर्य ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। हे गोविन्द ! वर्णाश्रम की मर्यादा के तुम आधार हो। वेदानुवाद का कारण तुम ही
हो और विवाद का और संवाद का मूल भी तुम ही हो। तुम शब्दसृष्टि के देदीप्यमान सूर्य हो; तुम वेद के गूढ़ार्थ
के प्रकाशक हो, तुम एक होते हुए अनेक हो गये हो; व्याप्य और व्यापक भी तुम्ही हो। विधि और विधान तुम्हीं
हो, वाचाल भी तुम्हीं हो और मौन भी तुम्हीं हो; हे गुरुराजा ! एका और जनार्दन ये दोनों भी पूर्ण रूप से तुम्ही
हो। इसलिये श्रीभागवत की कविता तुम्हीं हो और अर्थ भी तुम्हीं हो। अर्थज्ञान भी तुम्हीं हो और हमलोगों से
बात कराने वाले भी तुम्हीं हो। जिस प्रकार अपना ही शब्द प्रतिध्वनि के रूप में उत्तर देता है, उसी प्रकार मेरे
मुख से कवित्व बोलने वाले तुम्हीं हो। श्रीभागवत में कृपामूर्ति श्रीकृष्ण ही वक्ता है। उसने वर्णाश्रम की उत्पत्ति
यथार्थ ढंग से बता दी है। सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मचर्य धर्म सुगम ढंग से बतलाया और गृहस्थ के
स्वधर्म का तथा नित्य कर्म का निरूपण किया। अब अठारहवें अध्याय में वानप्रस्थाश्रम का लक्षण तथा संन्यास
धर्म का निरूपण भी श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।
वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः ॥ १ ॥
अब क्रम के अनुसार वानप्रस्थ का निरूपण आता है। उसे वन में जाने के लिये जीवन के विभाग ही
कारण हैं। श्रुति में पुरुष के जीवन की मर्यादा सौ वर्ष बतायी गयी है; उसमें के दो भाग बीत कर तीसरा भाग
शुरू होने पर अर्थात् छासठवाँ लगने पर वन में जाने की तैयारी करनी चाहिये। वन जाने के पूर्व पत्नी को पुत्र के
सुपुर्द कर देना चाहिये और स्वयं वानप्रस्थाश्रम स्वीकार करने के लिये वन में जाना चाहिये। महान साध्वी सती
तथा पतिव्रता स्त्री जो पति को ईश्वरस्वरूप मानकर आचरण करती है तथा पति वानप्रस्थाश्रम में जाने के लिये
तैयार होता है तो वह पुत्र के साथ रहने के लिये तैयार नहीं होती। पति की सेवा से वंचित होना उसे कल्पांत की
तरह लगता है, ऐसे पति के चरणों की दासी को अपने साथ वन में ले जाना चाहिये। उसे आश्रम में स्त्रीकाम से
विरत रहकर वही व्रत दृढ़ होकर आगे चलाना चाहिये। जिसने वानप्रस्थ स्वीकार कर लिया उसे मन में शान्ति
धारण करनी चाहिये, कामक्रोध को स्पर्श नहीं करना चाहिये। यह व्रत उसके लिये आवश्यक है।
कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत् ।
व सीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च ॥ २ ॥
वन में ऋतु के अनुसार जो कंदमूल और फल उपलब्ध हों उनमें से अत्यन्त निर्मल और पवित्र फल चुन
कर उन पर निर्वाह करना चाहिये। वनवास में हों तब तक वल्कल, व्याघ्रांबर अथवा मृगचर्म आदि वस्त्र ही
परिधान करें अथवा केवल तृण पहनें या पेड़ के पत्तों का वस्त्र बनायें। अब वानप्रस्थ आश्रम में कौन-सा व्रत
करना चाहिये उसके बारे में भी सुनो। उन व्रतों का निरूपण स्वयं नारायण कर रहे हैं।

अठारहवाँ अध्याय ४७७
केशरोमनखश्मश्रूमलानि बिभृयाद् दतः।
न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशयः ॥ ३ ॥
