श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 485, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४६९
चलती है। क्षत्रिय और वैश्य भी द्विजन्मा हैं लेकिन उन्हें गुरु होने का अधिकार नहीं है। इसलिये इन तीनों कर्मों
का निषेध ही किया गया है। अब ब्राह्मण का लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं कि हे उद्धव! उनके साधारण, श्रेष्ठ
और अत्यन्त श्रेष्ठ ये तीन भेद हैं।
प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्।
अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वा दोषदृक् तयोः ॥ ४१ ॥
स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण के पास तप, तेज, धैर्य और यश का संग्रह रहता है लेकिन प्रतिग्रह इन सबके विनाश
के लिये कारणीभूत होता है। स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण होते हुए जो प्रतिग्रह स्वीकार करता है उसे 'साधारण' ब्राह्मण
समझना चाहिये। यह एक प्रकार के ब्राह्मण का लक्षण है। जो ब्राह्मण प्रतिग्रह स्वीकार नहीं करता उसे याजन
और अध्यापन कर स्वधर्म से ही धन उपार्जन करना चाहिये और अपनी जीविका चलानी चाहिये। धन की आशा
मन में रख कर किसी से यज्ञ नहीं करवाना चाहिये तथा वेदाध्ययन कर शिष्य से द्रव्य की इच्छा नहीं करनी
चाहिये। जो वेदाध्ययन करा कर शिष्य से बिलकुल धन नहीं लेता, ऐसे वैराग्य से परिपूर्ण व्यक्ति ही 'शुद्ध
ब्राह्मण' है। उसका जीविकावर्तन भी बताता हूँ, सुनो। उसे 'शिल' वृत्ति से अथवा 'उंछ' वृत्ति से अपना उदर
निर्वाह करना चाहिये। उसका भी यथार्थ लक्षण बताता हूँ। कटाई के बाद खेत में जो बाल या दाने बचे रहते हैं
उस पर चरितार्थ चलाना, इसे शिलवृत्ति कहते हैं। अब 'उंछवृत्ति' का लक्षण सुनो। बाजार में कुछ ऐसे धान्य के
दाने मिलते हैं जिनका कोई मालिक नहीं होता। उन्हें इकट्ठा कर उस पर निर्वाह करना, इसी का नाम है
'उंछवृत्ति'। यही ब्राह्मण की अत्यन्त पवित्र स्थिति है। इसलिये श्रीकृष्ण ने इसके बारे में भी उद्धव को बताया।
ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।
कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च ॥ ४२ ॥
सभी वर्णों में उत्तम वर्ण ब्राह्मण का है। ब्राह्मण का देह भगवान ने किसी क्षुद्र काम के लिये नहीं बनाया
है। पशु-पक्षी आदि योनियों में काम के सिवा और कुछ नहीं होता। वही अगर ब्राह्मण के देह में हो तो फिर
उसकी विशेषता ही क्या है? स्वधर्म का अनुष्ठान करना यही ब्राह्मण के देह का कर्तव्य है। कृच्छ्रचांद्रायण आदि
तप उसे मेरे लिये ही करने चाहिये। मुझ अनंत को मन में धारण कर तथा पूर्ण वैराग्ययुक्त होकर जो ब्राह्मण
तपादि साधनों में अपने देह को निरन्तर कष्ट देते हैं उन्हें देह के पतन के बाद मेरे अनंत सुख की प्राप्ति होती है।
उस समय स्वर्गसुख आदि का ऐश्वर्य तत्काल लुप्त हो जाता है। जिस सुख की आनन्दमय स्थिति में संसार की
स्फूर्ति भी शेष नहीं रहती, जहाँ पुनः जन्म लेने का भय नष्ट हो जाता है, ऐसे सुख की प्राप्ति उन ब्राह्मणों को
होती है। कृच्छ्रादि साधनों के आश्रय से ब्राह्मणों को जिस ब्रह्मसुख की प्राप्ति होती है, शिलोछं वृत्ति की साधना
करने वालों को उसी सुख का वैभव प्राप्त होता है।
शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः।
मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठन् नातिप्रसक्तः समुपैति शान्तिम् ॥ ४३ ॥
जो ब्राह्मण शिल अथवा उंछवृत्ति धारण कर अपनी चित्तवृत्ति को सन्तुष्ट रखते हैं तथा विषय वैराग्य से
मुझे प्राप्त कर लेते हैं तथा अतिथि का मद्भाव से पूजन करते हैं, अतिथि के आने पर उसे प्राणांत होने पर भी
पराङ्मुख नहीं होने देते, समय पर अपनी भूख-प्यास का ख्याल न कर अतिथि को आवश्यक अन्न देते हैं, तथा