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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 869 में से

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पृष्ठ 474

४५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं है और निःशस्त्र है, उस पर वह आक्रमण नहीं करता, जो महाशूर होते हैं वे भागने वाले शत्रु पर भी प्रहार
नहीं करते। रणभूमि में शत्रु से सामना होने पर पीछे वे हटने का नाम नहीं लेते, अकेले ही हजारों वीरों का
सफाया कर देते हैं। स्वधर्म के अनुसार यही सच्ची वीरता है। सबसे बड़ा शत्रु मृत्यु है। उसके जैसा शत्रु अन्य
कोई नहीं है। वह उसी का विनाश कर देता है। उसकी वीरता का वर्णन देवदानव भी करते हैं। इस प्रकार अपने
शौर्य से सारी पृथ्वी को 'शत्रुरहित' कर देना यही 'शौर्य' है और यही क्षत्रिय धर्म के अनुसार क्षत्रियों का चौथा
गुण है। भले ही मस्तक पर शस्त्रों का प्रहार हो अथवा बाण शरीर में पूरी तरह घुस जाएँ लेकिन वह रणभूमि में
पीछे नहीं हटता यही क्षत्रियों की 'सहिष्णुता' है। हाथियों के झुण्ड सामने आ जाएँ, बड़े-बड़े वीर जोश में
सामना करने आ जाएँ लेकिन वह वीर शिरोमणि उनका वह आवेग सहन करता है। इसी का नाम है सच्ची
सहिष्णुता। समुद्र की लहरों के प्रहार से जिस प्रकार महापर्वत पीछे नहीं हटता, उसी प्रकार जो शत्रु की सेना के
प्रहार से रणभूमि से पीछे नहीं हटता अथवा यश अपयश, सुख-दुःख, हर्ष-विषाद क्षत्रिय के चित्त को बाधा नहीं
पहुँचाते। इसी को सम्पूर्ण सहिष्णुता कहते हैं। इसी को 'तितिक्षा' भी कहते हैं। यह क्षत्रियों का पाँचवाँ लक्षण
है। अब क्षत्रियों का औदार्य का गुण अर्थात् दातृत्व शक्ति के बारे में भी सुनो। क्षत्रियों के लिये धन तृणसमान
होता है इसलिये वे याचकों का मन तृप्त होने तक उसे दान देते रहते हैं। देश, काल, सत्पात्र देखकर
सम्मानपूर्वक तथा मन में किसी भी प्रकार का संकोच न लाकर विधिपूर्वक दान देना। चन्द्र एक बार चकोर को
देख भर ले फिर वह उसे अमृत देने में जिस प्रकार नहीं सकुचाता उसी प्रकार इसकी वृत्ति याचक के प्रति रहती
है। क्षत्रिय उससे कभी पीछे नहीं हटता। इस प्रकार स्वाभाविक रूप में दान देना यही क्षत्रियों का स्वाभाविक गुण
है। इसी का नाम है 'औदार्य'। यह क्षत्रियों का छठां लक्षण है। क्षत्रियों का परमार्थ प्राप्ति का उपाय है
स्वधर्मनिष्ठा। उसके अनुसार जो भी प्रयास किया जाता है उसे 'उद्यम' कहते हैं। अपने प्राण तक देकर गोब्राह्मण
की रक्षा करना, स्वधर्म से प्रजा का पालन करना और किसी को भी कष्ट न देकर पृथ्वी की रक्षा करना, इसी का
नाम 'उद्यम' है, इसे ध्यान में रखो। यही क्षत्रियों का सातवाँ लक्षण है। अब उनके धर्म के 'स्थैर्य' नामक गुण
का भी लक्षण सुनो। गोब्राह्मणों की रक्षा करते समय तथा स्वधर्म से प्रजा का पालन करते समय उनका मन थक
नहीं जाता। यही क्षत्रियों की स्थिरता है। स्वधर्म के प्रति यह 'स्थिरत्व' ही क्षत्रियों का आठवाँ लक्षण है। अब
उनका ब्राह्मण भक्ति का लक्षण बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियों को परमार्थ प्राप्ति के लिये ब्राह्मण 'गुरु' है। उस ब्राह्मण
का ब्रह्मभाव से भजन करना चाहिये। ब्राह्मण के प्रति ब्रह्मभावना रखकर, यथाविधि उनका सम्मान कर जो
प्रतिदिन भक्तिभाव से ब्राह्मण का पूजन करेगा उसमें मेरे ही प्रति भावना होगी, वह ब्राह्मणों को संतोष प्रदान
करेगा। उद्धव! यह मेरी आत्मा है। उसने मुझ श्रीकृष्ण की ही पूजा की ऐसा समझ लो। क्षत्रिय सम्मान के साथ
ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, इसीलिये उन्हें ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ब्राह्मण ब्राह्मणों का ही द्वेष करते हैं इसलिये वे
दारिद्रय का दुःख भोगते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण का भजन करने से मैं परब्रह्म उसके अधीन हो जाता हूँ। उसका
ऐश्वर्य का चिह्न यही दसवाँ लक्षण है। ब्राह्मण का भजन न करें तो ऐश्वर्य नहीं प्राप्त होगा; मैंने ब्राह्मण के पैर
अपने पेट से लगा लिये इसीलिये षड्गुण ऐश्वर्य सम्पन्न हो गया हूँ। ब्राह्मण भजन के मार्ग पर लगने पर
ब्रह्मसायुज्य पैरों का स्पर्श करता है फिर भी ब्राह्मण भजन के लिये भक्त उसे स्वीकार नहीं करते। ब्राह्मण भजन
करने से अपने आप ही मेरी सत्ता उनके पास आती है। इसलिये सचमुच ही उसकी आज्ञा देवदानव भी
शिरसावंद्य करते हैं। उसकी आज्ञा के भय से अकाल भी नहीं पड़ता। न्याय से प्रजा का पालन और धर्म का
संरक्षण भी उसके ही कारण होता है। इसी अत्यन्त उत्कृष्ट स्वधर्म के योग से भरत, पुरुरवा, जनक आदि ऐश्वर्य