जो मस्तक पर आते हैं, वे 'केश', जो मुख पर आते हैं वे 'श्मश्रु' और जो बगल तथा गुह्यभाग में आते हैं
वे 'रोम' इन सबको नहीं काटना चाहिये। मस्तक का कभी वपन नहीं करना चाहिये। श्मश्रु अथवा गुह्य स्थान के
बाल, नाखून नहीं काटने चाहिये। दाँत भी साफ नहीं करने चाहिये। स्नान अवश्य तीन बार करना चाहिये लेकिन
उसी तरह जैसे मूसल को पानी में डुबोकर निकाला जाता है। शरीर पर का मल नहीं धोना चाहिये। वानप्रस्थ का
यही बड़ा व्रत है। सदा जमीन पर सोना चाहिये। नीचे घास भी नहीं बिछानी चाहिये। इस प्रकार वानप्रस्थ का
दृढ़ व्रत धारण कर तप करना चाहिये। उस तप के लक्षण सुनो।
ग्रीष्मे तप्येत पञ्चाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।
आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत् ॥ ४ ॥
गर्मी में पंचाग्निसाधन करना चाहिये। चारों दिशाओं में चार अग्निकुण्ड प्रज्वलित करने चाहिये ताकि ऐसा
लगे जैसे मध्याह्न का सूर्य आकाश पर चमक रहा है। इसे 'पंचाग्नि साधन' कहते हैं। बरसात में ऊँचे स्थान पर
मचान बनाकर मूसलाधार बारिश में उस पर बैठना चाहिये। यह वर्षाकाल का तप है। जाड़े के दिन हों तो रात को
गले तक पानी में डूब कर बैठना चाहिये। यही वानप्रस्थ का तपाचरण है। तप की यह क्रिया वानप्रस्थ के लिये
प्रतिवर्ष के लिये है। अब उम्र के हिसाब से कौन से पदार्थ खाने चाहिये इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
अग्निपक्वं समश्नीयात् कालपक्वमथापि वा।
उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा ॥ ५ ॥
आग पर पकाये हुए (या आग में भुने हुए कंदमूल) अथवा मौसम के अनुसार पके हुए फल तपस्वी को
उदरनिर्वाह के लिये उपयुक्त हैं। दाँत मजबूत हों तो वह सभी प्रकार के फल खाये और अगर सभी दाँत गिर गये
हों तो उन्हें ओखली में कूट कर खाये। वन में यदि ऊखल प्राप्त न हो तो पत्थर से कूच कर खाना चाहिये। स्वाद
का विचार न कर केवल भूख निवारण का ही उद्देश्य होना चाहिये।
स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।
देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम् ॥ ६ ॥
फलों के मौसम में वे काफी मिलते हैं इसलिये भविष्य के लिये उनका संग्रह नहीं करना चाहिये। यही
वानप्रस्थ का व्रत है। एक दिन पहले खाये हुए फल यदि बच जाएँ तो उन्हें फेंक देना चाहिये। शास्त्रों में उन्हें
खाने के लिये निषिद्ध माना गया है। प्रतिदिन खाने के लिये ताजा फल लाने चाहिये। बासी फल खाना वानप्रस्थ
के लिये निषिद्ध है यह जान लो। उसी प्रकार किसी दूसरे द्वारा लाये गये फल भी खाने के योग्य नहीं हैं। अपने
ही परिश्रम से स्वयं लाये हुए फल ही आहार के लिये योग्य हैं। देश, काल और वर्तमान आदि का पूर्ण ज्ञान होने
पर भी किसी प्रकार का संग्रह नहीं करना चाहिये। भाग्य पर विश्वास करके रहना चाहिये। दूसरे ने दिया हुआ
दान कभी भी नहीं लेना चाहिये। इस प्रकार का प्रतिग्रह लेने से वानप्रस्थ व्रत भंग होता है।
वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत् कालचोदितान्।
न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥ ७ ॥