श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 481, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४६५
एवंवृत्ता गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जितः।
विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम्॥ ३०॥
सारे सुखोपभोग त्याग कर गुरु के घर रह कर वहाँ गुरु की सेवा के व्रत से ही वह सबका प्रिय बन जाता
है। इस प्रकार गुरुसेवा कर तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर, वेदशास्त्र में प्रवीण होकर सारा अध्ययन
समाप्त हो जाता है और सारी विद्या जब पूर्ण हो जाती है तो नैष्ठिक और उपकुर्वाण व्रत का पालन कैसे किया
जाय यह श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।
गुरवे विन्यसेद् देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः॥ ३१॥
ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते समय जो उसी आश्रम को निरन्तर चलते रखने का निश्चय करता है व वेदों
में लिखे अनुसार सत्यलोक से वैकुण्ठ तक मेरी प्राप्ति की इच्छा करता है। उसे स्वयं जीवनपर्यंत गुरुभजन
व्यवस्थित होने के लिये सारा देह ही गुरुचरण में अर्पित करना चाहिये। रोज नये प्रेम से गुरु का भजन करना
चाहिये। गुरुचरणों में आत्मभावना रखने से उसी की लगन लग जाती है। ऐसा पुरुष पहले से रखा हुआ
ब्रह्मचर्यव्रत आगे चालू रखता है और उसी को दृढ़ करता है। वही 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी बनता है और गुरुभजन पर
ही निश्चय रखता है। वह मानसम्मान की इच्छा नहीं करता, विषय से प्रेम नहीं रखता, संसार से मोह नहीं
रखता; अपने व्रत में दृढ़तापूर्वक लगा रहता है। ऐसे व्रत का पालन कर जो महान व्रतधारी बनता है, उसकी
गुरुजनों पर वैसी ही निष्ठा जमती है और वह सद्गुरु के साथ स्वाध्यायपूर्वक वेदांतरहस्य का ही विचार करता
रहता है। 'स्व' का अर्थ है आत्मा यह ध्यान में रखो। उसी का नित्य अनुसंधान करना, इसी को ज्ञानीजन
'स्वाध्याय' कहते हैं। इस प्रकार के साधक के लिये सर्वत्र ब्रह्म की ही भावना रखना उचित होता है। यही बात
श्रीकृष्ण अपने मुख से अगले श्लोक में बता रहे हैं।
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।
अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्यकल्मषः॥ ३२॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्यव्रत धारण करने से शरीर पर ब्रह्मतेज चढ़ता है। सद्गुरु के भजन से तथा आत्मवृत्ति से
वह निष्पाप हो जाता है। उसे अग्नि, गुरु, स्वयं तथा समस्त प्राणिमात्र में अभिन्न ब्रह्मभावना धारण कर निरन्तर
वही अनुसन्धान करते रहना चाहिये। ऐसा करने से जब भी कोई दृश्य पदार्थ उसकी दृष्टि के सामने आता है उसे
वह शुद्ध ब्रह्मरूप ही लगता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप होकर सद्भाव के साथ वह मेरी उपासना करता रहता है।
सारांश नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत वानप्रस्थ तथा संन्यासियों जैसा ही होता है। इसमें आचरण का जो प्रमुख धर्म है
उसका मर्म है त्याग।
स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।
प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा वन में रहने वाले वानप्रस्थ इन्हें मुख्य रूप से स्त्रियों की ओर नहीं देखना
चाहिये, यही उनका मुख्य धर्म है। यदि स्त्री दिखायी पड़े तो तत्काल अपनी झोपड़ी छोड़कर भाग जाना चाहिये।
फिर उससे बात करना कैसे सम्भव होगा? इन तीनों को स्वप्न में भी स्त्री का स्पर्श नहीं करना चाहिये। करने से